काव्य - सौन्दर्य
मैथिलीशरण गुप्त जी का काव्य हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। उनका काव्य सौंदर्य 'भाव पक्ष' (आंतरिक संवेदना) और 'कला पक्ष' (बाह्य शिल्प) का एक अत्यंत संतुलित और शास्त्रीय समन्वय है। आचार्य रामच…


मैथिलीशरण गुप्त जी का काव्य हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि है। उनका काव्य सौंदर्य 'भाव पक्ष' (आंतरिक संवेदना) और 'कला पक्ष' (बाह्य शिल्प) का एक अत्यंत संतुलित और शास्त्रीय समन्वय है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें 'सामंजस्यवादी कवि' कहा था, क्योंकि उनके काव्य में प्राचीन परंपराओं के प्रति पूज्य भाव भी है और आधुनिक युगीन चेतना का प्रखर स्वागत भी।
यहाँ गुप्त जी के काव्य सौंदर्य की प्रमुख विशेषताओं का सोदाहरण विवेचन प्रस्तुत है-
क. भाव पक्ष
1. राष्ट्रप्रेम और अतीत का गौरव गान :
गुप्त जी के काव्य का मूल स्वर राष्ट्रभक्ति है। वे देशवासियों को उनके गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराकर वर्तमान की जड़ता को तोड़ने का आह्वान करते हैं-
भूलोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ?
फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहाँ?
संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है?
उसका की जो ऋषिभूमि है, वह कौन? भारतवर्ष है।
-भारत-भारती
अर्थ : कवि संसार के मानचित्र पर भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक श्रेष्ठता को रेखांकित करते हुए पूछते हैं कि इस पृथ्वी का गौरव और प्रकृति की पवित्र क्रीड़ा-स्थली कहाँ है? जहाँ मन को हरने वाला हिमालय खड़ा है और जहाँ पवित्र गंगाजल बहता है, वही स्थान इस पृथ्वी का मुकुटमणि है। दुनिया के समस्त देशों में सबसे उन्नत और विकसित जो ऋषियों की पावन भूमि है, वह कोई और नहीं, बल्कि हमारा प्यारा 'भारतवर्ष' है।
2. नारी-चेतना एवं उपेक्षित पात्रों का उद्धार :
हिंदी साहित्याकाश में गुप्त जी संभवतः पहले ऐसे महाकवि हैं, जिन्होंने सदियों से उपेक्षित रही पौराणिक नारियों लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला, गौतम बुद्ध की पत्नी यशोधरा आदि के त्याग, विरह और आत्मगौरव को काव्य के केंद्र में स्थापित किया-
सखि, वे मुझसे कहकर जाते,
कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
मुझको बहुत उन्होंने माना,
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
-यशोधरा
विशेष रूप से प्रसिद्ध पंक्ति :
अबल जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।
अर्थ : इन पंक्तियों में भारतीय नारी के प्रति कवि की गहरी सहानुभूति और संवेदना प्रकट हुई है। कवि कहते हैं कि भारतीय समाज में नारी के जीवन की यही विडंबना रही है कि उसके भीतर ममता, वात्सल्य और पोषण की अगाध क्षमता है , परंतु उसे जीवनभर केवल दुःख, त्याग और अश्रु ही प्राप्त होते हैं। वह कष्ट सहकर भी समाज का सृजन करती है।
3. मानवतावाद और ईश्वर का मानवीकरण :
गुप्त जी ने अपने आराध्य प्रभु श्रीराम को अलौकिक ईश्वर के रूप में नहीं, बल्कि इस धरती के दुखों को दूर करने वाले एक आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका दृष्टिकोण पूर्णतः मानवतावादी था।
प्रचलित काव्यांश साकेत से उद्धृत -
संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।
अर्थ : साकेत महाकाव्य में स्वयं श्रीराम के मुख से कवि कहलवाते हैं कि मैं इस पृथ्वी पर केवल मनुष्यों को स्वर्ग का कोई काल्पनिक संदेश देने नहीं आया हूँ, बल्कि मेरा वास्तविक उद्देश्य इस धरती पर फैले अन्याय और कष्टों को समाप्त करके इस पृथ्वी को ही अपने कर्मों से स्वर्ग जैसा सुंदर, सुखद और पवित्र बनाना है।
ख. कला पक्ष
1. परिष्कृत और व्याकरण सम्मत खड़ी बोली :
गुप्त जी से पूर्व खड़ी बोली को शुष्क और नीरस माना जाता था। उन्होंने आचार्य द्विवेदी के अनुशासन में रहकर खड़ी बोली को एक अत्यंत मधुर, व्याकरणिक रूप से शुद्ध और काव्यात्मक गरिमा से युक्त भाषा बनाया।
प्रचलित काव्यांश पंचवटी से -
चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बर-तल में।
अर्थ : पंचवटी की रात्रिकालीन प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि सुंदर चंद्रमा की चंचल किरणें जल और धरती दोनों स्थानों पर क्रीड़ा कर रही हैं। चंद्रमा का यह अत्यंत निर्मल और उज्ज्वल प्रकाश पूरी पृथ्वी से लेकर आकाश के छोर तक चादर की तरह फैला हुआ है।
2. प्रबंधात्मकता और शैलीगत विविधता :
गुप्त जी कथा-काव्य लिखने में सिद्धहस्त थे। उनके काव्य में 'हरिगीतिका' छंद का प्रयोग इतनी कुशलता से हुआ है कि लंबी कथाएँ भी अत्यंत संगीतात्मक और प्रवाहपूर्ण प्रतीत होती हैं-
अन्याय सहकर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है,
न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है
-जयद्रथ-वध
अर्थ: महाभारत के युद्ध प्रसंग में अर्जुन के माध्यम से कवि राष्ट्रीय कर्तव्य का बोध कराते हुए कहते हैं कि समाज में अन्याय को चुपचाप सहते रहना सबसे बड़ा पाप है। न्याय की रक्षा के लिए यदि अपने सगे-संबंधियों या भाइयों के विरुद्ध भी शस्त्र उठाना पड़े या उन्हें दंड देना पड़े, तो वही सबसे बड़ा और वास्तविक धर्म है।
हरिगीतिका गुप्त जी का सबसे प्रिय छंद रहा है I विशेष रूप से प्रसिद्ध पंक्ति -
नर हो, न निराश करो मन को,
कुछ काम करो, कुछ काम करो।
जग में रहके निज नाम करो,
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो,
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो।
— सूत की माला/मनुष्यता का संदेश
अर्थ: कवि मनुष्य को कर्मठता का संदेश देते हुए कहते हैं कि तुम मनुष्य श्रेष्ठ जीव हो, इसलिए विपत्तियों से घबराकर अपने मन को कभी हताश या निराश मत होने दो। इस संसार में आए हो, तो अकर्मण्य मत बैठो; कुछ न कुछ रचनात्मक कार्य करो और इस जगत में रहते हुए पुरुषार्थ के बल पर अपना नाम कमाओ। यह विचार करो कि तुम्हारा यह अमूल्य मानव जीवन किस महान उद्देश्य के लिए हुआ है, उसे समझो और कर्मशील बनकर जियो ताकि यह जीवन व्यर्थ न चला जाए।
निष्कर्ष :
मैथिलीशरण गुप्त जी का काव्य सौंदर्य इस बात में निहित है कि उन्होंने कला को केवल कला के लिए नहीं, बल्कि समाज के जागरण के लिए प्रयोग किया। उनका भाव पक्ष जहाँ भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीयता की ठोस नींव पर खड़ा है, वहीं उनका कला पक्ष हिंदी व्याकरण की शुद्धता और सहज अभिव्यक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। यही कारण है कि वे आधुनिक हिंदी कविता के इतिहास में राष्ट्रकवि और सामंजस्यवादी महाकवि' के रूप में अमर हैं।