अलंकार
अलंकार कविता का वह अनिवार्य और जादुई तत्व है, जो साधारण शब्दों में भी प्राण फूंक देता है और उसे पढ़ने वाले के हृदय तक सीधे पहुंचा देता है।


अलंकार कविता का वह अनिवार्य और जादुई तत्व है, जो साधारण शब्दों में भी प्राण फूंक देता है और उसे पढ़ने वाले के हृदय तक सीधे पहुंचा देता है।
1. अलंकार का अर्थ और परिभाषा :
जिस प्रकार आभूषण पहनने से किसी स्त्री के शरीर की सुंदरता बढ़ जाती है, उसी प्रकार काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्वों को अलंकार कहते हैं। अलंकार केवल कविता का बाहरी आवरण नहीं है, बल्कि यह शब्द और अर्थ की वह रहस्यमयी शक्ति है, जो सामान्य कथन को काव्य के उच्च शिखर पर स्थापित कर देती है।
अलंकार संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भामह ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'काव्यालंकार' में लिखा है -
"न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनितामुखम्।"
अर्थात् जिस प्रकार किसी सुंदर स्त्री का मुख स्वाभाविक रूप से सुंदर होने पर भी आभूषणों के बिना पूर्ण शोभा नहीं पाता, उसी प्रकार अलंकार-विहीन कविता भी सुशोभित नहीं होती।
2. अलंकार के प्रकार :
अलंकार के मुख्य रूप से दो प्रकार हैं-
शब्दालंकार: जब काव्य में शब्दों के कारण चमत्कार या सुंदरता उत्पन्न होती है, तब वहाँ शब्दालंकार होता है ,जैसे- अनुप्रास, यमक, श्लेष । यदि शब्द को हटाकर उसका पर्यायवाची रख दें, तो चमत्कार समाप्त हो जाता है।
अर्थालंकार: जब काव्य में अर्थ के कारण चमत्कार या सुंदरता उत्पन्न होती है, तब वहाँ अर्थालंकार होता है ,जैसे- उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा।
(यूपी बोर्ड कक्षा 10 के पाठ्यक्रम में हमें मुख्य रूप से अर्थालंकार उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा का ही अध्ययन करना है।)
3. प्रमुख अर्थालंकार :
१. उपमा अलंकार
परिभाषा: जब किसी व्यक्ति या वस्तु की तुलना किसी अन्य प्रसिद्ध व्यक्ति या वस्तु से उनके समान गुण, धर्म या रूप के आधार पर की जाती है, तो वहाँ उपमा अलंकार होता है। अथवा
समान गुण धर्म के आधार पर एक वस्तु की तुलना दुसरी प्रसिद्ध वस्तु से की जाती है तो, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
पहचानने की ट्रिक (वाचक शब्द): जिस कविता की पंक्ति में सा, सी, से, सम, सरिस, समान आदि शब्द आएं, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
उपमा के चार अंग होते हैं-
उपमेय: जिसकी तुलना की जाए।
उपमान: जिससे तुलना की जाए।
वाचक शब्द: तुलना प्रकट करने वाले शब्द सा, सी, सम आदि।
साधारण धर्म: वह गुण जिसके कारण तुलना की जा रही है।
उपमा अलंकार के 5 सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण:
पीपर पात सरिस मन डोला।
(मन पीपल के पत्ते के समान डोलने लगा।)
हरिपद कोमल कमल से।
(भगवान के चरण कमल के समान कोमल हैं।)
मुख मयंक सम मंजु मनोहर।
(मुख चंद्रमा के समान अत्यंत सुंदर और मनमोहक है।)
नवल सुंदर श्याम शरीर की, सजल नीरद-सी कल कांति थी।
(उनके नवीन और सुंदर साँवले शरीर की चमक जल से भरे हुए बादल के समान मनोहारी थी।)
प्रातः नभ था बहुत नीला शंख जैसे।
(प्रातः काल का आकाश शंख के समान बहुत नीला और निर्मल था।)
(विशेष टिप्पणी: इन सभी पंक्तियों में किसी एक वस्तु की तुलना किसी दूसरी प्रसिद्ध वस्तु से की गई है। यहाँ 'सरिस', 'से', 'सम', 'सी', और 'जैसे' वाचक शब्द हैं जो समानता (उपमा) को दर्शा रहे हैं।)
२. रूपक अलंकार
परिभाषा: जहाँ उपमेय और उपमान में कोई भेद न रहे, अर्थात् दोनों को एक ही मान लिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है। (यहाँ भेदरहित आरोप होता है।)
पहचानने की ट्रिक: इसमें प्रायः उपमेय और उपमान के बीच योजक चिह्न ( - ) लगा होता है और वाचक शब्दों (सा, सी, से) का प्रयोग नहीं होता। इसका अर्थ निकालने पर अक्सर "रूपी" शब्द आता है।
रूपक अलंकार के 5 सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण:
चरन - कमल बंदउँ हरिराई।
( मैं भगवान के कमल-रूपी चरणों की वंदना करता हूँ।)
मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहौं।
(अर्थ: माता मुझे चंद्रमा-रूपी खिलौना ही चाहिए।)
उदित उदयगिरि-मंच पर, रघुबर-बाल-पतंग।।
(अर्थ: उदयाचल पर्वत-रूपी मंच पर बाल-सूर्य-रूपी श्रीराम प्रकट हुए।)
पायो जी मैंने राम-रतन धन पायो।
(अर्थ: मैंने राम-नाम-रूपी रत्न प्राप्त कर लिया है।)
विषय-वारि मन-मीन भिन्न नहिं होत कबहुँ पल एक।
(अर्थ: विषय-वासना-रूपी जल से मन-रूपी मछली एक पल के लिए भी अलग नहीं होती है।)
३. उत्प्रेक्षा अलंकार
परिभाषा: जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। अर्थात, जब किसी एक वस्तु में किसी दूसरी वस्तु की कल्पना कर ली जाती है।
पहचानने की ट्रिक -जिस कविता की पंक्ति में वाचक शब्द मनु, मानो, जनु, जानो, मनहुँ, जनहुँ आदि शब्द आएं, वहाँ निश्चित रूप से उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
उत्प्रेक्षा अलंकार के 5 सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण:
1. सोहत ओढ़े पीत पटु, स्याम सलोने गात।
मनहुँ नीलमनि सैल पर, आतपु पर्यो प्रभात।।
(अर्थ: श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीला वस्त्र ऐसा लग रहा है मानो नीलमणि पर्वत पर सुबह की धूप पड़ी हो।)
2. उस काल मारे क्रोध के, तन काँपने उसका लगा।
मानो हवा के ज़ोर से, सोता हुआ सागर जगा।।
(अर्थ: क्रोध के कारण अर्जुन का शरीर इस प्रकार काँपने लगा, मानो हवा के तेज़ झोंके से सोता हुआ विशाल समुद्र जाग उठा हो।)
3. सिर फट गया उसका वहीं,
मानो अरुण रंग का घड़ा।
(अर्थ: उसका सिर वहीं इस प्रकार फट गया, मानो लाल रंग से भरा हुआ कोई घड़ा फूट गया हो।)
4. धाय धाम काम सब त्यागी।
मनहुँ रंक निधि लूटन लागी।।
(अर्थ: स्त्रियाँ अपने घर और सारे कामकाज छोड़कर इस प्रकार दौड़ीं, मानो कोई दरिद्र खजाना लूटने के लिए दौड़ पड़ा हो।)
5. चमचमात चंचल नयन, बिच घूँघट पट झीन।
मानहुँ सुरसरिता बिमल, जल उच्छरत जुग मीन।।
(अर्थ: झीने घूँघट के बीच से चमकते हुए चंचल नेत्र ऐसे लग रहे हैं, मानो गंगा के पवित्र जल में दो मछलियाँ उछल रही हों।)
निष्कर्ष:
उपमा (तुलना): चाँद के समान मुखड़ा। (समान,सा,सी)
रूपक (अभेद): चाँद-रूपी मुखड़ा। (योजक चिह्न)
उत्प्रेक्षा (कल्पना): मुखड़ा ऐसा है मानो चाँद हो। (मानो,मनहुँ)