काव्य सौन्दर्य :
भारतेंदु जी के काव्य-सौंदर्य को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है- 1. भाव-पक्ष या विषय-वस्तु और भावनाएँ तथा 2. कला-पक्ष या भाषा, छंद और अलंकार भाग 1 भाव-पक्ष : 1. देश-प्रेम और राष्ट्रीय चे…


भारतेंदु जी के काव्य-सौंदर्य को दो मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है-
1. भाव-पक्ष या विषय-वस्तु और भावनाएँ तथा
2. कला-पक्ष या भाषा, छंद और अलंकार
भाग 1 भाव-पक्ष :
1. देश-प्रेम और राष्ट्रीय चेतना :
भारतेंदु जी के काव्य का मुख्य स्वर देशभक्ति है। उन्होंने पराधीन भारत की दुर्दशा पर गहरे दुःख का अनुभव किया और देशवासियों को जगाने का प्रयास किया। वे एक तरफ अंग्रेजी व्यवस्था की सुख-सुविधाओं को देखते हैं, तो दूसरी तरफ यहाँ से धन लूटकर ले जाने की क्रूर सच्चाई को भी उजागर करते हैं।
उदाहरण -
अँग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी।
पै धन बिदेस चलि जात इहै अति ख्वारी॥
अर्थ : अंग्रेज शासन में ऊपरी तौर पर सुख और व्यवस्था के सारे साधन बहुत भारी दिखाई देते हैं। परंतु, इस व्यवस्था की सबसे बड़ी 'ख्वारी' (दुर्दशा या दुःखद बात) यह है कि हमारे देश का सारा धन और संसाधन बहकर विदेशों में चला जा रहा है, जिससे भारत निरंतर निर्धन हो रहा है।
2. भक्ति भावना :
भारतेंदु जी वल्लभ संप्रदाय में दीक्षित थे, इसलिए उनके काव्य में भगवान कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और आत्म-समर्पण की भावना दिखाई देती है। उनकी भक्ति में सूरदास जैसी तन्मयता और मीराबाई जैसी व्याकुलता है।
उदाहरण -
हरिचंद जू प्रेम कौ पंथ करै, जिय की जिय में ही सिहानि रहै।
तौ पुकारत में कछु दोष नहीं, लखि कै सब लोग अयान रहै॥
अर्थ : भारतेंदु जी गोपियों के माध्यम से कहते हैं कि भगवान कृष्ण के प्रेम का मार्ग अत्यंत कठिन है, इसमें मन की इच्छाएँ मन में ही दबी रह जाती हैं। इस विरह के दुःख में यदि कोई तड़पकर पुकारता भी है, तो उसका कोई दोष नहीं है; परंतु संसार के अज्ञानी लोग इस निश्छल प्रेम के दर्द को नहीं समझ पाते और केवल तमाशा देखते हैं।
3.शृंगार रस का सजीव चित्रण :
भारतेंदु जी ने परंपरा से चले आ रहे शृंगार रस को भी अपने काव्य में स्थान दिया। विशेषकर 'वियोग शृंगार के चित्रण में उन्होंने कमाल किया है। उनके विरह वर्णन में कृत्रिमता नहीं बल्कि हृदय की वास्तविक तड़प है।
उदाहरण -
ऊधो जू सूधो गहो वह मारग, जहाँ सीख सीखन की कोउ नाहिं।
एक अयानी यहाँ न अयान, सयानप की कछु बात कोउ नाहिं॥
अर्थ : जब उद्धव गोपियों को ज्ञान का उपदेश देने आते हैं, तब गोपियाँ कहती हैं-हे उद्धव जी! आप सीधे उसी मार्ग से वापस लौट जाइए जहाँ से आए हैं, क्योंकि यहाँ ब्रज में आपके इस रूखे ज्ञान की सीख को सीखने वाला कोई नहीं है। यहाँ कोई एक गोपी अज्ञानी नहीं है जो आपकी बातों में आ जाए, और यहाँ आपके इस ज्ञान के सीधेपन या चतुराई की कोई आवश्यकता नहीं है। हम तो केवल कृष्ण के प्रेम को जानती हैं।
4. प्रकृति चित्रण :
भारतेंदु जी ने प्रकृति का बहुत ही सुंदर और अलौकिक चित्रण किया है। 'यमुना-छवि' कविता में उन्होंने यमुना नदी के किनारे खिले वृक्षों और चंद्रमा के प्रतिबिंब का जो वर्णन किया है, वह हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर है।
उदाहरण -
तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए॥
अर्थ : सूर्य की पुत्री अर्थात यमुना नदी के किनारे तमाल के बहुत से सुंदर वृक्ष छाए हुए हैं। वे वृक्ष यमुना के जल की ओर इस प्रकार झुके हुए हैं, मानो वे अत्यंत सुंदर प्रतीत होते हुए स्वयं यमुना के पवित्र जल को स्पर्श करना चाहते हों।
भाग 2: कला-पक्ष :
भाषा : भारतेंदु जी ने अपने गद्य में जहाँ खड़ीबोली का प्रयोग किया, वहीं काव्य में शुद्ध, सरस और मधुर ब्रजभाषा को ही अपनाए रखा। उनकी ब्रजभाषा कठिन नहीं है, बल्कि अत्यंत सहज और प्रवाहमयी है।
छंद योजना : उन्होंने कवित्त, सवैया, दोहा, चौपाई, और कुंडलियाँ जैसे पारंपरिक छंदों का प्रयोग अत्यंत कुशलता से किया है। उनके पद गेय
हैं।
अलंकार : उनके काव्य में अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप से हुआ है, कहीं भी जबरदस्ती अलंकार थोपे नहीं गए हैं। ऊपर दिए गए 'यमुना-छवि' के दोहे में 'त' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार का चरम सौंदर्य देखा जा सकता है, तथा "मनहुँ सुहाए" में उत्प्रेक्षा अलंकार है।
निष्कर्ष : भारतेंदु हरिश्चंद्र का काव्य-सौंदर्य प्राचीन ब्रजभाषा, श्रृंगार, भक्ति और आधुनिक देशभक्ति, समाज-सुधार का एक ऐसा अभूतपूर्व संगम है, जिसने आने वाली पीढ़ियों के कवियों का मार्ग प्रशस्त किया।