जीवन परिचय
वास्तविक नाम: सैय्यद इब्राहिम जन्म: 1548 ईस्वी (कुछ विद्वान 1533 ईस्वी भी मानते हैं) जन्म स्थान: पिहानी हरदोई, उत्तर प्रदेश (कुछ साहित्यकार दिल्ली मानते हैं।) दीक्षा गुरु: गोस्वामी विट्ठलनाथ वल्ल…


संक्षिप्त परिचय :
वास्तविक नाम: सैय्यद इब्राहिम
जन्म: 1548 ईस्वी
(कुछ विद्वान 1533 ईस्वी भी मानते हैं)
जन्म स्थान: पिहानी हरदोई, उत्तर प्रदेश
(कुछ साहित्यकार दिल्ली मानते हैं।)
दीक्षा गुरु: गोस्वामी विट्ठलनाथ वल्लभ संप्रदाय
मृत्यु: 1628 ईस्वी के आस-पास
भाषा: ब्रजभाषा
जीवन वृत्त:
महाकवि रसखान का वास्तविक और मूल नाम सैयद इब्राहिम था। रसखान इनके द्वारा अपनाया गया साहित्यिक उपनाम था, जो इनके काव्य के सर्वथा अनुकूल था, क्योंकि इनका एक-एक सवैया वास्तव में रस की खान है। इनका जन्म दिल्ली के एक अत्यंत संभ्रांत और संपन्न पठान परिवार में हुआ था। इतिहासकार और साहित्यिक मनीषी इनका संबंध दिल्ली के आस-पास के राजवंश या किसी उच्च कुलीन शासकीय परिवार से मानते हैं।
रसखान के जन्म वर्ष को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। प्रामाणिक साक्ष्यों, ऐतिहासिक घटनाओं और मिश्रबंधु विनोद जैसे प्रामाणिक ग्रंथों के सूक्ष्म विश्लेषण के आधार पर इनका जन्म संवत 1590 विक्रमी (सन 1533 ईस्वी) के आस-पास दिल्ली के एक सम्पन्न और संभ्रांत पठान परिवार में हुआ था। मुख्य रूप से शिवसिंह सेंगर अपनी पुस्तक शिवसिंह सरोज में, जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन और आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जैसे इतिहासकार इनका जन्म स्थान पिहानी, हरदोई मानते हैं, किन्तु अधिकांश विद्वान उनके दिल्ली के होने पर सहमत हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार और स्वयं रसखान ने लिखा भी है कि दिल्ली में हुए व्यापक राजनीतिक विप्लव और गदर से क्षुब्ध होकर दिल्ली का परित्याग कर दिया और साक्षात आनंद की भूमि ब्रजमंडल की ओर प्रस्थान कर गए।
प्रेमवाटिका में लिखते हैं -
देखि गदर हित साहबी , दिल्ली नगर मसान
छिनहिं बादसा - बंस की , ठसक छोरि रसखान।।
रसखान के माता-पिता के संबंध में मध्यकालीन और रीतिकालीन साहित्यों में कोई प्रामाणिक या स्पष्ट उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। चूंकि वे एक उच्च कुलीन पठान परिवार से थे, इसलिए उनके पिता दिल्ली के राजदरबार या तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था के एक अत्यंत प्रतिष्ठित और समृद्ध अधिकारी थे। ऐतिहासिक ग्रंथों में उनके माता-पिता के वैयक्तिक नामों का साक्ष्य न मिलना तत्कालीन मुस्लिम समाज से विरक्त होकर पूर्णतः कृष्णमय हो जाने की उनकी वैराग्य भावना को भी रेखांकित करता है।
प्रारंभ में रसखान लौकिक प्रेम में आसक्त थे, परंतु कालांतर में इनका वह लौकिक प्रेम अलौकिक भगवद-प्रेम में परिवर्तित हो गया। श्रीनाथ जी के मंदिर में श्रीकृष्ण के साक्षात अलौकिक रूप के दर्शन पाकर ये सदा के लिए कृष्ण के हो गए। इनकी अनन्य भक्ति से प्रभावित होकर वल्लभ संप्रदाय के प्रधान गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने इन्हें अपना शिष्य स्वीकार किया और इन्हें पुष्टिमार्ग की दीक्षा दी। गुरु के आशीर्वाद से इनका कवित्व पूर्णतः निखर उठा। विट्ठलनाथ जी की शरण में आने के बाद सैयद इब्राहिम पूर्णतः रसखान बन गए, अर्थात वे साक्षात रस की खान हो गए। वे आजीवन गोवर्धन पर्वत के समीप और वृंदावन की कुंजों में रहकर राधा-कृष्ण की युगल छवि का गान करते रहे।
कृष्ण की भक्ति में लीन रहकर अपना संपूर्ण जीवन ब्रज की पावन भूमि पर न्योछावर करने वाले भक्त कवि रसखान का महाप्रयाण सन 1628 ई. के आसपास वृंदावन में हुआ। इनकी समाधि 'महाबन' मथुरा जिले में है। महाकवि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने रसखान जैसे महान मुस्लिम कृष्ण भक्तों की महिमा से अभिभूत होकर ही कहा था कि-
इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिंदू वारिए।
(ईश्वर की भक्ति में डूबे हुए इन मुसलमान भक्तों पर करोड़ों हिंदुओं को भी न्यौछावर किया जा सकता है।)
रसखान का जीवन और उनका काव्य आज भी भारतीय संस्कृति की समन्वयवादी चेतना का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है।
चर्चित वृत्तांत:
सैयद इब्राहिम एक अत्यंत भावुक, रसिक और प्रेमी स्वभाव के व्यक्ति थे। उनके ब्रज आने और कृष्ण भक्त बनने के पीछे दो मुख्य वृत्तांत साहित्य जगत में चर्चित हैं-
पहला वृत्तांत- यह है कि वे दिल्ली के किसी रूपवान बनिया-पुत्र पर अत्यधिक आसक्त थे। लोगों द्वारा इस आसक्ति पर उलाहना देने पर किसी वैष्णव भक्त ने उनसे कहा कि यदि ऐसा ही तीव्र प्रेम तुम भगवान श्रीकृष्ण से करो, तो तुम्हारा कल्याण हो जाए। इसके पश्चात उनके हृदय में अलौकिक प्रेम का अंकुर फूटा।
दूसरा वृत्तांत- और अधिक प्रामाणिक मत यह है कि उन्होंने श्रीमद्भागवत पुराण का फारसी अनुवाद पढ़ा, जिससे उनके भीतर श्रीनाथ जी (श्रीकृष्ण) के प्रति तन्मयता जाग्रत हो गई। दिल्ली की राजनीतिक अशांति और मुगलों के आपसी संघर्ष से खिन्न होकर वे दिल्ली छोड़कर सदा के लिए ब्रजभूमि चले आए।
प्रमुख कृतियाँ :
रसखान की मुख्य रूप से दो रचनाएँ सर्वमान्य और प्रामाणिक मानी जाती हैं-
सुजान रसखान:
यह उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति है। इसमें कवित्त, सवैया, दोहा और सोरठा छंदों में श्रीकृष्ण के बाल-रूप, उनकी रूप-माधुरी, बाँसुरी-प्रेम और गोपियों की विरह-लीला का अत्यंत मर्मस्पर्शी वर्णन है।
प्रेमवाटिका:
इस लघु ग्रंथ की रचना सन 1614 ईस्वी के आसपास मानी जाती है। इसमें दोहा छंद के माध्यम से प्रेम के गूढ़, शास्त्रीय और दार्शनिक स्वरूप का निरूपण किया गया है। इसमें राधा और कृष्ण को प्रेम-उद्यान के माली-मालिन के रूप में चित्रित किया गया है।
इसके अतिरिक्त वर्तमान में विद्वानों द्वारा संपादित रसखान ग्रंथावली में उनके कई स्फुट पद भी प्राप्त होते हैं।
भाषा-शैली और साहित्यिक विशेषताएँ :
रसखान रीतिकाल और भक्तिकाल के संधिकाल के कवि हैं। उनकी काव्य भाषा अत्यंत शुद्ध, परिमार्जित और सरल ब्रजभाषा है। उसमें तत्कालीन कवियों की तरह कृत्रिमता, आडंबर या व्यर्थ का शब्द-चमत्कार नहीं है। उन्होंने मुख्यतः सवैया और कवित्त छंदों का प्रयोग किया। उनके सवैये इतने लोकप्रिय हुए कि बाद के साहित्य में सवैया छंद का नाम ही रसखान पड़ गया। उनके काव्य का मुख्य रस भक्ति और श्रृंगार है, जिसमें वात्सल्य का भी सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
1 . अलौकिक एवं निष्काम प्रेम की पराकाष्ठा :
रसखान का प्रेम लौकिक धरातल से उठकर अलौकिक और आध्यात्मिक ऊँचाइयों को स्पर्श करता है। उनके काव्य में वासना का सर्वथा अभाव है और वहाँ केवल साक्षात आनंद स्वरूप ईश्वर के प्रति सर्वस्व समर्पण की भावना है। वे राधा-कृष्ण को साक्षात प्रेम का प्रतिरूप मानते हैं।
उदाहरण -
कमल तंतु सो छीन अरु, बक ते सेत दिखाय।
अति सूछम सीतल सरस, प्रेम अहै रसराय॥
रसखान प्रेम के दार्शनिक और सूक्ष्म स्वरूप का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि प्रेम का धागा कमल के नाल के सूत से भी अधिक कोमल और बारीक होता है। यह बगुले के पंखों से भी अधिक स्वच्छ, पवित्र और निष्कलंक होता है। प्रेम अत्यंत सूक्ष्म होने के साथ-साथ हृदय को परम शीतलता प्रदान करने वाला और समस्त रसों का राजा है। इसमें लेशमात्र भी संकीर्णता या मलिनता नहीं होती।
2. भक्ति और अनन्य शरणागति भाव :
रसखान पुष्टिमार्ग में दीक्षित थे, इसलिए उनकी भक्ति में सखा भाव, वात्सल्य और माधुर्य का अद्भुत समन्वय मिलता है। उनकी भक्ति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मोक्ष या स्वर्ग की कामना नहीं करते, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के सामीप्य और उनकी शरण में बने रहने को ही जीवन का परम पुरुषार्थ मानते हैं।
उदाहरण-
दिसि अरु बिदिसि सुदेस सब, रोके गगन मँझार।
तौ रसखान विलोकिहैं, कहा स्याम के द्वार॥
भक्त कवि रसखान अपनी अडिग भक्ति और अनन्य निष्ठा की घोषणा करते हुए कहते हैं कि यदि संसार की सभी दिशाएँ, उपदिशाएँ और सुंदर देश मेरे लिए अवरुद्ध कर दिए जाएँ, यहाँ तक कि संपूर्ण आकाश मंडल भी मेरे मार्ग में बाधा बनकर खड़ा हो जाए, तब भी मुझे कोई भय नहीं है। सांसारिक बाधाएँ चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हों, वे मुझे मेरे आराध्य घनश्याम श्रीकृष्ण के द्वार तक पहुँचने और उनके दर्शन करने से कदापि नहीं रोक सकतीं।
3. दार्शनिक रहस्यात्मकता एवं अद्वैत बोध :
रसखान केवल एक भावुक भक्त ही नहीं थे, वरन वे मध्यकालीन संत परंपरा के वेदांत और अद्वैत दर्शन से भी भली-भांति परिचित थे। उनके काव्य में ब्रह्म के सगुण और निर्गुण स्वरूप का शास्त्रीय समन्वय दिखाई देता है। वे उस परम तत्व को प्रेम के वशीभूत होकर सगुण रूप धारण करते हुए दिखाते हैं।
उदाहरण-
खोजत जाहि पुरान पुरिस, बेद बतावत आन।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥
रसखान प्रभु की लीला के दार्शनिक रहस्य को उद्घाटित करते हुए कहते हैं कि जिस परम ब्रह्म को चारों वेद, पुराण और ऋषि-मुनि निरंतर खोजते रहते हैं और जिसके स्वरूप का पार नहीं पाते, वही पूर्ण ब्रह्म जब ब्रज में अवतरित होता है, तो वह भक्त के प्रेम के अधीन हो जाता है। उस जगत के स्वामी को ब्रज की भोली-भाली गोपियाँ थोड़े से छाछ के बदले अपनी उँगलियों पर नचाती हैं। यह जीवात्मा और परमात्मा के बीच के प्रेम का चरम रूप है।
4. साहित्यिक ब्रजभाषा एवं व्याकरणिक शुद्धता :
साहित्यिक विशेषता का एक प्रमुख स्तंभ रसखान का भाषा-शिल्प है। रीतिकाल के अन्य कवियों की भाँति रसखान की ब्रजभाषा में कृत्रिमता, व्यर्थ का शब्द-आडंबर या क्लिष्टता नहीं है। उनकी भाषा में व्याकरणिक शुद्धता के साथ-साथ मुहावरों का स्वाभाविक प्रयोग और अद्भुत माधुर्य गुण विद्यमान है, जो सीधे पाठक के अंतःकरण को मुग्ध करता है।
उदाहरण-
बिना प्रान को देह ज्यों, बिनु जल जैसे मीन।
त्यों रसखान सु स्याम बिनु, भयो हेत अति दीन॥
कवि रसखान ने भाषा की सहजता और उपमा अलंकार के सुंदर प्रयोग द्वारा विरह की विकलता को स्वर दिया है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार प्राणों के और जल के बिना मछली तड़प कर अपने प्राण त्याग देती है, ठीक वैसी ही अत्यंत दयनीयबिना मानव शरीर सर्वथा निर्जीव और व्यर्थ हो जाता है, और मर्मांतक स्थिति साक्षात श्यामसुंदर के बिना उनके अनन्य प्रेमी भक्त की हो गई है। प्रभु से बिछड़कर आत्मा पूरी तरह निष्प्राण हो चुकी है।