झाँसी की रानी की समाधि पर
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक में संकलित कविता झाँसी की रानी की समाधि पर से ली गई हैं। इस कविता की रचयिता प्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान हैं। इन पंक्तियों में कवयित्री ने वीरांगना…


प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक में संकलित कविता झाँसी की रानी की समाधि पर से ली गई हैं। इस कविता की रचयिता प्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान हैं। इन पंक्तियों में कवयित्री ने वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान और उनकी समाधि के गौरव का अत्यंत भावपूर्ण व मार्मिक वर्णन किया है। यह समाधि देशवासियों के लिए स्वतंत्रता और देशभक्ति की प्रेरणा का सबसे बड़ा प्रतीक है।

समाधि का परिचय और रानी का बलिदान:
इस समाधि में छिपी हुई है,
एक राख की ढेरी।
शब्दार्थ-
समाधि ~ स्मारक या मरणोपरांत बना स्मृति स्थल
राख की ढेरी ~ चिता के जलने के बाद बची भस्म
व्याख्या-
कवयित्री कहती हैं कि यह जो छोटी सी समाधि दिखाई दे रही है, इसके भीतर उस महान वीरांगना झाँसी की रानी की राख रखी हुई है। यह राख कोई साधारण राख नहीं है, बल्कि एक महान देशभक्त के अंतिम अवशेष हैं।
जल कर जिसने स्वतंत्रता की,
दिव्य आरती फेरी।।
शब्दार्थ-
दिव्य ~ अलौकिक या पवित्र
आरती फेरी ~ देवी-देवताओं की वंदना करना या स्वयं को समर्पित करना
व्याख्या-
रानी लक्ष्मीबाई ने देश को आजाद कराने के लिए स्वयं को स्वतंत्रता रूपी देवी के हवन कुंड में जलाकर भस्म कर दिया। मानो उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देकर आजादी की एक पवित्र आरती उतारी हो।
यह समाधि, यह लघु समाधि है,
झाँसी की रानी की।
शब्दार्थ-
लघु ~ छोटी
व्याख्या-
आकार में यह समाधि भले ही बहुत छोटी दिखाई देती है, लेकिन यह उस महान वीरांगना झाँसी की रानी की है, जिनका देश के इतिहास में बहुत बड़ा स्थान है।
अंतिम लीलास्थली यही है,
लक्ष्मी मरदानी की।।
शब्दार्थ-
अंतिम लीलास्थली ~ जीवन की आखिरी कर्मभूमि
मरदानी ~ पुरुषों के समान वीरता दिखाने वाली स्त्री
व्याख्या-
यही वह पवित्र स्थान है जहाँ वीर पुरुषों की तरह युद्ध करने वाली महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने जीवन का अंतिम युद्ध लड़ा था और वीरगति को प्राप्त हुई थीं।

वीरांगना का संघर्ष और अमरत्व:
यहीं कहीं पर बिखर गयी वह,
भग्न विजय-माला-सी।
शब्दार्थ-
भग्न ~ टूटी हुई
विजय-माला-सी ~ जीत की माला के समान
व्याख्या-
अंग्रेजों से युद्ध करते हुए वह वीरांगना इसी स्थान पर किसी टूटी हुई जीत की माला के समान बिखर गई थीं। अर्थात् उन्होंने अंतिम साँस तक संघर्ष किया और यहीं अपने प्राण त्याग दिए।
उसके फूल यहाँ संचित हैं,
है यह स्मृति-शाला सी।।
शब्दार्थ-
फूल ~ चिता की राख के बाद बची हुई अस्थियाँ
संचित ~ इकट्ठे
स्मृति-शाला सी ~ यादों के घर के समान
व्याख्या-
इस समाधि के भीतर उस वीरांगना की अस्थियाँ सँभाल कर रखी गई हैं। इसलिए यह समाधि हमारे लिए रानी की यादों के एक पवित्र मंदिर या घर के समान है।
सहे वार पर वार अंत तक,
लड़ी वीर बाला-सी।
शब्दार्थ-
वार ~ प्रहार या हमला
वीर बाला-सी ~ वीर कन्या के समान
व्याख्या-
रानी लक्ष्मीबाई ने युद्ध के मैदान में दुश्मनों के अनगिनत प्रहार अपने शरीर पर सहे। वह जीवन की अंतिम साँस तक एक सच्ची वीर स्त्री की तरह डटकर लड़ती रहीं।
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर,
चमक उठी ज्वाला-सी।।
शब्दार्थ-
आहुति-सी ~ यज्ञ में डाली जाने वाली सामग्री के समान
ज्वाला-सी ~ आग की लपट के समान
व्याख्या-
जिस प्रकार यज्ञ की अग्नि में आहुति डालने से आग और तेज भड़क उठती है, उसी प्रकार देश की आजादी के महायज्ञ में रानी ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, जिससे उनकी कीर्ति आग की लपट के समान चारों ओर चमक उठी।
बढ़ जाता है मान वीर का,
रण में बलि होने से।
शब्दार्थ-
मान ~ सम्मान या इज्जत
रण ~ युद्ध का मैदान
बलि होने से ~ प्राण न्योछावर करने से
व्याख्या-
कवयित्री कहती हैं कि जब कोई सच्चा वीर युद्ध के मैदान में अपने देश के लिए प्राणों का बलिदान देता है, तो संसार में उसका सम्मान और भी अधिक बढ़ जाता है।
मूल्यवती होती सोने की,
भस्म यथा सोने से।।
शब्दार्थ-
मूल्यवती ~ कीमती
भस्म ~ राख या रसायन
यथा ~ जिस प्रकार
व्याख्या-
जिस प्रकार साधारण सोने की तुलना में उस सोने को जलाकर बनाई गई भस्म अधिक कीमती और गुणकारी मानी जाती है, उसी प्रकार बलिदान के बाद वीर की राख भी बहुत मूल्यवान हो जाती है।
रानी से भी अधिक हमें अब,
यह समाधि है प्यारी।
शब्दार्थ-
प्यारी ~ बहुत अच्छी या प्रिय
व्याख्या-
चूँकि इस समाधि में देश के लिए प्राण देने वाली रानी की राख रखी है, इसलिए अब हमें रानी लक्ष्मीबाई से भी अधिक उनकी यह समाधि प्यारी और पूजनीय लगती है।
यहाँ निहित है स्वतंत्रता की,
आशा की चिनगारी।।
शब्दार्थ-
निहित ~ छिपी हुई या रखी हुई
चिनगारी ~ आग का छोटा सा कण
व्याख्या-
इस समाधि के भीतर आजादी पाने की वह उम्मीद और प्रेरणा छिपी हुई है, जो देशवासियों के हृदय में स्वतंत्रता की आग भड़काने के लिए एक चिनगारी का काम करती है।

अन्य समाधियों से तुलना और अमर कीर्ति:
इससे भी सुंदर समाधियाँ,
हम जग में हैं पाते।
शब्दार्थ-
जग ~ संसार या दुनिया
पाते ~ देखते हैं
व्याख्या-
कवयित्री कहती हैं कि इस दुनिया में बहुत से राजा-महाराजाओं की समाधियाँ बनी हैं, जो देखने में रानी की समाधि से कहीं अधिक सुंदर और बड़ी हैं।
उनकी गाथा पर निशीथ में,
क्षुद्र जंतु ही गाते।।
शब्दार्थ-
गाथा ~ कहानी
निशीथ ~ आधी रात
क्षुद्र जंतु ~ छोटे कीड़े-मकोड़े जैसे झींगुर आदि
व्याख्या-
परंतु उन भव्य और सुंदर समाधियों पर आधी रात के समय केवल झींगुर, छिपकली और अन्य छोटे कीड़े-मकोड़े ही आवाज करते हैं। अर्थात् उन राजाओं को कोई आदर के साथ याद नहीं करता।
पर कवियों की अमर गिरा में,
इसकी अमिट कहानी।
शब्दार्थ-
अमर ~ कभी न मरने वाला
गिरा ~ वाणी या भाषा
अमिट ~ जो कभी मिट न सके
व्याख्या-
लेकिन झाँसी की रानी की इस समाधि की कहानी कभी नहीं मिट सकती। सच्चे कवियों की अमर वाणी में रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की कहानी हमेशा गूँजती रहेगी।
स्नेह और श्रद्धा से गाती,
है, वीरों की बानी।।
शब्दार्थ-
स्नेह ~ प्रेम
श्रद्धा ~ आदर या सम्मान
बानी ~ वाणी या बोली
व्याख्या-
देश के सभी वीर पुरुष बहुत ही प्रेम और सम्मान के साथ रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का गुणगान करते हैं और उनकी बहादुरी के गीत गाते हैं।

लोकगीतों में रानी की शौर्य गाथा:
बुंदेले हरबोलों के मुख,
हमने सुनी कहानी।
शब्दार्थ-
बुंदेले हरबोलों ~ बुंदेलखंड के लोकगायक जो राजाओं की वीरता के गीत गाते हैं
मुख ~ मुँह से
व्याख्या-
कवयित्री कहती हैं कि बुंदेलखंड के लोकगायकों के मुँह से हमने रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की वह प्रसिद्ध कहानी कई बार सुनी है।
खूब लड़ी मर्दानी वह थी,
झाँसी वाली रानी।।
शब्दार्थ-
खूब लड़ी ~ बहुत बहादुरी से युद्ध किया
मर्दानी ~ मर्दों जैसी हिम्मत वाली
व्याख्या-
वह कहानी यह है कि झाँसी की वह महान रानी युद्ध के मैदान में पुरुषों के समान असीम साहस और पराक्रम के साथ दुश्मनों से लड़ी थी।
यह समाधि, यह चिर समाधि है,
झाँसी की रानी की ।
शब्दार्थ-
चिर समाधि ~ हमेशा रहने वाली या अमर समाधि
व्याख्या-
अंत में कवयित्री फिर याद दिलाती हैं कि यह समाधि भले ही छोटी हो, लेकिन यह झाँसी की रानी की अमर समाधि है जो युगों-युगों तक लोगों को प्रेरणा देती रहेगी।
अंतिम लीलास्थली यही है,
लक्ष्मी मरदानी की।।
शब्दार्थ-
अंतिम लीलास्थली ~ आखिरी कार्यक्षेत्र या युद्धभूमि
व्याख्या-
वीर पुरुषों की तरह साहस दिखाने वाली महारानी लक्ष्मीबाई के जीवन का यह अंतिम कार्यक्षेत्र है, जहाँ उन्होंने अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया था।
काव्य सौंदर्य:
* रस: पूरी कविता में वीर रस की प्रधानता है, जो पढ़ने वाले के भीतर जोश और देशभक्ति जगाता है।
* छंद: यह कविता मात्रिक छंद में लिखी गई है, जिससे इसे एक प्रवाह के साथ गाया जा सकता है।
* अलंकार: इस कविता में उपमा अलंकार (विजय-माला-सी, वीर बाला-सी, ज्वाला-सी) और अनुप्रास अलंकार का बहुत ही सुंदर प्रयोग हुआ है।
* भाषा: खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग किया गया है, जो अत्यंत सरल, ओजपूर्ण और सीधे दिल में उतरने वाली है।
* गुण: इस काव्य में ओज गुण विद्यमान है, जो मन में उत्साह का संचार करता है।
कविता का केंद्रीय संदेश:
इस कविता का मूल संदेश देशप्रेम और बलिदान की भावना को जागृत करना है। कवयित्री बताना चाहती हैं कि अपने स्वार्थ के लिए जीने वालों को दुनिया भुला देती है। परंतु जो लोग देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं, वे हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं। उनकी छोटी सी समाधि भी भव्य महलों से अधिक पूजनीय हो जाती है। हमें भी रानी लक्ष्मीबाई की तरह निडर होकर अपने देश की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।