उद्धव - प्रसंग
उद्धव-प्रसंग' की यह अत्यंत मार्मिक और भावपूर्ण कथा मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध 46वें और 47वें अध्याय से ली गई है。 हिंदी साहित्य में इस कथानक को 'भ्रमरगीत' परंपरा के नाम से जाना…


उद्धव-प्रसंग' की यह अत्यंत मार्मिक और भावपूर्ण कथा मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध 46वें और 47वें अध्याय से ली गई है。 हिंदी साहित्य में इस कथानक को 'भ्रमरगीत' परंपरा के नाम से जाना जाता है, जिसे भक्तिकाल में महाकवि सूरदास जी ने 'सूरसागर' में अमर किया और आधुनिक काल में जगन्नाथदास 'रत्नाकर' जी ने ब्रजभाषा के इस विख्यात काव्य में पिरोया है I
श्रीकृष्ण का लालन-पालन ब्रज में माता यशोदा, नंद बाबा, गोपियों और ग्वाल-बालों के अगाध और निश्छल प्रेम के बीच हुआ था। परंतु जब कंस का अत्याचार बहुत बढ़ गया, तो श्रीकृष्ण को ब्रज छोड़कर मथुरा जाना पड़ा। मथुरा जाकर उन्होंने कंस का वध किया और वहाँ के राजा बने। मथुरा के राजसी वैभव में रहने के बाद भी श्रीकृष्ण का मन सदा ब्रजवासियों और गोपियों के निश्छल प्रेम को याद करके व्याकुल रहता था। वे अक्सर ब्रज की कुंज गलियों और सखाओं को याद कर भावुक हो उठते थे।
मथुरा में श्रीकृष्ण के एक परम मित्र और मंत्री थे, जिनका नाम उद्धव था। उद्धव परम ज्ञानी थे और निर्गुण निराकार ब्रह्म के बहुत बड़े उपासक थे। उन्हें अपने ज्ञान और योग-साधना पर बहुत अहंकार था। वे प्रेम और भक्ति जैसी सगुण भावनाओं को तुच्छ समझते थे I श्रीकृष्ण ने उद्धव के इस ज्ञान के अहंकार को दूर करने के लिए और साथ ही विरह में तड़पती हुई गोपियों को सांत्वना देने के लिए एक योजना बनाई। उन्होंने उद्धव से कहा कि वे उनका पत्र लेकर ब्रज जाएँ, वहाँ व्याकुल गोपियों को अपने निर्गुण ब्रह्म और योग का उपदेश देकर शांत करें। उद्धव सहर्ष तैयार हो गए और रथ पर सवार होकर ब्रज की ओर चल पड़े। रत्नाकर जी द्वारा रचित 'उद्धव-प्रसंग' कविता ठीक इसी मोड़ से शुरू होती है, जब उद्धव ब्रज की सीमा में प्रवेश करते हैं I

छंद 1: उद्धव के ब्रज आगमन पर गोपियों की व्याकुलता
प्रसंग :
प्रस्तुत छंद में कृष्ण के परम मित्र उद्धव के मथुरा से ब्रज आने का समाचार सुनकर व्याकुल और उत्सुक गोपियों की दशा का सजीव वर्णन किया गया है।
पंक्ति 1 :
भेजे मनभावन के ऊधव के आवन की
शब्दार्थ :
मनभावन ➔ मन को अच्छे लगने वाले श्रीकृष्ण
ऊधव ➔ उद्धव
आवन की ➔ आने की
व्याख्या : मन को अत्यधिक प्रिय लगने वाले प्रियतम श्रीकृष्ण द्वारा भेजे गए उद्धव के ब्रज में आने की...
पंक्ति 2 :
सुधि ब्रज-गाँवनि मैं पावन जबै लगीं।
शब्दार्थ :
सुधि ➔ समाचार, खबर
ब्रज-गाँवनि ➔ ब्रज के गाँवों में
पावन लगीं ➔ प्राप्त होने लगी, फैलने लगी
व्याख्या : ...यह समाचार जैसे ही ब्रज के अलग-अलग गाँवों में गोपियों को प्राप्त होने लगी।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' गुवालिनि की झौरि-झौरि-
शब्दार्थ :
गुवालिनि ➔ गोपियाँ
झौरि-झौरि ➔ समूह के समूह, झुंड के झुंड
व्याख्या : कवि रत्नाकर जी कहते हैं कि वह सुखद समाचार सुनते ही गोपियों के झुंड के झुंड और समूह उमड़ पड़े और...
पंक्ति 4 :
दौरि-दौरि नंद-पौरि आवन तबै लगीं।।
शब्दार्थ :
दौरि-दौर ➔ दौड़-दौड़कर
नंद-पौरि ➔ नंद जी के द्वार पर
तबै लगीं ➔ तब से ही आने लगीं
व्याख्या : ...वे सभी व्याकुल होकर दौड़-दौड़कर नंद बाबा के द्वार पर एकत्रित होने लगीं।
पंक्ति 5 :
उझकि-उझकि पद-कंजनि के पंजनि पै
शब्दार्थ :
उझकि-उझकि ➔ एड़ी उठाकर देखने का प्रयास करना
पद-कंजनि ➔ कमल रूपी चरण
पंजनि पै ➔ पंजों के बल पर खड़े होकर।
व्याख्या : उद्धव के हाथ में कृष्ण का पत्र देखने के लिए वे अपने कमल जैसे कोमल चरणों के पंजों के बल उचक-उचक कर देखने लगीं।
पंक्ति 6 :
पेखि-पेखि पाती छाती छोहनि छबै लगीं।
शब्दार्थ :
पेखि-पेखि ➔ देख-देख कर
पाती ➔ पत्र, चिट्ठी
छोहनि ➔ प्रेम, करुणा की उमंग से
छबै लगीं ➔ स्पर्श करने लगीं, भावविह्वल होने लगीं
व्याख्या : प्रियतम कृष्ण के उस पत्र को देख-देखकर उनका हृदय प्रेम और अनुराग की तीव्र उमंग से भर गया।
पंक्ति 7 :
हमकौं लिख्यौ है कहा, हमकौं लिख्यौ है कहा,
शब्दार्थ :
हमकौं ➔ हमारे लिए
लिख्यौ है कहा ➔ क्या लिखा है
व्याख्या : वे उत्सुकता वश उद्धव से बार-बार एक ही सवाल पूछने लगीं कि हमारे आराध्य ने हमारे लिए इस पत्र में क्या लिखा है? हमारे लिए क्या संदेश भेजा है?
पंक्ति 8 :
हमकौं लिख्यौ है कहा कहन सबै लगीं ।1।
शब्दार्थ :
कहन सबै लगीं ➔ सभी पूछने लगीं, सभी कहने लगीं
व्याख्या : हाँ, बताओ हमारे लिए विशेष रूप से क्या लिखा है?"ऐसा सभी गोपियाँ एक साथ मिलकर व्याकुल होकर पूछने लगीं।

छंद 2: उद्धव का गोपियों को निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देना
प्रसंग :
इस छंद में उद्धव गोपियों के प्रेम और व्याकुलता को देखकर उन्हें कृष्ण के सगुण रूप को भूलकर निराकार ब्रह्म की साधना करने का योग-उपदेश दे रहे हैं।
पंक्ति 1 :
चाहत जौ स्वबस सँजोग स्याम-सुंदर कौ
शब्दार्थ :
जौ ➔ यदि
स्वबस ➔ अपने वश में
सँजोग ➔ मिलन, संयोग
स्याम-सुंदर कौ ➔ श्याम सुंदर कृष्ण का
व्याख्या : उद्धव गोपियों से कहते हैं कि यदि तुम सचमुच श्याम-सुंदर श्रीकृष्ण का शाश्वत मिलन अपने वश में करना चाहती हो,
पंक्ति 2 :
जोग के प्रयोग मैं हियौ तौ बिलस्यो रहै।
शब्दार्थ :
जोग ➔ योग साधना
हियौ ➔ हृदय
बिलस्यो रहै ➔ आनंदित, लीन रहे
व्याख्या : तो तुम्हें इस विरह-वेदना से हटकर योग साधना के अभ्यास में अपने हृदय को लीन करना होगा।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' सु-अंतर-मुखी है ध्यान
शब्दार्थ :
सु-अंतर-मुखी ➔ अंतर्मुखी, भीतर की ओर देखना
ध्यान ➔ एकाग्रता
व्याख्या : कवि रत्नाकर कहते हैं कि उद्धव उपदेश देते हैं कि बाहरी दुनिया से दृष्टि हटाकर अंतर्मुखी होकर ध्यान लगाओ,
पंक्ति 4 :
मंजु हिय-कंज-जगी जोति मैं धस्यो रहै।।
शब्दार्थ :
मंजु ➔ सुंदर
हिय-कंज ➔ हृदय रूपी कमल
जोति ➔ ज्ञान का प्रकाश
धस्यो रहै ➔ डूबा रहे
व्याख्या : जिससे तुम्हारे सुंदर हृदय-कमल के भीतर जो ब्रह्म की ज्ञान-ज्योति जल रही है, तुम्हारा मन सदा उसी में समाया रहे।
पंक्ति 5 :
ऐसें करौं लीन आतमा कौ परमातमा मैं
शब्दार्थ :
आतमा ➔ आत्मा
परमातमा ➔ परमात्मा
व्याख्या : तुम योग के माध्यम से अपनी अंतरात्मा को उस सर्वव्यापी परमात्मा में इस प्रकार एकाकार कर लो,
पंक्ति 6 :
जामैं जड़-चेतन-बिलास बिकस्यो रहै।
शब्दार्थ :
जामैं ➔ जिसमें
जड़-चेतन-बिलास ➔ सजीव और निर्जीव संसार का आनंद
बिकस्यो रहै ➔ विकसित, प्रकट होता है
व्याख्या : जिस परमात्मा के भीतर इस संपूर्ण जड़ और चेतन संसार का अलौकिक विलास या आनंद सदैव पल्लवित होता रहता है।
पंक्ति 7 :
मोह-बस जोहत बिछोह जिय जाकौ छोहि
शब्दार्थ :
मोह-बस ➔ सांसारिक मोह के कारण
जोहत ➔ देखती हो
बिछोह ➔ वियोग, जुदाई
जिय ➔ हृदय में
छोहि ➔ कष्ट, दुख
व्याख्या : अज्ञान और मोह के वश में होकर तुम जिस कृष्ण से अपने हृदय में दूर होने का दुख महसूस कर रही हो,
पंक्ति 8 :
सो तौ सब अंतर-निरंतर बस्यो रहै।।2।।
शब्दार्थ :
सब अंतर-निरंतर ➔ सबके भीतर सदैव
बस्यो रहै ➔ निवास करता है
व्याख्या : वह ब्रह्म या कृष्ण तो संसार के कण-कण में और तुम सबके हृदय के भीतर सदा बिना किसी दूरी के निवास करता है।

छंद 3: निर्गुण ब्रह्म की बातें सुनकर गोपियों की दशा
प्रसंग :
उद्धव के मुख से प्रेम के स्थान पर योग और निर्गुण ज्ञान की अत्यंत कठिन बातें सुनकर ब्रज की गोपियों पर जो वज्रपात हुआ, उनकी शारीरिक और मानसिक शिथिलता का यहाँ मार्मिक वर्णन है।
पंक्ति 1 :
सुनि सुनि ऊधव की अकह कहानी कान
शब्दार्थ :
सुनि सुनि ➔ सुन-सुनकर
अकह कहानी ➔ न कहने योग्य कथा, कठिन निर्गुण ब्रह्म की
कान ➔ कानों से
व्याख्या : उद्धव के कानों को अप्रिय लगने वाली और अकथनीय निर्गुण ब्रह्म की कथा को अपने कानों से सुन-सुनकर,
पंक्ति 2 :
कोऊ थहरानी, कोऊ थानहिं थिरानी हैं।
शब्दार्थ :
कोऊ ➔ कोई गोपी
थहरानी ➔ काँप उठी
थानहिं ➔ अपने स्थान पर ही
थिरानी हैं ➔ जड़, स्थिर हो गई
व्याख्या : कोई गोपी दुख के मारे थर-थर काँपने लगी, तो कोई अत्यधिक सदमे के कारण अपने स्थान पर ही मूर्ति की तरह जड़ हो गई।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' रिसानी, बररानी कोऊ
शब्दार्थ :
रिसानी ➔ क्रोधित हो गईं
बररानी ➔ पागलों की तरह बड़बड़ाने लगीं
व्याख्या : रत्नाकर जी कहते हैं कि उद्धव की सूखी बातें सुनकर कोई गोपी अत्यंत क्रोधित हो गई, तो कोई अत्यधिक मानसिक कष्ट से बौखलाकर बड़बड़ाने लगी।
पंक्ति 4 :
कोऊ बिलखानी, बिकलानी, बिथकानी हैं।।
शब्दार्थ :
बिलखानी ➔ विलाप करने लगीं
बिकलानी ➔ व्याकुल हो गईं
बिथकानी हैं ➔ थक कर चूर हो गईं
व्याख्या : उद्धव की सूखी बातें सुनकर कोई गोपी अत्यंत क्रोधित हो गई, तो कोई अत्यधिक मानसिक कष्ट से बौखलाकर बड़बड़ाने लगी।।
पंक्ति 5 :
कोऊ सेद-सानी, कोऊ भरि दृग-पानी रहीं
शब्दार्थ :
सेद-सानी ➔ पसीने से भीगी हुई
दृग-पानी ➔ आँखों में आँसू
व्याख्या : किसी गोपी का शरीर दुख के मारे पसीने-पसीने हो गया, तो कोई अपनी आँखों में आंसुओं का सैलाब भरकर मौन खड़ी रही।
पंक्ति 6 :
कोऊ घूमि-घूमि परीं भूमि मुरझानी हैं।
शब्दार्थ :
घूमि-घूमि ➔ चक्कर खाकर
परीं भूमि ➔ धरती पर गिर पड़ीं
मुरझानी हैं ➔ मूर्छित होकर
व्याख्या : कोई-कोई गोपी तो इस विरह-वेदना और आघात को सहन न कर सकी और सिर घूमने के कारण अचेत या मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़ीं।
पंक्ति 7 :
कोऊ स्याम-स्याम कै बहकि बिललानी कोऊ
शब्दार्थ :
बहकि ➔ सुध-बुध खोकर
बिललानी ➔ तड़प उठीं
व्याख्या : कोई गोपी अपनी सुध-बुध खोकर केवल "श्याम-श्याम" पुकारती हुई व्याकुलता से तड़पने लगी,
पंक्ति 8 :
कोमल करेजौ थामि सहमि सुखानी हैं।।3।।
शब्दार्थ :
करेजौ ➔ कलेजा,हृदय
थामि ➔ पकड़कर
सहमि ➔ डरकर
सुखानी हैं ➔ सूख गईं, कमजोर हो गईं
व्याख्या : और कोई गोपी अपने अत्यंत कोमल कलेजे को हाथों से कसकर थामे हुए, अत्यधिक भय और शोक के कारण भीतर ही भीतर सूख सी गई।

छंद 4: गोपियों द्वारा कृष्ण के दूत उद्धव को खरी-खोटी सुनाना
प्रसंग :
इस छंद में गोपियाँ उद्धव के निर्गुण ज्ञान को पूरी तरह नकारते हुए उन पर व्यंग्य करती हैं और सगुण कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को सर्वोपरि सिद्ध करती हैं।
पंक्ति 1 :
कान्ह-दूत कैधौं ब्रह्म-दूत ह्वै पधारे आप
शब्दार्थ :
कान्ह-दूत ➔ कृष्ण के संदेशवाहक
कैधौं ➔ या फिर
ब्रह्म-दूत ➔ निर्गुण ब्रह्म के दूत
पधारे आप ➔ आप आए हैं
व्याख्या : गोपियाँ उद्धव पर व्यंग्य बाण चलाते हुए कहती हैं कि हे उद्धव जी! आप यहाँ हमारे प्रिय कृष्ण के दूत बनकर आए हैं या उस निराकार ब्रह्म के दूत बनकर पधारे हैं?
पंक्ति 2 :
धाने प्रन फेरन कौ मति ब्रजबारी की।
शब्दार्थ :
धाने ➔ दृढ़ संकल्प करके आए हैं
प्रन फेरन कौ ➔ प्रतिज्ञा बदलने के लिए
मति ➔ बुद्धि
ब्रजबारी की ➔ ब्रज की बालाओं की
व्याख्या : ऐसा लगता है कि आप ब्रज की भोली-भाली गोपियों के कृष्ण-प्रेम के दृढ़ निश्चय और बुद्धि को जबरन बदलने का संकल्प लेकर आए हैं।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' पै प्रीति-रीति जानत ना
शब्दार्थ :
प्रीति-रीति ➔ प्रेम की परंपरा, मर्यादा
व्याख्या : कवि रत्नाकर कहते हैं कि गोपियाँ स्पष्ट कहती हैं कि आप ज्ञान के अहंकार में इतने डूबे हैं कि प्रेम की पवित्र रीति (मर्यादा) को बिल्कुल नहीं जानते।
पंक्ति 4 :
ठानत अनीति आनि रीति लै अनारी की।।
शब्दार्थ :
अनीति ➔ अन्याय, गलत बात
आनि ➔ लाकर
रीति लै अनारी की ➔ अज्ञानियों जैसी परंपरा लेकर
व्याख्या : आप प्रेम के स्थान पर यहाँ आकर हमारे साथ सरासर अन्याय कर रहे हैं और किसी मूर्ख या अनारी की तरह यह ज्ञान मार्ग हमारे ऊपर थोप रहे हैं।
पंक्ति 5 :
मान्यौ हम, कान्ह ब्रह्म एक ही, कह्यौ जो तुम
शब्दार्थ :
मान्यौ हम ➔ हमने स्वीकार किया
कान्ह ब्रह्म एक ही ➔ कृष्ण और ब्रह्म एक ही हैं
कह्यौ जो तुम ➔ जो आपने कहा है
व्याख्या : चलो, जैसा आप कह रहे हैं हमने आपकी बात मान ली कि श्रीकृष्ण और आपके निराकार ब्रह्म सैद्धांतिक रूप से एक ही हैं,
पंक्ति 6 :
तौहू हमें भावति ना भावना अन्यारी की।
शब्दार्थ :
तौहू ➔ तो भी
भावति ना ➔ अच्छी नहीं लगती
भावना अन्यारी की ➔ आपसे अलग पराएपन की भावना
व्याख्या : परंतु तो भी हमें कृष्ण को छोड़कर किसी अन्य निराकार रूप की आराधना करने की यह पराई भावना रत्ती भर भी अच्छी नहीं लगती।
पंक्ति 7 :
जैहै बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि की
शब्दार्थ :
जैहै बनि बिगरि न ➔ कुछ बनेगा या बिगड़ेगा नहीं
बारिधिता ➔ समुद्र का बड़प्पन, अस्तित्व
बारिधि की ➔ समुद्र की
व्याख्या : जिस प्रकार नदी के समुद्र में मिलने से विशाल समुद्र के ठाठ या उसके अस्तित्व पर कोई फर्क नहीं पड़ता,
पंक्ति 8 :
बूँदता बिलैहै बूँद बिबस बिचारी की।।4।।
शब्दार्थ :
बूँदता ➔ बूँद का अपना अस्तित्व
बिलैहै ➔ नष्ट हो जाएगा/विलीन हो जाएगा
बिबस ➔ लाचार/विवश
बिचारी की ➔ बेचारी , पानी की बूँद की
व्याख्या : परंतु समुद्र में समा जाने के बाद उस लाचार और बेचारी पानी की बूँद का अपना व्यक्तिगत अस्तित्व हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है। अर्थात् हम कृष्ण रूपी समुद्र में विलीन होकर अपना अस्तित्व नहीं खोना चाहतीं, हम भक्त बनकर ही रहना चाहती हैं।

छंद 5: उद्धव के योग संदेश का गोपियों द्वारा उपहास
प्रसंग :
इस छंद में गोपियाँ उद्धव द्वारा बताए गए योग के कड़े नियमों जैसे आँखों को बंद करना, भस्म लगाना की व्यावहारिक कमियाँ बताते हुए तार्किक रूप से उसका उपहास उड़ाती हैं।
पपंक्ति 1 :
चिंता-मनि मंजुल पँवारिधूर-धारनि मैं
शब्दार्थ :
चिंता-मनि ➔ सब कुछ देने वाली अमूल्य चिंतामणि , यहाँ कृष्ण का प्रेम
मंजुल ➔ सुंदर
पैंवारि ➔ फेंककर, त्यागकर
धूरि-धारनि मैं ➔ धूल की धाराओं में, साधना के कष्टों में
व्याख्या :
गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव! आप हमसे हमारे कृष्ण-प्रेम रूपी परम सुंदर और अमूल्य 'चिंतामणि' रत्न को धूल में फेंक देने को कह रहे हैं,
पंक्ति 2 :
काँच-मन-मुकुर सुधारि रखिबौ कहौ।
शब्दार्थ :
काँच-मन-मुकुर ➔ मन रूपी काँच का दर्पण
सुधारि ➔ सँभालकर
व्याख्या :
और उसके बदले में इस नष्ट होने वाले निराकार ब्रह्म के ध्यान रूपी काँच के बने मन-रूपी दर्पण को सँभालकर रखने की शिक्षा दे रहे हैं।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' बियोग-आगि सारन कौ
शब्दार्थ :
बियोग-आगि ➔ वियोग की अग्नि
सारन कौ ➔ शांत करने के लिए, बुझाने के लिए
व्याख्या :
रत्नाकर जी कहते हैं कि गोपियाँ कहती हैं कि हमारी कृष्ण वियोग की भीषण आग को बुझाने के लिए...
पंक्ति 4 :
ऊधौ हाय हमकौ बयारि भखिबौ कहौ।।
शब्दार्थ :
बयारि ➔ हवा
भखिबौ कहौ ➔ खाने , प्राणायाम करने के लिए कहते हो
व्याख्या :
...हे उद्धव! आप हमें हवा खाकर अर्थात् प्राणायाम करके निराहार रहने के लिए जीवित रहने को कह रहे हैं, जो कि आग में घी डालने जैसा असंभव है!
पंक्ति 5 :
रूस-रस-हीन जाहि निपट निरूपि चुके
शब्दार्थ :
रूस-रस-हीन ➔ रूप और रस से सर्वथा रहित
जाहि ➔ जिसे
निपट ➔ पूरी तरह
निरूपि चुके ➔ सिद्ध कर चुके हो
व्याख्या :
जिस ब्रह्म को आप स्वयं रूप, रंग और आनंद से पूरी तरह रहित और निराकार सिद्ध कर चुके हैं,
पंक्ति 6 :
ताकौ रूप ध्याइबौ औ रस चखिबौ कहौ।
शब्दार्थ :
ताकौ ➔ उसका
रूप ध्याइबौ ➔ रूप का ध्यान करना
रस चखिबौ ➔ आनंद का स्वाद लेना
व्याख्या :
भला आप ही बताइए कि उस रूपहीन का हम कैसे रूप का ध्यान करें और उस रसहीन ब्रह्म का आनंद-रस हम कैसे चखें?
पंक्ति 7 :
एते बड़े बिस्व माँहि हेरें हूँ न पैयै जाहि
शब्दार्थ :
एते बड़े बिस्व माँहि ➔ इतने विशाल संसार में
हेरें हूँ ➔ ढूँढने पर भी
न पैयै जाहि ➔ जो नहीं मिलता
व्याख्या :
जो निराकार ब्रह्म इतने असीम और विशाल ब्रह्मांड में कहीं भी ढूँढने से प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता,
पंक्ति 8 :
ताहि त्रिकुटी मैं नैन मूँदि लखिबौ कहौ।।5।।
शब्दार्थ :
ताहि ➔ उसको
त्रिकुटी मैं ➔ दोनों भौंहों के बीच, आज्ञा चक्र में
नैन मूँदि ➔ आँखें बंद करके
लखिबौ कहौ ➔ देखने को कहते हो
व्याख्या :
उसे आप हमसे हमारी आँखें बंद करके, माथे की त्रिकुटी यानी दोनों भौंहों के मध्य के भीतर देखने को कह रहे हैं, यह कितनी हास्यास्पद बात है!
छंद 6: गोपियों का उद्धव से करुण आग्रह
प्रसंग :
इस छंद में गोपियाँ अत्यंत भावुक हो उठती हैं। वे उद्धव से प्रार्थना करती हैं कि वे अपने योग के वचनों से उनके दुखी हृदय को और अधिक न दुखाएँ, क्योंकि उनका हृदय पहले ही टूट चुका है।
पंक्ति 1 :
आए हौ सिखावन कौ जोग मथुरा तै तौपै
शब्दार्थ :
सिखावन कौ ➔ सिखाने के लिए
जोग ➔ योग साधना
तौपै ➔ तो फिर, यदि ऐसा है
व्याख्या :
गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव! यदि आप मथुरा से हमें केवल योग साधना सिखाने के उद्देश्य से ही यहाँ आए हैं,
पंक्ति 2 :
ऊधौ ये बियोग के बचन बतरावौ ना।
शब्दार्थ :
बियोग के बचन ➔ वियोग और अलगाव की बातें
बतरावौ ना ➔ हमसे मत कहो
व्याख्या :
तो कृपया हमसे यह विरह और दूरी बढ़ाने वाले कड़वे वचन मत बोलिए।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' दया करि दरस दीन्यौ
शब्दार्थ :
दया करि ➔ कृपा करके
दरस दीन्यौ ➔ दर्शन दिए हैं
व्याख्या :
कवि रत्नाकर के अनुसार गोपियाँ कहती हैं कि आपने यहाँ आकर हम पर बड़ी दया की जो कृष्ण के सखा के रूप में हमें दर्शन दिए,
पंक्ति 4 :
दुख दरिबै कौं, तोपै अधिक बढ़ावौ ना।।
शब्दार्थ :
दुख दरिबै कौं ➔ दुख को दूर करने, दलने के लिए
तोपै ➔ तो फिर उसे
अधिक बढ़ावौ ना ➔ ज्यादा मत बढ़ाओ
व्याख्या :
इसलिए हमारे इस विरह-दुख को दूर करने का प्रयास कीजिए, इसे अपनी ज्ञान की बातों से और अधिक मत बढ़ाइए।
पंक्ति 5 :
टूक-टूक ह्वैहै मन-मुकुर हमारौ हाय
शब्दार्थ :
टूक-टूक ➔ टुकड़े-टुकड़े
ह्वैहै ➔ हो जाएगा
मन-मुकुर ➔ मन रूपी दर्पण या शीशा
व्याख्या :
हाय! हमारा यह कोमल मन रूपी शीशा आघात लगने से टूट-टूट कर बिखर जाएगा,
पंक्ति 6 :
चूकि हूँ कठोर-बैन-पाहन चलावौ ना।
शब्दार्थ :
चूकि हूँ ➔ भूलकर भी
कठोर-बैन-पाहन ➔ कठोर वचनों रूपी पत्थर
चलावौ ना ➔ मत मारो
व्याख्या :
इसलिए आप भूलकर भी अपने इन कठोर योग-वचनों रूपी पत्थरों को हमारे इस भावुक मन पर मत चलाइए।
पंक्ति 7 :
एक मनमोहन तौ बसिकै उजारयौ मोहिं
शब्दार्थ :
मनमोहन ➔ मन को मोहने वाले कृष्ण
बसिकै ➔ हृदय में निवास करके
उजारयौ मोहिं ➔ मुझे उजाड़ दिया, मथुरा जाकर दुखी कर दिया
व्याख्या :
एक अकेले मनमोहन श्रीकृष्ण ने ही हमारे हृदय में बसकर और फिर हमें छोड़कर इस ब्रज को पूरी तरह विरह की आग में उजाड़ दिया है,
पंक्ति 8 :
हिय मैं अनेक मनमोहन बसावौ ना।।6।।
शब्दार्थ :
हिय मैं ➔ हृदय में
अनेक मनमोहन ➔ कृष्ण के अनेक रूप, शीशा टूटने पर जैसे कई प्रतिबिंब बनते हैं
व्याख्या :
यदि आपका कठोर वचन रूपी पत्थर हमारे मन रूपी दर्पण पर लगा, तो वह टूट जाएगा और दर्पण के हर टुकड़े में कृष्ण का एक नया विरही रूप दिखने लगेगा; इसलिए हमारे हृदय में दुखों के ऐसे अनेक मनमोहन मत बसाओ।
छंद 7: गोपियों का उद्धव के प्रति विनम्र समर्पण और उदारता
प्रसंग :
इस छंद में गोपियाँ उद्धव को विदा करते समय कहती हैं कि वे कृष्ण के सामने जाकर उनकी कोई शिकायत नहीं करेंगी। वे कृष्ण के हर निर्णय को सहर्ष स्वीकार करने को तैयार हैं।
पंक्ति 1 :
ऊधौ यहै सूधौ सौ संदेस कहि दीजौ एक
शब्दार्थ :
सूधौ सौ ➔ सीधा सा, सरल
संदेस ➔ संदेश
व्याख्या :
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव जी! आप द्वारका या मथुरा जाकर हमारे प्रिय कृष्ण से हमारा यह एक सीधा-सरल संदेश कह देना,
पंक्ति 2 :
जानति अनेक न बिबेक ब्रज-बारी हैं।
शब्दार्थ :
जानति अनेक न ➔ बहुत चालाकी या बातें नहीं जानतीं
बिबेक ➔ ज्ञान, बुद्धि
ब्रज-बारी हैं ➔ ब्रज की कन्याएँ हैं
व्याख्या :
कि हम ब्रज की साधारण युवतियाँ बहुत ज्यादा ज्ञान, विवेक या चतुरता की बातें करना नहीं जानतीं।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' असीम रावरी तौ छमा
शब्दार्थ :
असीम ➔ जिसकी कोई सीमा न हो
रावरी ➔ आपकी, श्रीकृष्ण की
व्याख्या :
रत्नाकर जी कहते हैं कि गोपियाँ कहती हैं कि हमारे कृष्ण का हृदय असीम दयालु है, उनकी क्षमा करने की शक्ति अनंत है,
पंक्ति 4 :
छमता कहाँ लौं अपराध की हमारी हैं।।
शब्दार्थ :
छमता ➔ सामर्थ्य, औकात
अपराध की हमारी ➔ हमारे गुनाहों की
व्याख्या :
और हमारे तुच्छ अपराधों या नादानियों की भला इतनी कहाँ बिसात कि वह उनकी क्षमाशीलता के आगे टिक सकें?
पंक्ति 5 :
दीजै और ताजन सबै जो मन भावै पर
शब्दार्थ :
दीजै ➔ भले ही दें
ताजन ➔ प्रताड़ना, सजा , दंड
जो मन भावै ➔ जो उनके मन को अच्छा लगे
व्याख्या :
वे हमें अपने वियोग में तड़पाने की या और जो भी सजा देना चाहें, खुशी-खुशी दें, जो भी उनके मन को भाए,
पंक्ति 6 :
कीजै न दरस-रस बंचित बिचारी हैं।
शब्दार्थ :
दरस-रस बंचित ➔ दर्शन के आनंद से महरूम , दूर
बिचारी हैं ➔ हम बेचारियों को
व्याख्या :
परंतु बस इतनी कृपा करें कि हम बेचारियों को अपने दर्शन रूपी परम आनंद के रस से कभी पूरी तरह वंचित न करें।
पंक्ति 7 :
भली हैं बुरी हैं और सलज्ज निरलज्ज हू हैं
शब्दार्थ :
सलज्ज ➔ लज्जा के साथ
निरलज्ज हू ➔ अथवा लोक-लाज छोड़ चुकी , लोक-निंदा से बेपरवाह
व्याख्या :
संसार की नजरों में हम चाहे जैसी भी हों—अच्छी हों या बुरी, कुल की मर्यादा रखने वाली लज्जावती हों या कृष्ण-प्रेम में मर्यादा खो चुकी लोक-लाजहीन हों,
पंक्ति 8 :
जो कहैं सो हैं पै परिचारिका तिहारी हैं।।7।।
शब्दार्थ :
जो कहैं सो हैं ➔ लोग जो भी कहें हम वही हैं
परिचारिका ➔ दासियाँ, सेविकाएँ
तिहारी हैं ➔ आपकी ही हैं
व्याख्या :
दुनिया हमारे बारे में जो भी कहे, हम उसे स्वीकार करती हैं, परंतु अकाट्य सत्य यही है कि हम केवल और केवल आपकी ही अनन्य दासियाँ हैं।
छंद 8: गोपियों द्वारा कृष्ण के लिए उपहार भेजना
प्रसंग :
इस छंद में जब उद्धव मथुरा लौटने लगते हैं, तो ब्रज के लोग और गोपियाँ अपने प्रिय कृष्ण के लिए अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अत्यंत स्नेहपूर्ण उपहार भेंट करती हैं।
पंक्ति 1 :
धाईं जित तित तैं बिदाई-हेत ऊधव की
शब्दार्थ :
धाईं ➔ दौड़ पड़ीं
जित तित तैं ➔ जहाँ-तहाँ से, चारों दिशाओं से
बिदाई-हेत ➔ विदा करने के लिए
व्याख्या :
उद्धव की ब्रज से विदाई का समय जानकर सभी गोपियाँ और ब्रजवासी जहाँ-तहाँ से दौड़ते हुए वहाँ एकत्र होने लगे।
पंक्ति 2 :
गोपी भरीं आरति सँभारति न साँसुरी।
शब्दार्थ :
भरीं आरति ➔ अत्यंत व्याकुलता, पीड़ा से भरी हुई
सँभारति न ➔ संभल नहीं रही थी
साँसुरी ➔ लंबी गर्म साँसें
व्याख्या :
गोपियों के हृदय में कृष्ण से बिछड़ने की गहरी पीड़ा उमड़ रही थी, विरह के कारण उनके मुख से निकलती गर्म आहें या साँसें तक उनसे सँभाली नहीं जा रही थीं।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' मयूर-पच्छ कोऊ लिए
शब्दार्थ :
मयूर-पच्छ ➔ मोर का पंख
कोऊ लिए ➔ कोई अपने साथ लाई
व्याख्या :
कवि रत्नाकर कहते हैं कि कृष्ण को भेंट देने के लिए कोई गोपी अपने साथ प्रिय कृष्ण के मुकुट की शोभा बढ़ाने वाला सुंदर मोरपंख लेकर आई,
पंक्ति 4 :
कोऊ गुंज-अंजली उमाहै-प्रेम-आँसुरी।।
शब्दार्थ :
गुंज-अंजली ➔ घुंघची से भरी अंजलि
उमाहै ➔ उमड़ते हुए
प्रेम-आँसुरी ➔ प्रेम के आँसुओं के साथ
व्याख्या :
तो कोई गोपी अपनी अंजलि में प्रेम के उमड़ते आंसुओं से भीगे हुए 'गुंजा' के दानों का उपहार लेकर आई।
पंक्ति 5 :
भाव-भरी कोऊ लिए रुचिर सजाव दही
शब्दार्थ :
भाव-भरी ➔ आदर और प्रेम की भावना से युक्त
रुचिर ➔ सुंदर, स्वादिष्ट
सजाव दही ➔ जमाया हुआ गाढ़ा स्वादिष्ट दही
व्याख्या :
कृष्ण के प्रति अनन्य श्रद्धा और भाव से भरकर कोई गोपी उनके खाने के लिए सुंदर हांडी में जमाया हुआ गाढ़ा, स्वादिष्ट दही लेकर आई,
पंक्ति 6 :
कोऊ मही मंजु दाबि दलकति पाँसुरी।
शब्दार्थ :
मही ➔ मट्ठा, छाछ
मंजु ➔ सुंदर
दाबि दलकति पाँसुरी ➔ छाती से बर्तन को कसकर भींचे हुए जिससे उसकी पसलियाँ काँप रही थीं
व्याख्या :
तो कोई गोपी मटके में छाछ या मट्ठा लेकर आई, जिसे उसने अपनी छाती से इतनी तेजी से भींच रखा था कि व्याकुलता के कारण उसकी पसलियाँ तक काँप रही थीं।
पंक्ति 7 :
पीत पट नंद जसुमति नवनीत नयौ
शब्दार्थ :
पीत पट ➔ पीला वस्त्र , पीतांबर
नवनीत नयौ ➔ ताजा निकाला हुआ मक्खन
व्याख्या :
नंद बाबा ने अपने लाड़ले कृष्ण के लिए सुंदर पीला वस्त्र भिजवाया और माता यशोदा ने अपने हाथ से निकाला हुआ ताजा, कोमल मक्खन उपहार में दिया।
पंक्ति 8 :
कीरति-कुमारी सुरबारी दई बाँसुरी।।8।।
शब्दार्थ :
कीरति-कुमारी ➔ कीर्ति की पुत्री अर्थात् श्री राधा जी
सुरबारी ➔ सुंदर सुरीली तान वाली, देवताओं को भी प्रिय
व्याख्या :
और वृषभानु-नंदिनी कीर्ति-कुमारी श्री राधा जी ने अपने प्रियतम के अधरों की शोभा बढ़ाने वाली और देवताओं को भी मोहित करने वाली अपनी वह अत्यंत सुरीली बाँसुरी उद्धव को भेंट स्वरूप सौंप दी।
छंद 9: उद्धव की ब्रज से विदाई और उनकी भावुक दशा
प्रसंग :
ब्रज के निश्छल और अगाध प्रेम को देखकर ज्ञान के अहंकार में डूबे उद्धव स्वयं पूरी तरह प्रेम के रंग में रंग गए। ब्रज से लौटते समय उनकी जो भावविह्वल दशा हुई, उसका यहाँ अद्भुत चित्रण है।
पंक्ति 1 :
प्रेम-मद-छाके पग परत कहाँ के कहाँ
शब्दार्थ :
प्रेम-मद-छाके ➔ ब्रज के प्रेम रूपी मदिरा के नशे में पूरी तरह डूबे हुए
परत कहाँ के कहाँ ➔ लड़खड़ा रहे थे
व्याख्या :
ब्रजवासियों के इस निष्काम और परम प्रेम रूपी मदिरा के आनंद में उद्धव इस कदर सराबोर हो गए कि वापसी में चलते समय उनके कदम रास्ते पर लड़खड़ा रहे थे और कहीं के कहीं पड़ रहे थे।
पंक्ति 2 :
थाके अंग नैननि सिथिलता सुहाई है।
शब्दार्थ :
थाके अंग ➔ सारे अंग शिथिल या थक गए
नैननि ➔ आँखों में
सिथिलता सुहाई है ➔ एक अजीब सी भावुक शिथिलता या शून्यता दिखाई दे रही थी
व्याख्या :
प्रेम की अधिकता के कारण उनके शरीर के सारे अंग पूरी तरह शिथिल हो गए थे और उनकी आँखों में प्रेम का एक सुंदर आलस्य या शून्यता छाई हुई थी।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' यौ आवत चकात ऊधौ
शब्दार्थ :
यौ आवत ➔ इस प्रकार वापस लौट रहे हैं
चकात ➔ चकित, भौंचक्के होकर
व्याख्या :
कवि रत्नाकर कहते हैं कि उद्धव ब्रज से इस प्रकार आश्चर्यचकित और भौंचक्के होकर वापस लौट रहे हैं,
पंक्ति 4 :
मानौ सुधियात कोऊ भावना भुलाई है।।
शब्दार्थ :
मानौ ➔ ऐसा प्रतीत होता है
सुधियात ➔ याद करने का प्रयास कर रहे हैं
भावना भुलाई है ➔ खोई हुई सुध-बुध या भावना को
व्याख्या :
मानो वे अपनी सुध-बुध खो बैठे हों और रास्ते में चलते-चलते अपनी किसी भूली हुई पुरानी भावना को गहराई से याद करने की कोशिश कर रहे हों।
पंक्ति 5 :
धारत धरा पै ना उदार अति आदर सौं
शब्दार्थ :
धारत धरा पै ना ➔ जमीन पर नहीं रख रहे हैं
उदार ➔ श्रेष्ठ,महान
अति आदर सौं ➔ अत्यधिक सम्मान के साथ
व्याख्या :
गोपियों द्वारा दिए गए उपहारों को वे अत्यंत सम्मान और आदर के साथ अपने हाथों में इस तरह सँभाले हुए हैं कि उन्हें भूलकर भी नीचे जमीन पर नहीं रख रहे हैं।
पंक्ति 6 :
सारत बँहोलिनि जो आँसु-अधिकाई है।
शब्दार्थ :
सारत ➔ पोंछ रहे हैं
बँहोलिनि ➔ अपने कुर्ते की बाँहों से
आँसु-अधिकाई है ➔ आंसुओं की अधिकता, अविरल धारा
व्याख्या :
ब्रज के प्रेम को याद कर उनकी आँखों से बहते आंसुओं की जो अविरल धारा रुक नहीं रही थी, उसे वे बार-बार अपने कुर्ते की बाँहों से पोंछते जा रहे हैं।
पंक्ति 7 :
एक कर राजै नवनीत जसुदा कौ दियौ
शब्दार्थ :
एक कर ➔ एक हाथ में
राजै ➔ सुशोभित हो रहा है
नवनीत ➔ मक्खन
जसुदा कौ दियौ ➔ माता यशोदा का दिया हुआ
व्याख्या :
उद्धव के एक हाथ में माता यशोदा द्वारा दिया हुआ वह पवित्र और स्नेहिल ताजा मक्खन सुशोभित हो रहा है,
पंक्ति 8 :
एक कर बंसी बर राधिका-पठाई है।।9।।
शब्दार्थ :
एक कर ➔ दूसरे हाथ में
बंसी बर ➔ श्रेष्ठ और सुंदर बाँसुरी
राधिका-पठाई है ➔ श्री राधा जी द्वारा भिजवाई हुई
व्याख्या :
और उनके दूसरे हाथ में श्री राधा रानी द्वारा विशेष रूप से प्रियतम कृष्ण के लिए भिजवाई गई वह सर्वश्रेष्ठ और दिव्य बाँसुरी सँभली हुई है।
छंद 10: मथुरा पहुँचकर उद्धव का कृष्ण के सामने भावुक होना
प्रसंग :
मथुरा पहुँचकर जब उद्धव श्रीकृष्ण के सम्मुख ब्रजवासियों और विशेषकर राधा जी का प्रेम-संदेश लेकर उपस्थित होते हैं, तो वे इतने भावुक हो जाते हैं कि उनके शरीर का रोम-रोम पुलकित हो उठता है।
पंक्ति 1 :
ब्रज-रज-रंजित सरीर सुभ ऊधव कौ
शब्दार्थ :
ब्रज-रज-रंजित ➔ ब्रज की पवित्र धूल से सना हुआ
सरीर सुभ ➔ पावन शरीर
व्याख्या :
ब्रज की पावन और अलौकिक धूल से सने हुए उद्धव के उस अत्यंत पवित्र और सुंदर शरीर को देखकर,
पंक्ति 2 :
धाई बलबीर ह्वै अधीर लपटाए लेत।
शब्दार्थ :
धाई ➔ दौड़कर
बलबीर ➔श्रीकृष्ण
ह्वै अधीर ➔ व्याकुल, अधीर होकर
लपटाए लेत ➔ गले से लगा लेते हैं
व्याख्या :
स्वयं श्रीकृष्ण व्याकुल और भावुक होकर दौड़ पड़े और उद्धव को अपनी भुजाओं में कसकर गले से लगा लिया।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' सु प्रेम-मद-माते हेरि
शब्दार्थ :
प्रेम-मद-माते ➔ प्रेम के रंग में पूरी तरह रंगे हुए
हेरि ➔ देखकर
व्याख्या :
कवि रत्नाकर कहते हैं कि उद्धव को इस प्रकार ब्रज के निश्छल प्रेम रस में पूरी तरह डूबा हुआ देखकर...
पंक्ति 4 :
थरकति बाँह थामि थहरि थिराए लेत।।
शब्दार्थ :
थरकति बाँह ➔ काँपती हुई भुजाएँ
थामि ➔ पकड़कर
थहरि ➔ थरथराकर
थिराए लेत ➔ स्वयं को संभालते हैं, स्थिर करते हैं
व्याख्या :
...श्रीकृष्ण के शरीर में भी कंपन होने लगा और वे उद्धव की काँपती हुई बाँहों को थामकर स्वयं को बड़ी मुश्किल से स्थिर कर पाए।
पंक्ति 5 :
कीरति-कुमारी के दरस-रस सद्य ही की
शब्दार्थ :
कीरति-कुमारी ➔ श्री राधा जी
दरस-रस ➔ दर्शन के आनंद
सद्य ही की ➔ अभी-अभी के
व्याख्या :
उद्धव की आँखों में कीर्ति-कुमारी श्री राधा जी के दर्शनों का जो ताजा और अलौकिक आनंद-रस झलक रहा था,
पंक्ति 6 :
छलकनि चाहि पलकनि पुलकाए लेत।
शब्दार्थ :
छलकनि चाहि ➔ उस छलकते हुए रस को देखकर
पलकनि ➔ अपनी पलकों को
पुलकाए लेत ➔ आनंद से रोमांचिंत कर लेते हैं
व्याख्या :
उसे प्रत्यक्ष छलकते हुए देखकर कृष्ण का अपना हृदय भी भर आया और उनकी अपनी पलकें भी अत्यंत भावुकता और रोमांच से भीग उठीं।
पंक्ति 7 :
परन न देत एक बूँद पुहुमी की कौंछि
शब्दार्थ :
परन न देत ➔ गिरने नहीं देते
पुहुमी की कौंछि ➔ पृथ्वी की गोद में,धरती पर
व्याख्या :
उद्धव के शरीर पर लगी ब्रज की धूल पर वे अपनी आँखों से गिरते हुए आंसुओं की एक भी बूँद को नीचे धरती की गोद में नहीं गिरने देना चाहते थे,
पंक्ति 8 :
पोंछि-पोंछि पट निज नैननि लगाए लेत।।10।।
शब्दार्थ :
पोंछि-पोंछि ➔ बार-बार पोंछकर
पट ➔ अपने पीतांबर से
निज नैननि ➔ अपनी आँखों से
व्याख्या :
इसलिए वे उद्धव के शरीर पर लगी उस पावन ब्रज-रज को अपने वस्त्र से बड़े यत्न से बार-बार पोंछकर अपने माथे और अपनी आँखों से श्रद्धापूर्वक लगा रहे थे।
छंद 11: गोपियों का ब्रज भूमि के प्रति अनन्य अनुराग
प्रसंग :
इस अंतिम छंद में गोपियाँ ब्रज भूमि और यमुना के तट के प्रति अपने अनन्य प्रेम को प्रकट करती हैं। वे कहती हैं कि कृष्ण के बिना भी वे इस परम पावन ब्रज का त्याग किसी भी कीमत पर नहीं कर सकतीं।
पंक्ति 1 :
छावते कुटीर कहूँ रम्य जमुना कैं तीर
शब्दार्थ :
छावते ➔ छप्पर या कुटिया बनाते
कुटीर ➔ छोटी झोपड़ी, कुटिया
रम्य ➔ अत्यंत सुंदर
जमुना कैं तीर ➔ यमुना नदी के किनारे पर
व्याख्या :
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि यदि हम चाहतीं तो इस परम सुंदर और पवित्र यमुना नदी के किनारे कहीं भी अपनी छोटी सी कुटिया बनाकर रह लेतीं,
पंक्ति 2 :
गौन रौन-रेती सौं कदापि करते नहीं।
शब्दार्थ :
गौन ➔ गमन, जाना, छोड़ना
रौन-रेती सौं ➔ रमणीय और आनंद देने वाली ब्रज की बालू से
कदापि ➔ कभी भी
व्याख्या :
परंतु इस ब्रज की अत्यंत सुखद और रमणीय रेती (बालू) को छोड़कर हम यहाँ से दूर जाने का विचार कभी सपने में भी नहीं कर सकतीं।
पंक्ति 3 :
कहै 'रत्नाकर' बिहाइ प्रेम-गाथा गूढ़
शब्दार्थ :
बिहाइ ➔ छोड़कर,त्यागकर
प्रेम-गाथा गूढ़ ➔ कृष्ण-प्रेम की इस अत्यंत गहरी और रहस्यमयी कथा को
व्याख्या :
रत्नाकर जी कहते हैं कि गोपियों के अनुसार, हमारे हृदय में बसी इस अत्यंत गूढ़ और पवित्र प्रेम-गाथा को भुलाकर...
पंक्ति 4 :
स्रौन रसना मैं रस और भरते नहीं।।
शब्दार्थ :
स्रौन रसना मैं ➔ अपनी इस जीभ में
रस और ➔ कोई दूसरा आनंद ,जैसे आपके निर्गुण ज्ञान की चर्चा
व्याख्या :
...हम अपनी इस जिह्वा या वाणी से किसी अन्य शुष्क ज्ञान या निर्गुण ब्रह्म का नाम लेकर कोई दूसरा रस कभी नहीं भर सकतीं।
पंक्ति 5 :
गोपी ग्वाल बालनि के उमड़त आँसू देखि
शब्दार्थ :
गोपी ग्वाल बालनि के ➔ ब्रज की गोपियों और ग्वाल-बालों के
उमड़त आँसू ➔ आँखों से लगातार बहते आंसुओं को
व्याख्या :
यहाँ के समस्त गोपियों और ग्वाल-बालों के आँखों से अविरल बहते हुए आंसुओं की बाढ़ को देखकर,
पंक्ति 6 :
लेखि प्रलयागम हूँ नैकु डरते नहीं।
शब्दार्थ :
लेखि ➔ मानकर, देखकर
प्रलयागम हूँ ➔ प्रलय के आगमन, संसार डूबने को भी
नैकु ➔ थोड़ा सा भी, रत्ती भर भी
व्याख्या :
हमें ऐसा लगता है कि मानो साक्षात् प्रलय आ गई हो, परंतु कृष्ण के प्रेम में डूबे होने के कारण हम इस प्रेम-अश्रु के प्रलय से थोड़ा सा भी नहीं डरते।
पंक्ति 7 :
होतौ चित चाब जौ न रावरे चितावन को
शब्दार्थ :
होतौ चित चाब ➔ यदि हमारे मन में यह तीव्र इच्छा न होती
जौ न ➔ यदि नहीं
रावरे ➔ आपके
चितावन को ➔ दर्शन करने की, ध्यान लगाने की
व्याख्या :
यदि हमारे मन में केवल और केवल आपके सुंदर स्वरूप का चिंतन करने और आपके दर्शन पाने की यह अटूट अभिलाषा न होती,
पंक्ति 8 :
तजि ब्रज-गाँव इतै पाँव धरते नहीं।।11।।
शब्दार्थ :
तजि ➔ त्यागकर, छोड़कर
इतै ➔ यहाँ इस ब्रज से बाहर
पाँव धरते नहीं ➔ अपने कदम कभी बाहर नहीं रखते
व्याख्या :
तो हम इस परम पावन ब्रज-गाँव को छोड़कर, संसार के किसी भी अन्य स्थान पर अपने पैर कभी भूलकर भी न रखते। हम इस ब्रज की भूमि में ही सदा के लिए लीन रहना चाहते हैं।
विशेष टिप्पणी :
भाषा : संपूर्ण पाठ में शुद्ध, साहित्यिक और सरस ब्रजभाषा का अत्यंत सुंदर प्रयोग हुआ है।
छंद : यह संपूर्ण रचना 'मनहरण कवित्त' छंद में निबद्ध है।
रस : इसमें मुख्य रूप से विप्रलंभ श्रृंगार वियोग श्रृंगार और अद्भुत रस का सामंजस्य है।
अलंकार : अनुप्रास, रूपक, उपमा और पुनरुक्तिप्रकाश अलंकारों का सहज और व्याकरण सम्मत प्रयोग सर्वत्र दर्शनीय है।