धनुष–भंग
धनुष भंग शीर्षक के रचयिता महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी हैं। उन्होंने इस कथा प्रसंग को अपने अमर महाकाव्य रामचरितमानस के बालकांड से उद्धृत किया है। इस प्रसंग में जनकपुरी के स्वयंवर में मर्यादा पुरुषोत्तम…


धनुष भंग शीर्षक के रचयिता महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी हैं। उन्होंने इस कथा प्रसंग को अपने अमर महाकाव्य रामचरितमानस के बालकांड से उद्धृत किया है। इस प्रसंग में जनकपुरी के स्वयंवर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, जगतजननी माता सीता और पराक्रमी लक्ष्मण जी के विषय में लिखा गया है। विशेष रूप से इसमें उस अलौकिक क्षण का वर्णन है जब श्री राम गुरु विश्वामित्र की आज्ञा पाकर शिव जी के अत्यंत भारी पिनाक धनुष को तोड़ने के लिए मंच से उठते हैं और सीता जी के मन की व्याकुलता, राजाओं के झूठे अहंकार का नाश तथा प्रकृति में छाए हुए हर्षोल्लास को दर्शाया गया है।
कवि तुलसीदास जी इसके माध्यम से यह प्रतिपादित करना चाहते हैं कि जब समाज में सच्चे ज्ञान, शील और विनम्रता का उदय होता है, तब अज्ञान और अभिमान का अंधकार स्वतः समाप्त हो जाता है। उन्होंने श्री राम को सूर्य के समान और सभा में उपस्थित अभिमानी राजाओं को तारों के समान दिखाकर यह सिद्ध किया है कि ईश्वर की इच्छा और भक्ति के सामने सांसारिक बल अत्यंत तुच्छ है। कवि दिखाना चाहते हैं कि जो कार्य बड़े-बड़े अहंकारी राजा और राक्षस राज रावण भी नहीं कर सके, उसे श्री राम ने अपनी सहज कोमलता और गुरु निष्ठा के बल पर क्षण भर में कर दिखाया। इसके अतिरिक्त कवि ने सीता जी के सात्विक प्रेम की पवित्रता को भी उजागर किया है, जहाँ संसार की समस्त दैवीय शक्तियाँ अंततः सच्चे प्रेम को सफल बनाने में सहायक सिद्ध होती हैं।

भाग 1 श्री राम का मंच पर आगमन :
दोहा १ :
उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।
शब्दार्थ :
उदित ➔ प्रकट होना या निकलना
उदयगिरि ➔ उदयाचल पर्वत जहाँ, से सूर्य का उदय माना जाता है
मंच ➔ रंगमंच या ऊँचा स्थान
पर ➔ ऊपर
रघुबर ➔ रघुकुल के श्रेष्ठ प्रभु श्रीराम
बालपतंग ➔ बाल सूर्य
व्याख्या : जब श्रीराम अपने गुरु विश्वामित्र की आज्ञा लेकर शिव धनुष तोड़ने के लिए धनुष-यज्ञशाला के मंच पर खड़े हुए, तो उस समय का दृश्य ऐसा लग रहा था मानो उदयाचल पर्वत पर बाल सूर्य उदित हो।
बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग॥
शब्दार्थ :
बिकसे ➔ खिल उठे या प्रफुल्लित हो गए
संत ➔ सज्जन पुरुष या ज्ञानी जन
सरोज ➔ कमल के फूल
सब ➔ समस्त या सभी
हरषे ➔ प्रसन्न हो गए या आनंदित हुए
लोचन ➔ नेत्र या आँखें
भृंग ➔ भौंरे
व्याख्या : उस मंच रूपी उदयाचल पर श्रीराम रूपी बाल सूर्य के उदय होते ही, सभा में उपस्थित संत रूपी कमल खिल उठे और सभी दर्शकों की आँखें रूपी भौंरे उस सौंदर्य को देखकर प्रसन्न हो गये।
अर्थ :
श्रीराम को देखकर वहाँ उपस्थित सभी संत रूपी कमल खिल उठे हैं और उनके नेत्र रूपी भौंरे प्रसन्न हो गए हैं।
चौपाई १ :
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी॥
शब्दार्थ :
नृपन्ह ➔ राजाओं की
केरि ➔ की
आसा ➔ आशा या उम्मीद
निसि ➔ रात्रि
नासी ➔ नष्ट हो गई
नखत ➔ नक्षत्र या तारे
अवली ➔ पंक्तियाँ या समूह
प्रकासी ➔ चमकना या चमक रहे हैं
व्याख्या : अन्य राजाओं की सीता को पाने की आशा रूपी रात्रि नष्ट हो गई है और उनके वचन रूपी तारों के समूह का चमकना अर्थात उनका बोलना बंद हो गया है।
मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने॥
शब्दार्थ :
मानी ➔ अभिमानी या घमंडी
महिप ➔ राजा
कुमुद ➔ कुमुदनी के फूल (रात में खिलते हैं)
सकुचाने ➔ संकुचित हो गए या मुरझा गए
कपटी ➔ छली या ढोंगी
भूप ➔ राजा
उलूक ➔ उल्लू
लुकाने ➔ छिप गए
व्याख्या : जैसे सूर्य के उदय होते ही कुमुदिनी बंद हो जाती है और उल्लू छिप जाते हैं, वैसे ही श्री राम के मंच पर खड़े होते ही सभा के घमंडी राजाओं का अहंकार चूर हो गया और कपटी राजाओं का छल-कपट पूरी तरह निष्प्रभावी हो गया।
या
घमंडी राजा रूपी कुमुदिनी मुरझा गई और कपटी राजा रूपी उल्लू छिप गए हैं।
चौपाई २ :
भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरसहिं सुमन जनावहिं सेवा॥
शब्दार्थ :
भए ➔ हो गए
बिसोक ➔ शोकरहित या दुख से मुक्त
कोक ➔ चक्रवाक पक्षी (चकई-चकवा)
मुनि ➔ तपस्वी या ऋषि
देवा ➔ देवतागण
बरसिहिं ➔ वर्षा कर रहे हैं
सुमन ➔ फूल या पुष्प
जनावहिं ➔ प्रकट कर रहे हैं
सेवा ➔ अपनी भक्ति या आदर
व्याख्या: मुनि और देवता रूपी चकवा पक्षी अब शोकरहित हो गए हैं और वे फूल बरसाकर अपनी सेवा प्रकट कर रहे हैं।
भावार्थ :
श्री राम को देखकर ऋषि-मुनि और देवता रूपी चकवा पक्षी पूरी तरह चिंतामुक्त और सुखी हो गए तथा आकाश से पुष्पवर्षा करके प्रभु के प्रति अपना सेवा-भाव प्रकट करने लगे।
गुरु पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा॥
शब्दार्थ :
गुरु ➔ विश्वामित्र
पद ➔ चरण या पैर
बंदि ➔ वंदना करके
सहित ➔ साथ में
अनुरागा ➔ प्रेम
मुनिन्ह ➔ मुनियों से
आयसु ➔ आज्ञा या अनुमति
मांगा ➔ प्रार्थना की
व्याख्या: श्रीराम ने बड़े प्रेम के साथ अपने गुरु विश्वामित्र के चरणों की वंदना की और वहाँ उपस्थित अन्य मुनियों से आज्ञा माँगी।
चौपाई ३ :
सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी॥
शब्दार्थ :
सहजहिं ➔ स्वाभाविक रूप से या सरलता से
सकल ➔ समस्त या संपूर्ण
जग ➔ संसार
स्वामी ➔ ईश्वर या मालिक
मत्त ➔ मदमस्त
मंजु ➔ सुंदर
बर ➔ श्रेष्ठ
कुंजर ➔ हाथी
गामी ➔ चलने वाला या चाल
व्याख्या: संपूर्ण संसार के स्वामी श्रीराम अपनी स्वाभाविक चाल से ऐसे आगे बढ़े जैसे कोई सुंदर और मतवाला हाथी चल रहा हो।
चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी॥
शब्दार्थ :
चलत ➔ चलते समय
पुर ➔ जनकपुर के
नर ➔ पुरुष
नारी ➔ स्त्रियाँ
पुलक ➔ रोमांच (रोंगटे खड़े होना)
पूरि ➔ भर गया
तन ➔ शरीर
भए ➔ हो गए
सुखारी ➔ सुखी या आनंदित
व्याख्या: श्रीराम के चलते ही जनकपुर के सभी नर-नारी आनंदित हो गए और उनका शरीर रोमांच से भर गया।
चौपाई ४ :
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥
शब्दार्थ :
बंदि ➔ वंदना करके या याद करके
पितर ➔ पूर्वज या पितर देव
सुर ➔ देवता
सुकृत ➔ सत्कर्म या अच्छे कार्य
संभारे ➔ स्मरण किया या याद किया
जौं ➔ यदि
कछु ➔ कुछ भी
पुन्य ➔ पुण्यों का
प्रभाउ ➔ प्रभाव या प्रताप
व्याख्या: नगरवासियों ने अपने पूर्वजों और देवताओं की वंदना करके अपने पुण्यों को याद किया और प्रार्थना की कि यदि हमारे पुण्यों का कुछ भी प्रभाव हो...
तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहूँ रामु गनेस गोसाईं॥
शब्दार्थ :
सिवधनु ➔ शिव जी का धनुष
मृनाल ➔ कमल की डंडी (नाल)
नाईं ➔ भांति या तरह
तोरहुं ➔ तोड़ें
गनेस ➔ भगवान गणेश
गोसाईं ➔ हे स्वामी
व्याख्या: हे गणेश जी! श्रीराम इस शिवजी के भारी धनुष को कमल की कोमल डंडी के समान आसानी से तोड़ डालें।

भाग 2: सीता की माता सुनयना की चिंता :
दोहा २ :
रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ।
शब्दार्थ :
रामहि ➔ श्रीराम को
प्रेम ➔ अनुराग या स्नेह
समेत ➔ के साथ
लखि ➔ देखकर
सखिन्ह ➔ सखियों को
समीप ➔ पास में
व्याख्या: श्रीराम को अत्यंत प्रेम के साथ देखकर सीता जी की माता सुनयना ने अपनी सखियों को अपने पास बुलाया।
सीता मातु सनेह बस वचन कहइ विलखाइ॥2॥
शब्दार्थ :
मातु ➔ माता रानी सुनयना
सनेह ➔ स्नेह या ममता
बस ➔ वशीभूत होकर
बचन ➔ शब्द या वाणी
बिलखाइ ➔ विलाप करते हुए या दुखी होकर
व्याख्या: सीता जी की माता ममता के कारण व्याकुल होकर अपनी सखियों से ये वचन कहने लगीं।
चौपाई ५ :
सखी सब कौतुकु देखनिहारे। जेउ कहावत हितू हमारे॥
शब्दार्थ :
सखी ➔ हे सखियों
कौतुक ➔ तमाशा या खेल
देखनिहारे ➔ देखने वाले हैं
जेउ ➔ जो लोग
हितू ➔ हितैषी या भला चाहने वाले
व्याख्या: हे सखी! जो लोग हमारे हितैषी कहलाते हैं, वे सब भी यहाँ केवल तमाशा देखने वाले ही बने हुए हैं।
भावार्थ :
रानी सुनयना अत्यंत व्याकुल होकर अपनी सखी से कहती हैं कि हे सखी, यहाँ सभा में जितने भी लोग बैठे हैं और जो हमारे शुभचिंतक या हितैषी कहलाते हैं, वे सब केवल तमाशा देखने आए हैं। इनमें से कोई भी वास्तव में हमारा भला नहीं सोच रहा है, वे सब केवल तमाशा देख रहे हैं।
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं॥
शब्दार्थ :
कोउ ➔ कोई भी
बुझाइ ➔ समझाकर
गुर ➔ गुरु (महर्षि विश्वामित्र)
पाहीं ➔ के पास जाकर
बालक ➔ बालकों (श्रीराम और लक्ष्मण) के लिए
असि ➔ ऐसा
हठ ➔ जिद
भलि ➔ अच्छी
व्याख्या: कोई भी गुरु विश्वामित्र के पास जाकर उन्हें नहीं समझाता कि ये राम अभी नादान बालक हैं, इनके लिए धनुष तोड़ने की ऐसी हठ करना ठीक नहीं है।
भावार्थ :
रानी अपनी व्यथा आगे बढ़ाते हुए कहती हैं कि कोई भी ज्ञानी पुरुष जाकर गुरु विश्वामित्र को समझाकर क्यों नहीं कहता कि श्रीराम और लक्ष्मण अभी सुकुमार बालक हैं। इन बालकों के लिए शिव धनुष तोड़ने जैसी कठिन प्रतिज्ञा का ऐसा हठ करना किसी भी दृष्टि से उचित और अच्छा नहीं है। गुरु विश्वामित्र को इन्हें रोकना चाहिए।
चौपाई ६ :
रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा॥
शब्दार्थ
बान ➔ तीर ,
छुआ ➔ स्पर्श किया
चापा ➔ धनुष को
सकल ➔ समस्त
भूप ➔ राजागण
करि ➔ करके
दापा ➔ घमंड या अहंकार
व्याख्या : रानी अपनी सखी से तर्क करते हुए कहती हैं कि जिस शिव धनुष को रावण और बाणासुर जैसे महान शक्तिशाली योद्धाओं ने छूने तक का साहस नहीं किया और दूर से ही देख कर चले गए, तथा संसार के समस्त राजा अपना-अपना अहंकार और पराक्रम दिखाकर हार मान चुके हैं।
सो धनु राजकुँअर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं॥
शब्दार्थ
सो ➔ वही
धनु ➔ धनुष
राजकुँअर ➔ राजकुमार-श्रीराम
कर ➔ हाथों में
देहीं ➔ दे रहे हैं
बाल ➔ छोटा बच्चा
मराल ➔ हंस
मंदर ➔ मंदराचल पर्वत
लेहीं ➔ उठा सकता है
व्याख्या : वही अत्यंत भारी और अजेय धनुष ये लोग इस सुकुमार राजकुमार के हाथों में सौंप रहे हैं। यह तो वैसी ही असंभव बात है, जैसे कोई सोचे कि हंस का एक छोटा सा बच्चा विशाल मंदराचल पर्वत को अपनी चोंच से उठा सकता है। हंस का बच्चा कभी पर्वत नहीं उठा सकता, वैसे ही ये सुकुमार बालक इस भारी धनुष को कैसे उठा सकते हैं।
चौपाई ७ :
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी॥
शब्दार्थ :
भूप ➔ राजा
सयानप ➔ समझदारी या चतुराई
सकल ➔ समस्त या पूरी
सिरानी ➔ समाप्त हो गई या नष्ट हो गई
बिधि ➔ विधाता या ईश्वर
गति ➔ चाल या लीला
जाति ➔ जाती
जानी ➔ जानी या समझी
व्याख्या : रानी सुनयना अपनी सखी से अत्यंत दुखी होकर कहती हैं कि राजा जनक की भी सारी समझदारी और चतुरता समाप्त हो गई है क्योंकि वे भी इस अनुचित कार्य को नहीं रोक रहे हैं। हे सखी, विधाता की लीला बड़ी विचित्र है, उसकी गति के बारे में कुछ भी जाना या समझा नहीं जा सकता कि उसने भाग्य में क्या लिखा है।
बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी॥
शब्दार्थ :
चतुर ➔ बुद्धिमान
मृदु ➔ कोमल या मीठी
बानी ➔ आवाज या वाणी
तेजवंत ➔ तेजस्वी या प्रतापी पुरुष को
लघु ➔ छोटा
गनिअ ➔ गिनना चाहिए या समझना चाहिए
व्याख्या : रानी की व्याकुलता को देखकर उनकी एक अत्यंत चतुर और ज्ञानी सखी कोमल वाणी में बोली कि हे रानी, जो लोग तेज से संपन्न और प्रतापी होते हैं, उन्हें केवल शारीरिक आकार में छोटा देखकर कमजोर या छोटा नहीं समझना चाहिए।
चौपाई ८ :
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा॥
शब्दार्थ :
कहँ ➔ कहाँ
कुंभज ➔ घड़े से उत्पन्न होने वाले (महर्षि अगस्त्य)
सिंधु ➔ समुद्र
अपारा ➔ असीम या विशाल
सोषेउ ➔ सुखा दिया
सुजसु ➔ उत्तम यश
सकल ➔ समस्त
व्याख्या : चतुर सखी रानी को समझाते हुए कहती है कि कहाँ घड़े से उत्पन्न होने वाले छोटे से मुनि अगस्त्य और कहाँ यह असीम तथा विशाल महासागर, जिसकी कोई सीमा नहीं थी। परंतु मुनि अगस्त्य ने अपने तप के प्रभाव से उस पूरे समुद्र को एक चुल्लू में सुखा दिया, जिसका सुंदर यश आज भी समस्त संसार में प्रसिद्ध है।
रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु त्रिभुवन तम भागा॥
शब्दार्थ :
रबि ➔ सूर्य
मंडल ➔ घेरा या बिम्ब
लघु ➔ छोटा
उदयँ ➔ उदित होने पर
तासु ➔ उनके
तिभुवन ➔ तीनों लोकों का
तम ➔ अंधकार
व्याख्या : सूर्य का घेरा देखने में अत्यंत छोटा सा प्रतीत होता है, परंतु जैसे ही वह सुबह के समय उदित होता है, वैसे ही आकाश, पृथ्वी और पाताल अर्थात तीनों लोकों का विशाल अंधकार तत्काल भाग जाता है। इसलिए श्रीराम को छोटा मत समझो।

भाग 3: सखी का रानी को समझाना और सीता जी की प्रार्थना
दोहा 3 :
मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।
शब्दार्थ :
मंत्र ➔ गुप्त शब्द या वैदिक मंत्र
परम ➔ अत्यंत
लघु ➔ छोटा
जासु ➔ जिसके
बस ➔ नियंत्रण में
बिधि ➔ ब्रह्मा
हरि ➔ विष्णु
हर ➔ शिव
सुर ➔ देवता
सर्ब ➔ सभी
व्याख्या : सखी आगे कहती है कि ॐ या महामंत्र देखने में अक्षरों के दृष्टिकोण से अत्यंत छोटा होता है, परंतु उस छोटे से मंत्र के वश में ब्रह्मा, विष्णु, शिव और समस्त देवता आ जाते हैं। मंत्र की शक्ति उसके आकार से बहुत बड़ी होती है।
महामत्त गजराज कहूँ बस कर अंकुश खर्ब॥3॥
शब्दार्थ :
महामत्त ➔ अत्यंत मदमस्त
गजराज ➔ विशाल हाथी
बस ➔ नियंत्रण में
अंकुस ➔ लोहे का छोटा अस्त्र जिससे हाथी नियंत्रित होता है
खर्ब ➔ छोटा सा
व्याख्या : अत्यंत मदमस्त और विशालकाय हाथी को भी एक छोटा सा लोहे का अंकुश पूरी तरह अपने नियंत्रण में कर लेता है। अंकुश आकार में हाथी के सामने कुछ भी नहीं है, फिर भी वह उसे झुका देता है। अतः श्रीराम अवश्य ही इस धनुष को तोड़ेंगे।
चौपाई ९ :
काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे॥
शब्दार्थ :
काम ➔ कामदेव प्रेम और सौंदर्य के देवता
कुसुम ➔ फूल
धनु ➔ धनुष
सायक ➔ बाण
लीन्हे ➔ लेकर
सकल ➔ समस्त
भुबन ➔ संसार या लोक
बस ➔ नियंत्रण में
कीन्हे ➔ कर रखा है
व्याख्या : सखी तर्क देते हुए कहती है कि प्रेम के देवता कामदेव केवल फूलों का धनुष और फूलों के ही बाण अपने हाथों में धारण करते हैं। उनके अस्त्र अत्यंत कोमल हैं, परंतु फिर भी उन्होंने अपने इस कोमल प्रभाव से समस्त ब्रह्मांड को अपने वश में कर रखा है।
देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुषु राम सुनु रानी॥
शब्दार्थ :
तजिअ ➔ त्याग दीजिए
संसउ ➔ संशय या संदेह
अस ➔ ऐसा
भंजब ➔ तोड़ेंगे
धनुषु ➔ शिवधनुष को
सुनु ➔ सुनिए
व्याख्या : इसलिए हे देवी, इस सत्य को जानकर आप अपने मन के समस्त संदेह और भय को पूरी तरह त्याग दीजिए। हे रानी, मेरी बात पर विश्वास कीजिए, श्रीराम इस भारी शिवधनुष को अवश्य ही भंग करेंगे।
चौपाई १० :
सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती॥
शब्दार्थ :
परतीती ➔ विश्वास या भरोसा
मिटा ➔ समाप्त हो गया
बिषादु ➔ दुख या उदासी
बढ़ी ➔ अत्यधिक बढ़ गई
अति ➔ बहुत ज़्यादा
प्रीती ➔ प्रेम या अनुराग
व्याख्या : अपनी ज्ञानी सखी के इन तार्किक और सांत्वना भरे वचनों को सुनकर रानी सुनयना को श्रीराम के सामर्थ्य पर विश्वास हो गया। उनके मन का दुख और निराशा समाप्त हो गई और श्रीराम के प्रति उनके मन में स्नेह और आदर का भाव और अधिक गहरा हो गया।
तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही॥
शब्दार्थ :
तब ➔ उस समय
बिलोकि ➔ देखकर
बैदेही ➔ विदेहराज की पुत्री (सीता जी)
सभय ➔ भय के साथ या डरे हुए
हृदयँ ➔ मन से
बिनवति ➔ प्रार्थना कर रही हैं
जेहि ➔ जिस
तेही ➔ तिस देवता से
व्याख्या : उसी समय मंच की ओर बढ़ते हुए श्रीराम को देखकर सीता जी अत्यंत व्याकुल हो उठीं। उनका हृदय अनिष्ट की आशंका से डरा हुआ था, इसलिए वे व्याकुल मन से जिस-तिस देवता का स्मरण करके उनसे मन ही मन मन्नतें मांगने और प्रार्थना करने लगीं।
चौपाई ११ :
मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी॥
शब्दार्थ :
मनहीं ➔ मन ही
मनाव ➔ व्याकुल होना या मनाना
अकुलानी ➔ घबराकर
होहु ➔ हो जाइए
प्रसन्न ➔ कृपालु या खुश
महेस ➔ शिव जी
भवानी ➔ माता पार्वती
व्याख्या : सीता जी मन ही मन अत्यधिक घबराते हुए देवताओं को रिझा रही हैं और प्रार्थना कर रही हैं कि हे महादेव, हे माता पार्वती, आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइए और मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि बनाइए।
करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई॥
शब्दार्थ :
करहु ➔ कीजिए
सफल ➔ सार्थक
आपनि ➔ अपनी
सेवकाई ➔ सेवा या भक्ति को
करि ➔ करके
हितु ➔ भलाई या कल्याण
हरहु ➔ हरण कर लीजिए या कम कर दीजिए
चाप ➔ धनुष की
गरुआई ➔ भारीपन या वजन
व्याख्या : बचपन से आज तक मैंने जो आपकी निष्काम भाव से सेवा की है, आज उस सेवा को सफल करने का समय आ गया है। मुझ पर कृपा करके और मेरा कल्याण सोचते हुए इस शिवधनुष के भारीपन को बहुत कम कर दीजिए ताकि श्रीराम इसे उठा सकें।
चौपाई १२ :
गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा॥
शब्दार्थ :
गननायक ➔ गणों के नायक गणेश जी
बरदायक ➔ वरदान देने वाले
देवा ➔ हे देव
आजु ➔ आज के दिन
कीन्हिउँ ➔ की थी मैंने
तुअ ➔ आपकी
सेवा ➔ आराधना
व्याख्या : सीता जी प्रथम पूज्य गणेश जी की आराधना करते हुए कहती हैं कि हे गणों के स्वामी, हे वरदान देने वाले देव गणेश जी, मैंने आज के ही इस संकट के दिन के लिए आपकी निरंतर सेवा और पूजा की थी।
बार बार विनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी॥
शब्दार्थ :
विनती ➔ प्रार्थना
सुनि ➔ सुनकर
मोरी ➔ मेरी
करहु ➔ कर दीजिए
चाप ➔ धनुष की
गुरुता ➔ भारीपन या कठोरता
अति ➔ अत्यधिक
थोरी ➔ कम या हल्की
व्याख्या : मेरी इस बार-बार की जाने वाली करुण प्रार्थना को सुन लीजिए और इस धनुष के भारीपन को बहुत ही थोड़ा अर्थात अत्यंत कम कर दीजिए।
भाग 4 : सीता जी की व्याकुलता और राजा जनक के प्रण पर दुख
दोहा 4 :
देखि देखि रघुवीर तन सुर मनाव धरि धीर।
शब्दार्थ :
देखि ➔ देख-देखकर
देखि ➔ बार-बार देखना
रघुबीर ➔ रघुकुल के वीर श्रीराम
तन ➔ शरीर को
सुर ➔ देवताओं को
मनाव ➔ मना रही हैं
धरि ➔ धारण करके
धीर ➔ धैर्य या धीरज
व्याख्या : सीता जी बार-बार श्रीराम के कोमल और सुंदर शरीर को देखती हैं और फिर किसी तरह हृदय में धैर्य धारण करके देवताओं को मनाती हैं कि वे श्रीराम की सहायता करें। उनका मन पूरी तरह श्रीराम के प्रति समर्पित हो चुका है।
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर॥4॥
शब्दार्थ :
भरे ➔ भर गए हैं
बिलोचन ➔ नेत्र या आँखें
प्रेम ➔ अनुराग का
जल ➔ पानी या आँसू
पुलकावली ➔ रोमांच से युक्त
व्याख्या : श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम के कारण सीता जी की आँखों में आँसू भर आए हैं और उनका पूरा शरीर भाव-विभोर होकर रोमांच से भर गया है।
चौपाई १३ :
नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा॥
शब्दार्थ :
नीकें ➔ अच्छी तरह से
निरखि ➔ देखकर
भरि ➔ भरकर
पितु ➔ पिता राजा जनक
पनु ➔ प्रण या प्रतिज्ञा
सुमिरि ➔ याद करके
बहुरि ➔ दोबारा या फिर से
मनु ➔ मन
छोभा ➔ क्षुब्ध या दुखी हो गया
व्याख्या : सीता जी पहले तो जी भरकर श्रीराम के अलौकिक लावण्य और रूप को निहारती हैं, परंतु जैसे ही उन्हें अचानक अपने पिता राजा जनक की उस प्रतिज्ञा की याद आती है कि जो धनुष तोड़ेगा उसी से विवाह होगा, तो उनका मन फिर से गहरे दुख और क्षोभ से भर जाता है।
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी॥
शब्दार्थ :
अहह ➔ अत्यंत दुख सूचक शब्द, हाय
तात ➔ पिता जी ने
दारुनि ➔ अत्यंत कठोर या भयंकर
हठ ➔ प्रतिज्ञा या जिद
ठानी ➔ ठान ली है
हानी ➔ नुकसान
व्याख्या : वे मन ही मन कहती हैं कि हाय पिता जी ने यह कैसी अत्यंत भयंकर और निष्ठुर प्रतिज्ञा ठान ली है। वे इस हठ के कारण होने वाले लाभ और हानि के विषय में थोड़ा भी विचार नहीं कर रहे हैं कि इससे एक सुकुमार बालक संकट में पड़ सकता है।
चौपाई १४ :
सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई॥
शब्दार्थ :
सचिव ➔ मंत्रीगण
सभय ➔ डर के मारे
सिख ➔ सीख या सलाह
देइ ➔ देता
बुध ➔ ज्ञानियों या विद्वानों का
बड़ ➔ बहुत बड़ा
अनुचित ➔ गलत कार्य
होई ➔ हो रहा है
व्याख्या : राजा के जितने भी मंत्री हैं, वे सब भय के मारे राजा को कोई उचित सलाह नहीं दे रहे हैं। विद्वानों की इस प्रतिष्ठित सभा में आज यह बहुत ही गलत और अनुचित कार्य हो रहा है कि एक बालक को इतने कठिन कार्य के लिए आगे जाने दिया जा रहा है।
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा॥
शब्दार्थ :
कहँ ➔ कहाँ
धनु ➔ यह धनुष
कुलिसहु ➔ वज्र से भी
चाहि ➔ की तुलना में
कठोरा ➔ अत्यंत सख्त या कठोर
स्यामल ➔ सांवले रंग के
मृदुगात ➔ कोमल शरीर वाले
किसोरा ➔ किसोरा अवस्था के बालक
व्याख्या : कहाँ तो इंद्र के वज्र से भी अधिक भारी और कठोर यह शिव का पुराना धनुष और कहाँ यह सांवले रंग के अत्यंत कोमल अंगों वाले सुकुमार किशोर बालक श्रीराम। इन दोनों में कोई मेल ही नहीं है।
चौपाई १५ :
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरिस सुमन कन बेधिअ हीरा॥
शब्दार्थ :
बिधि ➔ हे विधाता
केहि ➔ किस
भाँति ➔ प्रकार या तरह
धरौं ➔ धारण करूँ
उर ➔ हृदय में
धीरा ➔ धैर्य या धीरज
सिरिस ➔ शिरीष का (एक अत्यंत कोमल फूल)
सुमन ➔ फूल के
कन ➔ कण या पंखुड़ी से
बेधिअ ➔ काटा या बींधा जा सकता है
हीरा ➔ वज्र जैसा कठोर हीरा
व्याख्या : सीता जी व्याकुल होकर विधाता से प्रश्न करती हैं कि हे ईश्वर, मैं किस आधार पर अपने हृदय में धीरज रखूँ। क्या कभी शिरीष के अत्यंत कोमल फूल की पंखुड़ी के अग्रभाग से अत्यंत कठोर हीरे को काटा या बींधा जा सकता है। यह सर्वथा असंभव है।
सकल सभा कै मति भइ भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी॥
शब्दार्थ :
सकल ➔ समस्त
मति ➔ बुद्धि
भइ ➔ हो गई है
भोरी ➔ नष्ट या पगली
मोहि ➔ मुझे केवल
संभुचाप ➔ शिव के धनुष की
गति ➔ शरण या सहारा है
तोरी ➔ तुम्हारा ही
व्याख्या : ऐसा लगता है कि यहाँ उपस्थित इस पूरी राजसभा के लोगों की बुद्धि नष्ट हो गई है। इसलिए हे शिव जी के धनुष, अब मुझे किसी मनुष्य से कोई आशा नहीं है, अब मुझे केवल तुम्हारा ही सहारा है कि तुम स्वयं मेरे लिए हल्के हो जाओ।
चौपाई १६ :
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी॥
शब्दार्थ :
निज ➔ अपनी
जड़ता ➔ भारीपन या अज्ञानता
लोगन्ह ➔ यहाँ उपस्थित लोगों
पर ➔ ऊपर
डारी ➔ डाल दो
होहि ➔ हो जाओ
हरुअ ➔ हल्के या वजनरहित
रघुपतिहि ➔ श्रीराम को
निहारी ➔ देखकर
व्याख्या : सीता जी धनुष से प्रार्थना करती हैं कि तुम अपनी इस जड़ता और भारीपन को इन निर्दयी और अज्ञानी लोगों पर डाल दो जो तमाशा देख रहे हैं। तुम साक्षात रघुकुल शिरोमणि श्रीराम के इस सुकुमार रूप को देखो और उनके कोमल शरीर के अनुकूल अत्यंत हल्के हो जाओ।
अति परिताप सीय मन माहीं। लव निमेष जुग सय सम जाहीं॥
शब्दार्थ :
अति ➔ अत्यधिक
परिताप ➔ संताप, दुख या मानसिक संताप
सीय ➔ सीता जी के
माहीं ➔ के भीतर
लव ➔ पलक झपकने का एक अत्यंत छोटा हिस्सा
निमेष ➔ पलक झपकना
जुग ➔ युगों के
सय ➔ सौ के
जाहीं ➔ बीत रहा है
व्याख्या : उस समय सीता जी के मन के भीतर अत्यंत तीव्र मानसिक संताप और व्याकुलता चल रही थी। दुःख की इस घड़ी में उनके लिए पलक झपकने का एक छोटा सा क्षण भी सौ युगों के समान लंबा और कष्टदायी प्रतीत हो रहा था।
भाग 5: श्री राम की ओर देखना और सीता जी का आत्म-समर्पण
दोहा 5 :
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।
शब्दार्थ :
चितइ ➔ देखकर
पुनि ➔ फिर दोबारा
चितव ➔ देखती हैं
महि ➔ धरती या ज़मीन की ओर
राजत ➔ सुशोभित हो रहे हैं
लोचन ➔ नेत्र या आँखें
लोल ➔ चंचल
व्याख्या : सीता जी लज्जा और प्रेम के वशीभूत होकर एक बार सामने खड़े प्रभु श्रीराम को देखती हैं और फिर लज्जा के कारण तुरंत अपनी दृष्टि नीचे धरती की ओर घुमा लेती हैं। इस प्रकार बार-बार ऊपर-नीचे होती उनकी चंचल आँखें अत्यंत सुंदर लग रही हैं।
खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल॥5॥
शब्दार्थ :
खेलत ➔ क्रीड़ा कर रहे हैं या खेल रहे हैं
मनसिज ➔ कामदेव की
मीन ➔ मछलियाँ
जुग ➔ दोनों या जोड़ा
जनु ➔ मानो
बिधु ➔ चंद्रमा रूपी
मंडल ➔ घेरे वाले
डोल ➔ डोलची या बर्तन में
उनकी आँखों की यह चंचलता ऐसी सुंदर लग रही है मानो चंद्रमा रूपी गोल बर्तन के भीतर कामदेव की दो चंचल मछलियाँ आपस में क्रीड़ा कर रही हों। यहाँ सीता जी के मुख को चंद्रमा और आँखों को चंचल मछलियों की उपमा दी गई है।
चौपाई १७ :
गिरा अनिलि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥
शब्दार्थ :
गिरा ➔ वाणी या आवाज
अनिलि ➔ भ्रमरी -मूल शब्द अलिनि
मुख ➔ मुख रूपी
पंकज ➔ कमल के फूल में
रोकी ➔ बंद कर दी है
प्रगट ➔ बाहर आना, प्रकट होना
निसा ➔ रात्रि को
अवलोकी ➔ देखकर
व्याख्या : सीता जी की वाणी रूपी भ्रमरी को उनके मुख रूपी कमल ने रोक रखा है। लज्जा रूपी रात्रि को देखकर वह वाणी बाहर प्रकट नहीं हो पा रही है। तात्पर्य यह है कि सीता जी के मन में बहुत कुछ कहने की तीव्र इच्छा है, परंतु मर्यादा और लज्जा के कारण वे मौन हैं।
लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसें परम कृपन कर सोना॥
शब्दार्थ :
लोचन ➔ आँखों का
जलु ➔ पानी या आँसू
लोचन ➔ आँखों के ही
परम ➔ अत्यंत
कृपन ➔ कंजूस का
कर ➔ हाथ का या पास रखा हुआ
सोना ➔ स्वर्ण या धन
व्याख्या : उनके भीतर के दुःख के कारण आँखों में आए हुए आँसू उनकी आँखों के कोनों में ही सिमट कर रह गए, वे बाहर नहीं गिरे। यह दृश्य वैसा ही था जैसे किसी महाकंजूस व्यक्ति का सोना उसके घर के किसी गुप्त कोने में छुपा रहता है और बाहर नहीं आता।
चौपाई १८ :
सकुची व्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी॥
शब्दार्थ :
सकुची ➔ संकुचित हो गईं या संभल गईं
व्याकुलता ➔ घबराहट को
बड़ि ➔ बहुत अधिक
जानी ➔ समझकर
धरि ➔ धारण करके
धीरजु ➔ धैर्य या धीरज
प्रतीति ➔ विश्वास या स्थिरता
उर ➔ हृदय में
आनी ➔ लाया
व्याख्या : जब सीता जी ने महसूस किया कि उनकी व्याकुलता बहुत अधिक बढ़ गई है और लोग उसे ताड़ सकते हैं, तो वे अपनी भावनाओं को संभालकर शांत हो गईं। उन्होंने अपने हृदय में अत्यधिक साहस और धैर्य धारण किया और मन को स्थिर किया।
तन मन वचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा॥
शब्दार्थ :
तन ➔ शरीर से
मन ➔ विचार से
वचन ➔ वाणी से
मोर ➔ मेरा
पनु ➔ प्रण या संकल्प
साचा ➔ सच्चा और पवित्र है
रघुपति ➔ श्रीराम के
पद ➔ चरण
सरोज ➔ कमल में
चितु ➔ मन
राचा ➔ पूरी तरह लीन या अनुरक्त
व्याख्या : वे मन ही मन दृढ़ संकल्प करते हुए कहती हैं कि यदि शरीर, मन और वाणी से श्रीराम को ही पति मानने का मेरा यह संकल्प पूरी तरह सच्चा है, और यदि मेरा चित्त श्रीराम के चरण कमलों में पूरी तरह लीन है।
चौपाई १९ :
तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी॥
शब्दार्थ :
भगवानु ➔ परमेश्वर
सकल ➔ समस्त जीवों के
उर ➔ हृदय में
बासी ➔ निवास करने वाले
करिहि ➔ अवश्य करेंगे
मोहि ➔ मुझको
रघुबर ➔ श्रीराम की
दासी ➔ अर्धांगिनी या सेविका
व्याख्या : तो समस्त प्राणियों के हृदय में निवास करने वाले और सबके अंतर्मन की बात जानने वाले अंतर्यामी भगवान मुझे अवश्य ही श्रीराम की अर्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्रदान करेंगे, क्योंकि वे मेरी सच्ची निष्ठा को देख रहे हैं।
जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥
शब्दार्थ :
जेही ➔ जिस व्यक्ति का
के ➔ का
जेही ➔ जिस दूसरे व्यक्ति
पर ➔ ऊपर
सत्य ➔ सच्चा
सनेहू ➔ प्रेम होता है
सो ➔ वह व्यक्ति
तेही ➔ उसे
मिलइ ➔ अवश्य मिलता है
कछु ➔ थोड़ा भी
संदेहू ➔ शक या संदेह
व्याख्या :यह सृष्टि का शाश्वत नियम है कि जिस किसी का जिसके प्रति पूर्ण रूप से सच्चा, पवित्र और निष्काम प्रेम होता है, वह उसे अवश्य ही प्राप्त होता है। इस सार्वभौमिक सत्य में तनिक भी संदेह नहीं है।
चौपाई २० :
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना॥
शब्दार्थ :
तन ➔ की ओर
चितइ ➔ देखकर
प्रेम ➔ अपने सच्चे प्रेम को
तन ➔ शरीर में
ठाना ➔ पक्का कर लिया
कृपानिधान ➔ कृपा के सागर
व्याख्या : प्रभु श्रीराम की ओर देखकर माता सीता ने मन ही मन यह दृढ़ संकल्प (प्रण) कर लिया कि उनका यह शरीर अब केवल श्रीराम का ही होकर रहेगा; और कृपा के सागर श्रीराम जी सीता जी के इस निश्चल प्रेम और अंतर्मन की बात को तुरंत जान गए।
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसें। चितव गरुड़ लघु ब्यालहि जैसें॥
शब्दार्थ :
सियहि ➔ सीता जी को
बिलोकि ➔ देखकर
तकेउ ➔ देखा या ताका
धनु ➔ शिव के धनुष को
कैसें ➔ किस प्रकार
चितव ➔ देखता है
गरुड़ ➔ पक्षीराज गरुड़
लघु ➔ छोटे से
ब्यालहि ➔ सर्प या सांप को
जैसें ➔ जिस प्रकार
व्याख्या : सीता जी के उस पावन भाव को देखकर श्रीराम ने शिव के उस विशाल धनुष की ओर उस सहजता से दृष्टि डाली, जैसे पक्षीराज गरुड़ आकाश से ज़मीन पर रेंगते हुए किसी अत्यंत छोटे और शक्तिहीन सांप को तुच्छ समझकर देखता है।
भाग 6: लक्ष्मण जी द्वारा पृथ्वी को सावधान करना
दोहा ६ :
लखन लखेउ रघुवंसमनि ताकेउ हर कोदंडु।
शब्दार्थ :
लखन ➔ लक्ष्मण जी ने
लखेउ ➔ देखा या ताड़ लिया
रघुबंसमनि ➔ रघुकुल के मणि श्रीराम
ताकेउ ➔ ध्यान से देखा है
हर ➔ शिव जी के
कोदंडु ➔ धनुष को
व्याख्या : जैसे ही रघुकुल शिरोमणि श्रीराम ने शिव के धनुष को तोड़ने की दृष्टि से उसकी ओर देखा, उनके अनुज लक्ष्मण जी ने श्रीराम के उस गुप्त संकेत और मनोभाव को तुरंत पहचान लिया कि अब प्रभु धनुषभंग करने वाले हैं।
पुलकि गात बोले वचन चरन चापि ब्रह्मांडु॥6॥
शब्दार्थ :
पुलकि ➔ रोमांचित होकर
गात ➔ शरीर से
बोले ➔ बोले या कहा
वचन ➔ शब्द (या बचन)
चरन ➔ पैरों से
चापि ➔ दबाकर या स्थिर करके
ब्रह्मांडु ➔ संपूर्ण ब्रह्मांड को
व्याख्या : यह जानकर लक्ष्मण जी का पूरा शरीर वीर रस के कारण रोमांच से भर गया। उन्होंने ब्रह्मांड को डोलने से बचाने के लिए अपने पैरों से पृथ्वी को कसकर दबा दिया और अत्यंत ओजस्वी वाणी में दिशाओं के रक्षकों को सचेत करते हुए वचन कहे।
चौपाई २१ :
दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला॥
शब्दार्थ :
दिसिकुंजरहु ➔ दसों दिशाओं के रक्षक हाथी
कमठ ➔ कच्छप या साक्षात कछुआ
अहि ➔ शेषनाग
कोला ➔ वराहावतार - सूअर रूप
धरहु ➔ पकड़ कर रखो
धरनि ➔ पृथ्वी को
धरि ➔ धारण करके
धीर ➔ धैर्य
डोला ➔ हिलनी चाहिए
व्याख्या : लक्ष्मण जी ब्रह्मांड के आधारभूत शक्तियों को पुकारते हुए कहते हैं कि हे दिशाओं के रक्षक हाथियों, हे महान कच्छप, हे शेषनाग और हे पृथ्वी को उठाने वाले आदि वराह, आप सब अपने भीतर महान धैर्य धारण करके इस पृथ्वी को मजबूती से थाम लें ताकि यह तनिक भी न हिले।
रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा॥
शब्दार्थ :
चहहिं ➔ चाहते हैं
संकर धनु ➔ शिव के धनुष को
तोरा ➔ तोड़ना
होहु ➔ हो जाओ
सजग ➔ सावधान या सतर्क
सुनि ➔ सुनकर
आयसु ➔ आज्ञा या आदेश
मोरा ➔ मेरा
व्याख्या : क्योंकि प्रभु श्रीराम अब शिव जी के इस अत्यंत भारी धनुष को तोड़ने जा रहे हैं। मेरे इस तात्कालिक आदेश को सुनकर आप सभी पूरी तरह सावधान और सतर्क हो जाइए ताकि ब्रह्मांड का संतुलन न बिगड़े।
चौपाई २२ :
चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए॥
शब्दार्थ :
चाप ➔ धनुष के
समीप ➔ पास में
जब ➔ जिस समय
सुर ➔ देवताओं को
सुकृत ➔ अपने पुण्यों को
मनाए ➔ याद करने लगे या प्रार्थना करने लगे
व्याख्या : जब श्रीराम अत्यंत शांत भाव से चलकर शिवधनुष के बिल्कुल पास पहुँचे, तो वहाँ उपस्थित जनकपुर के समस्त नर-नारी अत्यंत भावुक होकर पुनः अपने देवताओं से अपने सत्कर्मों के फल की याचना करने लगे।
सब कर संसउ और अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू॥
शब्दार्थ :
संसउ ➔ संशय या असमंजस
अरु ➔ और
अग्यानू ➔ अज्ञान या भ्रम
मंद ➔ मूर्ख या बुद्धिहीन
महीपन ➔ राजाओं
अभिमानू ➔ घमंड
व्याख्या : उस क्षण सभा में उपस्थित सामान्य जनों का संशय, अज्ञान, और जो अज्ञानी तथा कायर राजा वहाँ बैठे थे, उनका वह झूठा राजसी अहंकार पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर आ गया।
चौपाई २३ :
भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई॥
शब्दार्थ :
भृगुपति ➔ परशुराम जी
केरि ➔ का
गरब ➔ गर्व या घमंड
गरुआई ➔ भारीपन या श्रेष्ठता का भाव
सुर ➔ देवताओं
मुनिबरन्ह ➔ श्रेष्ठ मुनियों
कदराई ➔ डर या कायरता का भाव
व्याख्या : परशुराम जी के अहंकार का भारीपन, देवताओं और श्रेष्ठ मुनियों के मन में समाया हुआ यह भय कि अब क्या होगा, यह सब बातें भी उस धनुष के साथ जुड़ी हुई थीं।
सीय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा॥
शब्दार्थ :
सोचु ➔ शोक या चिंता
पछितावा ➔ पश्चाताप
रानिन्ह ➔ रानियों
दारुन ➔ भयंकर
दुख ➔ कष्ट
दावा ➔ दावानल -जंगल की आग
व्याख्या : सीता जी की अत्यंत गहरी चिंता, राजा जनक का वह पश्चाताप कि मैंने ऐसी कठिन प्रतिज्ञा क्यों की, और जनकपुर की समस्त रानियों के भीतर सुलग रही दुख की भयंकर दावानल रूपी अग्नि।
चौपाई २४ :
शंभुचाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई॥
शब्दार्थ :
शंभुचाप ➔ शिव का धनुष
बड़ ➔ बड़ा
बोहितु ➔ जहाज या नाव
पाई ➔ पाकर या समझकर
चढ़े ➔ सवार हो गए
जाइ ➔ जाकर
सँगु ➔ समूह या समाज
बनाई ➔ बनाकर
व्याख्या : ये समस्त नकारात्मक भाव (राजाओं का घमंड, परशुराम का गर्व, रानियों का दुख) शिव के धनुष रूपी एक बहुत बड़े जहाज को पाकर उस पर एक साथ समूह बनाकर सवार हो गए थे।
राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू॥
शब्दार्थ :
बाहुबल ➔ भुजाओं की शक्ति रूपी
सिंधु ➔ महासागर के
अपारू ➔ असीम
चहत ➔ चाहते हैं
पारु ➔ पार जाना
कोउ ➔ कोई भी
कड़नहारू ➔ मल्लाह या केवट, नाव चलाने वाला
व्याख्या : वे सब श्रीराम की भुजाओं के बल रूपी इस असीम महासागर को पार करना चाहते थे, परंतु उनके पास इस विपरीत परिस्थिति से बाहर निकालने वाला कोई कुशल मल्लाह या केवट उपलब्ध नहीं था। अर्थात श्रीराम की शक्ति के सामने इन सबका अंत निश्चित था।
भाग 7: श्री राम द्वारा सीता जी की व्याकुलता को देखना
दोहा ७ :
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।
शब्दार्थ :
बिलोके ➔ देखा
देखि ➔ देखकर
व्याख्या : श्रीराम ने जब सभा में उपस्थित समस्त जनों की ओर दृष्टि उठाई, तो वे सब भय और कौतूहल के कारण इतने शांत और जड़ दिखाई दिए मानो वे किसी दीवार पर बनाए गए जड़ चित्र या पेंटिंग हों। पूरी सभा स्तब्ध खड़ी थी।
चितई सीय कृपायतन जानी विकल वेिसेषि॥7॥
शब्दार्थ :
चितई ➔ देखा
कृपायतन ➔ कृपा के सागर श्रीराम ने
जानी ➔ जान लिया
विकल ➔ अत्यंत व्याकुल या दुखी
विसेषि ➔ विशेष रूप से या बहुत अधिक
व्याख्या : तदनंतर कृपा के सागर श्रीराम ने अपनी दृष्टि विशेष रूप से सीता जी की ओर घुमाई। उन्होंने तुरंत पहचान लिया कि सीता जी इस समय अन्य लोगों की तुलना में अत्यधिक व्याकुल, डरी हुई और मानसिक संताप से गुजर रही हैं।
चौपाई २५ :
देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही॥
शब्दार्थ :
देखी ➔ देखा
बिपुल ➔ अत्यधिक या बहुत अधिक
बिकल ➔ परेशान या व्याकुल
बैदेही ➔ सीता जी को
निमिष ➔ पलक झपकने का समय
बिहात ➔ बीत रहा था
कलप ➔ कल्प (लाखों वर्षों का एक काल)
तेही ➔ उनके लिए
व्याख्या : श्रीराम ने देखा कि सीता जी इस समय पराकाष्ठा की व्याकुलता में हैं। उनके लिए इस समय पलक झपकने का एक छोटा सा क्षण भी एक अत्यंत लंबे कल्प के समान कष्टकारी होकर बीत रहा है।
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा॥
शब्दार्थ :
तृषित ➔ प्यासा व्यक्ति
बारि ➔ पानी
बिनु ➔ के बिना
जो ➔ यदि
तनु ➔ शरीर
त्यागा ➔ छोड़ दे या मृत्यु को प्राप्त हो जाए
मुएँ ➔ मर जाने पर
करइ ➔ करेगा
सुधा ➔ अमृत का
तड़ागा ➔ तालाब
व्याख्या : श्रीराम ने सोचा कि यदि कोई प्यासा व्यक्ति पानी न मिलने के कारण तड़प-तड़प कर अपने प्राण त्याग दे, तो उसके मर जाने के बाद यदि उसके सामने साक्षात अमृत का तालाब भी लाकर रख दिया जाए, तो उस अमृत के तालाब का कोई औचित्य या लाभ नहीं रह जाता। अतः अब शीघ्रता करनी होगी।
चौपाई २६ :
का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें॥
शब्दार्थ :
बरषा ➔ वर्षा या बारिश का
कृषी ➔ खेती या फसल
सुखानें ➔ सूख जाने पर, नष्ट होने पर
चुकें ➔ बीत जाने पर
पुनि ➔ दोबारा
पछितानें ➔ पछतावा करने से
व्याख्या : यदि एक बार पूरी फसल सूख कर नष्ट हो जाए, तो उसके बाद होने वाली भारी वर्षा का कोई मूल्य नहीं रह जाता। उचित समय के एक बार हाथ से निकल जाने पर बाद में केवल पछतावा करने से कार्य सिद्ध नहीं होता।
अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी॥
शब्दार्थ :
अस ➔ ऐसा
जियँ ➔ हृदय में
जानि ➔ जानकर या विचार करके
पुलके ➔ हर्षित या रोमांचित हो गए
लखि ➔ देखकर
प्रीति ➔ प्रेम को
बिसेषी ➔ विशेष या अनन्य
व्याख्या : अपने मन में ऐसा विचार करके श्रीराम ने पुनः जानकी जी की ओर देखा। सीता जी के मन में अपने प्रति ऐसा अनन्य और अटूट प्रेम देखकर प्रभु श्रीराम का शरीर भीतर से पूरी तरह रोमांचित और आनंदित हो उठा
गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥
शब्दार्थ :
गुरहि ➔ अपने गुरु विश्वामित्र को
प्रनामु ➔ नमस्कार या प्रणाम
मनहिं ➔ मन ही
कीन्हा ➔ किया
अति ➔ अत्यधिक
लाघवँ ➔ फुर्ती, शीघ्रता या लाघव शक्ति से
उठाइ ➔ उठाकर
धनु ➔ धनुष को
लीन्हा ➔ अपने हाथों में ले लिया
व्याख्या : श्रीराम ने सबसे पहले अपने मन ही मन गुरु विश्वामित्र को प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद लिया। इसके तुरंत बाद उन्होंने अपनी अद्भुत लाघव शक्ति अर्थात पलक झपकते ही अत्यंत स्फूर्ति के साथ उस भारी धनुष को ज़मीन से ऊपर उठा लिया।
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडलसम भयऊ॥
शब्दार्थ :
दमकेउ ➔ चमक उठी
दामिनि ➔ बिजली
जिमि ➔ जिस प्रकार
लयऊ ➔ हाथ में उठाया
पुनि ➔ फिर तुरंत ही
नभ ➔ आकाश में
धनु ➔ वह धनुष
मंडलसम ➔ पूर्ण मंडलाकार या गोल
भयऊ ➔ हो गया
व्याख्या : जैसे ही श्रीराम ने उस धनुष को अपने हाथों में उठाया, पूरी सभा में बिजली की तरह एक तेज रोशनी चमक उठी। और अगले ही क्षण, जब उन्होंने उसकी प्रत्यंचा खींची, तो वह धनुष आकाश में सूर्य या पूर्ण चंद्रमा के समान गोल दिखाई देने लगा। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि किसी को प्रक्रिया दिखाई नहीं दी।
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥
शब्दार्थ :
लेत ➔ हाथ में लेते हुए
चढ़ावत ➔ उस पर डोरी चढ़ाते हुए
खैंचत ➔ उसे पीछे की ओर ज़ोर से खींचते हुए
गाढ़ें ➔ अत्यंत मजबूती से
काहुँ ➔ किसी ने भी
लखा ➔ देख पाया
सबु ➔ सब लोग
ठाढ़ें ➔ केवल खड़े होकर
व्याख्या : श्रीराम ने कब उस धनुष को हाथ में लिया, कब उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और कब उसे अत्यंत बलपूर्वक पीछे की ओर खींचा, यह तीनों क्रियाएँ इतनी त्वरित थीं कि सभा में खड़ा कोई भी व्यक्ति इसे देख नहीं सका। सबने तो बस श्रीराम को धनुष ताने सीधे खड़े देखा।
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥
शब्दार्थ :
तेहि ➔ उसी
छन ➔ क्षण या पल में
तोरा ➔ दो टुकड़ों में तोड़ दिया
भरे ➔ भर गए
भुवन ➔ समस्त लोक या ब्रह्मांड
धुनि ➔ ध्वनि या टंकार से
घोर ➔ गहरी
कठोरा ➔ अत्यंत भयंकर और कठोर
व्याख्या : श्रीराम ने कब उस धनुष को हाथ में लिया, कब उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और कब उसे अत्यंत बलपूर्वक पीछे की ओर खींचा, यह तीनों क्रियाएँ इतनी त्वरित थीं कि सभा में खड़ा कोई भी व्यक्ति इसे देख नहीं सका। सबने तो बस श्रीराम को धनुष ताने सीधे खड़े देखा।
भाग 8: धनुष टूटने पर ब्रह्मांड की स्थिति
छन्द :
भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।
शब्दार्थ :
रव ➔ ध्वनि, आवाज
रबि बाजि ➔ सूर्य के घोड़े
तजि मारगु चले ➔ अपना रास्ता छोड़कर भागने लगे
व्याख्या: धनुष टूटने की वह भयानक और कठोर आवाज पूरे ब्रह्मांड में इस कदर व्याप्त हो गई कि सूर्य के घोड़े अपने निश्चित रास्ते को छोड़कर भागने लगे।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले॥
शब्दार्थ :
चिक्करहिं दिग्गज ➔ हाथी चिंघाड़ने लगे
डोल महि ➔ पृथ्वी डोलने या कांपने लगी
अहि कोल कूरुम ➔ शेषनाग, वराह और कछुआ
कलमले ➔ छटपटाने लगे
व्याख्या : दसों दिशाओं के हाथी चिंघाड़ने लगे, पृथ्वी कांपने लगी और शेषनाग, वराह तथा कछुआ छटपटा उठे।
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल विकल बिचारहीं।
शब्दार्थ :
कर कान दीन्हें ➔ कानों पर हाथ रख लिए
सकल विकल ➔ सब व्याकुल होकर
बिचारहीं ➔ विचार करने लगे
व्याख्या : देवता, राक्षस और मुनि— सब घबराकर अपने कानों पर उंगलियां रखकर सोचने लगे कि यह क्या हुआ।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति वचन उचारहीं॥
शब्दार्थ :
कोदंड खंडेउ ➔ धनुष के टुकड़े कर दिए
जयति वचन ➔ जय हो, जय हो के नारे
उचारहीं ➔ लगाने लगे , उच्चारण करने लगे
व्याख्या : तुलसीदास जी कहते हैं कि सबको यह पक्का विश्वास हो गया कि श्री राम ने धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर दिए हैं, तब सब व्याकुलता छोड़ श्री राम जी की जय हो! जय हो! के नारे लगाने लगे और चारों ओर जय-जयकार होने लगी।
काव्य सौन्दर्य :
ग्रंथ एवं कवि का परिचय
यह संपूर्ण प्रसंग अवधी भाषा के सिरमौर महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित कालजयी महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड से उधृत है। गोस्वामी जी ने इस प्रसंग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के ईश्वरीय तेज, जनकपुरवासियों की व्याकुलता, और सीता जी के सात्विक प्रेम को काव्यात्मक रूप में पिरोया है।
शास्त्रीय विशिष्टता :
श्रीरामचरितमानस के इस अंश में काव्यशास्त्र के अंगों रस, छंद, अलंकार और गुण का जो शास्त्रीय समन्वय मिलता है, वह इस प्रकार है-
१. रस-योजना :
इस प्रसंग में रसों का अद्भुत उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है, जो पाठक को आदि से अंत तक बांधे रखता है:
श्रृंगार रस : श्रीराम और सीता जी के एक-दूसरे को देखने के दृश्यों में जैसे: राजत लोचन लोल..., सात्विक और मर्यादित संयोग श्रृंगार रस की छटा है। इसका स्थायी भाव रति है।
२. वात्सल्य रस: माता सुनयना का श्रीराम के सुकुमार शरीर को देखकर चिंतित होना जैसे: ए बालक असि हठ भलि नाहीं...विशुद्ध वात्सल्य रस की उत्पत्ति करता है। इसका स्थायी भाव वत्सलता है।
३. भक्ति रस: सीता जी का विभिन्न देवी-देवताओं और गणेश जी से प्रार्थना करना शांत और भक्ति रस के अंतर्गत आता है। इसका स्थायी भाव भगवद्विषयक रति है।
वीर एवं अद्भुत रस: जब लक्ष्मण जी ब्रह्मांड को थामने की बात करते हैं और श्रीराम धनुष को भंग करते हैं, तब काव्य में वीर और अद्भुत रस का संचार होता है। अंतिम छंद में चिक्करहिं दिग्गज... पंक्तियों में ओजस्वी वीर रस अपनी पराकाष्ठा पर है।
४. छंद विधान :
यह प्रसंग शास्त्रीय कड़वक शैली पर आधारित है, जहाँ निश्चित संख्या में चौपाइयों के बाद दोहा आता है:
५. चौपाई छंद: यह एक मात्रिक सम छंद है। इसके प्रत्येक चरण में १६-१६ मात्राएँ होती हैं तथा अंत में जगण (।) और तगण (ऽऽ) का निषेध होता है। यह गाने योग्य होती है।
६. दोहा छंद: यह मात्रिक अर्धसम छंद है। इसके प्रथम और तृतीय चरण में १३-१३ मात्राएँ तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में ११-११ मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में गुरु-लघु (ऽ।) का होना अनिवार्य है।
७. हरिगीतिका छंद: पाठ के अंत में प्रयुक्त भरे भुवन घोर कठोर रव... एक विशिष्ट मात्रिक छंद है, जो गति को तीव्र करने और प्रलयंकारी दृश्य को उभारने के लिए प्रयुक्त हुआ है।
८. अलंकार विधान :
तुलसीदास जी ने बिना किसी कृत्रिमता के केवल स्वाभाविक उपमानों के सहारे शास्त्रीय अलंकारों का प्रयोग किया है:
९. सांगरूपक अलंकार: 'उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग' में पूरे स्वयंवर स्थल पर सूर्योदय का हुबहू आरोप किया गया है (मंच पर उदयाचल का, श्रीराम पर बाल सूर्य का, संतों पर कमल का और नेत्रों पर भौंरों का)।
१०. उत्प्रेक्षा अलंकार: 'खेलत मनसिज मीन जुगु जनु बिधु मंडल डोल' में 'जनु' वाचक शब्द के माध्यम से सीता जी की चंचल आँखों में चंद्रमा के बर्तन में खेलती कामदेव की दो मछलियों की संभावना व्यक्त की गई है।
११. निदर्शना एवं उपमा अलंकार: 'बाल मराल की मंदर लेहीं' में कोमल स्वभाव वाले हंस के बच्चे द्वारा विशाल मंदराचल पर्वत को उठाने की बात कहकर असंभव उपमा दी गई है।
१२. अतिशयोक्ति अलंकार: अंतिम छंद में धनुष टूटने पर दिशाओं के हाथियों का चिंघाड़ना, सूर्य के घोड़ों का रास्ता बदलना आदि लोक-सीमा से बढ़कर होने के कारण यहाँ अतिशयोक्ति है।
१३. व्याकरणिक विशिष्टता :
तुलसीदास जी की अवधी भाषा केवल लोकभाषा नहीं है, बल्कि वह व्याकरण के नियमों और तत्सम शब्दों के अनूठे प्रयोग से सुसंस्कृत है। इसकी मुख्य व्याकरणिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
१४. भाषा का स्वरूप :
यह साहित्यिक अवधी भाषा है, जिसे 'बैसवाड़ी अवधी' या 'पुरबिया हिंदी' भी कहा जाता है। इसमें संस्कृत के तत्सम (जैसे: कुंभज, सिंधु, ब्रह्मांड, विलोचन) और तद्भव (जैसे: नखत, आसा, निसि, पाहीं) शब्दों का अत्यंत मधुर मिश्रण है।
१५. शब्द-शक्ति और गुण :
शब्द-शक्ति: इसमें मुख्य रूप से अभिधा (सीधा अर्थ) और जहाँ उपमा-रूपक हैं वहाँ लक्षणा शब्द-शक्ति का प्रयोग हुआ है।
१६. काव्य गुण: श्रृंगार और वात्सल्य के पदों में माधुर्य गुण है, जबकि लक्ष्मण के संवाद और धनुषभंग के क्षण में ओज गुण की प्रधानता है जो कानों में नाद (ध्वनि) उत्पन्न करता है।
१७. ध्वन्यात्मकता और नाद-सौंदर्य :
तुलसीदास जी ने अक्षरों का चयन इस प्रकार किया है कि पढ़ते समय वह दृश्य आँखों के सामने जीवंत हो जाता है। उदाहरण के लिए: 'भरे भुवन घोर कठोर रव' में भ, र, घ और ट जैसे महाप्राण और कठोर वर्णों की आवृत्ति से धनुष टूटने की भीषण कड़वाहट और गूंज (नाद-सौंदर्य) व्याकरणिक रूप से स्वतः ध्वनित होती है।
१८. पद-विन्यास और कारक चिह्न :
अवधी व्याकरण के अनुसार संबंध कारक के लिए 'केरि' (जैसे: नृपन्ह केरि आसा), 'कर' (जैसे: रानिन्ह कर दारुन) और 'कै' (जैसे: सकल सभा कै मति) का प्रयोग हुआ है।
क्रियाओं में भूतकाल और वर्तमान काल के लिए अवधी के प्रत्यय जैसे 'लीन्हें', 'कीन्हें', 'तकेउ', 'लखेउ' का सुंदर प्रयोग है, जो भाषा को प्रवाह और लय प्रदान करते हैं।