एथिल अल्कोहल/इथेनॉल के गुणधर्म
1. अवस्था: यह कमरे के तापमान पर एक रंगहीन और अत्यधिक वाष्पशील द्रव है। 2. गंध और स्वाद: इसकी एक विशिष्ट तीखी गंध और जलने वाला स्वाद होता है। 3. क्वथनांक : इसका क्वथनांक 351 K (78.5 °C) होता है। 4. गलन…
इथेनॉल के भौतिक गुण:-
1. अवस्था: यह कमरे के तापमान पर एक रंगहीन और अत्यधिक वाष्पशील द्रव है।
2. गंध और स्वाद: इसकी एक विशिष्ट तीखी गंध और जलने वाला स्वाद होता है।
3. क्वथनांक : इसका क्वथनांक 351 K (78.5 °C) होता है।
4. गलनांक : इसका गलनांक 156 K (-114.1 °C) होता है।
5. घुलनशीलता : यह पानी में किसी भी अनुपात में पूरी तरह से घुलनशील है।
कारण: इसके अणुओं में पाया जाने वाला हाइड्रॉक्सिल समूह (-OH) पानी के अणुओं के साथ हाइड्रोजन बंध बनाता है, जिसके कारण यह जल के साथ-साथ कई कार्बनिक विलायकों में आसानी से मिल जाता है
6. ज्वलनशीलता यह एक अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ है। यह हवा की उपस्थिति में नीली लौ के साथ तेजी से जलता है।
इथेनॉल के रासायनिक गुण:-
1. दहन
इथेनॉल वायु (ऑक्सीजन) में नीली लौ के साथ जलकर कार्बन डाइऑक्साइड और जल बनाता है।
C₂H₅OH + 3O₂ → 2CO₂ + 3H₂O + ऊष्मा
2. सोडियम के साथ अभिक्रिया
इथेनॉल सोडियम धातु के साथ अभिक्रिया करके हाइड्रोजन गैस और सोडियम एथोक्साइड बनाता है।
2C₂H₅OH + 2Na → 2C₂H₅ONa + H₂ ↑
3. ऑक्सीकरण
क्षारीय पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO₄) की उपस्थिति में इथेनॉल ऑक्सीकृत होकर एथेनोइक अम्ल (एसिटिक एसिड) बनाता है।
CH₃CH₂OH + 2[O] → CH₃COOH + H₂O
4. सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ अभिक्रिया
इथेनॉल की सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) के साथ अभिक्रिया तापमान पर निर्भर करती है। इसकी दो मुख्य अभिक्रियाएं होती हैं -
(a)443 K (170°C) तापमान पर निर्जलीकरण
जब इथेनॉल को आधिक्य सांद्र H₂SO₄ के साथ 443 K पर गर्म किया जाता है, तो यह निर्जलीकृत होकर एथीन गैस बनाता है। यहाँ H₂SO₄ एक निर्जलीकारक (Dehydrating agent) के रूप में कार्य करता है।
CH₃CH₂OH → CH₂=CH₂ + H₂O
(b) 413 K (140°C) तापमान पर: ईथर का निर्माण
जब इथेनॉल के आधिक्य को सांद्र H₂SO₄ के साथ कम तापमान यानी 413 K पर गर्म किया जाता है, तो इथेनॉल के दो अणु आपस में जुड़कर डाईएथिल ईथर बनाते हैं।
2C₂H₅OH → C₂H₅-O-C₂H₅ + H₂O
5. एस्टरीकरण
जब इथेनॉल (C₂H₅OH) को सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) की कुछ बूंदों की उपस्थिति में एथेनोइक अम्ल /एसिटिक एसिड (CH₃COOH) के साथ गर्म किया जाता है, तो दोनों आपस में क्रिया करके एक मीठी और फल जैसी गंध वाला यौगिक बनाते हैं, जिसे ईस्टर (एथिल एथेनोएट) कहते हैं। इस पूरी प्रक्रिया को एस्टरीकरण कहते हैं।
यहाँ सांद्र H₂SO₄ एक अम्ल उत्प्रेरक और निर्जलीकारक के रूप में कार्य करता है जो अभिक्रिया में बनने वाले जल (H₂O) को सोख लेता है।
एथेनोइक अम्ल + इथेनॉल ──> एथिल एथेनोएट [ईस्टर] + जल
CH₃COOH + C₂H₅OH ───> CH₃COOC₂H₅ + H₂O
इथेनॉल के प्रमुख उपयोग
• विलायक के रूप में :- यह पानी के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण विलायक है। इसका उपयोग पेंट, वार्निश, गोंद, और रेजिन को घोलने में किया जाता है।
• दवाइयों और चिकित्सा में :- इसका उपयोग कफ सिरप, टॉनिक, टिंचर आयोडीन और घावों को साफ करने वाले एंटीसेप्टिक/सैनिटाइजर में किया जाता है।
• ईंधन के रूप में :- इसे पेट्रोल के साथ मिलाकर "गैसोहोल" या एथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल के रूप में गाड़ियों में स्वच्छ ईंधन की तरह उपयोग किया जाता है।
• प्रयोगशाला अभिकर्मक के रूप में :- रसायन विज्ञान की प्रयोगशालाओं में कई अन्य कार्बनिक यौगिकों (जैसे क्लोरोफॉर्म, ईथर, एथिन) के निर्माण में यह एक मुख्य प्रारंभिक पदार्थ है।
• पेय पदार्थों में :- इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के अल्कोहल पेय (जैसे वाइन, बीयर, व्हिस्की) के मुख्य घटक के रूप में होता है।
