द्वितीयः पाठः आरुणि-श्वेतकेतु-संवादः
संस्कृत पंक्ति: श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यम्। शब्दार्थ: श्वेतकेतुर्हारुणेय = आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु; आस = था; तं ह = निश्चय ही उससे; पितोवाच = पिता ने कहा; श्वेतकेतो …


संस्कृत पंक्ति: श्वेतकेतुर्हारुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यम्।
शब्दार्थ: श्वेतकेतुर्हारुणेय = आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु; आस = था; तं ह = निश्चय ही उससे; पितोवाच = पिता ने कहा; श्वेतकेतो = हे श्वेतकेतु!; वस = पालन करो; ब्रह्मचर्यम् = ब्रह्मचर्य का।
अनुवाद: आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु था। उससे उसके पिता ने कहा - हे श्वेतकेतु! तुम ब्रह्मचर्य का पालन करो अर्थात गुरुकुल जाकर विद्या ग्रहण करो।
संस्कृत पंक्ति: न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति।
शब्दार्थ: न वै = निश्चय ही नहीं; सोम्यास्मत्कुलीनो = हे सौम्य! हमारे कुल में उत्पन्न हुआ; अननूच्य = बिना पढ़े; ब्रह्मबन्धुरिव = नाममात्र के ब्राह्मण के समान; भवतीति = होता है।
अनुवाद: हे सौम्य! हमारे कुल में उत्पन्न कोई भी व्यक्ति वेदों का अध्ययन किए बिना केवल नाममात्र का ब्राह्मण नहीं होता है।
संस्कृत पंक्ति: स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान्वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः।
शब्दार्थ: स ह = वह निश्चय ही; द्वादशवर्ष = बारह वर्ष की आयु में; उपेत्य = जाकर; चतुर्विंशतिवर्षः = चौबीस वर्ष की आयु तक; सर्वान्वेदानधीत्य = सभी वेदों को पढ़कर; महामना = स्वयं को बड़ा मानने वाला; अनूचानमानी = स्वयं को बहुत विद्वान मानने वाला; स्तब्ध = घमंडी होकर; एयाय = लौट आया; यन्नु = जो तुम; सोम्येदं = हे सौम्य! इस प्रकार; स्तब्धोऽस्युत = घमंडी हो गए हो; तम् = उस; आदेशम् = आदेश के विषय में; अप्राक्ष्यः = पूछा है?
अनुवाद: वह बारह वर्ष की आयु में गुरु के पास जाकर, चौबीस वर्ष की आयु तक सभी वेदों का अध्ययन करके, स्वयं को बहुत बड़ा और विद्वान मानता हुआ घमंड में भरकर घर लौट आया। उससे पिता ने कहा - हे श्वेतकेतु! हे सौम्य! तुम जो इस प्रकार स्वयं को बड़ा और विद्वान मानने वाले घमंडी हो गए हो, तो क्या तुमने गुरु से उस आदेश या ब्रह्मज्ञान के विषय में पूछा है?
संस्कृत पंक्ति: येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति। कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति।
शब्दार्थ: येनाश्रुतं = जिसके द्वारा न सुना हुआ; श्रुतं भवत्यमतं = सुना हुआ हो जाता है और जिसका मनन नहीं किया गया है; मतमविज्ञातं = वह मनन किया हुआ हो जाता है और जो नहीं जाना गया है; विज्ञातमिति = जाना हुआ हो जाता है; कथं नु = कैसे निश्चय ही; भगवः = हे भगवन्; स = वह; आदेशो भवतीति = आदेश होता है।
अनुवाद: पिता ने कहा - जिसके द्वारा न सुना हुआ भी सुन लिया जाता है, जिसका मनन नहीं किया गया वह भी मनन कर लिया जाता है और जो न जाना हुआ हो वह भी जान लिया जाता है। इस पर श्वेतकेतु ने पूछा - हे भगवन्! वह आदेश या ज्ञान कैसा होता है?
संस्कृत पंक्ति: यथासोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्।
शब्दार्थ: यथा = जिस प्रकार; सोम्यैकेन = हे सौम्य! एक; मृत्पिण्डेन = मिट्टी के ढेले से; सर्वं = सभी; मृन्मयं = मिट्टी से बनी वस्तुएँ; विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं (स्याद्+वाचा+आरम्भणं) = जान ली जाती हैं, वाणी का व्यवहारहै; विकारो नामधेयं = रूप परिवर्तन केवल नाम है; मृत्तिकेत्येव (मृत्तिका+इति+एव) = मिट्टी ही; सत्यम् = सत्य है।
अनुवाद: पिता ने उत्तर दिया- हे सौम्य! जिस प्रकार मिट्टी के एक ढेले को जान लेने से मिट्टी से बनी सभी वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है, उनका रूप परिवर्तन केवल वाणी का व्यवहार और नाम मात्र है, सत्य तो केवल मिट्टी ही है।
संस्कृत पंक्ति: यथा सौम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं लोहमित्येव सत्यम्।
शब्दार्थ: लोहमणिना = लोहे के टुकड़े से; लोहमयं = लोहे से बनी वस्तुएँ; लोहमित्येव (लोहम्+इति+एव) = लोहा ही।
अनुवाद: हे सौम्य! जिस प्रकार एक लोहमणि को जान लेने से लोहे से बनी सभी वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है; उनका रूप परिवर्तन केवल वाणी का व्यवहार और नाम मात्र है, सत्य तो केवल लोहा ही है।
संस्कृत पंक्ति: यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं कृष्णायसमित्येव सत्यमेवं सोम्य स आदेशो भवतीति।
शब्दार्थ: नखनिकृन्तनेन = नाखून काटने वाले यंत्र या नहनी से; कार्ष्णायसं = काले लोहे से बनी वस्तुएँ; कृष्णायसमित्येव = काला लोहा ही; सत्यमेवं (सत्यम्+एवं) = सत्य है, इसी प्रकार।
अनुवाद: हे सौम्य! जिस प्रकार एक नाखून काटने वाले यंत्र को जान लेने से काले लोहे से बनी सभी वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है; उनका रूप परिवर्तन केवल वाणी का व्यवहार और नाम मात्र है, सत्य तो केवल काला लोहा ही है। हे सौम्य! वह आदेश या ब्रह्मज्ञान भी ऐसा ही होता है।
संस्कृत पंक्ति: न वै नूनं भगवन्तस्त एतदवेदिषुर्यद्ध्येतदवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवां स्त्वेवमेतद् ब्रवीत्विति तथा सोम्येति होवाच।
शब्दार्थ: नूनं = अवश्य; भगवन्तस्त = मेरे गुरुजन; एतदवेदिषुर्यद्ध्येतदवेदिष्यन् = इस बात को जानते थे, क्योंकि यदि वे इसे जानते होते; कथं मे नावक्ष्यन्निति = तो मुझे क्यों नहीं बताते?; भगवां स्त्वेवमेतद् (भगवान्+तु+एवम्+एतत्) = आप भगवान ही मुझे यह; ब्रवीत्विति = बतायें; तथा = ठीक है; होवाच = कहा।
अनुवाद: श्वेतकेतु ने कहा - निश्चय ही वे आदरणीय मेरे गुरुजन इस रहस्य को नहीं जानते थे, क्योंकि यदि वे इसे जानते होते, तो मुझे क्यों नहीं बताते? अतः हे भगवन् या पूज्य पिता! आप ही मुझे यह बताएँ। इस पर पिता ने कहा - हे सौम्य! ठीक है मैं तुम्हें बताता हूँ।