गीत
महाकवि जयशंकर प्रसाद जी इस गीत के माध्यम से मुख्य रूप से राष्ट्रीय जागरण, चेतना और नवजीवन का संदेश देना चाहते हैंI बाह्य रूप में भले ही यहाँ एक सखी द्वारा दूसरी सोई हुई सखी को सुबह होने पर जगाने का सु…


महाकवि जयशंकर प्रसाद जी इस गीत के माध्यम से मुख्य रूप से राष्ट्रीय जागरण, चेतना और नवजीवन का संदेश देना चाहते हैंI बाह्य रूप में भले ही यहाँ एक सखी द्वारा दूसरी सोई हुई सखी को सुबह होने पर जगाने का सुंदर प्राकृतिक वर्णन है, जहाँ आकाश, तारों, पक्षियों और कलियों के माध्यम से प्रातःकाल की वेला को दर्शाया गया है। किंतु इसका वास्तविक और गहरा अर्थ देशवासियों को अज्ञान, आलस्य और गुलामी की निद्रा से जगाना है I कवि यह समझाना चाहते हैं कि पराधीनता की काली रात अब बीत चुकी है और देश में नव-जागरण की नई सुबह का आगमन हो चुका है। इसलिए अब अपनी आँखों से आलस्य और उदासीनता को त्याग कर देशवासियों को कर्मपथ पर आगे बढ़ना चाहिए और इस नए युग के आगमन का स्वागत पूरी ऊर्जा के साथ करना चाहिए।

प्रातःकाल का आगमन और जागरण का संदेश
पंक्ति 1
🌅 बीती विभावरी जाग री! 🌅
शब्दार्थ :
विभावरी ➔ रात, रात्रि
जाग री ➔ हे सखी!, अब तो जाग जा
व्याख्या : एक सखी अपनी दूसरी सोई हुई सखी को जगाते हुए कहती है कि हे सखी! अब रात बीत चुकी है, सुबह हो गई है, इसलिए अब तुम आलस्य त्याग कर जाग जाओ।
पंक्ति 2 :
🌊 अंबर-पनघट में डुबो रही- 🌊
शब्दार्थ :
अंबर-पनघट ➔ आकाश रूपी पनघट
डुबो रही ➔ डूबो रही है
व्याख्या : प्रातःकाल होने के कारण विशाल आकाश रूपी पनघट में अब रात के तारे धीरे-धीरे विलीन होते जा रहे हैं।
पंक्ति 3 :
👩 तारा-घट ऊषा-नागरी। 👩
शब्दार्थ :
तारा-घट ➔ तारा रूपी घड़े
ऊषा-नागरी ➔ प्रात:काल, सुबह रूपी चतुर स्त्री
व्याख्या : सुबह रूपी चतुर स्त्री अपने आकाश रूपी पनघट में तारा रूपी घड़ों को डुबोती जा रही है, अर्थात् जैसे कोई चतुर स्त्री सुबह पनघट पर घड़े डुबोकर पानी भरती है, वैसे ही सुबह होने पर आकाश से तारे गायब हो रहे हैं।
पंक्ति 4 :
🦜 खग-कुल कुल-कुल सा बोल रहा, 🦜
शब्दार्थ :
खग-कुल ➔ पक्षियों का समूह
कुल-कुल सा ➔ पक्षियों की मधुर आवाज़, कलरव
बोल रहा ➔ चहचहा रहा है
व्याख्या : सुबह होते ही बगीचे में पक्षियों का समूह चारों ओर चहचहाने लगा है और उनकी यह मधुर आवाज़ प्रकृति में गूंज रही है।
पंक्ति 5 :
🌿 किसलय का अंचल डोल रहा, 🌿
शब्दार्थ :
किसलय ➔ वृक्षों की नई और कोमल पत्तियां
अंचल ➔ पल्लू, आँचल
डोल रहा ➔ हिल-डुल रहा है
व्याख्या : मंद-मंद बहने वाली सुबह की शीतल हवा के कारण पेड़ों की नई और कोमल पत्तियां इस तरह हिल रही हैं, मानो किसी नवयौवना का आँचल डोल रहा हो।
पंक्ति 6 :
🌸 लो यह लतिका भी भर लाई- 🌸
शब्दार्थ :
लतिका ➔ छोटी बेल, लता
भर लाई ➔ अपने साथ भरकर लाई है
व्याख्या : कवि कहते हैं कि देखो, यह सुंदर लता भी अब पूरी तरह से उठ खड़ी हुई है और अपने साथ कुछ अद्भुत उपहार लेकर आई है।
पंक्ति 7 :
🍯 मधु मुकुल नवल रस गागरी। 🍯
शब्दार्थ :
मधु ➔ शहद, मीठा मकरंद
मुकुल ➔ अधखिली कली
नवल रस ➔ नया रस, सुगंधित पानी
गागरी ➔ छोटी मटकी
व्याख्या : यह लता अपनी अधखिली कली रूपी छोटी सी गागर में नया और मीठा मकरंद भरकर ले आई है, अर्थात् कलियां अब फूलों के रूप में खिलने को तैयार हैं।
पंक्ति 8 :
💖 अधरों में राग अमंद पिए, 💖
शब्दार्थ :
अधरों में ➔ होठों पर
राग ➔ प्रेम, संगीत
अमंद ➔ जो धीमा न हो , अत्यंत गहरा, तीव्र
पिए ➔ धारण किए हुए
व्याख्या : इतनी सुंदर सुबह होने के बाद भी तुम अपने होठों पर प्रेम की गहरी लालिमा या यादें समेटे हुए सोई हुई हो।
पंक्ति 9 :
🌸 अलकों में मलयज बंद किए- 🌸
शब्दार्थ :
अलकों में ➔ बालों की लटों में
मलयज ➔ चंदन की सुगंध , मलय पर्वत की शीतल हवा
बंद किए ➔ समेटे हुए या छुपाए हुए
व्याख्या : तुमने अपने सुंदर बालों की लटों में सुगंधित चंदन जैसी खुशबू को छुपा रखा है, अर्थात् तुम्हारे बाल अभी भी बिखरे और सुगंध से महक रहे हैं।
पंक्ति 10 :
🛌 तू अब तक सोई है आली! 🛌
शब्दार्थ :
तू अब तक ➔ तुम इस समय तक भी
सोई है ➔ निद्रा में लीन है
आली ➔ हे सखी!
व्याख्या : हे सखी! पूरी प्रकृति जाग चुकी है, चारों तरफ इतनी हलचल है, फिर भी तुम अब तक बिस्तर पर सोई हुई हो!
पंक्ति 11
😴 आँखों में भरे विहाग री! 😴
शब्दार्थ :
आँखों में भरे ➔ नेत्रों में लिए हुए
विहाग ➔ अर्धरात्रि में गाया जाने वाला राग, यहाँ तात्पर्य आलस्य या नींद से है
री ➔ हे सखी!
व्याख्या : हे सखी! तुम्हारी आँखों में अभी भी रात का वह आलस्य और नींद साफ़ दिखाई दे रही है। अब इस आलस्य को छोड़ो और उठ जाओ।