छंद
"छंद कविता का केवल बाहरी आभूषण नहीं है, बल्कि यह उसकी धड़कन है।" यह कविता को व्यवस्थित, सुंदर, प्रभावशाली और अमर बनाने की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। -डॉ. रमेश यदुवंशी


"छंद कविता का केवल बाहरी आभूषण नहीं है, बल्कि यह उसकी धड़कन है।" यह कविता को व्यवस्थित, सुंदर, प्रभावशाली और अमर बनाने की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
-डॉ. रमेश यदुवंशी
छंद का अर्थ और परिभाषा :
'छंद' शब्द का अर्थ है - आह्लादित या प्रसन्न करना। जिस रचना में वर्ण, मात्रा, यति, गति और तुक का निश्चित नियम होता है, उसे छंद कहते हैं। काव्य-जगत में छंद की भूमिका अत्यंत व्यापक और अनिवार्य है। यदि गद्य का अनुशासन 'व्याकरण' है, तो पद्य का अनुशासन 'छंद' है। छंदशास्त्र के आदि प्रणेता आचार्य पिंगल माने जाते हैं, इसलिए छंदशास्त्र को 'पिंगलशास्त्र' भी कहा जाता है। इसका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। काव्य में छंद की भूमिका को निम्नलिखित सरल और महत्वपूर्ण बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-
1. छंद कविता में एक विशेष लय, गति और प्रवाह उत्पन्न करता है। इसी के कारण कविता गद्य से अलग और कर्णप्रिय बनती है।
2. छंद के कारण ही कविता को गाया जा सकता है।
3. छंदबद्ध रचनाएँ मानव मस्तिष्क को जल्दी याद हो जाती हैं। यही कारण है कि रामचरितमानस की चौपाइयाँ, हनुमान चालीसा या कबीर के
दोहे सदियों से लोगों की ज़ुबान पर रटे हुए हैं।
4. प्राचीन काल में जब कागज़ नहीं था, तब ज्ञान को पीढ़ियों तक पहुँचाने का काम श्रुति परंपरा द्वारा छंदों के कारण ही संभव हो सका।
5. मनुष्य जब क्रोध में होता है तो उसके बोलने की गति तेज़ हो जाती है, लेकिन जब वह दुखी होता है, तो उसकी आवाज़ धीमी और ठहर-ठहर कर निकलती है। छंद इसी स्वाभाविक गति को कविता में उतारता है।
छंद के अंग :
छंद के मुख्य अंग निम्नलिखित हैं-
चरण या पाद- छंद की प्रत्येक पंक्ति को चरण कहते हैं। प्रायः एक छंद में 4 चरण होते हैं।
वर्ण और मात्रा- मुख से निकलने वाली ध्वनि 'वर्ण' है। किसी वर्ण के उच्चारण में लगने वाले समय को 'मात्रा' कहते हैं। जैसे -ह्रस्व = 1, दीर्घ = 2
यति- छंद पढ़ते समय बीच में जो विराम या ठहराव आता है, उसे यति कहते हैं।
गति- कविता को पढ़ने का प्रवाह या लय 'गति' कहलाती है।
तुक- छंद के चरणों के अंत में समान स्वरों या व्यंजनों की आवृत्ति 'तुक' कहलाती है।
गण- तीन वर्णों के समूह को 'गण' कहते हैं। ये 8 होते हैं - यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण।
छंद के भेद :
मुख्य रूप से छंद तीन प्रकार के होते हैं-
1. मात्रिक छंद: जिनमें मात्राओं की गणना की जाती है।
2. वर्णिक छंद: जिनमें वर्णों की गणना और गणों का क्रम देखा जाता है।
3. मुक्तक छंद: जो मात्रा और वर्ण के बंधनों से मुक्त होते हैं , जैसे- निराला की कविताएँ।
मात्राओं की गणना के नियम :
छंदशास्त्र में मात्राओं की गणना करना गणित की तरह ही सटीक और वैज्ञानिक है। मात्रिक छंदों जैसे दोहा, चौपाई, रोला आदि को समझने के लिए मात्रा गिनने के नियम जानना सबसे आवश्यक कदम है।
मात्रा गणना के नियम अत्यंत सरल, स्पष्ट और सटीक तरीके से समझाता हूँ-
मात्रा क्या है?
किसी भी स्वर के उच्चारण में लगने वाले समय को 'मात्रा' कहते हैं। मात्रा केवल स्वरों की होती है, व्यंजनों की अपनी कोई मात्रा नहीं होती।
मात्राएँ दो प्रकार की होती हैं-
1. लघु या ह्रस्व : चिह्न । - 1 मात्रा
2. गुरु या दीर्घ : चिह्न ऽ - 2 मात्रा
1. लघु के नियम :
जिन स्वरों के उच्चारण में कम समय लगता है, उन्हें लघु माना जाता है। इनकी 1 मात्रा गिनी जाती है।
मूल ह्रस्व स्वर- अ, इ, उ, ऋ।
ह्रस्व स्वर वाले व्यंजन- क, कि, कु, कृ।
चन्द्रबिन्दु (ँ) वाले ह्रस्व स्वर: यदि किसी ह्रस्व स्वर पर चन्द्रबिन्दु लगा हो, तो वह लघु ही रहता है।
उदाहरण-
क म ल = । । । कुल 3 मात्राएँ
कि ध र = । । । कुल 3 मात्राएँ
हँ स ना = । । ऽ कुल 4 मात्राएँ - 'हँ' लघु ही रहेगा
2. गुरु के नियम :
जिन स्वरों के उच्चारण में दोगुना समय लगता है, उन्हें गुरु माना जाता है। इनकी 2 मात्राएँ गिनी जाती हैं।
दीर्घ स्वर- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।
दीर्घ स्वर वाले व्यंजन- का, की, कू, के, कै, को, कौ।
अनुस्वार वाले वर्ण: यदि किसी भी वर्ण के ऊपर बिंदु (ं) लगा हो, तो वह गुरु हो जाता है।जैसे - गंगा
विसर्ग वाले वर्ण: विसर्ग वाले वर्ण भी गुरु माने जाते हैं। जैसे -अतः
उदाहरण-
रा म = ऽ । कुल 3 मात्राएँ
न दी = । ऽ कुल 3 मात्राएँ
अं ग = ऽ । कुल 3 मात्राएँ - 'अ' पर बिंदु होने से यह गुरु हो गया
दुः ख = ऽ । कुल 3 मात्राएँ - 'दु' विसर्ग के कारण गुरु हो गया
3. संयुक्ताक्षर या आधे अक्षर का विशेष नियम :
यह नियम सबसे महत्वपूर्ण है और अक्सर छात्र यहीं गलती करते हैं।
आधे अक्षर की अपनी कोई मात्रा नहीं होती।
परन्तु, आधे अक्षर से ठीक पहले वाला लघु वर्ण गुरु हो जाता है, क्योंकि आधे अक्षर का ज़ोर पहले वाले वर्ण पर पड़ता है।
यदि पहले वाला वर्ण, पहले से ही गुरु है, तो वह 2 ही रहेगा, क्योंकि मात्रा कभी 3 नहीं होती।
उदाहरण-
सत्य - स त् य। यहाँ 'त्' आधा है। इसका ज़ोर 'स' पर पड़ेगा। इसलिए 'स' जो लघु है वह गुरु हो जाएगा।
स (ऽ) + त्य (।) = ऽ । कुल 3 मात्राएँ
कर्म - क र् म। यहाँ 'र्' आधा है, जो 'म' के ऊपर लगा है। 'र्' का ज़ोर 'क' पर पड़ेगा।
क (ऽ) + र्म (।) = ऽ । कुल 3 मात्राएँ
आत्मा - आ त् मा। यहाँ 'आ' पहले से ही गुरु है, इसलिए वह गुरु ही रहेगा।
आ (ऽ) + त्मा (ऽ) = ऽ ऽ कुल 4 मात्राएँ
अपवाद: यदि आधे अक्षर के उच्चारण का ज़ोर पहले वर्ण पर नहीं पड़ रहा हो, तो पहला वर्ण लघु ही रहता है। जैसे- 'तुम्हारा' में 'तु' लघु ही रहता है, गुरु नहीं, क्योंकि बोलते समय 'तु' पर ज़ोर नहीं पड़ता।
4. हलन्त का नियम :
हलन्त जैसे- त्, म्, न् वाले वर्ण भी आधे अक्षर ही माने जाते हैं। इनके नियम भी संयुक्ताक्षर वाले ही हैं।
उदाहरण-
राजन् - रा ज न्। यहाँ 'न्' हलन्त है, इसलिए इसका ज़ोर 'ज' पर पड़ेगा और 'ज' गुरु हो जाएगा।
रा (ऽ) + ज (ऽ) + न् (0) = ऽ ऽ कुल 4 मात्राएँ
अभ्यास के लिए सम्पूर्ण पंक्तियों का उदाहरण-
आइए, इन नियमों को एक चौपाई पर लागू करके देखते हैं। चौपाई के प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होनी चाहिए -
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।
बं (ऽ) - अनुस्वार के कारण गुरु
द (।) - लघु
उँ (।) - चन्द्रबिन्दु के कारण लघु
गु (।) - लघु छोटे उ की मात्रा
रु (।) - लघु छोटे उ की मात्रा
प (।) - लघु
द (।) - लघु
प (।) - लघु
दु (।) - लघु
म (।) - लघु
प (।) - लघु
रा (ऽ) - गुरु
गा (ऽ) - गुरु
कुल मात्राएँ: 2 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 + 2 + 2 = 16 मात्राएँ
1. मात्रिक छंद :
1. चौपाई
परिभाषा: यह एक सम-मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं और प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं।
विशेष - अंत में दो गुरु होना शुभ माना जाता है और अंत मे ही जगण और तगण नहीं आते हैं।
उदाहरण 1:
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। (16)
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ (16)
उदाहरण 2:
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। (16)
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥ (16)
2. दोहा
परिभाषा: यह अर्धसम-मात्रिक छंद है। इसके पहले और तीसरे चरण में 13-13 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
विशेष - दोहा के सम चरण का आखिरी अक्षर हमेशा लघु ही होगा और उससे ठीक पहले वाला अक्षर गुरु होगा। जैसे- होइ, खोइ, समान। इसके विषम चरणों के अंत में कभी भी 'जगण' (।ऽ।) नहीं आना चाहिए।
उदाहरण 1:
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। (13, 11)
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥ (13, 11)
उदाहरण 2:
रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून। (13, 11)
पानी गए न ऊबरै, मोती मानुष चून॥ (13, 11)
3. सोरठा
परिभाषा: यह अर्धसम-मात्रिक छंद है और दोहे का ठीक उल्टा होता है। इसके पहले और तीसरे चरण में 11-11 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं।
विशेष - इसके विषम चरणों के अंत में 'गुरु-लघु' (ऽ l) वर्ण आते हैं।
उदाहरण 1:
जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन। (11, 13)
करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥ (11, 13)
उदाहरण 2:
नील सरोरुह स्याम, तरुन अरुन बारिज नयन। (11, 13)
करउ सो मम उर धाम, सदा छीरसागर सयन॥ (11, 13)
4. रोला
परिभाषा: यह एक सम-मात्रिक छंद है। इसमें चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं और 11 व 13 मात्राओं पर यति होती है।
विशेष - रोला एक सम-मात्रिक छंद है, जिसके प्रत्येक चरण के अंत में अनिवार्य रूप से दो गुरु वर्ण आते हैं।
उदाहरण 1:
जीती जाती हुई, जिन्होंने भारत बाजी।
निज बल से बल मेट, विधर्मी मुगल कुराजी॥
उदाहरण 2:
यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।
पर-स्वारथ के काज, सीस आगे धर दीजै॥
5. बरवै
परिभाषा: यह अर्धसम-मात्रिक छंद है। इसके पहले और तीसरे चरण में 12-12 मात्राएँ तथा दूसरे और चौथे चरण में 7-7 मात्राएँ होती हैं। कुल 19 मात्राएँ
उदाहरण 1:
वाम अंग शिव शोभित, शिवा उदार। (12, 7)
सरद सुवारिद में जनु, तड़ित विहार॥ (12, 7)
उदाहरण 2:
तुलसी राम नाम सम, मीत न आन। (12, 7)
जो पहुँचाव रामपुर, तनु अवसान॥ (12, 7)
6. कुण्डलिया
परिभाषा: यह एक विषम-मात्रिक छंद है, जो दोहा और रोला को मिलाने से बनता है। इसमें 6 चरण होते हैं। इसकी विशेषता है कि जिस शब्द से यह शुरू होता है, उसी शब्द पर समाप्त भी होता है।
उदाहरण 1:
साईं बैर न कीजिए, गुरु पण्डित कवि यार।
बेटा बनिता पौरिया, यज्ञ करावन हार॥
यज्ञ करावन हार, राज मन्त्री जो होई।
विप्र पड़ोसी वैद्य, आप को तपै रसोई॥
कह गिरिधर कविराय, जुगन सों यह चलि आई।
इन तेरह को तरह, दिए बनि आवै साईं॥
उदाहरण 2:
बिना विचारे जो करै, सो पाछै पछिताय।
काम बिगारै आपनो, जग में होत हँसाय॥
जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावै।
खान पान सम्मान, राग-रंग मनहि न भावै॥
कह गिरिधर कविराय, दुख कछु टरत न टारे।
खटकत है जिय माहिं, कियो जो काम बिना रे॥ (बिना/बिचारे)
7. हरिगीतिका
परिभाषा: यह एक सम-मात्रिक छंद है। इसमें 4 चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं और 16 व 12 मात्राओं पर यति होती है।
उदाहरण 1:
अन्याय सहकर बैठ रहना, यह महा दुष्कर्म है। (16, 12 = 28)
न्यायार्थ अपने बंधु को भी, दंड देना धर्म है॥ (16, 12 = 28)
उदाहरण 2:
कहती हुई यों उत्तरा के, नेत्र जल से भर गए। (16, 12 = 28)
हिम के कणों से पूर्ण मानों, हो गए पंकज नए॥ (16, 12 = 28)
वर्णिक छंद पहचानने के नियम :
1. वर्णिक छंद - जिनकी रचना वर्णों की संख्या और गण के नियम पर आधारित होती है। इसमें मात्राओं की गिनती नहीं की जाती, बल्कि अक्षरों को गिना जाता है। आइए इसके नियमों को समझते हैं -
1. वर्णिक छंद में केवल उन वर्णों की गिनती की जाती है, जिनमें कोई स्वर हो।
2. पूर्ण वर्ण: चाहे वह लघु जैसे- क, मि, सु हो या गुरु जैसे- का, मी, सू उसे एक वर्ण ही गिना जाएगा।
3. आधा अक्षर: आधे अक्षर जैसे- क्, त्, र् की गणना वर्णिक छंद में नहीं की जाती है।
उदाहरण: 'आत्मा' शब्द में 2 वर्ण हैं - आ, मा। बीच के आधे 'त्' को नहीं गिना जाएगा। 'कर्म' में 2 वर्ण हैं - क, र्म।
2. गण विधान
वर्णिक छंदों का पूरा ढाँचा 'गणों' पर टिका होता है। तीन वर्णों के समूह को 'गण' कहते हैं। कुल 8 गण होते हैं। इन्हें याद रखने और पहचानने का सबसे वैज्ञानिक और प्राचीन सूत्र है- यमाताराजभानसलगा
जिस गण का रूप जानना हो, सूत्र में उस अक्षर से लेकर आगे के दो अक्षर और ले लीजिए। जैसे -यथा
नाम सूत्र संकेत मात्राएँ उदाहरण
यगण यमाता I S S यशोदा
मगण मातारा S S S माता जी
तगण ताराज S S I तालाब
रगण राजभा S I S रामजी
जगण जभान I S I जवान
भगण भानस S I I भारत
नगण नसल I I I नमन
सगण सलगा I I S सलमा
1.वर्णों की कुल संख्या गिनें:
आधे अक्षरों को छोड़ दें.पंक्ति के शुरू से अंत तक सभी पूर्ण वर्णों को गिन लें। वर्णों की कुल संख्या आपको संभावित छंदों की सूची बता देगी। जैसे- यदि 11 वर्ण हैं, तो यह इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा या शालिनी हो सकता है। यदि 14 वर्ण हैं, तो वसंततिलका होगा।
2.मात्राएँ (लघु-गुरु) निर्धारित करें:
पंक्ति के प्रत्येक वर्ण पर मात्रा गणना के नियमों के अनुसार लघु और गुरु का चिह्न लगाएँ। याद रखें, यदि कोई आधा अक्षर बीच में है, तो वह अपने से ठीक पहले वाले वर्ण को गुरु कर देगा।
3.तीन-तीन वर्णों के 'गण' बनाएँ:
लगाए गए मात्रा चिह्नों को आरंभ से तीन-तीन के जोड़ों में बाँट लें। यदि अंत में एक या दो वर्ण बच जाएँ, तो उन्हें स्वतंत्र लघु या गुरु मान लें।
4.सूत्र से मिलान करें:
अब देखें कि कौन सा गण बन रहा है। अंत में प्राप्त गणों के क्रम का मिलान वर्णिक छंदों के स्थापित नियमों से करें।
प्रायोगिक उदाहरण :
आइए, इस पूरी प्रक्रिया को एक उदाहरण पर लागू करके प्रमाणित करते हैं।
पंक्ति: माता यशोदा हरि को जगावैं।
चरण 1: वर्णों की गिनती
मा , ता , य , शो , दा , ह , रि , को , ज , गा , वैं। कुल वर्ण = 11
संकेत: 11 वर्णों वाले छंद इन्द्रवज्रा या उपेन्द्रवज्रा हो सकते हैं।
चरण 2 और 3: मात्रा निर्धारण और गण निर्माण
हम तीन-तीन वर्णों का समूह बनाएँगे:
मा ता य
मात्रा: ऽ ऽ । (गुरु-गुरु-लघु)
गण सूत्र से मिलान- ताराज यानी तगण
शो दा ह
मात्रा: ऽ ऽ । (गुरु-गुरु-लघु)
सूत्र से मिलान: ताराज = तगण
रि को ज
मात्रा: । ऽ । (लघु-गुरु-लघु)
सूत्र से मिलान: जभान = जगण
अंत में बचे वर्ण:
गा = ऽ (गुरु)
वैं = ऽ (गुरु)
निष्कर्ष:
हमें जो क्रम प्राप्त हुआ वह है— तगण, तगण, जगण, गुरु, गुरु।
छंदशास्त्र के नियमानुसार, "जिस छंद के प्रत्येक चरण में 11 वर्ण हों और उनका क्रम 'त, त, ज, गु, गु' हो, वह इन्द्रवज्रा छंद कहलाता है।" अतः हमारी पहचान शत-प्रतिशत सटीक और सिद्ध है।
2. वर्णिक छंद :
1. इन्द्रवज्रा
परिभाषा: यह 11 वर्णों का सम-वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 2 तगण, 1 जगण और अंत में 2 गुरु होते हैं।
सूत्र - तात जागोगे इन्द्र आए हैं।
उदाहरण 1:
मैं जो नया ग्रंथ विलोकता हूँ।
भाता मुझे सो नव मित्र-सा है॥
उदाहरण 2:
माता यशोदा हरि को जगावैं।
प्यारे उठो भोर भयो सुनावैं॥
2. उपेन्द्रवज्रा
परिभाषा: यह भी 11 वर्णों का सम-वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 1 जगण, 1 तगण, 1 जगण और अंत में 2 गुरु होते हैं।
सूत्र- जीतू जागोगे उपेन्द्र आया है।
उदाहरण 1:
पधारते हैं जब-जब हमारे।
सुहावने वे लगते तिहारे॥
उदाहरण 2:
बड़ा कि छोटा कुछ काम कीजै।
परन्तु पूर्वापर सोच लीजै॥
3. सवैया (मत्तगयन्द और सुमुखी)
सवैया 22 से 26 वर्णों वाले छंदों का समूह है।
क. मत्तगयन्द (मालती) सवैया:
परिभाषा: इसमें 23 वर्ण होते हैं। इसका क्रम 7 भगण और 2 गुरु (भ भ भ भ भ भ भ गु गु) होता है।
सूत्र - मत्तू की 3 भाभी भागेंगी।
उदाहरण 1:
या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवो निधि को सुख, नंद की गाय चराय बिसारौं॥
उदाहरण 2:
धूरि भरे अति शोभित स्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनी बाजति पीरी कछोटी॥
ख. सुमुखी सवैया:
परिभाषा: इसमें भी 23 वर्ण होते हैं। इसका क्रम 7 जगण, 1 लघु और 1 गुरु (ज ज ज ज ज ज ज ल गु) होता है।
सूत्र - अब सुमुखी के 3 जीजा जलेंगे।
उदाहरण 1:
सुखी सब होहुँ कृपालु दयाल, सदा प्रभु के गुन गावत डोलें।
हरो सब पाप अनाथ-सनाथ, कृपा कर मोहन अमृत बोलें॥
उदाहरण 2:
मिलै सुख-सम्पति ज्ञान विज्ञान, सदा रहि सानन्द भानुकुलानी।
भजो रघुनाथ कृपालु गुसाईं, मिटै भव-पीर महा सुख-दानी॥
4. वसंततिलका
परिभाषा: यह 14 वर्णों का सम-वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 1 तगण, 1 भगण, 2 जगण और अंत में 2 गुरु होते हैं।
सूत्र - बसंती बोली- तभी जीजा गूंगे हो गए।
उदाहरण 1:
भूमे! सुरेन्द्र-धनु-तुल्य-विचित्र-वर्णा।
तू है अतीव रमणीय, सुगन्ध-पूर्णा॥
उदाहरण 2:
हे नाथ! तू परम-मङ्गल-रूप ही है।
तू ज्ञान का विपुल-निर्मल-कूप ही है॥
5. मनहर (कवित्त / घनाक्षरी)
परिभाषा: यह एक दंडक वर्णिक छंद है। इसके प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं। 16 और 15 वर्णों पर यति होता है और अंतिम वर्ण गुरु होता है।
उदाहरण 1:
इन्द्र जिमि जम्भ पर, बाडव सुअम्भ पर।
रावन सदम्भ पर, रघुकुल राज है॥ -(भूषण)
उदाहरण 2:
साजि चतुरंग सैन, अंग में उमंग धारि।
सरजा सिवाजी जंग, जीतन चलत हैं॥ -(भूषण)