अलंकार
साहित्य में अलंकार का प्रयोग केवल शब्दों की बाजीगरी या कृत्रिम सजावट के लिए नहीं होता। इसका मनोवैज्ञानिक आधार मनुष्य की अभिव्यक्ति की विशिष्टता की चाह है।जब कवि के हृदय में कोई भाव अत्यधिक तीव्र हो जा…


साहित्य में अलंकार का प्रयोग केवल शब्दों की बाजीगरी या कृत्रिम सजावट के लिए नहीं होता। इसका मनोवैज्ञानिक आधार मनुष्य की अभिव्यक्ति की विशिष्टता की चाह है।जब कवि के हृदय में कोई भाव अत्यधिक तीव्र हो जाता है,तो साधारण भाषा उस असीमित भाव को व्यक्त करने में असमर्थ हो जाती है। तब कवि भाषा को मोड़ता है, शब्दों में संगीत (शब्दालंकार) भरता है, और अर्थों में गहरी तुलना या कल्पना (अर्थालंकार) का सहारा लेता है।
अलंकार का अर्थ और परिभाषा :
काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्वों को अलंकार कहते हैं। अलंकार का सबसे पहला और मुख्य कार्य कविता की सुंदरता को बढ़ाना है। जिस प्रकार गहने पहनने से शरीर की सुंदरता कई गुना बढ़ जाती है उसी प्रकार अलंकारों के प्रयोग से साधारण शब्द और अर्थ भी चमत्कारी और मनमोहक बन जाते हैं। अलंकार के विषय मे विभिन्न आचार्यों का मत निम्नलिखित है -
अलंकार संप्रदाय के जनक आचार्य भामह माने जाते हैं। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ काव्यालंकार में सबसे पहले अलंकार के महत्व को दृढ़ता के साथ स्थापित किया था। आचार्य भामह ने लिखा -''न कान्तमपि निर्भूषं विभाति वनितामुखम्।'' अर्थात जिस प्रकार किसी सुंदर स्त्री का मुख भी बिना आभूषणों के आकर्षक नहीं लगता, ठीक उसी प्रकार अलंकारों के बिना कोई भी कविता सुंदर और प्रभावशाली नहीं हो सकती।
रीतिकाल के प्रमुख कवि केशवदास ने अपनी रचनाओं में अलंकारों का इतना अद्भुत प्रयोग किया कि उन्हें अलंकारवादी आचार्य कहा जाने लगा। उन्होंने कहा - ''जदपि सुजाति सुलच्छनी सुबरन सरस सुवृत्त भूषन बिनु न बिराजई कविता बनिता मित्त।'' अर्थात कविता और स्त्री दोनों ही सुंदर लक्षणों वाले हों, सुंदर रंग और अक्षरों वाले हों तथा सरस स्वभाव वाले हों, परंतु आभूषणों या अलंकारों के बिना वे कभी सुशोभित नहीं होते।
आचार्य वामन का कथन - ''सौंदर्यमलंकारः।'' अर्थात सौंदर्य ही अलंकार है।
आचार्य दंडी का कथन - ''काव्य शोभा करान धर्मान अलंकारान प्रचक्षते।'' अर्थात काव्य की शोभा या सुंदरता बढ़ाने वाले धर्म गुण या तत्व ही अलंकार कहलाते हैं।
इन सभी आचार्यों के कथन को दृष्टिगत रखते हुए हम कह सकते हैं कि अलंकार कविता का वह अनिवार्य और जादुई तत्व है, जो साधारण शब्दों में भी प्राण फूंक देता है और उसे पढ़ने वाले के हृदय तक सीधे पहुंचा देता है।
अलंकार के भेद :
अलंकार के मुख्य रूप से दो भेद होते हैं -
1. शब्दालंकार और 2. अर्थालंकार।
शब्दालंकार - जहां काव्य में शब्दों के विशेष प्रयोग के कारण चमत्कार या सौंदर्य उत्पन्न होता है।
अर्थालंकार - जहां काव्य में अर्थ के कारण चमत्कार या सौंदर्य उत्पन्न होता है।
विशेष :
1. अनुप्रास और यमक जैसे शब्दालंकारों के प्रयोग से कविता में एक अद्भुत नाद या ध्वनि सौंदर्य उत्पन्न होता है। शब्दों की यह विशेष सजावट कविता में संगीतात्मकता लाती है, जिससे कविता पढ़ने और सुनने में बहुत मधुर लगती है।
2. उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा जैसे अर्थालंकारों के प्रयोग से कवि नई नई कल्पनाएं करता है। वह दो अलग अलग वस्तुओं में समानता खोजता है जिससे साहित्य का दायरा बढ़ता है और पाठकों की सोचने समझने की क्षमता का भी विकास होता है।
शब्दालंकार के प्रकार :
1. अनुप्रास अलंकार
जहां किसी काव्य पंक्ति में एक ही व्यंजन वर्ण की आवृत्ति बार बार स्वरूपता और क्रमशः होती है, वहां अनुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण 1: तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
(सूर्य की पुत्री यमुना के किनारे तमाल के बहुत से सुंदर वृक्ष छाए हुए हैं। यहां त वर्ण की आवृत्ति हुई है।)
उदाहरण 2: चारु चंद्र की चंचल किरणें खेल रही हैं जल थल में।
(सुंदर चंद्रमा की चंचल किरणें जल और थल में क्रीड़ा कर रही हैं। यहां च वर्ण की आवृत्ति हुई है।)
उदाहरण 3: मुदित महीपति मंदिर आए।
(प्रसन्न होकर राजा अपने महल में आए। यहां म वर्ण की आवृत्ति हुई है।)
उदाहरण 4: रघुपति राघव राजा राम।
(रघुकुल के स्वामी राजा राम का स्मरण किया गया है। यहां र वर्ण की आवृत्ति हुई है।)
उदाहरण 5: कल कानन कुंडल मोरपखा उर पे बनमाल बिराजति है।
(कानों में कुंडल और सिर पर मोर पंख धारण किए हुए भगवान कृष्ण के हृदय पर वनमाला सुशोभित है। यहां क वर्ण की आवृत्ति हुई है।)
2. यमक अलंकार
जहां काव्य में कोई शब्द एक से अधिक बार आए, परंतु हर बार उसका अर्थ अलग अलग हो वहां यमक अलंकार होता है।
उदाहरण 1: कनक कनक ते सौगुनी मादकता अधिकाय।
(यहां पहले कनक का अर्थ धतूरा और दूसरे कनक का अर्थ सोना है।)
उदाहरण 2: काली घटा का घमंड घटा।
(यहां पहली घटा का अर्थ काले बादल और दूसरी घटा का अर्थ कम होना है।)
उदाहरण 3: तीन बेर खाती ते वे तीन बेर खाती हैं।
(यहां पहले बेर का अर्थ समय या बार है और दूसरे बेर का अर्थ एक प्रकार का फल है।)
उदाहरण 4: सजना है मुझे सजना के लिए।
(यहां पहले सजना का अर्थ श्रृंगार करना और दूसरे सजना का अर्थ पति या प्रियतम है।)
उदाहरण 5: जगती जगती की मूक प्यास।
(यहां पहली जगती का अर्थ जागना और दूसरी जगती का अर्थ पृथ्वी है।)
3. श्लेष अलंकार
जहां काव्य में कोई शब्द केवल एक बार आए, परंतु उसके एक से अधिक अर्थ निकलें, वहां श्लेष अलंकार होता है।
उदाहरण 1: रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून।
(यहां दूसरी पंक्ति के पानी शब्द के तीन अर्थ हैं। मोती के संदर्भ में चमक मनुष्य के संदर्भ में सम्मान और चून के संदर्भ में जल।)
उदाहरण 2: सुबरन को खोजत फिरत कवि व्यभिचारी चोर।
(यहां सुबरन शब्द के तीन अर्थ हैं। कवि के लिए सुंदर अक्षर व्यभिचारी के लिए सुंदर रंग रूप वाली स्त्री और चोर के लिए सोना।)
उदाहरण 3: जो रहीम गति दीप की कुल कपूत गति सोय बारे उजियारो करे बढ़े अंधेरो होय।
(यहां बारे शब्द के दो अर्थ हैं जलने पर और बचपन में। इसी तरह बढ़े शब्द के भी दो अर्थ हैं बुझने पर और बड़ा होने पर।)
उदाहरण 4: मंगन को देखि पट देत बार बार है।
(यहां पट शब्द के दो अर्थ हैं पहला अर्थ वस्त्र है और दूसरा अर्थ दरवाजा है।)
उदाहरण 5: मधुबन की छाती को देखो सूखी इसकी कितनी कलियां।
(यहां कलियां शब्द के दो अर्थ हैं पहला अर्थ खिलने से पहले का फूल और दूसरा अर्थ यौवन आने से पहले की अवस्था है।)
अर्थालंकार के प्रकार :
1. उपमा अलंकार
जहां किसी एक वस्तु या व्यक्ति की तुलना किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या व्यक्ति से उसके रूप गुण या स्वभाव के आधार पर की जाती है, वहां उपमा अलंकार होता है।
अथवा
एक वस्तु की तुलना, दूसरी वस्तु से गुण धर्म के आधार पर की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
पहचान - सा सी से सम सरिस समान।
उदाहरण 1: पीपर पात सरिस मन डोला।
(मन पीपल के पत्ते के समान चंचल होकर डोलने लगा। यहां मन की तुलना पीपल के पत्ते से की गई है।)
उदाहरण 2: मुख मयंक सम मंजु मनोहर।
(मुख चंद्रमा के समान सुंदर और मन को हरने वाला है। यहां मुख की तुलना चंद्रमा से की गई है।)
उदाहरण 3: हाय फूल सी कोमल बच्ची हुई राख की थी ढेरी।
(फूल के समान अत्यंत कोमल बच्ची जलकर राख की ढेरी हो गई थी। यहां बच्ची की तुलना फूल से की गई है।)
उदाहरण 4: हरिपद कोमल कमल से।
(भगवान के चरण कमल के समान कोमल हैं। यहां चरणों की तुलना कमल से की गई है।)
उदाहरण 5: नील गगन सा शांत हृदय था हो रहा।
(हृदय नीले आकाश के समान शांत हो रहा था। यहां हृदय की तुलना आकाश से की गई है।)
2. रूपक अलंकार
जहां उपमेय और उपमान में कोई अंतर न दिखाई दे अर्थात दोनों को एक ही मान लिया जाए वहां रूपक अलंकार होता है।
अथवा
जहां उपमेय और उपमान में भेदरहित आरोप हो, वहाँ रूपक अलंकार होता है।
उदाहरण 1: चरन - कमल बंदौ हरि राई।
(मैं भगवान के कमल रूपी चरणों की वंदना करता हूं। यहां चरणों को ही कमल मान लिया गया है।)
उदाहरण 2: मैया मैं तो चंद्र - खिलौना लैहों।
(भगवान कृष्ण माता यशोदा से चंद्रमा रूपी खिलौना मांग रहे हैं। यहां चंद्रमा को ही खिलौना मान लिया गया है।)
उदाहरण 3: पायो जी मैंने राम - रतन धन पायो।
(मीराबाई कहती हैं कि मैंने राम नाम रूपी रत्न और धन प्राप्त कर लिया है। यहां राम के नाम को ही धन मान लिया गया है।)
उदाहरण 4: मुनि पद - कमल बंदि दोउ भ्राता।
(दोनों भाइयों ने मुनि के कमल रूपी चरणों की वंदना की। यहां चरणों पर कमल का अभेद आरोप है।)
उदाहरण 5: उदित उदयगिरि - मंच पर रघुवर बाल - पतंग।
(उदयाचल रूपी मंच पर राम रूपी बाल सूर्य उदित हो गए हैं। मंच पर पर्वत का और राम पर सूर्य का अभेद आरोप है।)
3. उत्प्रेक्षा अलंकार
जहां उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाती है वहां उत्प्रेक्षा अलंकार होता है।
पहचान - इसमें मनु मानो मनहु, जनु जानो जानहु आदि शब्दों का प्रयोग होता है।
उदाहरण 1: सोहत ओढ़े पीत पट स्याम सलोने गात मनहु नीलमनि सैल पर आतप परयो प्रभात।
(श्रीकृष्ण के सांवले शरीर पर पीले वस्त्र ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो नीलमणि पर्वत पर सुबह की धूप पड़ रही हो।)
उदाहरण 2: कहती हुई यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए।
(उत्तरा की आंखों में आंसू ऐसे लग रहे हैं मानो ओस के कणों से कमल के नए फूल भर गए हों।)
उदाहरण 3: ले चला साथ मैं तुझे कनक ज्यों भिक्षुक लेकर स्वर्ण झनक।
(कवि धतूरे को इस प्रकार साथ ले जा रहा है मानो कोई भिखारी सोना ले जा रहा हो।)
उदाहरण 4: पद्मावती सब सखी बुलाई जनु फुलवारी सबै चली आई।
(पद्मावती ने अपनी सभी सखियों को बुलाया और वे ऐसी लग रही थीं मानो पूरी फुलवारी ही चली आई हो।)
उदाहरण 5: उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उसका लगा मानो हवा के ज़ोर से सोता हुआ सागर जगा।
(अर्जुन का शरीर क्रोध से ऐसे कांपने लगा मानो तेज हवा के झोंके से सोता हुआ समुद्र जाग उठा हो।)
4. संदेह अलंकार
जहां किसी वस्तु को देखकर उसमें किसी अन्य वस्तु का संशय या शक बना रहे और निश्चय न हो पाए वहां संदेह अलंकार होता है।
उदाहरण 1: सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है सारी ही कि नारी है कि नारी ही कि सारी है।
(दुशासन को यह संदेह हो रहा है कि साड़ी के बीच में द्रौपदी है या द्रौपदी के बीच में साड़ी है साड़ी ही द्रौपदी बन गई है या द्रौपदी ही साड़ी बन गई है।)
उदाहरण 2: यह काया है या शेष उसी की छाया।
(नायिका अत्यंत दुर्बल हो गई है जिसे देखकर यह संदेह होता है कि यह उसका शरीर है या केवल उसकी परछाई बची है।)
उदाहरण 3: यह मुख है या चंद्र है।
(मुख की सुंदरता देखकर यह संदेह हो रहा है कि यह मुख है या चंद्रमा है।)
उदाहरण 4: हरिमुख यह आलि किधौं मयंक।
(सखी को यह संदेह हो रहा है कि यह भगवान का मुख है या चंद्रमा है।)
उदाहरण 5: तारे आसमान के हैं आए मेहमान बन या कि यह मधुमास है या कि यह वसंत है।
(आकाश के तारों को देखकर यह शक हो रहा है कि ये मेहमान बनकर आए हैं या वसंत ऋतु आ गई है।)
5. भ्रांतिमान अलंकार
जहां समानता के कारण किसी एक वस्तु को भ्रमवश दूसरी वस्तु मान लिया जाता है और उसी के अनुसार कार्य भी कर दिया जाता है वहां भ्रांतिमान अलंकार होता है।
उदाहरण 1: नाक का मोती अधर की कांति से बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से।
(तोता नायिका की नाक के मोती को लाल होठों की चमक के कारण अनार का दाना समझ लेता है।)
उदाहरण 2: मुन्ना तब मम्मी के सिर पर देख देख दो चोटी भाग उठा भय मानकर सिर पर सांपिन लोटी।
(बच्चा अपनी मां के सिर पर दो चोटियां देखकर उन्हें सांप समझ लेता है और डर कर भाग जाता है।)
उदाहरण 3: जानि स्याम को स्याम घन नाच उठे बन मोर।
(वन के मोर भगवान श्रीकृष्ण के सांवले शरीर को देखकर उन्हें काले बादल समझ लेते हैं और खुशी से नाचने लगते हैं।)
उदाहरण 4: ओस बिंदु चुग रही हंसिनी मोती उनको जान।
(हंसिनी ओस की बूंदों को सच्चा मोती समझकर चुग रही है।)
उदाहरण 5: बिल विचार कर नाग शुंड में घुसने लगा विषैला सांप।
(विषैला सांप हाथी की सूंड को बिल समझकर उसमें घुसने लगा।)
6. अनन्वय अलंकार
जहां उपमेय की तुलना करने के लिए कोई उपमान नहीं मिलता और उपमेय को ही उपमान बना दिया जाता है वहां अनन्वय अलंकार होता है।
उदाहरण 1: राम से राम सिया सी सिया।
(राम के समान केवल राम ही हैं और सीता के समान केवल सीता ही हैं।)
उदाहरण 2: भारत के सम भारत है।
(भारत देश की तुलना किसी और देश से नहीं की जा सकती भारत के समान केवल भारत ही है।)
उदाहरण 3: मुख मुख के ही समान सुंदर है।
(मुख इतना सुंदर है कि उसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती मुख केवल मुख के ही समान है।)
उदाहरण 4: यद्यपि अति आरत मारत है भारत के सम भारत है।
(भले ही कितने भी कष्ट हों लेकिन भारत देश अद्वितीय है और भारत के समान केवल भारत है।)
उदाहरण 5: नागर नंदकिसोर से नागर नंदकिसोर।
(चतुर भगवान कृष्ण के समान केवल चतुर भगवान कृष्ण ही हैं उनके जैसा कोई दूसरा नहीं है।)
7. प्रतीप अलंकार
प्रतीप का अर्थ होता है उल्टा या विपरीत। यह उपमा अलंकार का ठीक उल्टा होता है। जहां प्रसिद्ध उपमान को उपमेय से हीन बताकर उपमेय की प्रशंसा की जाए वहां प्रतीप अलंकार होता है।
उदाहरण 1: सिय मुख समता किमि करै चंद बापुरो रंक।
(बेचारा गरीब चंद्रमा सीता जी के मुख की बराबरी कैसे कर सकता है। यहां उपमान चंद्रमा को उपमेय मुख से हीन बताया गया है।)
उदाहरण 2: उसी तपस्वी से लंबे थे देवदारू दो चार खड़े।
( देवदारू के वृक्ष उस तपस्वी के समान लंबे थे। यहां देवदारू उपमान को तपस्वी उपमेय के समान बताया गया है।)
उदाहरण 3: मुख सा चंद्र है।
(चंद्रमा मुख के समान है। यहां चंद्रमा की तुलना मुख से की गई है जो उपमा का उल्टा है।)
उदाहरण 4: गर्व करो रघुनंदन जिन मन मांहि देखहु आपन मूरति सिय के छांहि।
(राम अपनी परछाई सीता में देखकर गर्व कर रहे हैं। यहां राम उपमान हैं और परछाई उपमेय है।)
उदाहरण 5: नेत्र के समान कमल है।
(कमल की सुंदरता को नेत्र के समान बताया गया है जबकि सामान्यतः नेत्र को कमल के समान बताया जाता है।)
8. दृष्टांत अलंकार
जहां पहले कोई सामान्य बात कहकर फिर उससे मिलती जुलती दूसरी बात उदाहरण के रूप में कही जाए और दोनों में बिंब प्रतिबिंब का भाव हो वहां दृष्टांत अलंकार होता है।
उदाहरण 1: सठ सुधरहिं सतसंगति पाई पारस परस कुधात सुहाई।
(दुष्ट लोग भी अच्छी संगति पाकर सुधर जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे पारस पत्थर के स्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है।)
उदाहरण 2: एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं रह सकती हैं किसी और पर प्रेम नारियां पति का क्या सह सकती हैं।
(जिस तरह एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं उसी तरह कोई भी पत्नी अपने पति का किसी दूसरी स्त्री से प्रेम सहन नहीं कर सकती।)
उदाहरण 3: करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान।
(लगातार अभ्यास करने से मूर्ख व्यक्ति भी बुद्धिमान बन जाता है जिस प्रकार कुएं की मुंडेर के पत्थर पर रस्सी के बार बार रगड़ने से निशान पड़ जाते हैं।)
उदाहरण 4: पापी मनुज भी आज मुख से राम नाम निकालते देखो भयंकर भेड़िए भी आज आंसू ढालते।
(जब पापी मनुष्य भगवान का नाम लेने लगते हैं तो ऐसा लगता है जैसे भयंकर भेड़िए भी दया दिखाकर आंसू बहा रहे हों।)
उदाहरण 5: शिव द्रोही मम दास कहावा सो नर मोहि सपनेहुं नहिं भावा।
(जो शिव का विरोध करता है और राम का भक्त होने का दावा करता है वह व्यक्ति राम को सपने में भी पसंद नहीं आता।)
9. अतिशयोक्ति अलंकार
जहां किसी व्यक्ति वस्तु या घटना का वर्णन इतना बढ़ा चढ़ा कर किया जाए कि लोक सीमा या मर्यादा का उल्लंघन हो जाए, वहां अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
उदाहरण 1: आगे नदियां पड़ी अपार घोड़ा कैसे उतरे पार राणा ने सोचा इस पार तब तक चेतक था उस पार।
(महाराणा प्रताप अभी सोच ही रहे थे कि इतनी बड़ी नदी कैसे पार की जाए तब तक उनका घोड़ा चेतक नदी के उस पार पहुंच गया। यहां सोचने से पहले ही नदी पार करने का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है।)
उदाहरण 2: हनुमान की पूंछ में लगन न पाई आग लंका सगरी जल गई गए निशाचर भाग।
(हनुमान जी की पूंछ में अभी आग लग भी नहीं पाई थी कि उससे पहले ही पूरी लंका जलकर राख हो गई और सारे राक्षस भाग गए। यह अत्यंत बढ़ा चढ़ा कर किया गया वर्णन है।)
उदाहरण 3: बाण नहीं पहुंचे शरीर तक शत्रु गिरे पहले ही भू पर।
(योद्धा के बाण अभी शत्रु के शरीर तक पहुंचे भी नहीं थे कि शत्रु पहले ही डर कर जमीन पर गिर पड़े।)
उदाहरण 4: देख लो साकेत नगरी है यही स्वर्ग से मिलने गगन में जा रही।
(साकेत नगरी की इमारतें इतनी ऊंची हैं कि कवि कह रहा है कि वे स्वर्ग से मिलने के लिए आकाश में जा रही हैं।)
उदाहरण 5: परवल पाक फाट हिय गोहूं।
(विरह की गर्मी इतनी तेज है कि परवल पक गए हैं और गेहूं का हृदय फट गया है। यह विरह ताप का अत्यंत बढ़ा चढ़ा कर वर्णन है।)