जीवन परिचय
नाम : जयशंकर प्रसाद जन्म तिथि : 30 जनवरी, 1889 ईस्वी कुछ स्थानों पर 1890 ईस्वी भी उल्लेखित है जन्म स्थान : काशी वाराणसी, उत्तर प्रदेश पिता का नाम : बाबू देवी प्रसाद माता का न…


1. संक्षिप्त परिचय :
नाम : जयशंकर प्रसाद
जन्म तिथि : 30 जनवरी, 1889 ईस्वी
कुछ स्थानों पर 1890 ईस्वी भी उल्लेखित है
जन्म स्थान : काशी वाराणसी, उत्तर प्रदेश
पिता का नाम : बाबू देवी प्रसाद
माता का नाम : मुन्नी देवी
उपाधि : छायावाद के जनक, ब्रह्मा
मुख्य विधाएँ ; काव्य, नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध
महाकाव्य : कामायनी 1936 ई.
भाषा शैली : तत्समप्रधान खड़ीबोली,
प्रतीकात्मक एवं भावपूर्ण शैली
मृत्यु तिथि : 15 नवम्बर, 1937 ईस्वी ,अल्पायु: 48 वर्ष)

पारिवारिक पृष्ठभूमि :
छायावादी युग के आधार स्तंभ जयशंकर प्रसाद जी का जन्म काशी के एक अत्यंत संपन्न और प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ था। इनका परिवार संपूर्ण काशी में सुँघनी साहू के नाम से विख्यात था, क्योंकि यहाँ तंबाकू का व्यापार होता था। इनके पितामह यानी दादा बाबू शिवरत्न साहू परम शिव-भक्त और दानी थे तथा इनके पिता बाबू देवी प्रसाद जी स्वयं एक साहित्य-प्रेमी व्यक्ति थे। इस प्रकार प्रसाद जी को बचपन से ही साहित्यिक माहौल प्राप्त हुआ।
प्रसाद जी का प्रारंभिक जीवन सुखमय था, किंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब ये मात्र 12 वर्ष के थे, तब इनके पिता का देहावसान हो गया। इसके कुछ समय बाद ही माता की मृत्यु भी हो गई। इनकी प्रारंभिक शिक्षा काशी के प्रसिद्ध 'क्वींस कॉलेज' में हुई थी, किंतु पारिवारिक विषम परिस्थितियों के कारण कक्षा आठ के बाद इनकी स्कूली शिक्षा छूट गई।इसके बाद इन्होंने घर पर ही स्वाध्याय के बल पर हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, उर्दू, फारसी और पालि भाषाओं का गहन एवं सारगर्भित अध्ययन किया। बड़े भाई शंभूरत्न जी के निधन के बाद व्यापार और ऋण का पूरा बोझ इनके कंधों पर आ गया। प्रसाद जी ने तीन विवाह किए, परंतु उनकी पत्नियों का असामयिक निधन क्षय रोग के कारण होता रहा। इस तरह इनका संपूर्ण जीवन घोर पारिवारिक त्रासदियों और आर्थिक संघर्षों से घिरा रहा।
भीषण मानसिक चिंताओं, अनवरत कठिन परिश्रम और पारिवारिक शोक के कारण प्रसाद जी स्वयं क्षय रोग (T.B.) से ग्रसित हो गए। चिकित्सा के बावजूद इनका स्वास्थ्य गिरता गया और अंततः 15 नवम्बर, 1937 ईस्वी को मात्र 48 वर्ष की अल्पायु में हिन्दी साहित्य का यह दैदीप्यमान सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया।
3. साहित्यिक परिचय :
जयशंकर प्रसाद जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकार थे। इन्होंने साहित्य के गद्य और पद्य दोनों ही क्षेत्रों में युगांतरकारी परिवर्तन किए।
ब्रजभाषा काल में उनकी रचनाएँ कलाधर के नाम से ही प्रसिद्ध हुईं।
छायावाद के प्रवर्तक : प्रसाद जी को हिन्दी काव्य में 'छायावाद का जनक' माना जाता है। उन्होंने द्विवेदीयुगीन इतिवृत्तात्मकता अर्थात नीरस वर्णन को तोड़कर काव्य में अंतर्मुखी अनुभूतियों, सौंदर्य, प्रेम और दार्शनिकता का समावेश किया।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद : इनके साहित्य विशेषकर नाटकों में भारत के गौरवशाली अतीत, ऐतिहासिक गरिमा और उदात्त राष्ट्रीय चेतना के दर्शन होते हैं।
दार्शनिक दृष्टिकोण : प्रसाद जी पर कश्मीर के 'प्रत्यभिज्ञा दर्शन' (शैव दर्शन) का गहरा प्रभाव था। इनका प्रसिद्ध महाकाव्य 'कामायनी' इसी आनंदवाद के सिद्धांत पर आधारित है, जो मानव को समरसता का संदेश देता है।
रचना संसार :
प्रसाद जी की रचनाओं को विधावार इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है:
( क) काव्य कृतियाँ :
कामायनी (1936) : यह आधुनिक हिन्दी साहित्य का अद्वितीय और कालजयी महाकाव्य है। इसमें 15 सर्ग हैं। यह मानव सभ्यता के विकास की मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक व्याख्या है।
आँसू : यह एक अत्यंत मार्मिक स्मृति-काव्य (विरह काव्य) है, जिसे हिन्दी का 'मेघदूत' भी कहा जाता है।
लहर : यह प्रौढ़ प्रगीतों का संग्रह है, जिसमें प्रकृति सौंदर्य और देशप्रेम की सुंदर कविताएँ हैं।
झरना : इसे छायावाद की प्रथम प्रयोगशाला या 'छायावाद की प्रथम रचना' माना जाता है।
अन्य : चित्रधार -ब्रजभाषा की रचना, कानन-कुसुम, प्रेम-पथिक, महाराणा का महत्त्व।
(ख) नाटक : हिन्दी नाट्यजगत के सम्राट
प्रसाद जी ने भारत के स्वर्णिम इतिहास को आधार बनाकर श्रेष्ठ ऐतिहासिक नाटकों की रचना की I
स्कंदगुप्त, चंद्रगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु, राज्यश्री, विशाख, जनमेजय का नागयज्ञ, एक घूँट (एकांकी)।
( ग) उपन्यास :
कंकाल : इसमें तत्कालीन समाज के यथार्थ और धार्मिक पाखंडों पर तीखा प्रहार है।
तितली : इसमें ग्रामीण जीवन और सुधारवादी दृष्टिकोण को दर्शाया गया है।
इरावती : यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित एक अपूर्ण उपन्यास है, मृत्यु के कारण पूरा नहीं हो सका।
(घ) कहानी संग्रह :
प्रसाद जी हिन्दी के प्रथम आधुनिक कहानीकार माने जाते हैं, जिन्होंने भावप्रधान कहानियाँ लिखीं। कुल 70 से अधिक कहानियाँ 5 संग्रहों में संकलित हैं I
कहानी संग्रह :
आकाशदीप, इन्द्रजाल, प्रतिध्वनि, आँधी, छाया ।
मुख्य कहानियाँ: पुरस्कार, गुंडा, छोटा जादूगर, ममता
( ङ) निबंध :
काव्य और कला तथा अन्य निबंध
इसमें उनके गंभीर साहित्यिक और शास्त्रीय चिंतन का परिचय मिलता है।
5. भाषा-शैली और हिन्दी साहित्य में स्थान :
भाषा : प्रसाद जी की प्रारंभिक भाषा ब्रजभाषा थी, परंतु शीघ्र ही वे खड़ीबोली की ओर उन्मुख हुए। इनकी खड़ीबोली अत्यंत परिष्कृत, संस्कृतनिष्ठ (तत्सम प्रधान) और साहित्यिक है। शब्दों का चयन नाद-सौंदर्य और अर्थ-गांभीर्य से परिपूर्ण है।
शैली : इन्होंने वर्णनात्मक, भावात्मक, आलंकारिक, प्रतीकात्मक और सूक्तिपरक शैलियों का प्रयोग किया है।
साहित्य में स्थान :
जयशंकर प्रसाद जी आधुनिक हिन्दी साहित्य के 'युगप्रवर्तक' साहित्यकार हैं। उन्होंने गद्य को जहाँ ऐतिहासिक प्रौढ़ता दी, वहीं पद्य को कामायनी जैसा रत्न देकर अमर कर दिया। महादेवी वर्मा ने उनके विषय में ठीक ही कहा था कि वे हिमालय की तलहटी में खड़े एक देवदारु वृक्ष के समान अडिग और ऊँचे थे।