द्वितीया: पाठ: प्रश्नोत्तर
I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए- 1. श्वेतकेतु: क: आसीत् ? अथवा श्वेतकेतु: कस्य पुत्र: ? उत्तर: श्वेतकेतु: आरुणे: पुत्र: आसीत्। 2. द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्ष: क: सर्वान्…


I. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए-
1. श्वेतकेतु: क: आसीत् ? अथवा श्वेतकेतु: कस्य पुत्र: ?
उत्तर: श्वेतकेतु: आरुणे: पुत्र: आसीत्।
2. द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्ष: क: सर्वान् वेदान् अधीतवान् ?
उत्तर: द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्ष: श्वेतकेतु: सर्वान् वेदान् अधीतवान्।
3. क: अनूचानमानी अभवत् ?
उत्तर: श्वेतकेतु: अनूचानमानी अभवत्।
4. आरुणि: क: आसीत् ?
उत्तर: आरुणि: श्वेतकेतो: पिता आसीत्।
5. आरुणि: श्वेतकेतुं किम् उपदिशति ?
उत्तर: आरुणि: श्वेतकेतुं ब्रह्मचर्यस्य पालनं कर्तुम् उपदिशति।
II. अनुवादात्मक प्रश्न :
निम्नलिखित संस्कृत गद्यांशों का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए -
सन्दर्भ: प्रस्तुत सभी गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक के द्वितीय: पाठ: आरुणि-श्वेतकेतु-संवाद: से अवतरित हैं। यह पाठ छान्दोग्य उपनिषद् से संकलित किया गया है।
क. स ह द्वादशवर्ष ........................... तमादेशमप्राक्ष्य:।
अनुवाद: वह श्वेतकेतु बारह वर्ष की आयु में गुरु के पास जाकर, चौबीस वर्ष की आयु तक सभी वेदों का अध्ययन करके, स्वयं को बहुत बड़ा और विद्वान मानता हुआ घमंड में भरकर घर लौट आया। उस पुत्र से पिता ने कहा - हे सौम्य श्वेतकेतु! तुम जो इस प्रकार स्वयं को बड़ा और विद्वान मानने वाले घमंडी हो गए हो, तो क्या तुमने गुरु से उस आदेश या ब्रह्मज्ञान के विषय में पूछा है?
ख. येनाश्रुतम् ........................... मृत्तिकेत्येव सत्यम्।
अनुवाद: पिता ने कहा - जिसके द्वारा न सुना हुआ भी सुन लिया जाता है, जिसका मनन नहीं किया गया वह भी मनन कर लिया जाता है और जो न जाना हुआ हो वह भी जान लिया जाता है। इस पर श्वेतकेतु ने पूछा - हे भगवन्! वह आदेश कैसा होता है? पिता ने उत्तर दिया - हे सौम्य! जिस प्रकार मिट्टी के एक ढेले को जान लेने से मिट्टी से बनी सभी वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है; उनका रूप परिवर्तन केवल वाणी का व्यवहार और नाम मात्र है, सत्य तो केवल मिट्टी ही है।
ग. यथा सोम्यैकेन ........................... स आदेशो भवतीति।।
अनुवाद: हे सौम्य! जिस प्रकार एक नाखून काटने वाले यंत्र या नहनी को जान लेने से काले लोहे से बनी सभी वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है; उनका रूप परिवर्तन केवल वाणी का व्यवहार और नाम मात्र है, सत्य तो केवल काला लोहा ही है। हे सौम्य! वह आदेश या ब्रह्मज्ञान भी ऐसा ही होता है।
घ. यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन ........................... तथा सोम्येति होवाच।
अनुवाद: हे सौम्य! जिस प्रकार एक नाखून काटने वाले यंत्र को जान लेने से काले लोहे से बनी सभी वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है; उनका रूप परिवर्तन केवल वाणी का व्यवहार और नाम मात्र है, सत्य तो केवल काला लोहा ही है। हे सौम्य! वह आदेश भी ऐसा ही होता है। यह सुनकर श्वेतकेतु ने कहा - निश्चय ही वे आदरणीय मेरे गुरुजन इस रहस्य को नहीं जानते थे, क्योंकि यदि वे इसे जानते होते, तो मुझे क्यों नहीं बताते? अतः हे भगवन्! आप ही मुझे यह बताएँ। इस पर पिता ने कहा - हे सौम्य! ठीक है।
III. अनुभूति और अभिव्यक्ति :
छान्दोग्य उपनिषद् के पठित अंशों के आधार पर सत्य की परिभाषा दीजिए।
उत्तर: छान्दोग्य उपनिषद् के इस पाठ के अनुसार, सत्य वह मूल तत्त्व या उपादान कारण है, जिससे विभिन्न वस्तुएं उत्पन्न होती हैं। जैसे मिट्टी से बनी सभी वस्तुओं में केवल मिट्टी ही सत्य है और लोहे से बनी वस्तुओं में केवल लोहा ही सत्य है। उनके परिवर्तित रूप और नाम केवल वाणी के व्यवहार के लिए होते हैं। अतः जो मूल आधार है, वही एकमात्र शाश्वत सत्य है, जबकि उससे बनने वाले विकार या रूप असत्य और क्षणिक हैं।