दोहावली
प्रस्तुत पंक्तियाँ यूपी बोर्ड कक्षा 11 की हिंदी पाठ्यपुस्तक के पद्य-खंड में संकलित गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ''दोहावली'' पाठ से ली गई हैं। दोहावली के इन दोहों में तुलसीदास जी ने जीवन जीने की…


प्रस्तुत पंक्तियाँ यूपी बोर्ड कक्षा 11 की हिंदी पाठ्यपुस्तक के पद्य-खंड में संकलित गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित ''दोहावली'' पाठ से ली गई हैं।
दोहावली के इन दोहों में तुलसीदास जी ने जीवन जीने की सच्ची कला और व्यावहारिक ज्ञान का संदेश दिया है। वे बताते हैं कि संसार स्वार्थी है, अतः सच्चा प्रेम केवल ईश्वर से करना चाहिए। इसके साथ ही, उन्होंने चातक पक्षी के माध्यम से स्वाभिमान, बगुले के माध्यम से दिखावे से बचने, और सूर्य के माध्यम से एक आदर्श राजा के गुणों को समझाया है। अंत में यह संदेश दिया गया है कि जहाँ मूर्खों की कद्र होती हो, वहाँ समझदार व्यक्ति को शांत ही रहना चाहिए।

हरो चरहिं, तापहिं बरतः फरे पसारहिं हाथ।
शब्दार्थ–
हरो – हरा-भरा
चरहिं – चरते हैं (पशु)
तापहिं – तापते हैं या जलाते हैं
बरत – जलते हुए (सूखने पर)
फरे – फलने पर
पसारहिं – फैलाते हैं
व्याख्या: जब पेड़ हरा-भरा होता है तो लोग उसके पत्ते पशुओं को चराते हैं, जब वह सूख कर जलने लगता है तो लोग उससे आग तापते हैं, और जब उसमें फल लग जाते हैं तो लोग फल तोड़ने के लिए उसके आगे हाथ फैलाते हैं।
तुलसी स्वारथ मीत सब, परमारथ रघुनाथ।।1।।
शब्दार्थ–
स्वारथ – स्वार्थ या मतलब
मीत – मित्र
परमारथ – परमार्थ या बिना स्वार्थ के
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि इसी पेड़ की तरह इस संसार में सभी लोग केवल अपने मतलब के साथी हैं, बिना स्वार्थ के सच्चा प्रेम करने वाले तो केवल भगवान श्री रघुनाथ जी ही हैं।
मान राखिबो, माँगिबो, पियसों नित नव नेहु।
शब्दार्थ–
मान – सम्मान
पियसों – प्रियतम से
नित – हमेशा
नव – नया
नेहु – प्रेम
व्याख्या: अपना आत्मसम्मान भी बनाए रखना है, अपने प्रियतम से कुछ माँगना भी है, और अपने प्रियतम से हमेशा नया और गहरा प्रेम भी बनाए रखना है।
तुलसी तीनिउ तब फबैं, जौ चातक मत लेहु।।2।।
कठिन शब्द: शब्दार्थ–
तीनिउ – तीनों बातें
फबैं – शोभा देती हैं या संभव हैं
चातक मत – पपीहे का नियम या सिद्धांत
लेहु – अपनाओ
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि ये तीनों बातें एक साथ तभी संभव हैं और तभी शोभा देती हैं, जब आप चातक पक्षी (पपीहे) के सिद्धांत को अपना लें, जो केवल स्वाति नक्षत्र की बूंद के लिए ही बादलों से प्रेम करता है और मांगता है।
नहिं जाचत नहिं संग्रहीं, सीस नाइ नहिं लेइ।
शब्दार्थ–
जाचत – मांगता है
संग्रहीं – इकट्ठा करता है
सीस नाइ – सिर झुका कर
व्याख्या: चातक पक्षी की विशेषता यह है कि वह बादलों से कभी मुंह खोलकर मांगता नहीं है, पानी को इकट्ठा करके नहीं रखता है, और न ही सिर झुकाकर नीचे गिरा हुआ पानी पीता है।
ऐसे मानी माँगनेहिं को बारिद बिन देइ।।3।।
शब्दार्थ–
मानी – स्वाभिमानी
माँगनेहिं – मांगने वाले को
बारिद – बादल
देइ – दे सकता है
व्याख्या: ऐसे स्वाभिमानी मांगने वाले (चातक) को भला बादलों के अलावा और कौन पानी दे सकता है, क्योंकि बादल भी बिना मांगे ही बरस कर उसकी प्यास बुझाते हैं।

चरन चोंच लोचन रँगौ, चलौ मराली चाल।
शब्दार्थ–
लोचन – आँखें
रँगौ – रंग लो
मराली – हंसनी जैसी
व्याख्या: कोई बगुला चाहे अपने पैरों, चोंच और आँखों को लाल रंग ले, और बिल्कुल हंसनी के जैसी चाल चलने लगे।
छीर-नीर बिबरन समय बक उघरत तेहि काल।।4।।
शब्दार्थ–
छीर-नीर – दूध और पानी
बिबरन – अलग-अलग करने का
बक – बगुला
उघरत – पोल खुल जाती है
व्याख्या: लेकिन जब दूध और पानी को अलग-अलग करने का समय आता है, तब उस समय उस बगुले की असलियत सबके सामने आ ही जाती है, क्योंकि यह गुण केवल हंस में होता है बगुले में नहीं।
आपु आपु कहँ सब भलो, आने कहँ कोइ कोइ।
शब्दार्थ–
आपु आपु कहँ – अपने-अपने लिए
भलो – अच्छा
आने कहँ – दूसरों के लिए
व्याख्या: इस संसार में हर व्यक्ति केवल अपने लिए ही अच्छा सोचता है, बहुत कम लोग होते हैं जो दूसरों की भलाई के बारे में सोचते हैं।
तुलसी सब कहँ जो भलो, सुजन सराहिय सोइ।।5।।
शब्दार्थ–
सुजन – सज्जन लोग
सराहिय – सराहना करते हैं या तारीफ करते हैं
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति सबके लिए अच्छा सोचता है और सबकी भलाई करता है, सज्जन लोग हमेशा उसी व्यक्ति की तारीफ करते हैं।
ग्रह, भेषज, जल, पवन, पट, पाइ कुजोग सुजोग।
शब्दार्थ–
ग्रह – नक्षत्र
भेषज – दवाई
पट – कपड़े
कुजोग – बुरी संगति या बुरा समय
सुजोग – अच्छी संगति या अच्छा समय
व्याख्या: ग्रह, दवाइयां, पानी, हवा और कपड़े, ये सभी बुरी संगति या बुरे समय में पड़ने पर बुरे हो जाते हैं, और अच्छी संगति में पड़ने पर अच्छे हो जाते हैं।
होइ कुबस्तु सुबस्तु जग, लखहिं सुलच्छन लोग।।6।।
शब्दार्थ–
कुबस्तु – बुरी वस्तु
सुबस्तु – अच्छी वस्तु
लखहिं – पहचानते हैं
सुलच्छन – अच्छे लक्षण वाले या समझदार
व्याख्या: इस प्रकार संसार में संगति के प्रभाव से चीजें अच्छी या बुरी बन जाती हैं, इस बात को केवल समझदार और अच्छे लक्षण वाले लोग ही पहचान पाते हैं।

जो सुनि समुझि अनीतिरतः जागत रहै जु सोइ।
शब्दार्थ–
अनीतिरत – अन्याय या गलत रास्ते पर चलने वाला
जागत रहै जु सोइ – जो जागते हुए भी सो रहा हो
व्याख्या: जो व्यक्ति सब कुछ सुनकर और समझकर भी गलत रास्तों पर चलता रहता है, वह उस इंसान के समान है जो जागते हुए भी सो रहा है।
उपदेसिबो जगाइबो तुलसी उचित न होइ।।7।।
शब्दार्थ–
उपदेसिबो – उपदेश देना
जगाइबो – जगाना
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति को जो जानबूझकर अनजान बना हुआ है, उसे कोई उपदेश देना या सही रास्ता दिखाने की कोशिश करना बिल्कुल बेकार और अनुचित है।
बरषत हरषत लोग सब, करषत लखै न कोइ।
शब्दार्थ–
बरषत – बरसते समय
हरषत – खुश होते हैं
करषत – खींचते समय (पानी सोखते समय)
लखै – देखता है
व्याख्या: जब बादल बारिश करते हैं तो सभी लोग बहुत खुश होते हैं, लेकिन जब सूरज अपनी किरणों से चुपचाप पानी सोखता है, तब उसे कोई नहीं देखता।
तुलसी प्रजा-सुभाग तें भूप भानु सो होइ।।8।।
शब्दार्थ–
प्रजा-सुभाग तें – प्रजा के अच्छे भाग्य से
भूप – राजा
भानु सो – सूर्य के समान
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि प्रजा के अच्छे भाग्य से ही उसे सूर्य के समान ऐसा राजा मिलता है, जो चुपचाप कर (टैक्स) वसूलता है लेकिन उसे प्रजा की भलाई के लिए बारिश की तरह खुलकर खर्च करता है।
मंत्री, गुरु अरु बैद जो प्रिय बोलहिं भय आस।
शब्दार्थ–
अरु – और
बैद – वैद्य या डॉक्टर
प्रिय बोलहिं – मीठा बोलते हैं (चापलूसी करते हैं)
भय – डर
आस – लालच या आशा
व्याख्या: यदि किसी राज्य का मंत्री, किसी का गुरु और किसी का वैद्य (डॉक्टर) डर के कारण या किसी लालच में आकर सिर्फ मीठी बातें बोलने लगें और सच्ची बात न बताएं।
राज, धरम, तन तीनि कर होइ बेगिही नास।।9।।
शब्दार्थ–
तन – शरीर
बेगिही – बहुत जल्दी
नास – नाश या विनाश
व्याख्या: तो मंत्री की चापलूसी से राज्य का, गुरु की चापलूसी से धर्म का और वैद्य की चापलूसी से शरीर का बहुत जल्दी ही सर्वनाश हो जाता है।
तुलसी पावस के समय धरी कोकिलन मौन।
शब्दार्थ–
पावस – वर्षा ऋतु या बरसात
मौन – चुप्पी
व्याख्या: तुलसीदास जी कहते हैं कि बरसात का मौसम आने पर कोयलों ने अपनी मीठी आवाज बंद कर दी है और चुप्पी साध ली है।
अब तौ दादुर बोलिहैं, हमैं पूछिहैं कौन ?
शब्दार्थ–
दादुर – मेंढक
पूछिहैं – पूछेगा
व्याख्या: कोयलें सोचती हैं कि अब इस बारिश में तो सिर्फ मेंढक ही टर्र-टर्र करके शोर मचाएंगे, ऐसे शोरगुल में हमारी मीठी आवाज को भला कौन सुनेगा और हमें कौन पूछेगा। अर्थात जहाँ मूर्खों का बोलबाला हो, वहाँ समझदार इंसान का चुप रहना ही बेहतर है।
5. काव्य सौंदर्य और मूल भाव:
* रस: पदों में मुख्य रूप से शांत रस की प्रधानता है, जो ज्ञान और वैराग्य का भाव जगाता है।
* छंद: यह संपूर्ण पाठ दोहा छंद में लिखा गया है, जो हिंदी साहित्य का एक अत्यंत लोकप्रिय मात्रिक छंद है।
* अलंकार: अनुप्रास, दृष्टांत, अन्योक्ति (कोयल और मेंढक का उदाहरण), और उपमा अलंकारों का बहुत ही सटीक प्रयोग हुआ है।
कविता का सारांश:
तुलसीदास जी द्वारा रचित दोहावली के इन दोहों में नीति, भक्ति और सांसारिक व्यवहार की बहुत गहरी बातें बताई गई हैं। पहले दोहे में बताया गया है कि संसार के लोग पेड़ से केवल अपने स्वार्थ के लिए जुड़े रहते हैं, सच्चा हितैषी तो केवल भगवान है। फिर चातक पक्षी का उदाहरण देकर बताया गया है कि स्वाभिमान और सच्चा प्रेम कैसे निभाया जाता है, जो बिना मांगे केवल स्वाति नक्षत्र की बूंद के लिए ही तरसता है। आगे बताया गया है कि बाहरी दिखावा करने वाले बगुले की असलियत दूध और पानी अलग करते समय सामने आ ही जाती है, क्योंकि गुण छिपाये नहीं छिपते।
तुलसीदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति बिना स्वार्थ के सबकी भलाई सोचता है, वही सच्चा सज्जन है। संसार में संगति का बहुत बड़ा असर होता है, अच्छी संगति से बुरी चीजें भी अच्छी हो जाती हैं। जो व्यक्ति जानबूझकर गलत रास्ते पर चलता है, उसे समझाना बेकार है। इसके बाद एक अच्छे राजा की तुलना सूर्य से की गई है, जो बिना बताए टैक्स लेता है लेकिन बारिश की तरह खुलकर प्रजा पर लुटा देता है।
अंत में यह चेतावनी दी गई है कि यदि मंत्री, गुरु और वैद्य डर या लालच में आकर केवल मीठी-मीठी बातें करने लगें, तो राज्य, धर्म और शरीर का बहुत जल्दी नाश हो जाता है। सबसे आखिरी दोहे में कोयल और मेंढक के उदाहरण से यह समझाया गया है कि जहाँ मूर्खों और चापलूसों का शोर हो, वहाँ समझदार इंसान को चुपचाप किनारे हो जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ उसकी सही बात की कोई कद्र नहीं होती।