गीतावली
प्रस्तुत पंक्तियाँ यूपी बोर्ड कक्षा 11 की हिंदी पाठ्यपुस्तक में संकलित गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ''गीतावली'' पाठ से ली गई हैं। नीचे दी गई संपूर्ण कविता की अत्यंत सरल और भावपूर्ण पंक्ति-दर-पंक्त…


प्रस्तुत पंक्तियाँ यूपी बोर्ड कक्षा 11 की हिंदी पाठ्यपुस्तक में संकलित गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ''गीतावली'' पाठ से ली गई हैं।
नीचे दी गई संपूर्ण कविता की अत्यंत सरल और भावपूर्ण पंक्ति-दर-पंक्ति व्याख्या दी जा रही है, ताकि आप इसे आसानी से समझ सकें।

जो पै हौं मातु मते महँ ह्वैहौं।
शब्दार्थ–
पै – यदि
हौं – मैं
मते महँ – मत में या योजना में
ह्वैहौं – होऊंगा या शामिल होऊंगा
व्याख्या: भरत जी अत्यंत दुखी होकर माता कौशल्या से कहते हैं कि हे माता, यदि श्री राम को वन भेजने की माता कैकेयी की योजना में मेरी जरा भी सहमति या मेरा कोई हिस्सा हो।
तौ जननी! जग में या मुख की कहाँ कालिमा ध्वैहौं ?
शब्दार्थ–
तौ – तो
जननी – हे माता
जग – संसार
कालिमा – कलंक या बुराई
ध्वैहौं – धोऊंगा
व्याख्या: तो हे माता, मैं इस संसार में अपने मुंह पर लगे इस भयंकर कलंक को कहां जाकर धो पाऊंगा, अर्थात मैं जीवन भर के लिए कलंकित हो जाऊंगा और कभी किसी को अपना मुंह नहीं दिखा पाऊंगा।
क्यों हौं आजु होत सुचि सपथनि ? कौन मानिहै साँची ?
शब्दार्थ–
सुचि – पवित्र
सपथनि – कसमों या सौगंध से
साँची – सच्ची
व्याख्या: आज मैं चाहे कितनी भी कसमें खाकर खुद को पवित्र और निर्दोष साबित करने की कोशिश क्यों न करूं, भला मेरी इन बातों को कौन सच मानेगा।
महिमा-मृगी कौन सुकृती की खल-बच-बिसिखन बाँची ?
शब्दार्थ–
महिमा-मृगी – यश रूपी हिरणी
सुकृती – पुण्यात्मा या अच्छे कर्म करने वाला
खल – दुष्ट
बच – वचन
बिसिखन – बाणों से
बाँची – बची है
व्याख्या: इस संसार में ऐसा कौन सा पुण्यवान या अच्छा व्यक्ति है, जिसके यश रूपी हिरणी दुष्ट लोगों के कड़वे वचन रूपी बाणों से बच पाई हो। अर्थात, दुनिया तो अच्छे लोगों को भी ताने मारती है, फिर मेरी बात पर कौन विश्वास करेगा।
गहि न जाति रसना काहू की, कहौ जाहि जोइ सूझै।
शब्दार्थ–
गहि – पकड़ना
रसना – जीभ
काहू की – किसी की
सूझै – समझ में आए
व्याख्या: किसी भी व्यक्ति की जीभ को पकड़ा नहीं जा सकता है, इसलिए जिसके मन में जो आ रहा है, वह मुझे वही कह रहा है और मुझ पर आरोप लगा रहा है।
दीनबंधु कारुन्य-सिंधु बिनु कौन हिए की बूझै ?
शब्दार्थ–
दीनबंधु – गरीबों के मित्र (श्री राम)
कारुन्य-सिंधु – दया के सागर (श्री राम)
हिए की – हृदय की बात
बूझै – समझे
व्याख्या: दीनों के मित्र और दया के सागर मेरे बड़े भाई श्री राम के अलावा भला दूसरा कौन है, जो मेरे हृदय की इस सच्ची पीड़ा और पवित्रता को समझ सके।
तुलसी रामबियोग-बिषम-बिष-बिकल नारिनर भारी।
शब्दार्थ–
बियोग – बिछड़ना
बिषम-बिष – भयंकर जहर
बिकल – बेचैन या व्याकुल
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री राम के बिछड़ने रूपी भयंकर जहर के कारण अयोध्या के सभी नर-नारी बहुत ज्यादा व्याकुल और दुखी हो रहे थे।
भरत-स्नेह-सुधा सींचे सब भए तेहि समय सुखारी।।1।।
शब्दार्थ–
स्नेह-सुधा – प्रेम रूपी अमृत
सींचे – भीग कर
सुखारी – सुखी या शांत
व्याख्या: उस समय भरत जी के इन प्रेम रूपी अमृत वाले वचनों से भीग कर वे सभी दुखी लोग अत्यंत सुखी और शांत हो गए।

मेरो सब पुरुषारथ थाकौ।
शब्दार्थ–
पुरुषारथ – पराक्रम या बल
थाकौ – थक गया है या हार गया है
व्याख्या: लंका युद्ध में लक्ष्मण जी के मूर्छित होने पर श्री राम एक साधारण मनुष्य की तरह रोते हुए कहते हैं कि आज मेरा सारा पराक्रम और बल थक कर हार गया है, मैं बिल्कुल असहाय हो गया हूं।
बिपति बँटावन बंधु-बाहु बिनु करौं भरोसो काको ?
शब्दार्थ–
बिपति – मुसीबत
बँटावन – बांटने वाला
बंधु-बाहु – भाई रूपी भुजा
काको – किसका
व्याख्या: मेरी मुसीबत को बांटने वाले मेरे भाई लक्ष्मण रूपी भुजा के बिना, अब मैं किस पर भरोसा करूं। लक्ष्मण ही मेरा सबसे बड़ा सहारा था।
सुनु सुग्रीव साँचेहूँ मोपर फेर्यो बदन विधाता।।
शब्दार्थ–
साँचेहूँ – सचमुच में
मोपर – मुझ पर से
फेर्यो – फेर लिया है
बदन – मुख
विधाता – ईश्वर या भाग्य ने
व्याख्या: हे मित्र सुग्रीव सुनो, ऐसा लगता है कि सचमुच में आज भाग्य ने या ईश्वर ने मुझसे अपना मुंह फेर लिया है, वह मुझसे रूठ गया है।
ऐसे समय समर-संकट हौं तज्यो लखन सो भ्राता।।
शब्दार्थ–
समर-संकट – युद्ध के इस भारी संकट में
हौं – मैंने
तज्यो – खो दिया
भ्राता – भाई
व्याख्या: ईश्वर की नाराजगी के कारण ही युद्ध के इस इतने भयानक संकट के समय में मैंने लक्ष्मण जैसा महान और प्यारा भाई हमेशा के लिए खो दिया है।
गिरि कानन जैहैं साखामृग, हौं पुनि अनुज सँघाती।।
शब्दार्थ–
गिरि – पर्वत
कानन – वन
जैहैं – चले जाएंगे
साखामृग – बंदर
अनुज – छोटा भाई
सँघाती – साथी
व्याख्या: अगर लक्ष्मण को कुछ हो गया, तो ये सारे बंदर और भालू तो वापस अपने पर्वतों और जंगलों में चले जाएंगे, और मैं भी अपने छोटे भाई लक्ष्मण का साथी बनकर उसी के साथ यमलोक चला जाऊंगा।
ह्वैहै कहा बिभीषन की गति, रही सोच भरि छाती।।
शब्दार्थ–
ह्वैहै कहा – क्या होगा
गति – दशा
सोच – चिंता
व्याख्या: मुझे बस इसी बात की भारी चिंता सता रही है कि मेरे मरने के बाद मेरी शरण में आए हुए लंकापति विभीषण का क्या होगा, उसकी दशा कैसी होगी।
तुलसी सुनि प्रभु-बचन भालु कपि सकल बिकल हिय हारे।
शब्दार्थ–
सकल – सारे
बिकल – व्याकुल
हिय हारे – हृदय से निराश हो गए
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रभु श्री राम के इन अत्यंत दुखी वचनों को सुनकर वहां मौजूद सभी भालू और बंदर बहुत व्याकुल हो गए और अंदर से पूरी तरह हिम्मत हार गए।
जामवंत हनुमंत बोलि तब औसर जानि प्रचारे।।2।।
कठिन शब्द: शब्दार्थ–
औसर – अवसर या मौका
जानि – जानकर
प्रचारे – प्रेरित किया या भेजा
व्याख्या: तब जामवंत जी ने स्थिति की गंभीरता और सही अवसर जानकर हनुमान जी को अपने पास बुलाया और उन्हें संजीवनी बूटी लाने के लिए प्रेरित करके तुरंत भेजा।

हृदय-घाउ मेरे, पीर रघुबीरै।
शब्दार्थ–
घाउ – घाव या चोट
पीर – पीड़ा या दर्द
रघुबीरै – श्री राम को
व्याख्या: संजीवनी बूटी मिलने पर जब लक्ष्मण जी होश में आते हैं, तो वे लोगों से कहते हैं कि बाण लगने का शारीरिक घाव तो मेरे हृदय में है, लेकिन उसकी असली पीड़ा और दर्द तो मेरे बड़े भाई श्री राम को हो रहा है।
पाइ सँजीवनि जागि कहत यों प्रेमपुलकि बिसराय सरीरै।।
शब्दार्थ–
प्रेमपुलकि – प्रेम में मग्न होकर
बिसराय – भुलाकर
सरीरै – शरीर की सुध-बुध
व्याख्या: संजीवनी बूटी पाकर जागने के बाद लक्ष्मण जी अपने शरीर के सारे दर्द को भुलाकर और श्री राम के प्रेम में पूरी तरह डूबकर यही बात कह रहे हैं।
मोहिं कहा बूझत पुनि पुनि जैसे पाठ अरथ चरचा कीरै।
शब्दार्थ–
मोहिं कहा – मुझसे क्या
बूझत – पूछते हो
पुनि पुनि – बार-बार
अरथ चरचा – अर्थ की चर्चा
कीरै – तोते से
व्याख्या: लक्ष्मण जी वहां खड़े लोगों से कहते हैं कि तुम लोग बार-बार मुझसे मेरा हाल क्या पूछ रहे हो। यह तो वैसा ही है जैसे कोई रटे हुए पाठ का अर्थ किसी तोते से पूछने लगे, जिसे खुद कुछ नहीं पता होता।
सोभा सुख छति लाहु भूप कहँ, केवल कांति मोल हीरै।।
शब्दार्थ–
छति – नुकसान
लाहु – लाभ
भूप – राजा
कांति – चमक
मोल – मूल्य या कीमत
व्याख्या: जिस तरह हीरे की सुंदरता, सुख, नुकसान या लाभ का अनुभव तो उसे पहनने वाले राजा को ही होता है, हीरे की अपनी तो केवल चमक और कीमत होती है। ठीक वैसे ही मेरे जीवन और रक्षा का सारा सुख या दुख तो केवल श्री राम का है।
तुलसी सुनि सौमित्रि-बचन सब धरि न सकत धीरौ धीरे।।
शब्दार्थ–
सौमित्रि – सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण
धरि न सकत – धारण नहीं कर सके
धीरौ धीरे – बड़े से बड़ा धैर्यवान व्यक्ति भी
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि लक्ष्मण जी के ऐसे महान और प्रेम से भरे वचनों को सुनकर वहां मौजूद बड़े से बड़ा धैर्यवान व्यक्ति भी अपने आंसुओं को रोक नहीं सका।
उपमा राम-लखन की प्रीति की क्यों दीजै खीरै-नीरै।।3।।
शब्दार्थ–
प्रीति – प्रेम
खीरै-नीरै – दूध और पानी
व्याख्या: राम और लक्ष्मण के इस अनोखे प्रेम की तुलना दूध और पानी के मेल से भी नहीं की जा सकती है, क्योंकि दूध और पानी को तो फिर भी अलग किया जा सकता है, लेकिन इन दोनों भाइयों का प्रेम उससे भी कहीं अधिक गहरा और अटूट है।
काव्य सौंदर्य और मूल भाव:
* रस: पदों में मुख्य रूप से करुण रस, वात्सल्य रस और शांत रस का सुंदर प्रयोग हुआ है।
* छंद: यह पूरी कविता गेय पद छंद में रची गई है, जिसे आसानी से गाया जा सकता है।
* अलंकार: इसमें अनुप्रास, रूपक (स्नेह-सुधा, बंधु-बाहु, महिमा-मृगी) और उपमा (खीरै-नीरै) अलंकारों का अत्यंत सटीक और स्वाभाविक प्रयोग किया गया है।
कविता का सारांश:
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित गीतावली के इन पदों में श्री राम, लक्ष्मण और भरत के बीच के अटूट और पवित्र भाईचारे का बहुत ही मार्मिक वर्णन किया गया है। पहले भाग में भरत जी अपनी माता कौशल्या के सामने अपनी बेगुनाही साबित करते हुए कहते हैं कि राम को वन भेजने में उनका कोई हाथ नहीं है। वे इस बात से बहुत दुखी हैं कि लोग उन पर शक कर रहे हैं, लेकिन उन्हें पूरा विश्वास है कि श्री राम उनके मन की पवित्रता को जरूर समझेंगे। भरत जी की ये सच्ची बातें सुनकर अयोध्या के व्याकुल लोग बहुत शांत और सुखी हो जाते हैं।
दूसरे भाग में लंका युद्ध के दौरान लक्ष्मण जी के मूर्छित हो जाने की घटना का वर्णन है। लक्ष्मण को बेहोश देखकर प्रभु श्री राम एक आम इंसान की तरह बहुत रोते हैं और कहते हैं कि अपने भाई के बिना मैं बिल्कुल असहाय हो गया हूं। वे विलाप करते हैं कि अब उनकी शरण में आए विभीषण का क्या होगा, क्योंकि लक्ष्मण के बिना वे खुद भी जीवित नहीं रहना चाहते। राम जी की इस करुण दशा को देखकर सभी बंदर और भालू हिम्मत हार जाते हैं, तब जामवंत जी सही मौका देखकर हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने के लिए भेजते हैं।
तीसरे भाग में संजीवनी बूटी से होश में आने के बाद लक्ष्मण जी का अपने बड़े भाई राम के प्रति अनोखा समर्पण दिखाया गया है। जब लोग लक्ष्मण जी से उनका हाल पूछते हैं, तो वे बड़ी विनम्रता से कहते हैं कि बाण का घाव तो मेरे शरीर पर है, लेकिन इसका असली दर्द मेरे भाई राम को हो रहा है। जिस प्रकार हीरे की सुंदरता का सुख उसे पहनने वाले राजा को मिलता है, उसी प्रकार मेरा सारा जीवन और मेरे बचने की खुशी केवल मेरे श्री राम की है। अंत में कवि कहते हैं कि राम और लक्ष्मण के इस महान प्रेम की तुलना पानी और दूध के मिलावट से भी नहीं की जा सकती, क्योंकि यह प्रेम संसार की हर मिसाल से बहुत ऊपर है।