कैकेयी का अनुताप
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने इस काव्य का मूल आधार महर्षि वाल्मीकि रचित 'रामायण' और गोस्वामी तुलसीदास रचित 'रामचरितमानस' की पौराणिक कथा को बनाया है। मूल रामकथा में कैकेयी को केवल एक अत्यंत क्रू…


राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने इस काव्य का मूल आधार महर्षि वाल्मीकि रचित 'रामायण' और गोस्वामी तुलसीदास रचित 'रामचरितमानस' की पौराणिक कथा को बनाया है। मूल रामकथा में कैकेयी को केवल एक अत्यंत क्रूर, ईर्ष्यालु और स्वार्थी स्त्री के रूप में दिखाया गया है, जिसने अपने पुत्र भरत के लिए राज्य और श्री राम के लिए चौदह वर्ष का कठोर वनवास माँगा। इस कारण राजा दशरथ की मृत्यु हुई और पूरा रघुकुल बिखर गया। पौराणिक कथाओं में इसके बाद कैकेयी को समाज द्वारा घोर तिरस्कार और उपेक्षा ही मिलती रही।
गुप्त जी ने अपने महाकाव्य 'साकेत' के इस अंश 'कैकेयी का अनुताप' में इसी पारंपरिक कथा को एक सर्वथा नवीन और मानवीय दृष्टिकोण से जोड़ा है। जब भरत श्री राम को वापस अयोध्या लाने के लिए पंचवटी पहुँचते हैं, तो उनके साथ कैकेयी भी वहाँ जाती हैं। गुप्त जी ने यहाँ कैकेयी को एक खलनायिका के रूप में प्रस्तुत न करके, पश्चाताप की अग्नि में जलती हुई एक विवश माँ के रूप में दिखाया है। वह सभा के सामने स्वीकार करती हैं कि उन्होंने मतिभ्रम और पुत्र-मोह में आकर यह घोर पाप किया था, जिसके लिए वे नरक भोगने को भी तैयार हैं। इस प्रकार गुप्त जी ने वाल्मीकि और तुलसीदास की कथा के उस ऐतिहासिक कलंक को मिटाकर, कैकेयी के वात्सल्य और उनके हृदय परिवर्तन को दिखाकर उन्हें लोक-चेतना में आदर और सहानुभूति का पात्र बना दिया है।
मैथिलीशरण गुप्त जी कैकेयी का अनुताप के माध्यम से समाज को यह संदेश देना चाहते हैं कि सच्चा पश्चाताप बड़े से बड़े पाप को भी धो देता है और व्यक्ति के अंतःकरण को निर्मल बना देता है। वे यह स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य स्वभाववश मोह या अज्ञान में आकर गलतियाँ कर सकता है, परंतु यदि वह अपनी भूल को खुले मन से स्वीकार कर ले, तो वह समाज में पुनः आदर का पात्र बन जाता है। इसके अतिरिक्त, यह काव्य मातृ-प्रेम के उस उदात्त रूप को दर्शाता है जहाँ एक माँ अपने पुत्र के कल्याण के लिए दुनिया भर का अपयश सहने को भी तैयार हो जाती है। गुप्त जी संदेश देते हैं कि किसी व्यक्ति के अतीत की भूलों के आधार पर उसे हमेशा के लिए कलंकित नहीं ठहराया जाना चाहिए, बल्कि उसके हृदय परिवर्तन और विवेक का सम्मान किया जाना चाहिए। अंततः, यह रचना पारिवारिक एकता, भ्रातृ-प्रेम और सहानुभूतिपूर्ण मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का प्रबल संदेश देती है।
भाग 1: पंचवटी की रात्रिकालीन सभा :
पंक्ति 1 :
तदनन्तर बैठी सभा उटज के आगे,
शब्दार्थ :
तदनन्तर ➔ उसके बाद, भरत के आगमन के बाद
उटज ➔ कुटिया
व्याख्या : इसके बाद पंचवटी में श्री राम की कुटिया के सामने सभी लोगों की एक सभा बैठ गई।
पंक्ति 2 :
नीले वितान के तले दीप बहु जागे।
शब्दार्थ :
वितान ➔ आकाश रूपी शामियाना, तंबू
तले ➔ नीचे
दीप बहु जागे ➔ बहुत से दीपक जल उठे -यहाँ तात्पर्य तारों से है
व्याख्या : नीले आकाश रूपी शामियाने के नीचे मानो बहुत सारे तारा रूपी दीपक जगमगा उठे हों।
पंक्ति 3 :
टकटकी लगाये नयन सुरों के थे वे,
शब्दार्थ :
टकटकी ➔ लगातार देखना
नयन ➔ आँखें
सुरों के ➔ देवताओं के
व्याख्या : आकाश में स्थित देवतागण भी उस सभा को देखने के लिए नीचे की ओर टकटकी लगाए हुए थे।
पंक्ति 4:
परिणामोत्सुक उन भयातुरों के थे वे।
शब्दार्थ :
परिणामोत्सुक ➔ परिणाम जानने के लिए उत्सुक
भयातुरों ➔ भय से व्याकुल लोग
व्याख्या : वे देवतागण सभा के निर्णय का परिणाम जानने के लिए उत्सुक थे और किसी अनहोनी की आशंका से डरे हुए थे।
पंक्ति 5 :
उत्फुल्ल करौंदी-कुंज वायु रह रहकर,
शब्दार्थ :
उत्फुल्ल ➔ प्रफुल्लित, खिला हुआ
करौंदी-कुंज ➔ करौंदे के बाग, झाड़ियाँ
व्याख्या : वहाँ पास में ही स्थित खिले हुए करौंदे के बगीचे से आने वाली हवा रह-रहकर चल रही थी।
पंक्ति 6 :
करती थी सबको पुलक-पूर्ण मह महकर।
शब्दार्थ :
पुलक-पूर्ण ➔ आनंदित, रोमांचित
मह महकर ➔ सुगंध फैलाकर
व्याख्या : वह हवा अपनी सुगंध बिखेरकर वहाँ उपस्थित सभी लोगों को आनंद और रोमांच से भर रही थी।
पंक्ति 7 :
वह चन्द्रलोक था, कहाँ चाँदनी वैसी,
शब्दार्थ :
चन्द्रलोक ➔ चंद्रमा का लोक
व्याख्या : वह स्थान उस समय साक्षात् चंद्रलोक जैसा प्रतीत हो रहा था, वैसी स्वच्छ चाँदनी अन्यत्र दुर्लभ थी।
पंक्ति 8 :
प्रभु बोले गिरा गम्भीर नीरनिधि जैसी।
शब्दार्थ :
प्रभु ➔ श्री राम
गिरा ➔ वाणी, आवाज़
नीरनिधि ➔ समुद्र
व्याख्या : उस शांत वातावरण में प्रभु श्री राम ने समुद्र के समान अत्यंत गंभीर और धीर वाणी में बोलना प्रारंभ किया।
राम - भरत संवाद और भरत विलाप
पंक्ति 9 :
हे भरतभद्र, अब कहो अभीप्सित अपना
शब्दार्थ :
भरतभद्र = श्रेष्ठ भाई भरत
अभीप्सित = इच्छित, मनोकामना
व्याख्या : श्री राम ने कहा— हे श्रेष्ठ भाई भरत! अब तुम अपनी इच्छा बताओ कि तुम यहाँ किसलिए आए हो?
पंक्ति 10 :
सब सजग हो गये, भंग हुआ ज्यों सपना।
शब्दार्थ :
सजग = सावधान, जागरूक
भंग = टूटना
व्याख्या : राम के इस गंभीर प्रश्न को सुनकर सभा के सभी लोग वैसे ही सावधान हो गए, जैसे कोई सोता हुआ व्यक्ति सपना टूटने पर अचानक जाग जाता है।
पंक्ति 11 :
हे आर्य, रहा क्या भरत-अभीप्सित अब भी?
शब्दार्थ :
आर्य = श्रेष्ठ -राम के लिए
भरत-अभीप्सित = भरत की इच्छा
व्याख्या : भरत ने दुखी होकर कहा— हे श्रेष्ठ भाई! भला अब इस अभागे भरत की क्या कोई इच्छा बची होगी?
पंक्ति 12 :
मिल गया अकंटक राज्य उसे जब, तब भी?
शब्दार्थ :
अकंटक = बाधा रहित, काँटों के बिना
व्याख्या : जबकि उसे अयोध्या का संपूर्ण निष्कंटक (बाधा रहित) राज्य बिना माँगे ही मिल गया है।
पंक्ति 13 :
पाया तुमने तरु-तले अरण्य-बसेरा,पाया
शब्दार्थ :
तरु-तले = वृक्ष के नीचे; अरण्य-बसेरा = जंगल में निवास।
व्याख्या : और आपको महलों के स्थान पर वृक्षों के नीचे इस घने जंगल में निवास मिला है।
पंक्ति 14 :
रह गया अभीप्सित शेष तदपि क्या मेरा?
शब्दार्थ :
तदपि = फिर भी; शेष = बाकी।
व्याख्या : इतना सब अनर्थ हो जाने के बाद भी क्या मेरी कोई इच्छा बाकी रह सकती है?
पंक्ति 15 :
तन तड़प तड़पकर तप्त तात ने त्यागा,
शब्दार्थ :
तप्त = दुखी, संतप्त
तात = पिता -दशरथ
व्याख्या : मेरे कारण ही पूज्य पिता जी ने तड़प-तड़पकर और दुख की अग्नि में जलते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
पंक्ति 16 :
क्या रहा अभीप्सित और तथापि अभागा?
शब्दार्थ :
तथापि = फिर भी
अभागा = भाग्यहीन -भरत स्वयं के लिए
व्याख्या : तो फिर इस अत्यंत भाग्यहीन भरत की और कौन सी मनोकामना पूरी होनी शेष रह गई होगी?
पंक्ति 17 :
हा! इसी अयश के हेतु जनन था मेरा,
शब्दार्थ :
हा = दुःख सूचक अव्यय
अयश = अपकीर्ति, कलंक
जनन = जन्म
व्याख्या : हा धिक्कार है! मेरा जन्म संसार में इसी अपयश और कलंक को कमाने के लिए हुआ था।
पंक्ति 18 :
निज जननी ही के हाथ हनन था मेरा।
शब्दार्थ :
निज = अपनी
जननी = माता
हनन = विनाश, वध
व्याख्या : कि मेरी अपनी ही माता के हाथों मेरे चरित्र और मानसिक सम्मान का वध होना लिखा था।
पंक्ति 19 :
अब कौन अभीप्सित और आर्य, वह किसका?
व्याख्या : हे श्रेष्ठ भाई! अब इस संसार में मेरी क्या इच्छा होगी और वह किसके लिए होगी?
पंक्ति 20 :
संसार नष्ट है भ्रष्ट हुआ घर जिसका।
शब्दार्थ :
भ्रष्ट = नष्ट, बर्बाद।
व्याख्या : जिस व्यक्ति का घर और परिवार ही पूरी तरह बर्बाद हो गया हो, उसके लिए तो यह पूरा संसार ही नष्ट हो जाने के समान है।
पंक्ति 21 :
मुझसे मैंने ही आज स्वयं मुँह फेरा,
शब्दार्थ :
मुँह फेरा = खुद से ग्लानि होना, नफरत होना।
व्याख्या : आज मैं स्वयं अपनी ही नजरों में गिर गया हूँ और मुझे खुद से ही ग्लानि हो रही है।
पंक्ति 22 :
हे आर्य, बता दो तुम्हीं अभीप्सित मेरा?
शब्दार्थ : अभीप्सित = इच्छा
व्याख्या : इसलिए हे आर्य! अब आप ही मुझे बता दीजिए कि मेरी और क्या इच्छा हो सकती है?
पंक्ति 23 :
प्रभु ने भाई को पकड़ हृदय पर खींचा,
शब्दार्थ :
हृदय पर खींचा = गले से लगा लिया।
व्याख्या : भरत के इन अत्यंत कारुणिक वचनों को सुनकर प्रभु श्री राम ने भावुक होकर अपने भाई भरत को गले से लगा लिया।
पंक्ति 24 :
रोदन जल से सविनोद उन्हें फिर सींचा!
शब्दार्थ :
रोदन जल = आँसू
सविनोद = प्रेमपूर्वक, प्रसन्नता के साथ
सींचा = नहला दिया।
व्याख्या : और अपने प्रेम के आँसुओं की वर्षा करके उन्हें मानो आनंदपूर्वक सींच दिया गले लगाकर दोनों रो पड़ेI
भाग 2: कैकेयी का अकाट्य तर्क और पश्चाताप :
पंक्ति 25 :
उसके आशय की थाह मिलेगी किसको?
शब्दार्थ :
आशय = हृदय के भाव, मनसा
थाह = गहराई,अंत।
व्याख्या : राम ने कहा भरत के विशाल हृदय की गहराई को इस संसार में भला कौन नाप सकता है?
पंक्ति 26 :
जनकर जननी ही जान न पाई जिसको?
शब्दार्थ :
जनकर = जन्म देकर
जननी = माता कैकेयी।
व्याख्या : जिस भरत को जन्म देकर स्वयं उसकी माता कैकेयी भी उसके महान चरित्र को नहीं समझ पाईं।
विषय परिवर्तन: कैकेयी की घोषणा और पश्चाताप
पंक्ति 27 :
यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को।
व्याख्या : कैकेयी अचानक बोल उठी- हे राम! यदि तुम्हारी यह बात सच है कि मैं माँ होकर भी भरत को नहीं समझ सकी, तो अब मेरी प्रार्थना मानकर तुम घर लौट चलो।
पंक्ति 28 :
चौंके सब सुनकर अटल कैकेयी-स्वर को।
शब्दार्थ :
अटल = दृढ़, न बदलने वाला।
व्याख्या : कैकेयी के इस दृढ़ और बदले हुए स्वर को सुनकर सभा में उपस्थित सभी लोग अचानक चौंक उठे।
पंक्ति 29 :
सबने रानी की ओर अचानक देखा,
व्याख्या : सभी लोगों ने विस्मय के साथ अचानक रानी कैकेयी की तरफ देखना शुरू किया।
पंक्ति 30 :
वैधव्य-तुषारावृत्ता यथा विधु-लेखा।
शब्दार्थ :
वैधव्य = विधवा रूप
तुषारावृत्ता = कोहरे से ढकी हुई
विधु-लेखा = चंद्रमा की किरण
व्याख्या : सफेद वस्त्रों में लिपटी हुई विधवा कैकेयी उस समय ऐसी लग रही थी, मानो कोहरे से ढकी हुई चंद्रमा की कोई उज्ज्वल किरण हो।
पंक्ति 31 :
बैठी थी अचल तथापि असंख्यतरंगा,
शब्दार्थ :
अचल = स्थिर
असंख्यतरंगा = अनगिनत विचारों की तरंगों वाली
व्याख्या : यद्यपि वह शांत और स्थिर बैठी थीं, फिर भी उनके मन में विचारों की अनगिनत लहरें उठ रही थीं।
पंक्ति 32 :
वह सिंही अब थी हहा! गोमुखी गंगा-
शब्दार्थ :
सिंही = शेरनी
गोमुखी गंगा = गंगा के उद्गम जैसी पवित्र और शांत।
व्याख्या : जो कैकेयी कभी क्रोध में शेरनी जैसी खूंखार लग रही थी, वह आज पश्चाताप की अग्नि में तपकर गोमुख से निकलने वाली पवित्र गंगा जैसी शांत और निर्मल प्रतीत हो रही थी।
पंक्ति 33 :
हाँ, जनकर भी मैंने न भरत को जाना,
व्याख्या : कैकेयी ने कहा— यह सच है कि मैंने भरत को जन्म देने के बाद भी उसके मन को नहीं समझा।
पंक्ति 34 :
सब सुन लें, तुमने स्वयं अभी यह माना।
व्याख्या : यहाँ उपस्थित सभी लोग मेरी बात सुन लें, और हे राम! तुमने भी अभी-अभी इसी बात को स्वीकार किया है।
पंक्ति 35 :
यह सच है तो फिर लौट चलो घर भैया,
व्याख्या : यदि यह बात पूरी तरह सच है, तो हे पुत्र राम! अब तुम अयोध्या वापस लौट चलो।
पंक्ति 36 :
अपराधिनी मैं हूँ तात, तुम्हारी मैया।
शब्दार्थ :
अपराधिनी = गुनाहगार
तात = पुत्र -राम के लिए
व्याख्या : तुम्हारी अपराधी तो मैं हूँ, इसमें भरत का कोई दोष नहीं है।
पंक्ति 37 :
दुर्बलता का ही चिह्न विशेष शपथ है,
शब्दार्थ :
दुर्बलता = कमजोरी
चिह्न = प्रतीक
शपथ = कसम।
व्याख्या : यद्यपि कसम खाना मनुष्य की कमजोरी का ही प्रतीक माना जाता है,
पंक्ति 38 :
पर, अबलाजन के लिए कौन-सा पथ है?
शब्दार्थ :
अबलाजन = असहाय स्त्रियाँ
व्याख्या : परंतु मुझ जैसी असहाय और बेबस स्त्री के पास अपनी बात मनवाने के लिए कसम खाने के अलावा दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं है।
पंक्ति 39 :
यदि मैं उकसाई गई भरत से होऊँ,
शब्दार्थ :
उकसाई गई = भड़काई गई।
व्याख्या : यदि इस कार्य लिए अर्थतत राम को वनवास भेजने के लिए मुझे भरत ने थोड़ा सा भी भड़काया हो,
पंक्ति 40 :
तो पति समान ही स्वयं पुत्र भी खोऊँ।
व्याख्या : तो जैसे मैंने अपने पति को खो दिया है, वैसे ही मैं अपने पुत्र भरत को भी खो दूँ ,यह मेरी घोर शपथ है।
पंक्ति 41 :
ठहरो, मत रोका मुझे, कहूँ सो सुन लो,
व्याख्या : मुझे बोलने से मत रोको, आज मेरे मन में जो कुछ भी है, उसे ध्यानपूर्वक सुन लो।
पंक्ति 42 :
पाओ यदि उसमें सार इसे सब चुन लो।
शब्दार्थ :
सार = निचोड़, सच्चाई।
व्याख्या : यदि मेरी बातों में कोई सच्चाई या तत्व दिखाई दे, तो उसे आप सब ग्रहण कर लें।
पंक्ति 43 :
करके पहाड़-सा पाप मौन रह जाऊँ?
व्याख्या : क्या मैंने इतना बड़ा पहाड़ जैसा पाप किया है और अब मैं चुपचाप बैठी रहूँ?
पंक्ति 44 :
राई भर भी अनुताप न करने पाऊँ?
शब्दार्थ :
राई भर = थोड़ी सी; अनुताप = पश्चाताप/पछतावा।
व्याख्या : क्या मुझे अपने पाप पर राई के दाने के बराबर भी पछतावा करने का अधिकार नहीं है?
पंक्ति 45 :
थी सनक्षत्र शशि-निशा ओस टपकाती,
शब्दार्थ :
सनक्षत्र = तारों सहित
शशि-निशा = चाँदनी रात।
व्याख्या : तारों से भरी वह चाँदनी रात ओस की बूंदों के रूप में आँसू टपका रही थी,
पंक्ति 46 :
रोती थी नीरव सभा हृदय थपकाती।
शब्दार्थ :
नीरव = शांत, मौन।
व्याख्या : और वहाँ बैठी हुई बिल्कुल शांत सभा अपने सीने को पीटकर रो रही थी (सभी भावुक थे)।
पंक्ति 47 :
उल्का-सी रानी दिशा दीप्त करती थी,
शब्दार्थ :
उल्का-सी = टूटते हुए तारे की तरह
दीप्त = प्रकाशित।
व्याख्या : जो रानी कैकेयी कभी समाज को नष्ट करने वाली उल्का जैसी थी, वही आज अपने पश्चाताप के वचनों से सभा को नई वैचारिक रोशनी दे रही थी।
पंक्ति 48 :
सबमें भय-विस्मय और खेद भरती थी।
शब्दार्थ :
विस्मय = आश्चर्य
खेद = दुःख।
व्याख्या : उनकी बातें सुनकर पूरी सभा में एक साथ भय, आश्चर्य और गहरा दुःख व्याप्त हो रहा था।
पंक्ति 49 :
क्या कर सकती थी, मरी मंथरा दासी,
व्याख्या : कैकेयी बोलीं— वह बेचारी दासी मंथरा तो बहुत साधारण थी, वह मेरा क्या बिगाड़ सकती थी?
पंक्ति 50 :
मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी।
शब्दार्थ :
निज विश्वासी = खुद पर भरोसा रखने वाला।
व्याख्या : असल में मेरा अपना मन ही कमजोर हो गया था और उसे खुद पर विश्वास नहीं रहा था।
पंक्ति 51 :
जल पंजर-गत अब अरे अधीर, अभागे,
शब्दार्थ :
पंजर-गत = शरीर के भीतर स्थित, हड्डियों के ढांचे में बंद
अधीर = धैर्यहीन।
व्याख्या : हे मेरे शरीर के भीतर रहने वाले धैर्यहीन और अभागे मन! अब तू पश्चाताप की अग्नि में जल,
पंक्ति 52 :
वे ज्वलित भाव थे स्वयं तुझीमें जागे।
शब्दार्थ :
ज्वलित भाव = ईर्ष्या और क्रोध की अग्नि वाले भाव।
व्याख्या : क्योंकि दूसरों के प्रति ईर्ष्या और नफरत के वे बुरे भाव सबसे पहले स्वयं तेरे अंदर ही पैदा हुए थे।
भाग 3: वात्सल्य का संकट और कलंक-मुक्ति :
पंक्ति 53 :
पर था केवल क्या ज्वलित भाव ही मन में?
व्याख्या : कैकेयी स्वयं से पूछती हैं क्या मेरे मन में केवल वही बुरे और ईर्ष्यालु भाव ही भरे हुए थे?
पंक्ति 54 :
क्या शेष बचा था कुछ न और इस मन में?
व्याख्या : क्या इस माँ के हृदय में और कुछ अच्छा शेष नहीं बचा था?
पंक्ति 55 :
कुछ मूल्य नहीं वात्सल्य-मात्र, क्या तेरा?
शब्दार्थ :
वात्सल्य-मात्र = पुत्र के प्रति माता का निश्छल प्रेम।
व्याख्या : क्या अपने पुत्र भरत के प्रति मेरे इस गहरे मातृ-प्रेम का कोई मूल्य नहीं रह गया?
पंक्ति 56 :
पर आज अन्य-सा हुआ वत्स भी मेरा।
शब्दार्थ :
अन्य-सा = पराए जैसा; वत्स = पुत्र।
व्याख्या : जिसके कारण आज मेरा खुद का बेटा भरत भी मुझसे पराए की तरह व्यवहार कर रहा है।
पंक्ति 57 :
थूके, मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके,
शब्दार्थ :
त्रैलोक्य = तीनों लोक -स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल।
व्याख्या : अब तीनों लोक मिलकर भले ही मेरे इस कृत्य पर मुझ पर थूकें या मेरी निंदा करें,
पंक्ति 58 :
जो कोई जो कह सके, कहे, क्यों चूके?
शब्दार्थ :
चूके = पीछे हटे।
व्याख्या : जिसके मन में जो आए वह कहे, कोई मेरी बुराई करने से पीछे क्यों हटे? क्योंकि मैंने काम ही ऐसा किया है।
पंक्ति 59 :
छीने न मातृपद किंतु भरत का मुझसे,
शब्दार्थ :
मातृपद = माता होने का गौरव, अधिकार।
व्याख्या : लेकिन मेरी भगवान से और तुम सब से यही विनती है कि भरत की माता होने का मेरा अधिकार मुझसे कोई न छीने।
पंक्ति 60 :
रे राम, दुहाई करूँ और क्या तुझसे?
शब्दार्थ :
दुहाई = प्रार्थना, गुहार।
व्याख्या : हे राम! मैं इसके अतिरिक्त तुझसे और क्या प्रार्थना करूँ?
लोक-अपवाद और माता का गौरव
पंक्ति 61 :
कहते आते थे यही अभी नरदेही,
शब्दार्थ :
नरदेही = मानव शरीर धारण करने वाले लोग, संसार के मनुष्य।
व्याख्या : अब तक संसार के लोग यही कहावत कहते चले आ रहे थे कि-
पंक्ति 62 :
माता न कुमाता, पुत्र कुपुत्र भले ही।
शब्दार्थ :
कुमाता = बुरी माँ
कुपुत्र = बुरा बेटा।
व्याख्या : पुत्र भले ही माता के प्रति बुरा व्यवहार करके कुपुत्र बन जाए, परंतु माता कभी अपने बच्चे के लिए बुरी माँ नहीं होती।
पंक्ति 63 :
अब कहें सभी यह हाय! विरुद्ध विधाता,
शब्दार्थ :
विधाता = भाग्य, ईश्वर।
व्याख्या : परंतु अब भाग्य मेरे विपरीत है, इसलिए लोग इस कहावत को उलटकर कहेंगे-
पंक्ति 64 :
है पुत्र पुत्र ही, रहे कुमाता माता।
व्याख्या : कि पुत्र तो हमेशा श्रेष्ठ पुत्र ही रहा जैसे भरत, परंतु माता ही दुष्ट और बुरी माँ अर्थात कुमाता बन गई।
पंक्ति 65 :
बस मैंने इसका बाह्य-मात्र ही देखा,
शब्दार्थ :
बाह्य-मात्र = बाहरी रूप।
व्याख्या : मैंने केवल भरत के इस कोमल बाहरी शरीर को ही देखा था,
पंक्ति 66 :
दृढ़ हृदय न देखा, मृदुल गात्र ही देखा,
शब्दार्थ :
मृदुल गात्र = कोमल शरीर।
व्याख्या : मैं इसके भीतर छिपे हुए दृढ़ और परोपकारी हृदय को नहीं देख पाई।
पंक्ति 67 :
परमार्थ न देखा, पूर्ण स्वार्थ ही साधा,
शब्दार्थ :
परमार्थ = दूसरों का कल्याण
साधा = पूरा किया।
व्याख्या : मैंने लोक-कल्याण की भावना को त्यागकर केवल अपना स्वार्थ पूरा करने का प्रयास किया।
पंक्ति 68 :
इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा!
व्याख्या : इसी स्वार्थी सोच के कारण आज मेरा जीवन इस घोर संकट और बाधा से घिर गया है।
पंक्ति 69 :
युग-युग तक चलती रहे कठोर कहानी-
व्याख्या : अब आने वाली सदियों तक संसार में यह कड़वी कहानी कही जाती रहेगी कि-
पंक्ति 70 :
रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी।
व्याख्या : कि सदाचारी रघुकुल में भी कैकेयी नाम की एक अत्यंत भाग्यहीन रानी रहती थी।
पंक्ति 71 :
निज जन्म-जन्म में सुने जीव यह मेरा-
व्याख्या : मेरी आत्मा आने वाले हर जन्म में स्वयं को धिक्कारते हुए यही सुनेगी कि-
पंकित 72 :
धिक्कार! उसे था महा स्वार्थ ने घेरा।
व्याख्या : उस कैकेयी को धिक्कार है, जिसे अंत समय में घोर स्वार्थ ने अंधा बना दिया था।
राम द्वारा कैकेयी का गौरव-गान :
पंक्ति 73 :
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई
शब्दार्थ :
लाल = पुत्र
माई = माता।
व्याख्या : कैकेयी के वचनों को बीच में ही रोकते हुए श्री राम भावुक होकर चिल्ला उठे- वह माता सौ बार धन्य है,
पंक्ति 74 :
जिस जननी ने है जना भरत-सा भाई।
शब्दार्थ :
जना = जन्म दिया।
व्याख्या : जिस माता ने भरत जैसे साक्षात् महान और अनुपम भाई को जन्म दिया है।
पंक्ति 75 :
पागल-सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई-
व्याख्या : श्री राम के मुख से यह सुनते ही वहाँ उपस्थित पूरी सभा पागलों की तरह एक स्वर में चिल्ला उठी-
पंक्ति 76 :
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई।
व्याख्या : भरत जैसे रत्न को जन्म देने वाली वह माता कैकेयी सौ बार धन्य है, पूजनीय है!
कैकेयी का पुनः विलाप :
पंक्ति 77 :
हा! लाल? उसे भी आज गंवाया मैंने,
शब्दार्थ :
गंवाया = खो दिया।
व्याख्या : कैकेयी दुखी होकर फिर बोलीं - हाय! जिस पुत्र भरत के लिए मैंने यह सब किया, आज उसे भी मैंने खो दिया है।
पंक्ति 78 :
विकराल कुयश ही यहाँ कमाया मैंने।
शब्दार्थ :
विकराल = भयानक
कुयश = अपयश, कलंक
व्याख्या : मैंने इस संसार में केवल भयानक कलंक और अपकीर्ति ही कमाई है।
पंक्ति 79 :
निज स्वर्ग उसी पर वार दिया था मैंने,
शब्दार्थ :
वार दिया था = न्योछावर कर दिया था।
व्याख्या : मैंने अपने जीवन के सारे सुख और स्वर्ग जैसी खुशियाँ उसी पुत्र पर न्योछावर कर दी थीं,
पंक्ति 80 :
हर तुम तक से अधिकार लिया था मैंने,
व्याख्या : और यहाँ तक कि तुम्हारा न्यायसंगत राज्य का अधिकार भी उससे छीन लिया था।
भाग 4: आत्मग्लानि और राम से घर लौटने का अंतिम आग्रह :
पंक्ति 81 :
पर वही आज यह दीन हुआ रोता है,
शब्दार्थ :
दीन = असहाय, बेबस।
व्याख्या : परंतु मेरा वही पुत्र भरत आज अत्यंत असहाय और दुखी होकर रो रहा है।
पंक्ति 82 :
शंकित सबसे धृत हरिण-तुल्य होता है,
शब्दार्थ :
शंकित = डरा हुआ
धृत हरिण-तुल्य = पकड़े हुए हिरण के समान।
व्याख्या : वह समाज में इस तरह डरा-सहमा रहता है, मानो पिंजरे या जाल में पकड़ा हुआ कोई भयभीत हिरण हो।
पंक्ति 83 :
श्रीखंड आज अंगार-चंड है मेरा,
शब्दार्थ :
श्रीखंड = चंदन शीतलता का प्रतीक
अंगार-चंड = तीव्र जलते हुए अंगारे के समान।
व्याख्या : चंदन के समान शांत रहने वाला मेरा बेटा भरत आज मेरे लिए जलते हुए अंगारे की तरह कड़वा और असहनीय हो गया है।
पंक्ति 84 :
तो इससे बढ़कर कौन दंड है मेरा?
व्याख्या : एक माँ के लिए अपने ही बेटे की नफरत झेलने से बढ़कर संसार में और कौन सा बड़ा दंड हो सकता है?
पंक्ति 85 :
पटके मैंने पद-पाणि मोह के नद में,
शब्दार्थ :
पद-पाणि = हाथ-पैर
नद = नदी
व्याख्या : मैंने अपने पुत्र-मोह रूपी नदी में अपने हाथ-पैर मारकर जो भी गलतियाँ कीं,
पंक्ति 86 :
जन क्या-क्या करते नहीं स्वप्न में, मद में?
शब्दार्थ :
जन = लोग
मद = अहंकार, पागलपन
व्याख्या : वह वैसी ही थीं जैसे कोई मनुष्य सपने में या अहंकार के पागलपन में अनजाने में कोई पाप कर बैठता है।
पंक्ति 87 :
हा! दंड कौन, क्या उसे डरूँगी अब भी?
व्याख्या : "अब मुझे चाहे जो भी सजा दी जाए, मैं उससे नहीं डरूँगी क्योंकि मैं बड़ी दोषी हूँ।
पंक्ति 88 :
मेरा विचार कुछ दयापूर्ण हो तब भी।
व्याख्या : भले ही मेरी इस दया की याचना को सुनकर सभा मेरे प्रति थोड़ी दया दिखाए, पर मैं दंड भोगने को तैयार हूँ।
पंक्ति 89 :
हा दया! हंत वह घृणा! अहह वह करुणा!
शब्दार्थ :
हंत = खेद सूचक शब्द
अहह = दुःख सूचक शब्द।
व्याख्या : आज मेरे लिए दया, घृणा और करुणा सब व्यर्थ लग रहे हैं क्योंकि मेरा अपराध बहुत बड़ा है।
पंक्ति 90 :
वैतरणी- है आज जाह्नवी-वरुणा!
कठिन शब्दार्थ :
वैतरणी = नरक की सी कष्टदायक नदी
जाह्नवी-वरुणा = गंगा और वरुणा जैसी पवित्र नदियाँ।
व्याख्या : मेरे पाप के कारण आज पवित्र गंगा और वरुणा नदी भी मेरे लिए नरक की कष्टकारी वैतरणी नदी के समान भयावह बन गई हैं।
पंक्ति 91 :
सह सकती हूँ चिर नरक, सुनें सुविचारी,
शब्दार्थ :
चिर नरक = लंबे समय तक नरक का दुःख
सुविचारी = अच्छे विचारों वाले विद्वान लोग।
व्याख्या : यहाँ उपस्थित सभी विद्वान लोग सुन लें, मैं लंबे समय तक नरक का दुःख सहने को तैयार हूँ,
पंक्ति 92 :
पर मुझे स्वर्ग की दया दंड से भारी।
व्याख्या : परंतु यदि कोई मुझ पर दया करके मुझे स्वर्ग देना चाहे, तो वह दया मेरे लिए किसी बड़े दंड से भी अधिक भारी होगी।
पंक्ति 93 :
लेकर अपना यह कुलिश-कठोर कलेजा,
शब्दार्थ :
कुलिश-कठोर = वज्र के समान अत्यधिक कठोर।
व्याख्या : मैंने अपने हृदय को वज्र के समान कठोर बनाकर ही तुम्हें वन भेजा था,
पंक्ति 94 :
मैंने इसके ही लिए तुम्हें वन भेजा।
व्याख्या : ताकि मैं भरत को राज्य दिला सकूँ।
पंक्ति 95 :
घर चलो इसीके लिए, न रूठो अब यों,
व्याख्या : अब उसी भरत के मन की शांति के लिए तुम अयोध्या लौट चलो, इस तरह हमसे मत रूठो।
पंक्ति 96 :
कुछ और कहूँ तो उसे सुनेंगे सब क्यों?
व्याख्या : यदि मैं इसके अलावा कोई और सफाई दूँगी, तो भला कोई मेरी बात पर विश्वास क्यों करेगा?
पंक्ति 97 :
मुझको यह प्यारा और इसे तुम प्यारे,
व्याख्या : मुझे मेरा पुत्र भरत अत्यंत प्रिय है, और भरत को तुम (राम) अपने प्राणों से भी ज्यादा प्यारे हो।
पंक्ति 98 :
मेरे दुगुने प्रिय रहो न मुझसे न्यारे।
शब्दार्थ :
न्यारे = अलग, दूर।
व्याख्या : इस नाते तुम मेरे दुगुने प्रिय पुत्र हुए, इसलिए हे राम! तुम अब मुझसे दूर मत रहो।
पंक्ति 99 :
मैं इसे न जानूँ, किंतु जानते हो तुम,
व्याख्या : मैं भले ही भरत के दिल को न समझ पाई, लेकिन तुम तो इसके हृदय को अच्छी तरह जानते हो।
पंक्ति 100 :
अपने से पहले इसे मानते हो तुम।
व्याख्या : तुम स्वयं से भी ज्यादा अपने छोटे भाई भरत का सम्मान करते हो।
पंक्ति 101 :
तुम भ्राताओं का प्रेम परस्पर जैसा,
शब्दार्थ :
भ्राताओं = भाइयों; परस्पर = आपस में।
व्याख्या : तुम दोनों भाइयों के बीच आपस में जैसा निश्छल प्रेम आज दिखाई दे रहा है,
पंक्ति 102 :
यदि वह सब पर यों प्रकट हुआ है वैसा,
व्याख्या : और वह यहाँ उपस्थित सभी लोगों के सामने जिस प्रकार पूरी तरह साफ़ हो चुका है,
पंक्ति 103 :
तो पाप-दोष भी पुण्य-तोष है मेरा,
शब्दार्थ :
पुण्य-तोष = पुण्य का संतोष
व्याख्या : उसे देखकर मेरा किया हुआ घोर पाप भी आज मुझे पुण्य के संतोष जैसा महसूस हो रहा है, क्योंकि मेरे बुरे कृत्य से तुम्हारा भाई-चारा दुनिया के सामने निखर आया।
पंक्ति 104 :
मैं रहूँ पंकिला, पद्म-कोष है मेरा।
शब्दार्थ :
पंकिला = कीचड़ से सनी हुई, दोषी
पद्म-कोष = कमल का भीतरी भागकमल के फूल के समान भरत
व्याख्या : मैं भले ही कीचड़ के समान कलंकित और अपराधी बनी रहूँ, परंतु मुझे संतोष है कि मेरी कोख से भरत जैसा पवित्र कमल का फूल पैदा हुआ है।
पंक्ति 105 :
आगत ज्ञानीजन उच्च भाल ले लेकर,
शब्दार्थ :
आगत = आए हुए
उच्च भाल = ऊँचा मस्तक, गर्व से।
व्याख्या : भविष्य में आने वाले ज्ञानी लोग और विद्वान गर्व से अपना सिर उठाकर तुम्हारे और भरत के इस प्रेम की व्याख्या करेंगे,
पंक्ति 106 :
समझावें तुमकों अतुल युक्तियाँ देकर।
शब्दार्थ :
अतुल = जिसकी तुलना न हो
युक्तियाँ = तर्क, उदाहरण।
व्याख्या : और तुम्हें अयोध्या न लौटने के लिए तरह-तरह के अनोखे तर्क और उदाहरण देंगे।
पंक्ति 107 :
मेरे तो एक अधीर हृदय है बेटा,
व्याख्या : परंतु बेटा! मैं तो एक साधारण माँ हूँ जिसके पास केवल एक व्याकुल और भावुक हृदय है,
पंक्ति 108 :
उसने फिर तुमको आज भुजा भर भेंटा!
शब्दार्थ :
भुजा भर भेंटा = बाँहों में भरकर गले से लगा लिया, आग्रह किया।
व्याख्या : और उस माँ का हृदय आज अपनी बाँहें फैलाकर तुमसे यही विनती कर रहा है कि तुम घर लौट चलो।