कवितावली
प्रस्तुत पंक्तियाँ यूपी बोर्ड कक्षा 11 की हिंदी पाठ्यपुस्तक के पद्य-खंड में संकलित गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित "कवितावली" से ली गई हैं। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'कवितावली' के लंका दहन प्…


प्रस्तुत पंक्तियाँ यूपी बोर्ड कक्षा 11 की हिंदी पाठ्यपुस्तक के पद्य-खंड में संकलित गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित "कवितावली" से ली गई हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'कवितावली' के लंका दहन प्रसंग की व्याख्या अत्यंत सरल शब्दों में दिया गया है। इस कविता में हनुमान जी द्वारा किए गए लंका दहन और उसके कारण लंकावासियों के बीच मची भयानक अफरातफरी का बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है।

बालधी बिसाल बिकराल ज्वाल-जाल मानौ,
लंक लीलिबे को काल रसना पसारी है।
शब्दार्थ–
बालधी – पूँछ
बिकराल – भयंकर
ज्वाल-जाल – आग की लपटों का समूह
मानौ – मानो
लीलिबे – निगलने
काल – मृत्यु
रसना – जीभ
पसारी – फैलाई
व्याख्या: हनुमान जी की विशाल पूँछ में जलती हुई भयंकर आग की लपटों को देखकर ऐसा लगता है मानो मृत्यु के देवता काल ने पूरी लंका को निगलने के लिए अपनी भयंकर जीभ फैला रखी हो।
कैधौं ब्योमबीथिका भरे हैं भूरि धूमकेतु,
बीररस बीर तरवारि सी उघारी है।
शब्दार्थ–
कैधौं – अथवा या फिर
ब्योमबीथिका – आकाश मार्ग
भूरि – बहुत से
धूमकेतु – पुच्छल तारे
बीररस – वीर रस
उघारी – म्यान से निकाली हुई
व्याख्या: हनुमान जी की जलती हुई पूँछ को देखकर ऐसा लगता है कि या तो आकाश मार्ग में बहुत सारे पुच्छल तारे निकल आए हैं, या फिर स्वयं वीर रस ने किसी शूरवीर का रूप धारण करके अपनी चमकती हुई तलवार म्यान से निकाल ली है।
तुलसी सुरेस चाप, कैधौं दामिनी कलाप,
कैधौं चली मेरु तें कृसानु-सरि भारी है।
शब्दार्थ–
सुरेस चाप – इंद्रधनुष
दामिनी – बिजली
कलाप – समूह
मेरु – सुमेरु पर्वत
कृसानु-सरि – आग की नदी
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि उस आग को देखकर ऐसा लगता है कि या तो आकाश में इंद्रधनुष निकल आया है, या बहुत सारी बिजलियाँ एक साथ चमक रही हैं, या फिर सुमेरु पर्वत से कोई भयंकर आग की नदी बह निकली है।
देखे जातुधान जातुधानी आकुलानी कहैं,
कानन उजार्यो अब नगर प्रजारी है।
शब्दार्थ–
जातुधान – राक्षस
जातुधानी – राक्षसियाँ
आकुलानी – व्याकुल होकर
कानन – वन या अशोक वाटिका
प्रजारी – जला रहा है
व्याख्या: इस भयंकर आग को देखकर लंका के सभी राक्षस और राक्षसियाँ बहुत घबरा गए हैं। वे व्याकुल होकर आपस में कह रहे हैं कि इस बंदर ने पहले तो अशोक वाटिका को उजाड़ा और अब यह हमारे पूरे नगर को जला रहा है।
हाट, बाट, कोट, ओट, अट्टनि, अगार, पौरि,
खोरि खोरि दौरि दौरि दीन्ही अति आगि है।
शब्दार्थ–
हाट – बाजार
बाट – रास्ता
कोट – किला
ओट – आड़ या छिपने की जगह
अट्टनि – अटारियां या छतों पर
अगार – घर
पौरि – दरवाजा
खोरि खोरि – गली गली में
व्याख्या: हनुमान जी ने लंका के बाजारों, रास्तों, किले की दीवारों, छिपने की जगहों, ऊंचे मकानों, घरों और दरवाजों पर भयंकर आग लगा दी है। वे गली-गली में दौड़-दौड़ कर बहुत भयानक आग फैला रहे हैं।

आरत पुकारत, सँभारत न कोऊ काहू,
ब्याकुल जहाँ सो तहाँ लोग चले भागि हैं।
शब्दार्थ–
आरत – दुखी होकर
सँभारत – संभालना
कोऊ काहू – कोई किसी को
ब्याकुल – बेचैन
व्याख्या: आग की गर्मी से दुखी होकर लोग दर्द से चिल्ला रहे हैं, लेकिन उस समय कोई भी किसी को संभाल नहीं पा रहा है। जो जहाँ भी है, वह बेचैन होकर अपनी जान बचाने के लिए वहीं से भाग रहा है।
बालधी फिरावै बार बार झहरावै, झरैं
बूँदिया सी लंक पघिलाइ पाग पागिहैं।
शब्दार्थ–
बालधी – पूँछ
झहरावै – झाड़ते हैं
झरैं – गिरती हैं
पघिलाइ – पिघलाकर
पाग पागिहैं – पागेंगे या चाशनी बनाएंगे
व्याख्या: हनुमान जी अपनी आग लगी हुई पूँछ को घुमाते हैं और बार-बार उसे झाड़ते हैं, जिससे आग की चिंगारियां इस तरह गिर रही हैं जैसे मीठी बूंदी बन रही हो। ऐसा लग रहा है मानो हनुमान जी पूरी लंका को पिघलाकर उसी की चाशनी में इन बूंदियों को पागने वाले हैं।
तुलसी बिलोकि अकुलानी जातुधानी कहैं
चित्रहू के कपि सों निसाचर न लागिहैं।
शब्दार्थ–
बिलोकि – देखकर
अकुलानी – घबराई हुई
जातुधानी – राक्षसियाँ
कपि – बंदर
निसाचर – राक्षस
लागिहैं – उलझेंगे या पंगा लेंगे
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि लंका की तबाही देखकर घबराई हुई राक्षसियाँ आपस में कह रही हैं कि आज के बाद लंका का कोई भी राक्षस असली बंदर तो दूर, किसी तस्वीर वाले बंदर से भी कभी पंगा नहीं लेगा।
लपट कराल ज्वालजालमाल दहूँ दिसि,
धूम अकुलाने पहिचाने कौन काहि रे।
शब्दार्थ–
कराल – भयंकर
दहूँ दिसि – दसों दिशाओं में
धूम – धुआं
अकुलाने – व्याकुल
काहि – किसे
व्याख्या: दसों दिशाओं में भयंकर आग की लपटें फैल गई हैं। चारों तरफ इतना ज्यादा धुआं भर गया है कि सभी लोग घबराए हुए हैं और धुएं के कारण कोई भी किसी को पहचान नहीं पा रहा है।
पानी को ललात, बिललात, जरे गात जात,
परे पाइमाल जात, भ्रात! तू निबाहि रे।
शब्दार्थ–
ललात – तड़पना या तरसना
बिललात – विलाप करना या रोना
जरे गात – जलते हुए शरीर
पाइमाल – नष्ट होना या बर्बाद होना
निबाहि – बचाना
व्याख्या: प्यास के मारे लोग पानी के लिए तरस रहे हैं और रो रहे हैं। उनके शरीर आग की गर्मी से जले जा रहे हैं और सब कुछ बर्बाद हो रहा है। लोग अपने भाइयों को पुकार रहे हैं कि हे भाई, मुझे इस आग से बचा लो।

प्रिया तू पराहि, नाथ तू पराहि, बाप,
बाप! तू पराहि, पूत पूत, तू पराहि रे।
शब्दार्थ–
प्रिया – पत्नी
पराहि – भाग जा
नाथ – पति
पूत – बेटा
व्याख्या: इस घबराहट में रिश्ते भी छूट रहे हैं। पति अपनी पत्नी से कह रहा है कि तुम भाग कर अपनी जान बचा लो, पत्नी अपने पति से भागने को कह रही है। पिता अपने बेटे से और बेटा अपने पिता से कह रहा है कि तुम भाग कर अपनी रक्षा करो।
तुलसी बिलोकि लोग ब्याकुल बिहाल कहैं,
लेहि दससीस अब बीस चख चाहि रे।
शब्दार्थ–
बिलोकि – देखकर
बिहाल – बेहाल या बुरी हालत में
दससीस – रावण
चख – आँखें
चाहि – देख
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि लंका के लोगों को इस तरह व्याकुल और बेहाल देखकर लोग रावण को ताना मारते हुए कह रहे हैं कि हे दस सिरों वाले रावण, अब अपनी करनी का फल अपनी बीसों आँखों से अच्छी तरह देख ले।
बीथिका बजार प्रति, अट्टनि अगार प्रति,
पँवरि पगार प्रति बानर बिलोकिए।
शब्दार्थ–
बीथिका – गली
अट्टनि – छत
अगार – मकान
पँवरि – दरवाजा
पगार – दीवार
बिलोकिए – दिखाई देते हैं
व्याख्या: लंका की हर गली, हर बाजार, छतों, घरों, दरवाजों और दीवारों पर हर जगह बस बंदर ही बंदर दिखाई दे रहे हैं। राक्षसों के मन में हनुमान जी का ऐसा खौफ बैठ गया है कि उन्हें हर जगह बंदर नजर आ रहा है।
अध ऊर्ध बानर, बिदिसि दिसि बानर हैं,
मानहु रह्यो है भरि बानर तिलोकिए।
शब्दार्थ–
अध – नीचे
ऊर्ध – ऊपर
बिदिसि दिसि – सभी दिशाओं और उपदिशाओं में
तिलोकिए – तीनों लोक
व्याख्या: लंकावासियों को नीचे, ऊपर और सभी दिशाओं में केवल बंदर ही बंदर दिखाई दे रहे हैं। उन्हें ऐसा लग रहा है मानो तीनों लोकों में हर जगह सिर्फ बंदर ही भर गए हैं।
मूँदे आँखि हीय में, उघारे आँखि आगे ठाढ़ो,
धाइ जाइ जहाँ तहाँ और कोऊ को किए।
शब्दार्थ–
हीय – हृदय
उघारे – खोलने पर
ठाढ़ो – खड़ा हुआ
धाइ जाइ – भाग कर जाते हैं
व्याख्या: डर के मारे जब वे अपनी आँखें बंद करते हैं तो उनके हृदय में बंदर नजर आता है, और जैसे ही वे अपनी आँखें खोलते हैं तो वही बंदर सामने खड़ा दिखाई देता है। वे भाग कर जहां भी जाते हैं, वहां उन्हें कोई और नहीं बस बंदर ही नजर आता है।
लेहु अब लेहु, तब कोऊ न सिखाओ मानो,
सोई सतराइ जाइ जाहि जाहि रोकिए।
शब्दार्थ–
लेहु – लो मजे लो
सिखाओ – समझाया
सतराइ – गुस्सा होना
जाहि जाहि – जिस जिस को
व्याख्या: लंका के लोग आपस में कह रहे हैं कि अब अपनी गलती का मजा चखो। जब पहले लोगों ने समझाया था तब किसी ने उनकी बात नहीं मानी। उस समय जिस किसी को भी ऐसा करने से रोका गया था, वह उल्टा गुस्सा हो जाता था, अब वही सब अपनी जिद का फल भुगत रहे हैं।
काव्य सौंदर्य और मूल भाव:
रस:
* भयानक रस, रौद्र रस, अद्भुत रस और वीर रस
छंद:
* कवित्त और सवैया छंद
अलंकार:
* अनुप्रास, उत्प्रेक्षा, उपमा, पुनरुक्ति प्रकाश और अतिशयोक्ति अलंकार
कवितावली कविता का सारांश:
कविता की शुरुआत में हनुमान जी की पूंछ में लगी भयंकर आग का वर्णन किया गया है। उनकी विशाल पूंछ से उठने वाली आग की लपटें ऐसी लग रही हैं मानो मृत्यु के देवता काल ने अपनी भयंकर जीभ फैला रखी हो, या फिर आकाश में बहुत सारे पुच्छल तारे एक साथ निकल आए हों। इस आग को देखकर लंका के सभी राक्षस और राक्षसियां बुरी तरह घबरा गए हैं। वे परेशान होकर कह रहे हैं कि इस बंदर ने पहले तो हमारी अशोक वाटिका को नष्ट किया और अब यह पूरे नगर को ही जला रहा है।
हनुमान जी ने एक जगह रुकने के बजाय लंका के बाजारों, रास्तों, किलों, महलों और गली-गली में दौड़-दौड़ कर भयानक आग लगा दी है। लोग आग की भयंकर गर्मी से बचने के लिए इधर-उधर भाग रहे हैं। जब हनुमान जी अपनी पूंछ झटकते हैं तो आग की चिंगारियां ऐसे गिरती हैं जैसे पूरी लंका को पिघलाकर बूंदी की चाशनी बनाई जा रही हो। यह भयंकर तबाही देखकर राक्षसियां इतनी ज्यादा डर गई हैं कि वे आपस में चर्चा करती हैं कि आज के बाद लंका का कोई भी व्यक्ति असली बंदर तो दूर, किसी तस्वीर वाले बंदर से भी कभी पंगा लेने की हिम्मत नहीं करेगा।
आग के कारण दसों दिशाओं में इतना ज्यादा धुआं फैल गया है कि कोई किसी को देख और पहचान नहीं पा रहा है। लोग प्यास से तड़प रहे हैं, उनके शरीर आग की तपिश से जल रहे हैं। जान बचाने की इस भयंकर अफरातफरी में सारे रिश्ते-नाते पीछे छूट रहे हैं। पति-पत्नी, माता-पिता और बच्चे एक-दूसरे को बस अपनी-अपनी जान बचाकर भाग जाने के लिए कह रहे हैं। इस दर्दनाक और बेहाल स्थिति को देखकर लंकावासी अपने राजा रावण को कोसते हुए कहते हैं कि हे दस सिरों वाले घमंडी रावण, अब अपनी इस बुरी करनी का भयंकर फल अपनी बीसों आंखों से अच्छी तरह देख ले।
लंका के लोगों के मन में हनुमान जी का इतना ज्यादा खौफ बैठ गया है कि अब उन्हें लंका की हर गली, हर बाजार, छत और दीवार पर सिर्फ बंदर ही बंदर दिखाई दे रहे हैं। उन्हें ऐसा लग रहा है मानो ऊपर-नीचे और तीनों लोकों में केवल बंदर ही भर गए हैं। लोग डर के मारे अपनी आंखें बंद करते हैं तो उन्हें अपने मन में बंदर दिखाई देता है और जैसे ही आंखें खोलते हैं तो सामने साक्षात बंदर खड़ा नजर आता है।
अंत में नगरवासी आपस में पश्चाताप करते हुए कहते हैं कि जब पहले कुछ समझदार लोगों ने इस विनाश को रोकने के लिए समझाया था, तब तो किसी ने उनकी बात नहीं मानी और उल्टा उन पर ही गुस्सा किया। अब उसी जिद, अहंकार और पाप का यह भयंकर परिणाम पूरी लंका को एक साथ भुगतना पड़ रहा है।
यह पूरी कविता रावण के अहंकार के विनाश और हनुमान जी के महान पराक्रम का एक बहुत ही प्रभावशाली दृश्य प्रस्तुत करती है।