जीवन परिचय
नाम ➔ जगन्नाथदास 'रत्नाकर' जन्म सन् ➔ 1866 ई. भाद्रपद शुक्ल पंचमी जन्म स्थान ➔ काशी ,उत्तर प्रदेश पिता ➔ बाबू पुरुषोत्तम दास भाषा ➔ शुद्ध, …


स्मरणीय बिंदु
नाम ➔ जगन्नाथदास 'रत्नाकर'
जन्म सन् ➔ 1866 ई. भाद्रपद शुक्ल पंचमी
जन्म स्थान ➔ काशी ,उत्तर प्रदेश
पिता ➔ बाबू पुरुषोत्तम दास
भाषा ➔ शुद्ध, सरस और प्रौढ़ ब्रजभाषा
मुख्य कृतियाँ ➔ उद्धवशतक, गंगावतरण, हरिश्चन्द्र, हिंडोला
मृत्यु ➔ 21 जून, 1932 ई. हरिद्वार में
जीवन वृत्ति :
ब्रजभाषा के अप्रतिम चितेरे बाबू जगन्नाथदास 'रत्नाकर' का जन्म संवत 1923 वि० सन् 1866 ई० में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को काशी के 'शीवाला घाट' मोहल्ले में एक अत्यंत समृद्ध अग्रवाल वैश्य परिवार में हुआ था। इनके पूर्वज मूलतः पानीपत के निवासी थे, जो बाद में दिल्ली और फिर वहाँ से आकर काशी में बस गए थे। इनके पिता का नाम बाबू पुरुषोत्तमदास था, जो फारसी और उर्दू के प्रकांड विद्वान होने के साथ-साथ हिंदी काव्य के अनन्य प्रेमी थे।
पारिवारिक वातावरण के प्रभाव स्वरूप रत्नाकर जी की प्रारंभिक शिक्षा उर्दू और फारसी भाषा में हुई। इन्होंने मात्र 12 वर्ष की अवस्था में अंग्रेजी पढ़ना प्रारंभ किया। रत्नाकर जी एक अत्यंत मेधावी छात्र थे। इन्होंने क्वींस कॉलेज, बनारस से सन् 1891 ई० में बी.ए. (B.A.) की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात इन्होंने एल-एल.बी. (LL.B.) तथा एम.ए. (M.A. फारसी) का उच्च अध्ययन भी आरंभ किया, किंतु किन्हीं अपरिहार्य कारणों से ये डिग्रियाँ पूर्ण नहीं हो सकीं। रत्नाकर जी को संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी, मराठी, बांग्ला और पंजाबी जैसी अनेक भाषाओं का गहन व्यावहारिक ज्ञान था।
रत्नाकर जी ने प्रारंभ में कुछ समय तक जरदोजी या कपड़ों पर कढ़ाई का काम का व्यवसाय किया। सन् 1900 ई० में वे आवागढ़ रियासत में कोषाध्यक्ष या खजाने के निरीक्षक नियुक्त हुए। तदनंतर, सन् 1902 ई० में वे अयोध्या नरेश महाराज प्रतापनारायण सिंह के निजी सचिव बने। राजा साहब की मृत्यु के उपरांत वे मृत्युपर्यंत महारानी के निजी सचिव के प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत रहे। सन् 1930 ई० में रत्नाकर जी को 'हिंदी साहित्य सम्मेलन' के बीसवें अधिवेशन झांसी का सर्वसम्मति से सभापति चुना गया। 21 जून, सन् 1932 ई० को हरिद्वार की पावन भूमि पर इस महान विभूति का अचानक हृदय गति रुक जाने से स्वर्गवास हो गया।
साहित्यिक परिचय :
रत्नाकर जी बाल्यावस्था में ही अपने पिता के माध्यम से भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र के संपर्क में आ चुके थे। भारतेंदु जी ने बचपन में ही इनकी विलक्षण प्रतिभा को पहचान कर आशीर्वाद दिया था। आधुनिक काल के उन विरले कवियों में से हैं, जिन्होंने खड़ीबोली के युग में भी ब्रजभाषा को अपने काव्य का माध्यम बनाया। वे रीतिकाल की अलंकृत शैली और आधुनिक राष्ट्रीय चेतना के अनूठे संगम थे। प्रारंभ में वे ज़की उपनाम से उर्दू-फ़ारसी में कविताएँ लिखते थे, परंतु बाद में अपने काव्यगुरु सरदार कवि और नवनीत चतुर्वेदी की प्रेरणा से पूर्णतः ब्रजभाषा काव्य की ओर उन्मुख हुए। उन्होंने साहित्य सुधानिधि नामक पत्रिका का कुशल संपादन भी किया। वे आधुनिक काल में ब्रजभाषा के अंतिम और सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं।आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार—"अपने समय के सभी कवियों में, चाहे वे ब्रजभाषा के हों या खड़ीबोली के, काव्य-कला की दृष्टि से रत्नाकर जी का स्थान सर्वोच्च है।"
प्रमुख कृतियाँ :
रत्नाकर जी ने मौलिक और अनुदित दोनों प्रकार के साहित्यों की रचना की है:
1. उद्धवशतक : यह रत्नाकर जी की कीर्ति का मुख्य आधार स्तंभ है। इसमें गोपी-उद्धव संवाद और भ्रमरगीत परंपरा का अत्यंत मार्मिक एवं मनोवैज्ञानिक चित्रण किया गया है।
2. गंगावतरण : यह पौराणिक कथा पर आधारित रोला छंद में रचित एक उत्कृष्ट महाकाव्य है, जिसमें भगीरथ के प्रयास से गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा है।
3. हरिश्चन्द्र : इसमें राजा हरिश्चंद्र के सत्यव्रत और पौराणिक आख्यान का सुंदर वर्णन है।
4. हिंडोला : यह इनका प्रारंभिक लघु काव्य संग्रह है।
5. कलकाशी, शृंगारलहरी, वीराष्टक : इनके अन्य महत्वपूर्ण मुक्तक काव्य हैं।
6. समालोचनादर्श : अंग्रेज़ी कवि अलेक्जेंडर पोप के 'एसे ऑन क्रिटिसिज्म' का रोला छंद में किया गया उत्कृष्ट पद्यानुवाद है।
संपादन एवं समीक्षा :
रत्नाकर जी एक उच्च कोटि के भाष्यकार और संपादक भी थे। इन्होंने महाकवि बिहारी लाल कृत 'बिहारी सतसई' की बिहारी-रत्नाकर नाम से जो प्रामाणिक टीका लिखी, वह हिंदी अनुसंधान जगत का एक बेजोड़ स्तंभ है। इसके अतिरिक्त इन्होंने 'साहित्य सुधानिधि' पत्रिका का संपादन किया तथा 'सूरसागर' के वैज्ञानिक संपादन का कार्य भी प्रारंभ किया था।
साहित्य में स्थान :
जगन्नाथदास 'रत्नाकर' जी को ब्रजभाषा काव्य-परंपरा का अंतिम अमर कवि माना जाता है। खड़ीबोली के प्रभाव के बीच ब्रजभाषा को जो प्रौढ़ता, नवीनता और जीवंतता उन्होंने प्रदान की, वह अद्वितीय है। एक श्रेष्ठ कवि होने के साथ-साथ वे प्राचीन ग्रंथों के कुशल टीकाकार और भाष्यकार भी थे।
रत्नाकर जी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जब उनके समकालीन कवि जैसे मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' ब्रजभाषा छोड़कर खड़ीबोली को अपना रहे थे, तब रत्नाकर जी ने ब्रजभाषा को ही चुना और उसे पराकाष्ठा पर पहुँचाया।