धानों का गीत
प्रिय विद्यार्थियों आज हम केदारनाथ सिंह जी द्वारा रचित बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण कविता धानों का गीत पढ़ने जा रहे हैं। यह मनमोहक कविता हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक से ली गई है। इस कविता में कवि ने एक किस…


प्रिय विद्यार्थियों आज हम केदारनाथ सिंह जी द्वारा रचित बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण कविता धानों का गीत पढ़ने जा रहे हैं।
यह मनमोहक कविता हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक से ली गई है। इस कविता में कवि ने एक किसान की भावनाओं और बादलों के प्रति उसके गहरे जुड़ाव को बहुत ही सरलता से दर्शाया है। किसान बादलों को बुला रहा है ताकि उसके खेतों में धान की फसल लहलहा उठे। धान केवल एक फसल नहीं है बल्कि किसान के लिए वह उसके प्राणों के समान है। प्रकृति और मनुष्य के बीच के इस सुंदर रिश्ते को बहुत ही सहजता से प्रस्तुत किया गया है।

किसान की आशा और बादलों को निमंत्रण:
धान उगेंगे कि प्राण उगेंगे
शब्दार्थ
धान - चावल की फसल
प्राण - जीवन या साँस
व्याख्या
किसान अत्यंत भावुक होकर कहता है कि जब खेत में धान के पौधे उगेंगे तो ऐसा लगेगा मानो उसके शरीर में नए प्राण आ गए हों क्योंकि धान ही उसका मुख्य जीवन है।
उगेंगे हमारे खेत में,
शब्दार्थ
खेत - कृषि भूमि
व्याख्या
ये जीवन रूपी धान के हरे भरे पौधे हमारे अपने खेतों में हरियाली फैलाते हुए उगेंगे और लहलाहाएंगे।
आना जी बादल जरूर !
शब्दार्थ
जरूर - अवश्य
व्याख्या
हे बादलों तुम हमारे खेतों में बरसात करने के लिए अवश्य आना, क्योंकि तुम्हारे बिना फसल का उगना संभव नहीं है।
चन्दा को बाँधेंगे कच्ची कलगीयों
शब्दार्थ
चन्दा - चंद्रमा
कलगीयों - धान के पौधों का ऊपरी कोमल हिस्सा
व्याख्या
रात के समय चाँद की सफेद रोशनी जब धान के कोमल और कच्चे पौधों पर पड़ेगी तो ऐसा लगेगा जैसे चाँद उन पौधों में बंध गया हो या उनके साथ खेल रहा हो।
सूरज को सूखी रेत में,
शब्दार्थ
सूरज - सूर्य
रेत - बालू या सूखी मिट्टी
व्याख्या
दिन के समय तेज धूप में जब सूरज की किरणें खेत की सूखी मिट्टी और रेत पर पड़ेंगी तो वह बहुत ही सुनहरा और सुंदर दृश्य होगा।
आना जी बादल जरूर !
शब्दार्थ
जी - सम्मानसूचक शब्द
व्याख्या
इसलिए हे बादलों तुम पूरे सम्मान के साथ हमारे गाँव में पानी बरसाने जरूर आना।

बादलों का इंतजार करती प्रकृति:
आगे पुकारेगी सूनी डगरिया
शब्दार्थ
सूनी - खाली या सुनसान
डगरिया - रास्ता या पगडंडी
व्याख्या
तुम्हारे इंतजार में गाँव के आगे के सुनसान रास्ते भी तुम्हें पुकारेंगे और बारिश की राह देखेंगे।
पीछे झुके वन-बेंत,
शब्दार्थ
वन - जंगल
बेंत - एक प्रकार का लचीला पौधा
व्याख्या
गाँव के पीछे जंगल में झुके हुए बेंत के पेड़ भी बारिश की बूंदों के लिए तरस रहे हैं और झुककर तुम्हें बुला रहे हैं।
संझा पुकारेंगी गीली अँखड़ियाँ
शब्दार्थ
संझा - शाम
अँखड़ियाँ - आँखें
व्याख्या
शाम के समय किसान की उम्मीद से भरी और नमी वाली आँखें तुम्हें आसमान में तलाशेंगी और पुकारेंगी।
भोर हुए धन-खेत,
शब्दार्थ
भोर - सुबह
धन-खेत - धान के खेत
व्याख्या
सुबह होते ही धान के खेत भी तुम्हारी राह देखेंगे और बारिश के लिए प्रार्थना करेंगे।
आना जी बादल जरूर,
शब्दार्थ
आना - पधारना
व्याख्या
अतः हे बादलों तुम इन सब की पुकार सुनकर हमारे गाँव में वर्षा करने के लिए अवश्य पधारना।
धान काँपेंगे कि प्राण काँपेंगे
शब्दार्थ
काँपेंगे - हिलेंगे या थरथरायेंगे
व्याख्या
जब हवा चलेगी तो धान के पौधे ऐसे हिलेंगे मानो किसान के भीतर के प्राण ही खुशी से झूम रहे हों और काँप रहे हों।
काँपेंगे हमारे खेत में,
शब्दार्थ
हमारे - अपने
व्याख्या
यह अद्भुत और खुशी से भरा दृश्य हमारे अपने खेतों में हवा के झोंकों के साथ दिखाई देगा।
आना जी बादल जरूर !
शब्दार्थ
बादल - मेघ
व्याख्या
इस खुशी को हमारे खेतों तक लाने के लिए हे बादलों तुम जल लेकर जरूर आना।

फसल पकने की अपार खुशी:
धूप ढरे तुलसी-वन झरेंगे
शब्दार्थ
धूप ढरे - शाम होने पर या धूप कम होने पर
तुलसी-वन - तुलसी के पौधों का समूह
झरेंगे - महकेंगे या झूम उठेंगे
व्याख्या
जब दिन ढलेगा और धूप कम होगी तब तुलसी के पौधों की पवित्र महक चारों ओर फैल जाएगी और वे हवा में झूम उठेंगे।
साँझ घिरे पर कनेर,
शब्दार्थ
साँझ - शाम
घिरे - घिरने पर या होने पर
कनेर - पीले रंग का एक सुंदर फूल
व्याख्या
शाम का अंधेरा घिरने पर कनेर के फूल भी खिल उठेंगे और अपनी सुंदरता बिखेरते हुए बादलों का स्वागत करेंगे।
पूजा की बेला में ज्वार झरेंगे,
शब्दार्थ
बेला - समय
ज्वार - एक प्रकार का मोटा अनाज
व्याख्या
संध्या की पूजा के समय खेतों में ज्वार के दाने भी हवा के साथ झूमते हुए झरेंगे और प्रकृति की वंदना करेंगे।
धान-दिये की बेर,
शब्दार्थ
धान-दिये - दीया जलाने का समय
बेर - समय या बेला
व्याख्या
जब घरों में शाम का दीया जलाने का समय होगा तब धान के खेत भी उस रोशनी में बहुत खूबसूरत लगेंगे और तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे।
आना जी बादल जरूर,
शब्दार्थ
जरूर - निश्चित रूप से
व्याख्या
इस पवित्र और सुंदर शाम के समय हे बादलों तुम बारिश बनकर निश्चित रूप से आना।
धान पकेंगे कि प्राण पकेंगे
शब्दार्थ
पकेंगे - पक कर तैयार होंगे
व्याख्या
जब खेतों में धान की फसल पक कर तैयार होगी तो ऐसा लगेगा जैसे किसान के जीवन की सारी तपस्या सफल हो गई हो और उसके प्राण तृप्त हो गए हों।
पकेंगे हमारे खेत में,
शब्दार्थ
खेत - कृषि भूमि
व्याख्या
यह सुनहरी और पकी हुई फसल हमारे अपने खेतों में लहराएगी जो हमारी रात दिन की मेहनत का सच्चा फल होगी।
आना जी बादल जरूर !
शब्दार्थ
आना - पधारना
व्याख्या
अंत में किसान फिर से सच्चे मन से प्रार्थना करता है कि हे बादलों इस पूरी प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए तुम जरूर आना।
काव्य सौंदर्य:
* रस - इस कविता में प्रकृति प्रेम और किसान के अपनी फसल के प्रति लगाव के कारण वात्सल्य और शांत रस की सुंदर अनुभूति होती है।
* छंद - यह एक मुक्तक छंद की कविता है जिसे बहुत ही मधुर लय और ताल के साथ गाया जा सकता है।
* अलंकार - सूनी डगरिया और संझा पुकारेंगी में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग है क्योंकि निर्जीव वस्तुओं को इंसानों की तरह पुकारते हुए
दिखाया गया है।
* भाषा - कविता की भाषा अत्यंत सरल सहज और ग्रामीण परिवेश से जुड़ी हुई है जो सीधे मन को छू लेती है।
मूल भाव:
किसान के लिए उसकी फसल केवल अनाज नहीं बल्कि उसका जीवन होती है और वह खेतों में हरियाली लाने के लिए बादलों पर पूरी तरह निर्भर रहता है। बादलों के आने से ही किसान के जीवन में खुशहाली आती है यही इस कविता का केंद्रीय संदेश है।