गंगावतरण
जगन्नाथदास रत्नाकर द्वारा रोला छंद में रचित गंगावतरण को समझने के लिए पौराणिक कथा को जानना अत्यंत आवश्यक है। इश्वाकु वंश में राजा सगर नाम के एक प्रतापी राजा हुए। उन्होंने चक्रवर्ती सम्राट का पद प्राप्त…


जगन्नाथदास रत्नाकर द्वारा रोला छंद में रचित गंगावतरण को समझने के लिए पौराणिक कथा को जानना अत्यंत आवश्यक है। इश्वाकु वंश में राजा सगर नाम के एक प्रतापी राजा हुए। उन्होंने चक्रवर्ती सम्राट का पद प्राप्त करने के लिए 'अश्वमेध यज्ञ' का आयोजन किया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र थे। यज्ञ के नियम के अनुसार छोड़े गए घोड़े को देवराज इंद्र ने ईर्ष्यावश चुरा लिया और उसे ले जाकर पाताल लोक में ध्यानमग्न महर्षि कपिल के आश्रम में बाँध दिया।
जब सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े को ढूँढते हुए पाताल लोक पहुँचे, तो उन्होंने घोड़े को ऋषि कपिल के आश्रम में देखा। अज्ञानतावश उन्होंने महर्षि कपिल को चोर समझ लिया और उन पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़े। इससे महर्षि कपिल का ध्यान भंग हो गया और उन्होंने क्रोध में जैसे ही अपनी आँखें खोलीं, उनके तेज, क्रोध की अग्नि से राजा सगर के सभी साठ हजार पुत्र वहीं जलकर भस्म हो गए। चूँकि वे असमय और शापित होकर मरे थे, इसलिए उनकी आत्माओं को मुक्ति नहीं मिल सकी। उनकी मुक्ति का केवल एक ही मार्ग था। स्वर्ग में बहने वाली देवनदी गंगा को पृथ्वी और पाताल लोक में लाया जाए, ताकि उनके पवित्र जल के स्पर्श से इन पूर्वजों के पाप नष्ट हो सकें और उन्हें मोक्ष प्राप्त हो।
सगर के वंश में आगे चलकर राजा भगीरथ हुए। उन्होंने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की। ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर भेजने की अनुमति दे दी, परंतु उन्होंने भगीरथ से कहा कि जब गंगा स्वर्ग से तीव्र वेग के साथ नीचे गिरेंगी, तो उनके उस प्रचंड वेग को सहन करने की शक्ति केवल भगवान शिव के पास है।
इसके बाद भगीरथ ने भगवान शिव की कठोर आराधना की। आशुतोष भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा के वेग को अपने मस्तक पर धारण करना स्वीकार कर लिया। जगन्नाथदास 'रत्नाकर' द्वारा रचित 'गंगावतरण' कविता ठीक इसी बिंदु से प्रारंभ होती है, जहाँ भगीरथ की तपस्या सफल हो चुकी है।

छंद 1: ब्रह्मा के कमंडल से गंगा की धारा का प्रस्थान
पंक्ति 1 :
निकसि कमंडल तैं उमंडि नभ-मंडल-खंडति।
शब्दार्थ :
निकसि ➔ निकलकर
तैं ➔ से
उमंडि ➔ उमड़कर
नभ-मंडल-खंडति ➔ आकाश मंडल को चीरती
व्याख्या :
गंगा जी ब्रह्मा जी के कमंडल से बाहर निकलकर और अत्यंत वेग से उमड़कर आकाश मंडल को चीरती हुई आगे बढ़ीं।
पंक्ति 2 :
धाई धार अपार वेग सौं वायु विहंडति।।
शब्दार्थ :
धाई ➔ दौड़ी/अग्रसर हुई
धार ➔ धारा
अपार वेग सौं ➔ असीम गति से
वायु विहंडति ➔ वायु के मार्ग को खंडित करती हुई
व्याख्या :
गंगा की वह अपार धारा असीम गति से नीचे की ओर दौड़ी और अपने तीव्र वेग से मार्ग में आने वाली प्रचंड वायु को भी काटती हुई आगे बढ़ी।
पंक्ति 3 :
भयौ घोर अति शब्द धमक सौं त्रिभुवन तरजे।
शब्दार्थ :
भयौ ➔ हुआ
घोर ➔ भयंकर
धमक सौं ➔ भारी गूँज या आघात से
त्रिभुवन ➔ तीनों लोक (आकाश, पाताल, पृथ्वी)
तरजे ➔ भयभीत हो उठे/काँप उठे
व्याख्या :
गंगा के उतरने से आकाश में इतना भयंकर शब्द उत्पन्न हुआ कि उसकी धमक और गूँज से तीनों लोक भय से काँप उठे।
पंक्ति 4 :
महामेघ मिलि मनहु एक संगहिं सब गरजे।।1।।
शब्दार्थ :
महामेघ ➔ प्रलयंकारी बड़े बादल
मिलि ➔ मिलकर
मनहु ➔ मानो (उत्प्रेक्षा)
एक संगहिं ➔ एक साथ
गरजे ➔ गरजने लगे
व्याख्या :
उस प्रचंड ध्वनि को सुनकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो प्रलय काल के समस्त विशाल बादल एक साथ मिलकर आकाश में गरज रहे हों।

छंद 2: गंगा की धारा का आकाश मार्ग में वेग
पंक्ति 1 :
निज दरेर सौं पौन-पटल फारति फहरावति।
शब्दार्थ :
निज ➔ अपनी
दरेर सौं ➔ रगड़/धक्के या तेज झोंके से
पौन-पटल ➔ वायु रूपी परदे या वस्त्र को
फारति ➔ फाड़ती हुई
फहरावति ➔ फहराती हुई
व्याख्या :
गंगा जी अपनी प्रचंड रगड़ और तेज धक्के से वायु रूपी वस्त्र को फाड़ती और श्वेत ध्वजा की तरह फहराती हुई आगे बढ़ती हैं।
पंक्ति 2 :
सुर-पुर के अति सघन घोर घन घसि घहरावति।
शब्दार्थ :
सुर-पुर ➔ देवलोक (स्वर्ग)
सघन ➔ घने
घोर घन ➔ भयानक बादल
घसि ➔ रगड़ खाकर
घहरावति ➔ भीषण गर्जना करती हुई
व्याख्या :
वे देवलोक के अत्यंत घने और विशाल बादलों से आपस में रगड़ खाती हुई भयंकर गर्जना के साथ आगे बढ़ रही हैं।
पंक्ति 3 :
चली धार धुधकारि धरा-दिसि काटति कावा।
शब्दार्थ :
धुधकारि ➔ तेज आवाज करती हुई
धरा-दिसि ➔ पृथ्वी की दिशा की ओर
काटति कावा ➔ चक्कर काटती हुई
व्याख्या :
गंगा की वह दिव्य धारा भीषण ध्वनि करती हुई पृथ्वी की दिशा की ओर चक्कर काटते हुए अत्यंत तीव्र गति से मुड़ती है।
पंक्ति 4 :
सगर-सुतनि के पाप-ताप पर बोलति धावा।।2।।
शब्दार्थ :
सगर-सुतनि ➔ राजा सगर के साठ हजार पुत्रों
पाप-ताप ➔ पापों और दुखों
पर बोलति धावा ➔ पर आक्रमण करती हुई
व्याख्या :
ऐसा प्रतीत होता है कि गंगा की यह धारा राजा सगर के शापित पुत्रों के पापों और सांसारिक कष्टों को समूल नष्ट करने के लिए उन पर पूरी शक्ति से आक्रमण कर रही है।

छंद 3: गंगा की धारा की अलौकिक सुंदरता और चमक
पंक्ति 1 :
स्वाति-घटा घहराति मुक्ति-पानिप सौं पूरी।
शब्दार्थ :
स्वाति-घटा ➔ स्वाति नक्षत्र के बादलों का समूह
घहराति ➔ उमड़ती हुई/गरजती हुई
मुक्ति-पानिप ➔ मोक्ष रूपी चमक या आभा
सौं पूरी ➔ से परिपूर्ण
व्याख्या :
गंगा की धारा ऐसी सुशोभित हो रही है मानो स्वाति नक्षत्र के सुंदर बादलों का कोई समूह मोक्ष रूपी अलौकिक चमक से पूरी तरह भरकर उमड़ रहा हो।
पंक्ति 2 :
कैधौं आवति झुकति सुभ्र आभा रुचि रूरी।।
शब्दार्थ :
कैधौं ➔ अथवा (संदेह अलंकार)
सुभ्र आभा ➔ श्वेत कांति (सफेद चमक)
रुचि रूरी ➔ अत्यंत सुंदर और आकर्षक
व्याख्या :
अथवा ऐसा संशय होता है कि कोई अत्यंत सुंदर, आकर्षक और पावन श्वेत कांति आकाश से पृथ्वी की ओर झुकती हुई आ रही है।
पंक्ति 3 :
मीन-मकर-जलव्यालनि की चल चिलक सुहाई।
शब्दार्थ :
मीन ➔ मछलियाँ
मकर ➔ मगरमच्छ
जलव्यालनि ➔ जल के सर्प या साँप
चल चिलक ➔ चंचल चमक
सुहाई ➔ सुंदर लग रही है
व्याख्या :
गंगा के जल में तैरते हुए मछलियों, मगरमच्छों और जलीय साँपों की चंचल गति से उत्पन्न होने वाली चमक अत्यंत सुंदर लग रही है।
पंक्ति 4 :
सो जनु चपला चमचमाति चंचल छबि छाई।।3।।
शब्दार्थ :
सो ➔ वह चमक
जनु ➔ मानो
चपला ➔ बिजली
चमचमाति ➔ चमकती हुई
चंचल छबि ➔ सुंदर रूप
व्याख्या :
उन जलचरों की वह सुंदर चमक ऐसी दिखती है, मानो श्वेत बादलों के बीच चंचल बिजली बार-बार चमचमा रही हो और अपनी छटा बिखेर रही हो।

छंद 4: देवताओं द्वारा गंगा का स्वागत और उल्लास
पंक्ति 1 :
रुचिर रजतमय कै बितान तान्यौ अति विस्तर।
शब्दार्थ :
रुचिर ➔ सुंदर
रजतमय ➔ चाँदी से बना हुआ
कै ➔ अथवा
बितान ➔ शामियाना/तंबू
तान्यौ ➔ ताना गया हो
अति विस्तर ➔ बहुत बड़े क्षेत्र में
व्याख्या :
गंगा की धारा को देखकर ऐसा आभास होता है मानो पूरे आकाश में किसी ने चाँदी से निर्मित बहुत बड़ा और सुंदर शामियाना तान दिया हो।
पंक्ति 2 :
झरति बूँद सो झिलमिलाति मोतिनि की झालर।।
शब्दार्थ :
झरति बूँद ➔ गिरती हुई जल की बूँदें
सो ➔ वह
झिलमिलाति ➔ चमकती हुई
मोतिनि की झालर ➔ मोतियों की झालर
व्याख्या :
और उस धारा से चारों ओर जो जल की बूँदें झड़ रही हैं, वे ऐसी झिलमिला रही हैं मानो उस चाँदी के शामियाने में मोतियों की सुंदर झालर लटक रही हो।
पंक्ति 3 :
ताके नीचें राग-रंग के ढंग जमाये।
शब्दार्थ :
ताके नीचें ➔ उसके नीचे -शामियाने के नीचे
राग-रंग के ढंग ➔ संगीत और नृत्य के आयोजन
जमाये ➔ व्यवस्थित किए गए हों
व्याख्या :
ऐसा लगता है कि उस भव्य शामियाने के नीचे उत्सव और नाच-गाने का सुंदर प्रबंध किया गया हो,
पंक्ति 4 :
सुर-बनितनि के वृंद करत आनंद-बधाये।।4।।
शब्दार्थ :
सुर-बनितनि ➔ देवांगनाएँ या देवताओं की स्त्रियाँ
के बूंद ➔ के समूह/झुंड
करत आनंद-बधाये ➔ आनंदपूर्वक बधाई के गीत गा रहे हैं
व्याख्या :
क्योंकि वहाँ देव-स्त्रियों के समूह एकत्र होकर इस पावन अवसर पर मंगल गान और आनंदपूर्वक बधाई के गीत गा रहे हैं।

छंद 5: गंगा का तीव्र वेग और उपमा
पंक्ति 1 :
कबहूँ सु धार अपार बेग नीचे कौं धावै।
शब्दार्थ :
कबहूँ ➔ कभी
सु धार ➔ वह सुंदर धारा
अपार बेग ➔ असीम गति से
नीचे कौं धावै ➔ नीचे की ओर दौड़ती है
व्याख्या :
वह गंगा की सुंदर और पवित्र धारा कभी-कभी असीम गति के साथ सीधे नीचे पृथ्वी की ओर तेजी से दौड़ती है,
पंक्ति 2 :
हरहराति लहराति सहस जोजन चलि आवै।।
शब्दार्थ :
हरहराति ➔ 'हर-हर' की ध्वनि करती हुई
लहराति ➔ तरंगें लेती हुई
सहस जोजन ➔ हजारों योजन
चलि आवै ➔ चली आती है
व्याख्या :
तो कभी वह 'हर-हर' का भीषण नाद करती हुई और सुंदर लहरें लेती हुई एक ही पल में हजारों योजन की दूरी तय करके आगे चली आती है।
पंक्ति 3 :
मनु बिधि चतुर किसान पौन निज मन कौ पावत।
शब्दार्थ :
मनु ➔ मानो
बिधि ➔ ब्रह्मा या भाग्य
चतुर किसान ➔ कुशल कृषक
पौन ➔ वायु/हवा
निज मन कौ पावत ➔ अपने मन के अनुकूल पाकर
व्याख्या :
गंगा की इस श्वेत उड़ती हुई धारा को देखकर ऐसा उत्प्रेक्षा पूर्ण दृश्य बनता है, मानो कोई चतुर किसान अपने मन के अनुकूल हवा चलते देखकर...
पंक्ति 4 :
पुन्य-खेत-उत्पन्न हीर की रासि उसावत।।5।।
शब्दार्थ :
पुन्य-खेत-उत्पन्न ➔ पुण्य रूपी खेत में पैदा हुई
हीर की रासि ➔ हीरों के ढेर को
उसावत ➔ हवा में उड़ाकर साफ कर रहा हो
व्याख्या :
...अपने पुण्य रूपी खेत में पैदा हुई हीरों की फसल को हवा के सहारे उड़ाकर साफ कर रहा हो और हवा में हीरों के कण उड़ रहे हों।

छंद 6: शिव के सम्मुख गंगा का पहुँचना
पंक्ति 1 :
इहिं बिधि धावति धँसति धरति ढरति ढरकति सुख-देनी।
शब्दार्थ :
इहिं बिधि ➔ इस प्रकार
धावति ➔ दौड़ती हुई
धँसति ➔ पहाड़ों को भेदती हुई
धरति ➔ पृथ्वी पर कदम रखती हुई
ढरति ढरकति ➔ लुढ़कती और बहती हुई
सुख-देनी ➔ सुख प्रदान करने वाली
व्याख्या :
सबको परम सुख देने वाली गंगा इस प्रकार तेजी से दौड़ती हुई, चट्टानों में धँसती हुई, ढालों पर आगे लुढ़कती और बहती हुई आगे बढ़ रही है।
पंक्ति 2 :
मनहूँ सँवारति सुभ सुर-पुर की सुगम निसेनी।।
शब्दार्थ :
मनहूँ ➔ मानो
सँवारति ➔ सजा रही हो
सुभ ➔ कल्याणकारी
सुर-पुर की ➔ स्वर्ग लोक की
सुगम निसेनी ➔ आसान सीढ़ी
व्याख्या :
गंगा की वह श्वेत सीधी गिरती धारा ऐसी लगती है, मानो वह मनुष्यों के लिए पृथ्वी से स्वर्ग लोक जाने के लिए कोई आसान और कल्याणकारी सीढ़ी तैयार कर रही हो।
पंक्ति 3 :
बिपुल बेग बल बिक्रम कैं ओजनि उमगाई।
शब्दार्थ :
बिपुल बेग ➔ अत्यधिक गति
बल बिक्रम ➔ शक्ति और पराक्रम
कैं ओजनि ➔ के तेज से
उमगाई ➔ उमड़ती हुई
व्याख्या :
वह अपने असीम वेग, अपार शक्ति, अद्भुत पराक्रम और दिव्य तेज से पूरी तरह उमड़ती हुई आगे बढ़ती जा रही है।
पंक्ति 4 :
हरहराति हरषाति संभु-सनमुख जब आई।।6।।
शब्दार्थ :
हरहराति ➔ तीव्र ध्वनि करती हुई
हरषाति ➔ अत्यंत प्रसन्न होती हुई
संभु-सनमुख ➔ भगवान शिव के ठीक सामने
जब आई ➔ जब पहुँची
व्याख्या :
वह 'हर-हर' शब्द करती हुई और मन में अत्यंत प्रसन्न होती हुई अंततः भगवान शिव के ठीक सामने आकर उपस्थित हो गई।

छंद 7: शिव के सौंदर्य को देखकर गंगा का मोहित होना
पंक्ति 1 :
भई थकित छबि चकित हेरि हर-रूप मनोहर।
शब्दार्थ :
भई थकित ➔ गतिहीन या ठिठक गई
छबि ➔ सुंदरता
चकित ➔ हैरान
हेरि ➔ देखकर
हर-रूप मनोहर ➔ शिव जी के सुंदर रूप को
व्याख्या :
भगवान शिव के उस अत्यंत सुंदर और मन को हरने वाले रूप को सामने देखकर गंगा जी पूरी तरह चकित रह गईं और उनका तीव्र वेग वहीं थम गया।
पंक्ति 2 :
ह्वै आनह के प्रान रहे तन धरे धरोहर।।
शब्दार्थ :
ह्वै आनह के प्रान ➔ किसी और के प्राण हो जाना या शिव के प्रति समर्पित हो जाना
तन धरे धरोहर ➔ शरीर मानो केवल एक अमानत (धरोहर) की तरह रह गया हो
व्याख्या :
वे शिव के रूप पर इस कदर मुग्ध हो गईं कि उनके प्राण पूरी तरह शिव के प्रति समर्पित हो गए और उनका स्वयं का शरीर केवल एक अमानत की भाँति रह गया।
पंक्ति 3 :
भयौ कोप कौ लोप चोप औरै उमगाई।
शब्दार्थ :
भयौ ➔ हुआ
कोप कौ लोप ➔ क्रोध का गायब होना
चोप ➔ तीव्र इच्छा/उमंग/प्रेम
औरै उमगाई ➔ एक अलग ही रूप में उमड़ पड़ी
व्याख्या :
स्वर्ग से उतरते समय गंगा के मन में जो अहंकार और क्रोध था, वह शिव को देखते ही पूरी तरह गायब हो गया और उसके स्थान पर उनके हृदय में शिव को पाने का अनन्य प्रेम उमड़ पड़ा।
पंक्ति 4 :
चित चिकनाई चढ़ी कढ़ी सब रोष रुखाई ।।7।।
शब्दार्थ :
चित चिकनाई चढ़ी ➔ हृदय में प्रेम का भाव आ गया
कढ़ी ➔ निकल गई/समाप्त हो गई
सब रोष रुशाई ➔ सारा गुस्सा और नाराजगी
व्याख्या :
उनके मन में शिव के प्रति अगाध स्नेह और कोमलता का भाव आ गया तथा उनका सारा क्रोध और रूखापन पूरी तरह से समाप्त हो गया।

छंद 8: शिव की जटाओं में गंगा का समा जाना
पंक्ति 1 :
कृपानिधान सुजान संभु हिय की गति जानी।
शब्दार्थ :
कृपानिधान ➔ कृपा के सागर
सुजान ➔ सब कुछ जानने वाले/अंतर्यामी
संभु ➔ भगवान शिव
हिय की गति ➔ हृदय की दशा/इच्छा
जानी ➔ जान ली
व्याख्या :
दया के सागर और सर्वज्ञ भगवान शिव ने गंगा के हृदय की इस इच्छा और प्रेम भावना को तुरंत भाँप लिया।
पंक्ति 2 :
दियौ सीस पर ठाम बाम करि कै मनमानी।।
शब्दार्थ :
दियौ ➔ दिया
सीस पर ठाम ➔ अपने सिर पर स्थान
बाम करि कै ➔ अपनी वामांगी या पत्नी के रूप में स्वीकार करके
मनमानी ➔ उनकी मनचाही इच्छा पूरी करते हुए
व्याख्या :
उन्होंने गंगा की मनचाही इच्छा को पूरा करते हुए उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया और अपने मस्तक पर सर्वोच्च स्थान दे दिया।
पंक्ति 3 :
सकुचति ऐचति अंग गंग सुख संग लजानी।
शब्दार्थ :
सकुचति ➔ संकोच करती हुई
ऐचति अंग ➔ अपने अंगों को सिकोड़ती हुई
गंग ➔ गंगा जी
सुख संग लजानी ➔ सुख का अनुभव करती हुई शर्मा गईं
व्याख्या :
शिव के मस्तक पर स्थान पाकर गंगा जी अत्यंत सुख का अनुभव करने लगीं और लोक-लाज के कारण संकोच करती हुई अपने अंगों को सिकोड़ने लगीं।
पंक्ति 4 :
जटा-जूट हिम कूट सघन बन सिमिटि समानी।।8।।
शब्दार्थ :
जटा-जूट ➔ शिव की घनी जटाएँ
हिम कूट ➔ हिमालय की बर्फीली चोटियाँ
सघन बन ➔ घने जंगल
सिमिटि समानी ➔ सिमटकर पूरी तरह समा गईं
व्याख्या :
अंततः, गंगा की वह विशाल और तीव्र धारा भगवान शिव के हिमालय की बर्फीली चोटियों और घने जंगलों जैसी विशाल जटाओं के भीतर सिमटकर इस प्रकार विलीन हो गई कि उनका पता ही नहीं चला।
विशेष टिप्पणी :
रचना विधा: यह संपूर्ण पाठ 'रोला छंद' में रचित है। प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ।
भाषा: शुद्ध, ओजपूर्ण और साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग है, जिसमें वीर और श्रृंगार रस का अद्भुत मिश्रण है।
अलंकार: अनुप्रास, उत्प्रेक्षा मनहु, मनु, मनहूँ, और संदेह कैधौं अलंकारों का उत्कृष्ट समावेश है।