कवित्त
यह सुंदर कवित्त रस की साक्षात मूर्ति भगवान श्रीकृष्ण के अलौकिक गोधूलि वेला के रूप-सौंदर्य के विषय में लिखा गया है। इसकी रचना भक्तिकाल के कृष्णभक्ति शाखा के अद्वितीय कवि रसखान (सैयद इब्राहिम) ने की है…


यह सुंदर कवित्त रस की साक्षात मूर्ति भगवान श्रीकृष्ण के अलौकिक गोधूलि वेला के रूप-सौंदर्य के विषय में लिखा गया है।
इसकी रचना भक्तिकाल के कृष्णभक्ति शाखा के अद्वितीय कवि रसखान (सैयद इब्राहिम) ने की है।
यह कवित्त मूल रूप से उनके सुप्रसिद्ध और प्रामाणिक काव्य-संग्रह रसखान ग्रंथावली में संकलित है।

श्रीकृष्ण का गोधूलि रूप :
पंक्ति १ :
गोरज बिराजै भाल लहलही बनमाल,
शब्दार्थ :
गोरज ➔ गायों के खुरों से उड़ने वाली धूल
बिराजै ➔ सुशोभित हो रही है
भाल ➔ माथे पर, ललाट पर
लहलही ➔ लहरा रही है, सुशोभित है
बनमाल ➔ वन के फूलों की माला, वैजयंती माला
व्याख्या :
एक गोपी संध्या के समय वन से गायें चराकर लौटते हुए श्रीकृष्ण के अप्रतिम सौंदर्य को देखकर भाव-विभोर हो जाती है और अपनी सखी से कहती है कि हे सखी! देखो, श्रीकृष्ण के सुंदर माथे पर गायों के खुरों से उड़ी हुई पावन धूल सुशोभित हो रही है, जो उनके मुख की आभा को और बढ़ा रही है। उनके हृदय पर वन के पुष्पों की दिव्य माला लहरा रही है।
आगे गैयाँ पाछें ग्वाल गावै मृदु तानि री।
शब्दार्थ :
गावै ➔ गा रहे हैं
मृदु ➔ मधुर
तानि ➔ ध्वनि, सुर में
री ➔ हे सखी
व्याख्या :
उनके आगे-आगे गायों का झुंड चल रहा है और पीछे-पीछे ग्वाल-बाल मधुर स्वर में लोकगीत गाते हुए आ रहे हैं।
पंक्ति २ :
तैसी धुनि बाँसुरी की मधुर-मधुर जैसी,
शब्दार्थ :
तैसी ➔ वैसी ही
धुनि ➔ धुन, तान
बाँसुरी ➔ वंशी की
मधुर ➔ मीठी
व्याख्या :
वह गोपी कहती है कि जिस प्रकार श्रीकृष्ण की बाँसुरी से निकलने वाली वह स्वर-लहरी अत्यंत मधुर और सम्मोहक है...
बंक चितवनि मंद-मंद मुसकानि री।
शब्दार्थ :
बंक ➔ तिरछी
चितवनि ➔ दृष्टि, चितवन
मंद-मंद ➔ धीमी
मुसकानि ➔ मुस्कुराहट
री ➔ हे सखी।
व्याख्या :
...ठीक वैसी ही मधुर उनकी तिरछी नज़रों की चितवन है। उस तिरछी चितवन के साथ उनके अधरों पर तैरने वाली वह धीमी-धीमी, रहस्यमयी मुस्कुराहट हृदय को पूरी तरह से आनंदित और विवश कर देने वाली है।
पंक्ति ३ :
कदम बिटप के निकट तटिनी के
शब्दार्थ :
कदम ➔ कदंब का
बिटप ➔ वृक्ष, पेड़
निकट ➔ पास
तटिनी ➔ नदी, यमुना नदी
तट ➔ किनारे
व्याख्या :
हे सखी! तुम शीघ्र ही महल की अटारी अर्थात छत पर चढ़ जाओ और यमुना नदी के पावन तट पर, कदंब के वृक्ष के समीप खड़े उस साक्षात सौंदर्य के पुंज श्रीकृष्ण को देखो।
अटा चढ़ि चाहि पीत पट फहरानि री।
शब्दार्थ :
अटा ➔ अट्टालिका, कोठे या छत पर
चढ़ि ➔ चढ़कर
चाहि ➔ देखो
पीत ➔ पीले
पट ➔ वस्त्र
फहरानि ➔ फहराना, उड़ना
री ➔ हे सखी।
व्याख्या :
हवा के झोंकों से उनके शरीर पर लिपटा हुआ वह पीला वस्त्र जिस प्रकार फहरा रहा है, वह दृश्य अटारी से अत्यंत अद्भुत और नयनाभिराम दिखाई दे रहा है।
पंक्ति ४ :
रस बरसावै तन-तपन बुझावै नैन,
शब्दार्थ :
रस ➔ आनंद, प्रेम रस
बरसावै ➔ बरसा रहा है
तन ➔ शरीर की
तपन ➔ संताप, तपिश, विरह वेदना
बुझावै ➔ शांत कर रहा है
नैन ➔ आँखों की प्यास
व्याख्या :
वह साक्षात रस की खान, आनंद का सागर श्रीकृष्ण अब ब्रज की ओर आ रहा है। उसका यह रूप हमारे संपूर्ण शरीर पर साक्षात प्रेम रस की वर्षा कर रहा है, हमारे अंतःकरण को शीतलता प्रदान कर रहा है, विरह की अग्नि में जल रहे हमारे नयनों की प्यास को बुझा रहा है
प्राननि रिझावै वह आवै रसखानि री।
शब्दार्थ :
प्राननि ➔ प्राणों को
रिझावै ➔ आनंदित, मोहित कर रहा है
आवै ➔ आ रहा है
रसखानि ➔ रसखान, आनंद की खान अर्थात् श्रीकृष्ण
री ➔ हे सखी।
व्याख्या :
... और हमारे प्राणों को अपनी ओर आकर्षित कर रिझा रहा है। उस परम ब्रह्म का आगमन संपूर्ण ब्रज को आनंदित कर रहा है।
साहित्यिक विशेषताएँ या काव्यगत सौंदर्य :
भाषा : शुद्ध, परिमार्जित और माधुर्य गुण से परिपूर्ण साहित्यिक ब्रजभाषा।
छंद : मनहरण कवित्त छंद (31 वर्णों का वर्णिक छंद), जिसमें अद्भुत गत्यात्मकता और संगीतात्मक प्रवाह है।
रस : श्रीकृष्ण के रूप-सौंदर्य के कारण यहाँ संयोग श्रृंगार रस का पूर्ण परिपाक हुआ है।
अलंकार : "मधुर मधुर" और "मंद मंद" में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है। "तटिनी के तट", "कदम बिटप" और "पट फहरानि" में अनुप्रास अलंकार का अत्यंत शास्त्रीय प्रयोग किया गया है। पूरे छंद में बिंब विधान अत्यंत सजीव है।