छायावाद
द्विवेदी युग की कविताएँ बहुत अधिक उपदेशात्मक (Moralistic), कठोर और नियमों से बँधी हुई थीं। जब कवियों का मन उन कठोर नियमों से ऊब गया, तो उन्होंने आज़ादी की साँस ली। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत भावनाओं, कल…


द्विवेदी युग की कविताएँ बहुत अधिक उपदेशात्मक (Moralistic), कठोर और नियमों से बँधी हुई थीं। जब कवियों का मन उन कठोर नियमों से ऊब गया, तो उन्होंने आज़ादी की साँस ली। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत भावनाओं, कल्पना की उड़ान और प्रकृति के सौंदर्य को कविता का विषय बनाया। इसी विद्रोह और सुंदरता के युग को 'छायावाद' कहा गया।
छायावाद की प्रमुख विशेषताएँ :
वैयक्तिकता और आत्मानुभूति ('मैं' शैली):
छायावादी कवियों ने समाज की बात करने के बजाय अपनी निजी भावनाओं, अपने सुख-दुख और अपनी पीड़ा को कविता में पिरोया। यहाँ कवि अपने हृदय की बात पूरी ईमानदारी से कहता है।
कविता का अंश (सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' - 'सरोज स्मृति' से):
"दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ आज जो नहीं कही!"
(अर्थ: निराला जी अपनी बेटी सरोज की मृत्यु पर अपने जीवन के निजी दुख को व्यक्त करते हुए कहते हैं कि मेरा पूरा जीवन ही दुखों की कहानी रहा है।)
प्रकृति का मानवीकरण:
छायावाद की सबसे बड़ी पहचान इसका प्रकृति प्रेम है। यहाँ प्रकृति केवल पेड़-पौधे या पहाड़ नहीं है, बल्कि वह एक जीती-जागती इंसान या प्रेमिका की तरह है जो हँसती है, रोती है और बातें करती है।
कविता का अंश (सुमित्रानंदन पंत):
"छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,
बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?"
अर्थ: पंत जी कहते हैं कि प्रकृति की इस सुंदर और कोमल छाया को छोड़कर, मैं किसी स्त्री के बालों में अपनी आँखें कैसे उलझा लूँ? यानी उन्हें प्रकृति प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं लगता।
नारी के प्रति नवीन और आदरपूर्ण दृष्टिकोण:
रीतिकाल में नारी को केवल 'भोग विलास' की वस्तु माना जाता था, लेकिन छायावाद में नारी को अत्यंत सम्मान दिया गया। उसे माँ, बहन, सहचरी और 'श्रद्धा' देवी का रूप माना गया।
कविता का अंश जयशंकर प्रसाद - 'कामायनी' से :
"नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास-रजत-नग पगतल में।
पीयूष-स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।"
अर्थ: हे नारी! तुम केवल श्रद्धा और विश्वास की मूर्ति हो। तुम जीवन के इस धरातल पर अमृत की नदी के समान बहती रहो।
रहस्यवाद:
प्रकृति की सुंदरता को देखकर कवियों के मन में यह सवाल उठा कि इस सुंदर दुनिया को बनाने वाला वह अज्ञात कौन है? उस अदृश्य ईश्वर के प्रति प्रेम और जिज्ञासा को ही रहस्यवाद कहते हैं।
कविता का अंश महादेवी वर्मा :
"मैं नीर भरी दुख की बदली!
विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना।"
अर्थ: महादेवी जी स्वयं को पानी से भरी दुख की एक बदली मानती हैं, जो इस अनंत आकाश में कहीं भी अपनी जगह नहीं खोज पाती। यह आत्मा का परमात्मा से मिलने का रहस्यमयी दर्द है।
कल्पना की प्रधानता:
इस युग की कविताओं में यथार्थ कम और कल्पना बहुत ज़्यादा है। कवि सपनों की एक अलग ही दुनिया रचता है।
हिंदी साहित्य में छायावाद एक इमारत की तरह है, जो चार महान कवियों पर टिकी है। इसे याद रखने का एक आसान तरीका है: प्रसाद, पंत, निराला, वर्मा।
कवि का नाम छायावाद में स्थान प्रमुख रचनाएँ:
1. जयशंकर प्रसाद छायावाद के ब्रह्मा (प्रवर्तक) कामायनी (महाकाव्य), आँसू, लहर, झरना
2. सुमित्रानंदन पंत छायावाद के विष्णु (प्रकृति के सुकुमार कवि) पल्लव, गुंजन, वीणा, ग्रंथि
3. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' छायावाद के महेश/शिव (विद्रोही कवि) परिमल, अनामिका, राम की शक्ति पूजा
4. महादेवी वर्मा आधुनिक मीरा (वेदना की कवयित्री)
छायावाद के चार प्रमुख स्तंभ :
1.जयशंकर प्रसाद
कामायनी (महाकाव्य) ,आंसू ,लहर ,झरना और चित्रधार
2. सुमित्रानंदन पंत
पल्लव, गुंजन, ग्रंथि, उच्छवास , वीणा
3. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
परिमल, गीतिका, अनामिका, तुलसीदास, सरोज स्मृति
4. महादेवी वर्मा
यामा, निहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत
छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों के अलावा, इस युग के कुछ अन्य महत्वपूर्ण कवि और उनकी प्रमुख रचनाएं इस प्रकार हैं -
5. रामकुमार वर्मा
चित्ररेखा, आकाशगंगा, जोहर, अंजलि, चंद्रकिरण
6 . माखनलाल चतुर्वेदी
हिमकिरीटिनी, हिमतरंगिणी, युग चरण, समर्पण, माता
7 . सुभद्रा कुमारी चौहान
मुकुल, त्रिधारा, झांसी की रानी (प्रसिद्ध कविता)
8 . हरिवंश राय बच्चन (उत्तर-छायावाद / हालावाद)
मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा निमंत्रण, एकांत संगीत
9 . बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'
कुंकुम, रश्मिरेखा, अपलक, , उर्मिला
10 . नरेंद्र शर्मा
शूल फूल, कर्ण फूल, प्रवासी के गीत, पलाश वन
11 . रामधारी सिंह 'दिनकर' (छायावादोत्तर / राष्ट्रीय सांस्कृतिक धारा)
रेणुका, हुंकार, रसवंती, द्वंद्वगीत, सामधेनी
छायावाद ने हिंदी कविता को एक नई उड़ान दी। जो खड़ी बोली द्विवेदी युग में थोड़ी रूखी और नीरस लगती थी, छायावादी कवियों ने उसमें इतनी कोमलता और मिठास भर दी कि वह संगीत की तरह बजने लगी।
यह सबसे सुंदर युग आपको स्पष्ट हो गया? अगर हाँ, तो इसके बाद जब कल्पना टूटती है और ज़मीन की सच्चाई सामने आती है, तो प्रगतिवाद या मार्क्सवाद का जन्म होता है।