गीत
मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपने कालजयी महाकाव्य 'साकेत' में गीत काव्य का आधार मुख्य रूप से 'रामचरितमानस' और विशेष रूप से रबीन्द्रनाथ ठाकुर के एक निबंध 'काव्येर उपेक्षिता' से ग्रहण किया है। मानस में उर्…


मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपने कालजयी महाकाव्य 'साकेत' में गीत काव्य का आधार मुख्य रूप से 'रामचरितमानस' और विशेष रूप से रबीन्द्रनाथ ठाकुर के एक निबंध 'काव्येर उपेक्षिता' से ग्रहण किया है। मानस में उर्मिला के त्याग का बहुत संक्षिप्त वर्णन था, जिसने गुप्त जी को इस उपेक्षित पात्र को केंद्र में लाने की प्रेरणा दी।
इस गीत काव्य का संबंध उस मूल पौराणिक कथा से जुड़ता है जब श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष के वनवास पर चले जाते हैं। लक्ष्मण अपनी पत्नी उर्मिला को अयोध्या में ही छोड़ जाते हैं ताकि वे अपने कर्तव्य पथ पर अडिग रह सकें। गुप्त जी ने इसी विरह की कथा को गीतों के माध्यम से व्यक्त किया है। जहाँ लक्ष्मण वन में राम-सीता की सेवा में रत हैं, वहीं महलों में रहकर उर्मिला वियोग की घोर अग्नि में जल रही हैं। गुप्त जी ने उर्मिला के इसी चौदह वर्ष के मानसिक संघर्ष, उनके रुदन, प्रकृति के साथ उनके विरह संवाद और उनके अपूर्व त्याग को अत्यंत भावुक और मार्मिक गीतों के रूप में 'साकेत' के नवम सर्ग में पिरोया है। इस प्रकार, मूल रामकथा का लक्ष्मण-उर्मिला विछोह ही गुप्त जी के इस विरह-प्रधान गीत काव्य का मुख्य आधार बनता है।
मैथिलीशरण गुप्त जी ने गीत काव्य विशेषकर उर्मिला के विरह गीतों के माध्यम से मुख्य रूप से नारी के त्याग, गरिमा और उसकी मूक राष्ट्र-भक्ति को समाज के सामने लाने का संदेश दिया है। वे यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि इतिहास और पौराणिक काव्यों में जिन नारी पात्रों को उपेक्षित रखा गया, उनका त्याग पुरुष नायकों से किसी भी प्रकार कम नहीं था। उर्मिला का विरह केवल व्यक्तिगत दुःख नहीं है, बल्कि उसमें आत्मसंयम, कर्तव्य-पालन और समाज कल्याण की भावना समाहित है।
सच्चा प्रेम भौतिक निकटता का मोहताज नहीं होता, बल्कि वह त्याग, संयम और कर्तव्य-भावना से ओत-प्रोत होता है। उर्मिला के विरह के माध्यम से वे दिखाते हैं कि नारी केवल विलास की वस्तु नहीं है, बल्कि वह कठिन परिस्थितियों में भी अपने पति के महान संकल्पों में बाधा न बनकर अद्वितीय धैर्य रख सकती है।
अंततः, काव्य के अंतिम अंश में वे स्पष्ट संदेश देते हैं कि इस नश्वर संसार में धन, संपत्ति और राज-वैभव क्षणभंगुर हैं, जिनके लिए आपसी कलह करना सर्वथा अनुचित है; जीवन में केवल निश्छल प्रेम और स्वार्थहीन त्याग की ही शाश्वत विजय होती है।
भाग 1: शरद ऋतु का आगमन और उर्मिला का विरह
पंक्ति 1: निरख सखी, ये खंजन आये,
कठिन शब्दार्थ:
निरख = देखो
सखी = सहेली
खंजन = एक सुंदर पक्षी -जिसकी उपमा सुंदर नेत्रों से दी जाती है।
व्याख्या: विरहाग्नि में जलती हुई उर्मिला अपनी सखी से कहती हैं कि हे सखी! जरा देखो, प्रकृति में ये सुंदर खंजन पक्षी आ गए हैं।
पंक्ति 2: फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाये!
कठिन शब्दार्थ:
रंजन = आनंद देने वाले -यहाँ प्रियतम लक्ष्मण
मन भाये = मन को अच्छे लगने वाले।
व्याख्या: इन खंजन पक्षियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो मेरे मन को आनंदित करने वाले प्रियतम लक्ष्मण ने वन से मेरी ओर अपने सुंदर नेत्र फेर लिए हों।
पंक्ति 3: फैला उनके तन का आतप, मन में सर सरसाये,
कठिन शब्दार्थ:
तन = शरीर
आतप = धूप,गर्मी
सर = सरोवर, तालाब
सरसाये = कमलों से युक्त होकर सुशोभित हो गए।
व्याख्या: चारों ओर फैली हुई धूप ऐसी लग रही है मानो मेरे प्रिय के शरीर की कांति फैली हो, और तालाबों में जो खिले कमल हैं, वे हमारे मन को आनंदित कर रहे हैं।
पंक्ति 4: घूमे वे इस ओर वहाँ, ये हंस यहाँ उड़ छाये!
व्याख्या: वन में प्रियतम निश्चित ही इस ओर घूम रहे होंगे, इसीलिए उनकी सुंदर चाल की याद दिलाने वाले ये हंस यहाँ उड़कर आ गए हैं।
पंक्ति 5: करके ध्यान आज इस जन का निश्चय वे मुसकाये,
कठिन शब्दार्थ:
इस जन का = मुझ दासी का
व्याख्या: आज वन में प्रियतम लक्ष्मण ने अवश्य ही मुझ अभागिन को याद किया होगा और वे मुस्कुराए होंगे।
पंक्ति 6: फूल उठे हैं कमल, अधर-से यह बंधूक सुहाये!
कठिन शब्दार्थ:
अधर-से = होठों के समान
बंधूक = एक लाल रंग का फूल
सुहाये = सुंदर लग रहे हैं।
व्याख्या: प्रिय की उसी मुस्कान के कारण यहाँ तालाबों में कमल खिल उठे हैं और लाल रंग के ये बंधूक के फूल उनके सुंदर होठों के समान मुस्कुराते हुए लग रहे हैं।
पंक्ति 7: स्वागत, स्वागत, शरद, भाग्य से मैंने दर्शन पाये,
कठिन शब्दार्थ:
शरद = शरद ऋतु
व्याख्या: हे सुंदर शरद ऋतु! तुम्हारा बार-बार स्वागत है, क्योंकि तुम्हारे माध्यम से आज बड़े भाग्य से मुझे अपने प्रियतम की झलक के दर्शन मिले हैं।
पंक्ति 8: नभ ने मोती वारे, लो, ये अश्रु अर्घ्य भर लाये ।1।
कठिन शब्दार्थ:
नभ = आकाश
वारे = न्योछावर किए
अश्रु = आँसू
अर्घ्य = पूजा की सामग्री, जल
व्याख्या: तुम्हारे स्वागत में इस आकाश ने ओस की बूंदों के रूप में मोती न्योछावर किए हैं, और लो! मैं अपनी आँखों में आँसू रूपी अर्घ्य लेकर तुम्हारे स्वागत के लिए खड़ी हूँ।
शिशिर ऋतु से उर्मिला का संवाद :
पंक्ति 9: शिशिर, न फिर गिरि-वन में,
कठिन शब्दार्थ:
शिशिर = अत्यधिक ठंड की ऋतु
गिरि-वन = पर्वतों और जंगलों में।
व्याख्या: उर्मिला शिशिर ऋतु से प्रार्थना करती हुई कहती हैं कि हे शिशिर! तुम व्यर्थ में जंगलों और पहाड़ों पर मत भटको।
पंक्ति 10: जितना माँगे, पतझड़ दूंगी मैं इस निज नंदन में,
कठिन शब्दार्थ:
निज नंदन = अपने इस उपवन रूपी शरीर में।
व्याख्या: तुम्हें अपनी तृप्ति के लिए जितना भी पतझड़ चाहिए, वह मैं अपने इस शरीर रूपी नंदन वन से दे दूँगी, क्योंकि विरह में मेरा शरीर सूख गया है।
पंक्ति 11: कितना कंपन तुझे चाहिए, ले मेरे इस तन में।
कठिन शब्दार्थ:
कंपन = काँपना
तन = शरीर।
व्याख्या: ठंडक पैदा करने के लिए तुम्हें जितने काँपने की आवश्यकता है, वह तुम मेरे विरह से काँपते हुए शरीर से ले लो।
पंक्ति 12: सखी कह रही, पांडुरता का क्या अभाव आनन में?
कठिन शब्दार्थ:
पांडुरता = पीलापन
अभाव = कमी
आनन = मुख/चेहरा।
व्याख्या: मेरी सहेलियाँ कह रही हैं कि विरह के कारण मेरे चेहरे पर जो पीलापन आ गया है, क्या उसमें तुम्हें पीली पत्तियों की कोई कमी दिखाई देती है?
पंक्ति 13: वीर, जमा दे नयन-नीर यदि तू मानस-भाजन में,
कठिन शब्दार्थ:
वीर = भाई -यहाँ शिशिर को भाई कहा है
नयन-नीर = आँखों का आँसू
मानस-भाजन = मन रूपी बर्तन।
व्याख्या: हे भाई शिशिर! यदि तुम मेरी आँखों के इन निरंतर बहने वाले आँसुओं को जमने वाली ठंड से मेरे मन रूपी बर्तन में जमा सको,
पंक्ति 14: तो मोती-सा मैं अकिंचना रक्खूँ उसको मन में।
कठिन शब्दार्थ:
अकिंचना = अत्यंत निर्धन स्त्री जिसके पास कुछ न हो।
व्याख्या: तो मुझ जैसी असहाय और निर्धन स्त्री उन जमे हुए आँसुओं को मोतियों के समान मूल्यवान मानकर हमेशा अपने मन में सहेज कर रखेगी।
पंक्ति 15: हँसी गई, रो भी न सकूँ मैं,-अपने इस जीवन में,
व्याख्या: प्रिय के जाने से मेरे जीवन की हँसी तो चली ही गई है, पर क्या अब मैं इस विरह के जीवन में अपनी पीड़ा पर रो भी नहीं सकती?
पंक्ति 16: तो उत्कंठा है, देखूँ फिर क्या हो भाव-भुवन में ।2।
कठिन शब्दार्थ:
उत्कंठा = तीव्र इच्छा
भाव-भुवन = भावनाओं के संसार में।
व्याख्या: यदि हँसना और रोना दोनों बंद हो जाएं, तो मेरे मन में यह देखने की तीव्र इच्छा है कि फिर मेरी भावनाओं के संसार में क्या शेष बचता है।
कामदेव को उर्मिला की चेतावनी
पंक्ति 17: मुझे फूल मत मारो,
व्याख्या:
उर्मिला कामदेव से याचना और चेतावनी के स्वर में कहती हैं कि हे कामदेव! तुम अपने पुष्प-बाणों से मुझ पर प्रहार मत करो।
पंक्ति 18: मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो।
कठिन शब्दार्थ:
अबला = बेबस स्त्री
बाला = युवती
वियोगिनी = विरह में तड़पने वाली
व्याख्या: मैं एक तो वैसे ही बेबस युवती हूँ और ऊपर से अपने पति के वियोग में तड़प रही हूँ, मेरे ऊपर कुछ तो दया करो।
पंक्ति 19: होकर मधु के मीत मदन, पटु, तुम कटु, गरल न गारो,
कठिन शब्दार्थ:
मधु = वसंत ऋतु
मीत = मित्र
मदन = कामदेव
पटु = चतुर
कटु = कड़वा
गरल = विष
गारो = मत उड़ेलो
व्याख्या: हे चतुर कामदेव! तुम वसंत ऋतु के मित्र हो, इसलिए तुम मुझ जैसी विरहिणी पर यह कड़वा काम-रूपी विष मत उड़ेलो।
पंक्ति 20: मुझे विकलता, तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो।
कठिन शब्दार्थ:
विकलता = व्याकुलता
विफलता = असफलता
श्रम परिहारो = अपनी थकान दूर करो, प्रयास बंद करो
व्याख्या: तुम्हारे प्रहार से मुझे केवल व्याकुलता होगी और तुम्हें असफलता ही हाथ लगेगी, इसलिए अपने इस व्यर्थ के प्रयास को रोककर अपनी थकान दूर करो।
पंक्ति 21: नहीं भोगिनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो,
कठिन शब्दार्थ:
भोगिनी = विलासी स्त्री जो केवल सुख चाहती है
जाल पसारो = फँसाने का जाल फैलाना।
व्याख्या: मैं महलों में रहने वाली कोई विलासी स्त्री नहीं हूँ जो तुम्हारे इस काम-वासना के जाल में फँस जाऊँगी।
पंक्ति 22: बल हो तो सिंदूर-बिंदू यह-यह हरनेत्र निहारो!
कठिन शब्दार्थ:
सिंदूर-बिंदु = मांग का सिंदूर
हरनेत्र = शिव जी की तीसरी आँख, जो कामदेव को भस्म कर देती है
निहारो = देखो।
व्याख्या: यदि तुममें साहस है तो मेरे माथे के इस सतीत्व के सिंदूर को देखो, यह तुम्हारे लिए भगवान शिव की तीसरी आँख के समान है जो तुम्हें भस्म कर देगा।
पंक्ति 23: रूप-दर्प कंदर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर वारो,
कठिन शब्दार्थ: रूप-दर्प = सुंदरता का घमंड
कंदर्प = कामदेव
वारो = न्योछावर कर दो
व्याख्या: हे कामदेव! यदि तुम्हें अपनी सुंदरता पर बहुत घमंड है, तो तुम अपनी उस सुंदरता को ले जाकर मेरे परम सुंदर पति लक्ष्मण के चरणों पर न्योछावर कर दो।
पंक्ति 24: लो, यह मेरी चरण-धूलि उस रति के सिर पर धारो ।3।
कठिन शब्दार्थ:
रति = कामदेव की अत्यंत सुंदर पत्नी
व्याख्या: और यदि तुम्हारी पत्नी रति को अपने रूप पर गर्व है, तो मेरी इस पतिव्रता के चरणों की धूल ले जाकर उसके सिर पर रख दो, उसका घमंड चूर हो जाएगा।
वन-गमन की तीव्र इच्छा :
पंक्ति 25: यही आता है इस मन में,
व्याख्या:
उर्मिला अपने हृदय की गहरी इच्छा व्यक्त करते हुए कहती हैं कि अब मेरे मन में बार-बार बस यही एक विचार आता है कि-
पंक्ति 26: छोड़ धाम-धन जाकर मैं भी रहूँ उसी वन में।
कठिन शब्दार्थ:
धाम-धन = महल और धन-दौलत।
व्याख्या: मैं अयोध्या के इन समस्त सुखों, महलों और धन-दौलत को छोड़कर उसी वन में जाकर रहने लगूँ जहाँ मेरे प्रियतम रह रहे हैं।
पंक्ति 27: प्रिय के व्रत में विघ्न न डालूँ, रहूँ निकट भी दूर,
कठिन शब्दार्थ:
व्रत = नियम, साधना
विघ्न = बाधा, रुकावट
निकट भी दूर = पास रहकर भी मर्यादा के कारण दूर रहना।
व्याख्या: मैं वहाँ जाकर भी अपने प्रियतम के सेवा-व्रत में कोई बाधा नहीं डालूँगी। मैं उनके भौतिक रूप से पास रहूँगी, किंतु मर्यादा के कारण उनसे दूरी बनाए रखूँगी ताकि वे मुझे देख न सकें।
पंक्ति 28: व्यथा रहे, पर साथ-साथ ही समाधान भरपूर।
कठिन शब्दार्थ: व्यथा = दुःख,पीड़ा
समाधान = तसल्ली,उपाय।
व्याख्या: भले ही मेरे दिल में उनसे न मिल पाने का दुःख बना रहे, पर साथ ही यह तसल्ली भी भरपूर रहेगी कि मेरे प्रिय साक्षात् मेरी आँखों के सामने सुरक्षित हैं।
पंक्ति 29: हर्ष डूबा हो रोदन में,
कठिन शब्दार्थ:
हर्ष = खुशी
रोदन = रोना।
व्याख्या: मेरी आँखों से विरह के आँसू तो बहते रहेंगे, पर प्रिय को सामने देखने की जो आंतरिक खुशी है, वह उन्हीं आँसुओं में घुली रहेगी।
पंक्ति 30: यही आता है इस मन में।
व्याख्या:
अब तो मेरे व्याकुल मन में बार-बार बस यही इच्छा जागती है।
पंक्ति 31: बीच बीच में उन्हें देख लूँ मैं झुरमुट की ओट,
कठिन शब्दार्थ:
झुरमुट = झाड़ियों का समूह
ओट = पीछे,आड़।
व्याख्या: जब प्रियतम वन में कार्य कर रहे होंगे, तो मैं बीच-बीच में घनी झाड़ियों के पीछे छिपकर उन्हें जी भरकर देख लिया करूँगी।
पंक्ति 32: जब वे निकल जाएँ तब लेटूँ उसी धूल में लोट।
कठिन शब्दार्थ:
लोट = लोटना, लोट-पोट होना।
व्याख्या: और जब वे उस मार्ग से आगे निकल जाएंगे, तब मैं उनके चरणों से पवित्र हुई उस मार्ग की धूल में भक्तिभाव से लोट-पोट हो जाऊँगी।
पंक्ति 33: रहें रत वे निज साधन में,
कठिन शब्दार्थ:
रत = लीन, डूबे हुए
निज साधन = अपनी साधना या कर्तव्य में।
व्याख्या: वे बिना किसी मानसिक चिंता के अपने भाई श्री राम की सेवा और साधना में पूरी तरह लीन रहें, मैं उन्हें बिल्कुल परेशान नहीं करूँगी।
पंक्ति 34: यही आता है इस मन में।
व्याख्या:
मेरे विरही हृदय में अब इसके अलावा कोई और इच्छा नहीं बची है।
पंक्ति 35: जाती जाती, गाती गाती, कर जाऊँ यह बात-
व्याख्या:
मैं इस संसार से जाते-जाते और अपने दुखों के गीत गाते-गाते दुनिया के लोगों से बस यही एक बात कह जाना चाहती हूँ कि-
पंक्ति 36: धन के पीछे जन, जगती में उचित नहीं उत्पात।
कठिन शब्दार्थ:
जन = मनुष्य
जगती = संसार, धरती
उत्पात = लड़ाई-झगड़ा, कलह।
व्याख्या: इस संसार में धन-दौलत और राज्य के वैभव को पाने के लिए इंसानों को आपस में लड़ना-झगड़ना या पारिवारिक कलह नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सब नश्वर है।
पंक्ति 37: प्रेम की ही जय जीवन में।
व्याख्या:
मानव जीवन में सबसे बड़ी जीत केवल सच्चे प्रेम और त्याग की ही होती है, धन की नहीं।
पंक्ति 38: यही आता है इस मन में ।4।
व्याख्या:
उर्मिला कहती हैं कि मेरे मन में बार-बार यही विचार आता है कि संसार के लोग इस त्याग और प्रेम के महत्व को समझ सकें।