जीवन परिचय
जन्म तिथि : अगस्त 1886 ई श्रावण पूर्णिमा जन्म स्थान : चिरगाँव, जिला- झाँसी उत्तर प्रदेश माता-पिता : श्रीमती काशीबाई एवं सेठ रामचरण कनकने काव्य-गुरु : आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी उ…


संक्षिप्त परिचय :
जन्म तिथि : अगस्त 1886 ई श्रावण पूर्णिमा
जन्म स्थान : चिरगाँव, जिला- झाँसी उत्तर प्रदेश
माता-पिता : श्रीमती काशीबाई एवं
सेठ रामचरण कनकने
काव्य-गुरु : आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी
उपाधि : राष्ट्रकवि महात्मा गांधी द्वारा प्रदत्त,
सम्मान : पद्म भूषण 1954, डी.लिट. आगरा विश्वविद्यालय
निधन तिथि : 12 दिसंबर 1964 ई आयु 78 वर्ष

प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा :
मैथिलीशरण गुप्त का जन्म एक संभ्रांत वैश्य परिवार में हुआ था। उनके पिता सेठ रामचरण कनकने स्वयं एक निष्ठावान रामभक्त और कवि थे, जिनका उपनाम 'कनकने' था। पिता के इसी धार्मिक और साहित्यिक परिवेश का प्रभाव बालक मैथिलीशरण पर भी पड़ा।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा चिरगाँव के स्थानीय विद्यालय में हुई। तदुपरान्त, राजकीय मैक्डोनल स्कूल, झाँसी में उनका प्रवेश कराया गया, किंतु वहाँ उनका मन पारंपरिक स्कूली शिक्षा में नहीं रमा। परिणामस्वरूप, उन्होंने घर पर ही स्वाध्याय के माध्यम से हिंदी, संस्कृत, बँगला, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं का गहन अध्ययन किया। महाकवि भास और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साहित्यों ने उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया।
साहित्यिक यात्रा और द्विवेदी युग का प्रभाव :
गुप्त जी की आरंभिक रचनाएँ कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले पत्र 'वैश्योपकारक' में उपनाम 'रसिकेन्द्र' से छपती थीं। वे ब्रजभाषा में लिखते थे। किंतु जब वे आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आए, तो द्विवेदी जी ने उन्हें दो दिशा-निर्देश दिए-
1. ब्रजभाषा छोड़कर खड़ी बोली में काव्य-लेखन करें।
2. रसिकेन्द्र जैसा सामंतवादी उपनाम छोड़कर अपने मूल नाम से लिखें।
द्विवेदी जी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका सरस्वती में गुप्त जी की खड़ी बोली की कविताएँ प्रकाशित होने लगीं। 1909 ई.में उनका पहला काव्य-ग्रंथ रंग में भंग प्रकाशित हुआ, जिसने उन्हें साहित्यिक पहचान दिलाई।
राष्ट्रकवि की उपाधि और स्वतंत्रता आंदोलन :
वर्ष 1912 में गुप्त जी की कालजयी कृति 'भारत-भारती' का प्रकाशन हुआ। इस ग्रंथ में भारत के गौरवशाली अतीत, दयनीय वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य का खाका खींचा गया था। इसने देश के स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रभक्तों के लिए मंत्र का कार्य किया।
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती,
भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती।
— भारत-भारती
इस अमर कृति की लोकप्रियता से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने वर्ष 1936 में उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से विभूषित किया। गुप्त जी राष्ट्रीय आंदोलनों में सक्रिय रहे और 1941 में व्यक्तिगत सत्याग्रह के अंतर्गत कारागार भी गए। स्वतंत्रता के पश्चात, राष्ट्र के प्रति उनकी सेवाओं को रेखांकित करते हुए उन्हें राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया, जहाँ वे दो बार 1952 से 1964 तक रहे।
प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ :
गुप्त जी ने मौलिक और अनुदित (अनुवादित) दोनों प्रकार का प्रचुर साहित्य रचा। उनकी रचनाओं को विषय-वस्तु के आधार पर वर्गीकृत किया गया है-
क. महाकाव्य
साकेत (1931) : यह उनका सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है, जो लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के विरह और त्याग को केंद्र में रखकर लिखा गया है। रामकथा के उपेक्षित पात्रों को न्याय देना इसका मुख्य उद्देश्य था।
यशोधरा (1932) : भगवान बुद्ध के गृह-त्याग के पश्चात उनकी पत्नी यशोधरा की पीड़ा और आत्मगौरव को इसमें गद्य-पद्य मिश्रित 'चम्पू काव्य' के रूप में उकेरा गया है। जैसे -सखि, वे मुझसे कहकर जाते...
ख. खंडकाव्य :
रंग में भंग (1909): राजपूती आन-बान की कथा।
जयद्रथ-वध (1910): महाभारत के प्रसंग पर आधारित अत्यंत लोकप्रिय खंडकाव्य।
भारत-भारती (1912): राष्ट्रीय चेतना का उद्घोषक ग्रंथ।
पंचवटी (1925): लक्ष्मण के चरित्र और प्रकृति-चित्रण का सुंदर समन्वय।
द्वापर (1936), सिद्धराज, नहुष, अंजली और अर्घ्य, झंकार, कुणाल गीत।
ग. अनुदित रचनाएँ
प्लासी का युद्ध, मेघनाद वध,
वृत्रसंहार बँगला से अनुवाद,
रुबाइयों उमर खै्याम फारसी से अनुवाद
6. गुप्त जी के काव्य की साहित्यिक विशेषताएँ :
मैथिलीशरण गुप्त के साहित्य की शास्त्रीय समीक्षा निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत की जा सकती है-
भाव पक्ष :
राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक पुनर्जागरण: गुप्त जी का काव्य राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत-प्रोत है। वे अतीत के गौरव गान द्वारा वर्तमान को सुदृढ़ करने के पक्षधर थे।
नारी-भावना के प्रति संवेदनशीलता: हिंदी साहित्य में उपेक्षित नारियों (जैसे उर्मिला, यशोधरा, कैकेयी, विष्णुप्रिया) के चरित्र को गरिमामय रूप में प्रस्तुत करना गुप्त जी की सबसे बड़ी देन है।
मानवतावाद और समन्वय की भावना: वे संकीर्णताओं से ऊपर उठकर विश्व-कल्याण की बात करते थे। उनके राम ईश्वर होते हुए भी मानवोचित आचरण करते हैं -संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।
कला पक्ष :
भाषा: उन्होंने परिष्कृत, शुद्ध और व्याकरण सम्मत खड़ी बोली का प्रयोग किया। तत्सम शब्दावली की प्रधानता के बावजूद उनकी भाषा में अद्भुत प्रवाह और सरलता है।
शैली: मुख्यतः महाकाव्य,खंडकाव्य और गीति-शैली का प्रयोग किया है। उपदेशात्मकता उनकी शैली का एक प्रमुख गुण है।
अलंकार एवं छंद: गुप्त जी ने हरिगीतिका, रोला, मात्रिक और वर्णिक छंदों का सहज प्रयोग किया है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा और अनुप्रास उनके प्रिय अलंकार हैं।
7. हिंदी साहित्य में स्थान :
मैथिलीशरण गुप्त केवल एक कवि नहीं, बल्कि अपने युग के प्रतिनिधि रचनाकार थे। उन्होंने ब्रजभाषा के विलासी और श्रृंगारिक परिवेश से हिंदी कविता को निकालकर राष्ट्र-निर्माण, नैतिकता और लोक-कल्याण की ठोस भूमि पर खड़ा किया। 12 दिसंबर 1964 को यह महान ज्योतिपुंज सदा के लिए विलीन हो गया।
हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में: "गुप्त जी वास्तव में सामंजस्यवादी कवि हैं। देश के संक्रमण काल में अतीत और वर्तमान को जोड़ने वाली वे एक सशक्त कड़ी हैं।" हिंदी साहित्य जगत में वे सदा 'दद्दा' के नाम से आदरपूर्वक स्मरण किए जाते रहेंगे।