छंद
छंद केवल काव्य का आवरण नहीं है, बल्कि यह वह गणितीय और संगीतमय ढाँचा है जिस पर कविता की आत्मा निवास करती है। छंद भारतीय मेधा की वह उत्कृष्ट गणितीय खोज है जिसने साहित्य को संगीत से जोड़ा और हमारी हजारों …


छंद केवल काव्य का आवरण नहीं है, बल्कि यह वह गणितीय और संगीतमय ढाँचा है जिस पर कविता की आत्मा निवास करती है। छंद भारतीय मेधा की वह उत्कृष्ट गणितीय खोज है जिसने साहित्य को संगीत से जोड़ा और हमारी हजारों वर्ष पुरानी ज्ञान संपदा को स्मृति के माध्यम से आज तक जीवित रखा। "छन्दः पादौ तु वेदस्य।" जिस प्रकार मनुष्य बिना पैरों के खड़ा नहीं हो सकता, उसी प्रकार कोई भी काव्य बिना छंद के खड़ा नहीं रह सकता।
1. छंद का परिचय :
जिस रचना में वर्णों की संख्या, मात्रा, गणना, यति और गति के विशिष्ट नियमों का पालन किया जाता है, उसे छंद कहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, कविता को लयबद्ध और संगीतमय बनाने वाले नियमों के समूह को ही छंद कहा जाता है। छंद को एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक रूप देने का श्रेय महर्षि पिंगल को जाता है।
महर्षि पिंगल ने 'छंदःशास्त्र' नामक महान ग्रंथ की रचना की थी, जिसे छंद का प्रथम और सबसे प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।
छंद के प्रवर्तक आचार्य पिंगल के नाम पर ही छंदशास्त्र को 'पिंगल शास्त्र' भी कहा जाता है।
2. छंद के प्रमुख अंग :
छंद को भली-भांति समझने के लिए इसके अंगों को समझना आवश्यक है:
चरण या पद: छंद की प्रत्येक पंक्ति को चरण कहते हैं। प्रायः एक छंद में चार चरण होते हैं।
वर्ण और मात्रा: मुख से निकलने वाली ध्वनि को सूचित करने वाले चिह्न वर्ण कहलाते हैं, और किसी वर्ण के उच्चारण में लगने वाले समय को मात्रा कहते हैं।
यति या विराम: छंद को पढ़ते समय जहाँ थोड़ी देर रुकना पड़ता है, उसे यति कहते हैं।
गति या लय: छंद को पढ़ने के प्रवाह या लय को गति कहा जाता है।
तुक: छंद के चरणों के अंत में आने वाले समान स्वर या अक्षरों की समानता को तुक कहते हैं।
3. मात्रा, लघु और गुरु :
मात्रा: किसी भी स्वर के उच्चारण में जितना समय लगता है, उसे मात्रा कहते हैं।
लघु : ह्रस्व या छोटे स्वरों के उच्चारण में कम समय लगता है। इसे लघु कहते हैं और इसका चिह्न एक खड़ी रेखा ( । ) है। इसकी गणना 1 एक की जाती है। उदाहरण: अ, इ, उ, ऋ, और इनसे युक्त व्यंजन क्रमशः, जैसे- क, कि, कु, कृ।
गुरु : दीर्घ या बड़े स्वरों के उच्चारण में लघु से दोगुना समय लगता है। इसे गुरु कहते हैं और इसका चिह्न अंग्रेजी के 'S' आकार जैसा ( S ) होता है। इसकी गणना 2 की जाती है। उदाहरण: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः और इनसे युक्त व्यंजन क्रमशः, जैसे- का, की, कू, के, कै, को, कौ।
4. मात्राओं की गणना के नियम :
1. अनुस्वार (ं) और विसर्ग (ः) युक्त वर्ण हमेशा 'गुरु' (ऽ) माने जाते हैं। जैसे- हँस = 1 मात्रा, लेकिन हंस = 2 मात्रा।
2. आधे अक्षर की कोई मात्रा नहीं होती, लेकिन आधा अक्षर जिस अक्षर के बाद आता है, उससे पहले वाला अक्षर 'गुरु' (ऽ) हो जाता है। जैसे- 'सत्य' में 'स' लघु होते हुए भी 'त' के कारण गुरु (ऽ) गिना जाएगा।
3. चंद्रबिंदु (ँ) वाले वर्णों की मात्रा में कोई वृद्धि नहीं होती, वे 'लघु' (।) ही रहते हैं।
5. गण केवल वर्णिक छंदों के लिए :
परिभाषा: तीन वर्णों के समूह को 'गण' कहते हैं।
गणों की कुल संख्या 8 होती है- यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण।
याद रखने का अत्यंत सरल सूत्र:
यमाताराजभानसलगा (य-मा-ता-रा-ज-भा-न-स-ल-गा)
इस एक सूत्र में आठों गणों के नाम और उनके लघु-गुरु के नियम छिपे हुए हैं।
6. छंद का विभाजन :
छंद मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं:
मात्रिक छंद: जिन छंदों की रचना मात्राओं की गणना के आधार पर होती है, जैसे- दोहा, चौपाई।
वर्णिक छंद: जिन छंदों की रचना वर्णों की गणना और क्रम के आधार पर होती है जैसे- सवैया, कवित्त।
मुक्तक छंद: जो छंद वर्णों और मात्राओं के कठोर नियमों से मुक्त होते हैं। आधुनिक कविताएँ, जैसे -
वह आता
दो टूक कलेजे के करता, पछताता पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी-भर दाने को, भूख मिटाने को,
मुँह फटी-पुरानी झोली का फैलाता,
दो टूक कलेजे के करता, पछताता पथ पर आता।
(कक्षा 10 के पाठ्यक्रम में हमें मुख्य रूप से मात्रिक छंद पढ़ने हैं।)
7. प्रमुख मात्रिक छंद :
(i) चौपाई
परिभाषा: यह एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। अंत में दो गुरु (ऽऽ) होना शुभ माना जाता है।
उदाहरण:
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। (16)
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ (16)
मंगल भवन अमंगल हारी। (16)
द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी॥ (16)
बिनु पग चलइ सुनइ बिनु काना। (16)
कर बिनु करम करै बिधि नाना॥ (16)
(ii) दोहा
परिभाषा: यह एक अर्धसम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। कुल 24 मात्राएँ प्रति पंक्ति।
उदाहरण:
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, (13) काके लागूँ पाँय। (11)
बलिहारी गुरु आपनो, (13) जिन गोबिंद दियो बताय॥ (11)
रहिमन पानी राखिए, (13) बिन पानी सब सून। (11)
पानी गए न ऊबरै, (13) मोती, मानुस, चून॥ (11)
मेरी भव बाधा हरौ, (13) राधा नागरि सोय। (11)
जा तन की झाँईं परै, (13) स्याम हरित दुति होय॥ (11)
(iii) सोरठा
परिभाषा: यह एक अर्धसम मात्रिक छंद है। यह दोहे का ठीक उल्टा होता है। इसके पहले और तीसरे चरण में 11-11 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है।
उदाहरण:
जो सुमिरत सिधि होय, (11) गननायक करिबर बदन। (13)
करउ अनुग्रह सोय, (11) बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥ (13)
मुक होइ बाचाल, (11) पंगु चढइ गिरिवर गहन। (13)
जासु कृपाँ सो दयाल, (11) द्रवउ सकल कलि मल दहन॥ (13)
सुनि केवट के बैन, (11) प्रेम लपेटे अटपटे। (13)
बिहसे करुना ऐन, (11) चितइ जानकी लखन तन॥ (13)
(iv) रोला
परिभाषा: यह एक सम मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में कुल 24 मात्राएँ होती हैं। इसमें 11 और 13 मात्राओं पर यति होता है।
उदाहरण:
जीती जाती हुई, (11) जिन्होंने भारत बाजी। (13) = 24
निज बल से बल मेट, (11) विधर्मी मुगल कुराजी॥ (13) = 24
उठो, उठो हे वीर! (11) आज तुम निद्रा त्यागो। (13) = 24
करो महासंग्राम, (11) नहीं कायर हो भागो॥ (13) = 24
नीलाम्बर परिधान, (11) हरित पट पर सुन्दर है। (13) = 24
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, (11) मेखला रत्नाकर है॥ (13) = 24