नागमती-वियोग-वर्णन
मलिक मोहम्मद जायसी रचित पद्मावत की कथा का आरंभ चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और उनकी रानी नागमती के सुखमय जीवन से होता है। दूसरी ओर, सात समुद्र पार सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती है, जो अत्यंत रूपवती है…


मलिक मोहम्मद जायसी रचित पद्मावत की कथा का आरंभ चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और उनकी रानी नागमती के सुखमय जीवन से होता है। दूसरी ओर, सात समुद्र पार सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती है, जो अत्यंत रूपवती है। पद्मावती के पास हीरामन नाम का एक अद्भुत और विद्वान तोता है, जो इंसानों की तरह बोल सकता है। एक दिन राजा के क्रोध से डरकर तोता महल से उड़ जाता है और एक बहेलिए द्वारा पकड़ लिया जाता है। बिकते-बिकते वह तोता अंततः चित्तौड़ के राजा रत्नसेन के दरबार में पहुँच जाता है। राजा रत्नसेन तोते की बुद्धिमत्ता से बहुत प्रभावित होते हैं और उसे अपने महल में रख लेते हैं।
एक दिन जब राजा शिकार पर गए होते हैं, रानी नागमती अपना पूर्ण श्रृंगार करके तोते के पास आती है और अहंकारवश पूछती है कि क्या इस संसार में उससे भी अधिक सुंदर कोई स्त्री है। हीरामन तोता नागमती के रूप की तुलना सिंहल द्वीप की राजकुमारी पद्मावती के अलौकिक सौंदर्य से कर देता है। यह सुनकर नागमती ईर्ष्या और इस भय से भर जाती है कि कहीं राजा इस तोते के मुख से पद्मावती के रूप का वर्णन सुनकर उसे छोड़ न दें। इसलिए वह अपनी दासी को तोते को मार डालने का आदेश देती है। दासी तोते को मारती नहीं है, बल्कि उसे छुपा देती है। राजा के लौटने पर जब सच्चाई सामने आती है, तो तोते को वापस लाया जाता है।
राजा रत्नसेन तोते से उसकी उदासी का कारण पूछते हैं, तब तोता उन्हें पद्मावती के अपूर्व सौंदर्य का नख-शिख वर्णन सुनाता है। पद्मावती के इस ईश्वरीय और अद्वितीय रूप का वर्णन सुनते ही राजा रत्नसेन मूर्छित हो जाते हैं। होश में आने पर उनके हृदय में पद्मावती को पाने की तीव्र लालसा जागृत हो जाती है। उनका मन संसार से विरक्त हो जाता है और वे अपने राजपाट, वैभव और रानी नागमती को त्यागकर एक जोगी का रूप धारण कर लेते हैं। राजा रत्नसेन हीरामन तोते को अपना मार्गदर्शक बनाकर पद्मावती की खोज में सिंहल द्वीप की कठिन यात्रा पर निकल पड़ते हैं।
कथा के ठीक इसी पड़ाव और घटना से महाकाव्य पद्मावत में नागमती वियोग वर्णन की शुरुआत होती है। जब राजा रत्नसेन अपनी रानी को महल में बिलखता हुआ छोड़कर पद्मावती की खोज में चले जाते हैं तब चित्तौड़ में अकेली छूट गई रानी नागमती की जो अत्यंत दयनीय और मार्मिक दशा होती है वही इस पूरे खंड का मुख्य विषय है। राजा के महल से कदम बाहर निकालते ही नागमती के विरह का अध्याय शुरू हो जाता है और यहीं से मलिक मोहम्मद जायसी ने बारहमासा शैली में यह दिखाना शुरू किया है कि कैसे राजा के जाने के बाद साल का हर बदलता हुआ महीना, ऋतु और प्रकृति का हर सुंदर नजारा नागमती के दुख को कम करने के बजाय उसे और अधिक जलाता है।

नागमती की विरह व्यथा :
चौपाई
नागमती चितउर पथ हेरा।
पिउ जो गए पुनि कीन्ह न फेरा।।
शब्दार्थ–
चितउर – चित्तौड़
पथ – रास्ता
हेरा – देखती है
पिउ – प्रियतम
पुनि – फिर
फेरा – वापस आना
व्याख्या: रानी नागमती चित्तौड़ के रास्ते की ओर लगातार देख रही है। उसके प्रियतम राजा रत्नसेन जो एक बार गए, तो फिर वापस लौटकर नहीं आए।
चौपाई
नागर काहु नारि बस परा।
तेइ मार पिउ मोसौं हरा।।
शब्दार्थ–
नागर – चतुर
काहु – किसी
नारि – स्त्री
बस परा – वश में हो गए
तेइ – उसने
मोसौं – मुझसे
हरा – छीन लिया
व्याख्या: नागमती सोचती है कि उसके चतुर पति किसी अन्य स्त्री के वश में हो गए हैं। उस स्त्री ने ही मेरे पति को मुझसे छीन लिया है।
चौपाई
सुआ काल होइ लेइगा पीऊ।
पिउ नहिं जात, जात बरु जीऊ।।
शब्दार्थ–
सुआ – तोता
काल – यमराज या मृत्यु
बरु – चाहे
जीऊ – प्राण
व्याख्या: वह हीरामन तोता मेरे लिए यमराज बनकर आया और मेरे प्रियतम को ले गया। ऐसा लगता है कि मेरे पति नहीं गए हैं, बल्कि उनके साथ मेरे प्राण ही चले गए हैं।
चौपाई
भयउ नरायन बाबन करा।
राज करत राजा बलि छरा।।
शब्दार्थ–
नरायन – भगवान विष्णु
बाबन – वामन अवतार
छरा – छल लिया
व्याख्या: जिस प्रकार भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर खुशी से राज करते हुए राजा बलि को छल लिया था, उसी प्रकार उस तोते ने मेरे साथ छल किया है।
चौपाई
करन पास लीन्हेउ कै छंदू।
बिप्र रूप धरि झिलमिल इंदू।।
शब्दार्थ–
करन – महाभारत के दानवीर कर्ण
पास – से
लीन्हेउ – ले लिया
छंदू – छल से
बिप्र – ब्राह्मण
इंदू – देवराज इंद्र
व्याख्या: जिस प्रकार ब्राह्मण का रूप धारण करके देवराज इंद्र ने छल से कर्ण के कवच-कुंडल ले लिए थे, वैसा ही धोखा मेरे साथ हुआ है।
चौपाई
मानत भोग गोपिचंद भोगी।
लेइ अपसवा जलंधर जोगी।।
शब्दार्थ–
अपसवा – अपने साथ
जलंधर – गुरु जालंधर नाथ
व्याख्या: जैसे राज्य का सुख भोगते हुए राजा गोपीचंद को गुरु जालंधर नाथ अपने साथ ले गए और उन्हें जोगी बना दिया, वैसे ही मेरे पति को जोगी बना दिया गया है।
चौपाई
लै कान्हहि भा अक्रूर अलोपी।
कठिन बिछोह, जियहिं किमि गोपी ?
शब्दार्थ–
कान्हहि – श्रीकृष्ण को
भा – हो गए
अलोपी – गायब या अदृश्य
बिछोह – वियोग
किमि – कैसे
व्याख्या: जिस प्रकार अक्रूर जी श्रीकृष्ण को मथुरा ले गए और गोपियों की आँखों से ओझल हो गए, इस कठिन वियोग में अब गोपियाँ कैसे जीवित रहें?
दोहा
सारस जोरी कौन हरि,
मारि बियाधा लीन्ह ?
शब्दार्थ–
सारस जोरी – सारस पक्षी का जोड़ा
हरि – हरण कर लिया
बियाधा – शिकारी या बहेलिया
व्याख्या: नागमती विलाप करते हुए कहती है कि हम पति-पत्नी रूपी सारस के जोड़े को किस बहेलिए ने मार कर एक दूसरे से अलग कर दिया
है?
दोहा
झुरि झुरि पींजर हौं भई,
बिरह काल मोहि दीन्ह।।1।।
शब्दार्थ–
झुरि झुरि – सूख-सूख कर
पींजर – हड्डियों का ढांचा
हौं भई – मैं हो गई हूँ
व्याख्या: वियोग के इस भयानक समय ने मुझे ऐसा दुःख दिया है कि मैं अपने पति की याद में सूख-सूख कर हड्डियों का ढांचा बन गई हूँ।

आषाढ़ मास का वर्णन :
चौपाई
चढ़ा असाढ़, गगन घन गाजा।
साजा बिरह दुंद दल बाजा।।
शब्दार्थ–
असाढ़ – आषाढ़ का महीना
गगन – आकाश
घन – बादल
गाजा – गरजने लगे
दुंद दल – सेना और नगाड़े
व्याख्या: आषाढ़ का महीना लग गया है और आकाश में बादल ज़ोर-ज़ोर से गरजने लगे हैं। ऐसा लग रहा है मानो मेरे विरह ने अपनी पूरी सेना सजा ली है और युद्ध के नगाड़े बज रहे हैं।
चौपाई
धूम साम, धौरे घन धाए।
सेत धजा बग पाँति देखाए।।
शब्दार्थ–
धूम – धुएँ के रंग के
साम – साँवले
धौरे – सफेद
धाए – दौड़ रहे हैं
सेत धजा – सफेद झंडी
बग पाँति – बगुलों की पंक्ति
व्याख्या: आकाश में धुएँ के रंग वाले, काले और सफेद बादल दौड़ रहे हैं। उड़ते हुए बगुलों की कतारें ऐसी लग रही हैं मानो बादलों की सेना की सफेद झंडियाँ फहरा रही हों।
चौपाई
खड़ग बीजु चमकै चहुँ ओरा।
बूंद बान बरसहिं घन घोरा।।
शब्दार्थ–
खड़ग – तलवार
बीजु – बिजली
बान – तीर
बरसहिं – बरस रहे हैं
घोरा – भयंकर
व्याख्या: चारों ओर चमकती हुई बिजली ऐसी लग रही है मानो विरह की सेना अपनी तलवार चला रही हो। भयंकर बादलों से गिरती हुई बारिश की बूँदें तीरों के समान मुझे चुभ रही हैं।
चौपाई
ओनइ घटा आइ चहुँ फेरी।
कंत! उबारु मदन हौं घेरी।।
शब्दार्थ–
ओनई – झुक कर
चहुँ फेरी – चारों ओर से
कंत – पति
उबारु – बचाइए
मदन – कामदेव
व्याख्या: आसमान से काली घटाओं ने नीचे झुक कर मुझे चारों ओर से घेर लिया है। हे मेरे प्रियतम! कामदेव ने मुझ पर आक्रमण कर दिया है, कृपया आकर मुझे बचाइए।
चौपाई
दादुर मोर कोकिला पीऊ।
गिरै बीजु, घट रहै न जीऊ।।
शब्दार्थ–
दादुर – मेंढक
पीऊ – पपीहा
घट – शरीर
जीऊ – प्राण
व्याख्या:
मेंढक, मोर और कोयल की आवाज़ें तथा पपीहे की पुकार मुझे डरा रही है। जब भी बिजली गिरती है, तो मुझे लगता है कि अब मेरे शरीर में प्राण नहीं बचेंगे।
चौपाई
पुष्य नखत सिर ऊपर आवा।
हौं बिनु नाह, मँदिर को छावा ?
शब्दार्थ–
पुष्य नखत – पुष्य नक्षत्र
नाह – नाथ या स्वामी
मँदिर – घर
छावा – छप्पर छाना
व्याख्या: पुष्य नक्षत्र सिर के ऊपर आ गया है, अर्थात भारी वर्षा का समय आ गया है। मेरे स्वामी मेरे पास नहीं हैं, तो इस बारिश में मेरे घर का छप्पर कौन ठीक करेगा?
चौपाई
अद्रा लाग लागि भुइँ लेई।
मोहिं बिनु पिउ को आदर देई ?
शब्दार्थ–
अद्रा – आर्द्रा नक्षत्र
भुइँ लेई – जमीन पानी सोख रही है या जलमग्न हो गई है
व्याख्या: आर्द्रा नक्षत्र लग गया है और पूरी धरती जलमग्न हो गई है। पति के बिना मुझे इस घर में कौन सम्मान और प्यार देगा?
दोहा
जिन्ह घर कंता ते सुखी,
जिन्ह गारौ औ गर्ब।
शब्दार्थ–
कंता – पति
गारौ – गौरव
गर्ब – गर्व या अहंकार
व्याख्या: जिनके पति उनके पास घर में मौजूद हैं, वे स्त्रियाँ बहुत सुखी हैं। उन्हें अपने सौभाग्य पर बहुत गौरव और गर्व है।
दोहा
कंत पियारा बाहिरै,
हम सुख भूला सर्ब।।2।।
शब्दार्थ–
बाहिरै – बाहर या परदेश में
सर्ब – सब कुछ
व्याख्या: लेकिन मेरे प्यारे पति घर से बाहर परदेश में हैं, इसलिए मैं अपने जीवन के सारे सुख पूरी तरह से भूल चुकी हूँ।

सावन मास का वर्णन :
चौपाई
सावन बरस मेह अति पानी।
भरनि परी, हौं बिरह झुरानी।।
शब्दार्थ–
मेह – बादल या वर्षा
भरनि परी – धरती पानी से भर गई
झुरानी – सूख रही हूँ
व्याख्या: सावन के महीने में बादलों से बहुत अधिक पानी बरस रहा है। पूरी धरती पानी से भर गई है, लेकिन मैं विरह की आग में जलकर सूख रही हूँ।
चौपाई
लाग पुनरबसु पीउ न देखा।
भइ बाउरि, कहँ कंत सरेखा।।
शब्दार्थ–
पुनरबसु – पुनर्वसु नक्षत्र
बाउरि – पगली
सरेखा – चतुर या समझदार
व्याख्या: पुनर्वसु नक्षत्र भी लग गया है लेकिन मैंने अभी तक अपने प्रियतम को नहीं देखा है। मैं वियोग में पागल हो गई हूँ, मेरे समझदार पति आखिर कहाँ हैं?
चौपाई
रकत कै आँसु परहिं भुइँ टूटी।
रेंगि चलीं जस बीरबहूटी।।
शब्दार्थ–
रकत – खून
भुइँ – धरती
बीरबहूटी – लाल रंग का एक कीड़ा जो बारिश में निकलता है
व्याख्या: मेरी आँखों से खून के लाल आँसू टूट-टूट कर धरती पर गिर रहे हैं। वे लाल आँसू धरती पर रेंगते हुए ऐसे लग रहे हैं जैसे सावन के लाल मखमली कीड़े चल रहे हों।
चौपाई
सखिन्ह रचा पिउ संग हिंडोला।
हरियरि भूमि कुसुंभी चोला।।
शब्दार्थ–
सखिन्ह – सखियों ने
हिंडोला – झूला
हरियरि – हरी-भरी
कुसुंभी – लाल रंग का
व्याख्या: मेरी सभी सखियों ने अपने पतियों के साथ सावन का झूला डाल लिया है। पूरी धरती हरी-भरी हो गई है और खुशी में स्त्रियों ने लाल रंग के सुंदर वस्त्र पहन लिए हैं।
चौपाई
हिय हिंडोल अस डोलै मोरा।
बिरह भुलाइ देइ झकझोरा।।
शब्दार्थ–
हिय – हृदय
झकझोरा – झकझोरना या हिलाना
व्याख्या: मेरा हृदय भी सावन के झूले के समान डोल रहा है और घबरा रहा है। विरह रूपी हवा आकर मेरे हृदय को बहुत ज़ोर से झकझोर देती है।
चौपाई
बाट असूझ अथाह गँभीरी।
जिउ बाउर भा, फिरै भँभीरी।।
शब्दार्थ–
बाट – रास्ता
असूझ – जो दिखाई न पड़े
जिउ – मन
भँभीरी – एक प्रकार का कीड़ा जो गोल-गोल घूमता है
व्याख्या: मेरे पति तक पहुँचने का रास्ता बहुत गहरा, कठिन और न दिखाई देने वाला है। मेरा मन पागल हो गया है और भँभीरी कीड़े की तरह गोल-गोल चक्कर काट रहा है।
चौपाई
जग जल बूड़ जहाँ लगि ताकी।
मोरि नाव खेवक बिनु थाकी।।
शब्दार्थ–
जग – संसार
ताकी – देखा
खेवक – नाविक
व्याख्या: जहाँ तक मेरी नज़र जाती है, मुझे पूरी दुनिया पानी में डूबी हुई नज़र आती है। मेरी जीवन रूपी नाव बिना नाविक के अब थक कर रुक गई है।
दोहा
परबत समुद अगम बिच,
बीहड़ घन बनढाँख।
शब्दार्थ–
अगम – जहाँ पहुँचा न जा सके
बीहड़ – भयंकर
बनढाँख – ढाक के जंगल
व्याख्या: मेरे और मेरे पति के बीच में पार न किए जा सकने वाले पहाड़, समुद्र और भयंकर घने जंगल स्थित हैं।
दोहा
किमि कै भेंटों कंत तुम्ह ,
ना मोहि पाँवन पाँख।।3।।
शब्दार्थ–
किमि कै – किस प्रकार
पाँवन – पाँवों में
पाँख – पंख
व्याख्या: हे मेरे प्रियतम! मैं आपसे कैसे आकर मिलूँ? न तो मेरे पैरों में इतनी शक्ति है और न ही मेरे पास उड़ने के लिए पंख हैं।

कुवार मास का वर्णन :
चौपाई
लाग कुवार, नीर जग घटा।
अबहुँ आउ, कंत! तन लटा।।
शब्दार्थ–
कुवार – आश्विन का महीना
नीर – पानी
लटा – कमजोर या क्षीण हो गया
व्याख्या: क्वार का महीना लग गया है और संसार में बारिश का पानी कम होने लगा है। हे प्रियतम! अब तो लौट आओ, मेरा शरीर वियोग में सूखकर बहुत कमज़ोर हो गया है।
चौपाई
तोहि देखे पिउ! पलुहै कया।
उतरा चीतु बहुरि करु मया।।
शब्दार्थ–
पलुहै – हरी-भरी होगी
कया – काया या शरीर
उतरा चीतु – मन से उतर गया
मया – दया या कृपा
व्याख्या: हे प्रियतम! तुम्हें देखने के बाद ही मेरी यह सूखी काया फिर से हरी-भरी हो सकेगी। यदि मैं तुम्हारे मन से उतर गई हूँ, तो भी मुझ पर दोबारा कृपा करो।
चौपाई
चित्रा मित्र मीन घर आवा।
पपिहा पीउ पुकारत पावा।।
शब्दार्थ–
चित्रा – चित्रा नक्षत्र
मित्र – सूर्य
मीन – कन्या राशि
व्याख्या: चित्रा नक्षत्र में सूर्य का प्रवेश हो गया है। पपीहा पीउ-पीउ पुकार कर अपने प्रियतम को पा गया है और उसकी प्यास बुझ गई है।
चौपाई
उआ अगस्त, हस्ति घन गाजा।
तुरय पलानि चढ़े रन राजा।।
शब्दार्थ–
उआ – उदय हुआ
अगस्त – अगस्त्य तारा
हस्ति – हथिया नक्षत्र
तुरय पलानि – घोड़ों पर जीन कसकर
व्याख्या: आकाश में अगस्त्य तारे का उदय हो गया है और हथिया नक्षत्र के बादल गरजने लगे हैं। वर्षा ऋतु समाप्त होते देखकर सभी राजा अपने घोड़ों पर जीन कसकर युद्ध के मैदान में जाने लगे हैं।
चौपाई
स्वाति बूँद चातक मुख परे।
समुद सीप मोती सब भरे।।
शब्दार्थ–
स्वाति बूँद – स्वाती नक्षत्र की बूँद
चातक – पपीहा पक्षी
व्याख्या: स्वाती नक्षत्र की बूँदें चातक पक्षी के मुँह में पड़ने लगी हैं और समुद्र की सीपियों में भी स्वाती की बूँद पड़ने से मोती भर गए हैं।
पंक्ति 33
सरवर सँवरि हंस चलि आए।
सारस कुरलहिं, खँजन देखाए।।
शब्दार्थ–
सरवर – सरोवर या तालाब
सँवरि – स्वच्छ हो गए
कुरलहिं – मधुर आवाज़ कर रहे हैं
खँजन – खंजन पक्षी
व्याख्या: तालाबों का जल साफ हो गया है और हंस लौट आए हैं। सारस पक्षी मधुर आवाज़ में बोल रहे हैं और खंजन पक्षी भी प्रसन्न होकर दिखाई देने लगे हैं।
चौपाई
भा परगास, बाँस बन फूले।
कंत न फिरे बिदेसहिं भूले।।
शब्दार्थ–
परगास – प्रकाश
कंत – पति
व्याख्या: चारों ओर स्वच्छ प्रकाश फैल गया है और जंगलों में बाँस फूल गए हैं। लेकिन मेरे पति जो परदेश में मुझे भूल गए हैं, वे अभी तक लौटकर नहीं आए।
दोहा
बिरह हस्ति तन सालै,
घाय करै चित चूर।
शब्दार्थ–
हस्ति – हाथी
सालै – कष्ट दे रहा है
घाय – घाव
चित – मन
व्याख्या: यह विरह रूपी पागल हाथी मेरे शरीर को लगातार कष्ट दे रहा है और मेरे हृदय को घायल करके चूर-चूर कर रहा है।
दोहा
बेगि आई, पिउ! बाजहु
गाजहु होइ सदूर।।4।।
शब्दार्थ–
बेगि – जल्दी
बाजहु – बजाइए
गाजहु – गर्जना कीजिए
सदूर – शेर या शार्दूल
व्याख्या: हे प्रियतम! जल्दी आइए और शेर बनकर गर्जना कीजिए ताकि यह विरह रूपी हाथी डर कर भाग जाए।

कार्तिक मास का वर्णन :
चौपाई
कातिक सरद चंद उजियारी।
जग सीतल, हौं बिरहै जारी।।
शब्दार्थ–
कातिक – कार्तिक का महीना
सरद चंद – शरद ऋतु का चंद्रमा
जारी – जल रही हूँ
व्याख्या: कार्तिक के महीने में शरद ऋतु की चाँदनी छिटकी हुई है। यह चाँदनी पूरे संसार को शीतलता दे रही है, लेकिन मैं विरह की आग में जल रही हूँ।
चौपाई
चौदह करा चाँद परगासा।
जनहुँ जरै सब धरति अकासा।।
शब्दार्थ–
चौदह करा – चौदह कलाएँ
परगासा – प्रकाशित है]
व्याख्या: चंद्रमा अपनी पूरी चौदह कलाओं के साथ आकाश में प्रकाशित है। लेकिन मेरी विरह-अग्नि इतनी तीव्र है कि मुझे लगता है मानो धरती और आकाश सब जल रहे हैं।
चौपाई
तन मन सेज जरै अगिदाहू।
सब कहँ चंद, भएउ मोहि राहू।।
शब्दार्थ–
सेज – बिस्तर
अगिदाहू – आग की तरह जल रहा है
राहू – राहु ग्रह
व्याख्या: मेरा तन, मन और बिस्तर आग की तरह जल रहा है। जो चंद्रमा सबके लिए सुखदायी है, वह मेरे लिए राहु के समान मुझे डसने वाला बन गया है।
चौपाई
चहुँ खंड लागै अँधियारा।
जौं घर नाहीं कंत पियारा।।
शब्दार्थ–
चहुँ खंड – चारों दिशाओं में
व्याख्या: चूँकि मेरे प्यारे पति घर पर नहीं हैं, इसलिए इस खूबसूरत चाँदनी रात में भी मुझे चारों दिशाओं में केवल अँधेरा ही दिखाई देता है।
चौपाई
अबहुँ निठुर! आउ एहि बारा।
परब देवारी होइ संसारा।।
शब्दार्थ–
निठुर – निष्ठुर या कठोर
एहि बारा – इस समय
परब देवारी – दिवाली का पर्व
व्याख्या: हे निष्ठुर प्रियतम! कम से कम अब तो वापस आ जाओ। इस समय पूरे संसार में दिवाली का उल्लास भरा त्योहार मनाया जा रहा है।
चौपाई
सखि झूमक गावैं अँग मोरी।
हौं झुरावँ, बिछुरी मोरि जोरी।।
शब्दार्थ–
झूमक – एक प्रकार का गीत या नृत्य
हौं – मैं
झुरावँ – सूख रही हूँ
जोरी – जोड़ी
व्याख्या: मेरी सभी सखियाँ खुशी से झूमकर और अंग मटका कर गीत गा रही हैं। लेकिन मैं दुखी होकर सूख रही हूँ क्योंकि मेरी जोड़ी मुझसे बिछड़ गई है।
चौपाई
जेहि घर पिउ सो मनोरथ पूजा।
मो कहँ बिरह, सवति दुख दूजा।।
शब्दार्थ–
मनोरथ – इच्छाएँ
सवति – सौत
व्याख्या: जिनके पति उनके घर में हैं, उनकी सभी इच्छाएँ पूरी हो रही हैं। मेरे लिए तो एक विरह का दुःख है और दूसरा सौत का बहुत बड़ा दुःख है।
दोहा
सखि मानैं तिउहार सब,
गाइ देवारी खेलि।
शब्दार्थ–
मानैं – मना रही हैं
देवारी – दिवाली]
व्याख्या: मेरी सभी सखियाँ दिवाली के इस पावन अवसर पर खेल-कूद कर और गाकर अपना त्योहार मना रही हैं।
दोहा
हौं का गावैं कंत बिनु,
रही हार सिर मेलि।।5।।
शब्दार्थ–
हार सिर मेलि – हार मानकर सिर झुकाए हुए]
व्याख्या: लेकिन मैं अपने पति के बिना क्या गाऊँ? मैं तो पूरी तरह से हार मानकर और निराश होकर अपना सिर झुकाए बैठी हूँ।

अगहन मास का वर्णन
चौपाई
अगहन दिवस घटा, निसि बाढ़ी।
दूभर रैनि, जाइ किमि गाढ़ी?
शब्दार्थ–
अगहन – मार्गशीर्ष का महीना
दिवस – दिन
निसि – रात
बाढ़ी – बड़ी हो गई
दूभर – कठिन
व्याख्या: अगहन के महीने में दिन छोटे हो गए हैं और रातें लंबी हो गई हैं। वियोग के कारण यह लंबी और कठिन रात आसानी से कैसे काटी जाए?
चौपाई
अब यहि बिरह दिवस भी राती।
जरौं बिरह जस दीपक बाती।।
शब्दार्थ–
जरौं – जल रही हूँ
बाती – बत्ती
व्याख्या: अब तो इस विरह में दिन भी रात के समान लंबे और अंधकारमय लगने लगे हैं। मैं इस विरह की आग में ऐसे जल रही हूँ जैसे दीपक में बत्ती जलती है।
चौपाई
काँपै हिया जनावै सीऊँ।
तो पै जाइ होइ सँग पीऊ।।
शब्दार्थ–
हिया – हृदय
सीऊँ – सर्दी
तो पै – तभी
व्याख्या: अत्यधिक सर्दी के कारण मेरा हृदय काँप रहा है। यह भयंकर सर्दी तभी जा सकती है जब मेरे प्रियतम मेरे साथ हों।
चौपाई
घर घर चीर रचे सब काहू।
मोर रूप रँग लेइगा नाहू।।
शब्दार्थ–
चीर – वस्त्र
नाहू – नाथ या पति
व्याख्या: सर्दी से बचने के लिए घर-घर में सभी ने नए-नए रंग-बिरंगे वस्त्र बना लिए हैं। लेकिन मेरा रूप और रंग तो मेरे पति अपने साथ ही ले गए हैं।
चौपाई
पलटि न बहुरा गा जो बिछोई।
अबहुँ फिरै, फिरै रँग सोई।।
शब्दार्थ–
बहुरा – लौटा
बिछोई – बिछड़ने वाला
व्याख्या: मुझसे बिछड़ने के बाद मेरा प्रियतम पलट कर वापस नहीं आया। यदि वे अब भी वापस आ जाएँ, तो मेरा खोया हुआ रूप-रंग फिर से लौट आएगा।
चौपाई
सियरि अगिनि बिरहिन हिय जारा।
सुलुगि सुलुगि दगधै होइ छारा।।
शब्दार्थ–
सियरि – ठंडी
जारा – जला रही है
दगधै – जल रही है
छारा – राख
व्याख्या: आग तो ठंड दूर करती है, लेकिन यह विरह रूपी ठंडी आग मेरे हृदय को जला रही है। मैं सुलग-सुलग कर जल रही हूँ और राख में बदल रही हूँ।
चौपाई
यह दुख दगध न जानै कंतू।
जोबन जनम करै भसमंतू।।
शब्दार्थ–
दगध – जलन
कंतू – पति
भसमंतू – भस्म या राख
व्याख्या
जलने के इस भयानक दुःख को मेरे पति नहीं जानते हैं। यह विरह मेरे यौवन और पूरे जीवन को भस्म कर रहा है।
दोहा
पिउ सौं कहेउ सँदेसड़ा,
हे भौंरा! हे काग!
शब्दार्थ–
सँदेसड़ा – संदेश
भौंरा – भ्रमर
काग – कौआ
व्याख्या: नागमती भौंरे और कौए से प्रार्थना करती है कि हे भौंरे! हे कौए! तुम लोग जाकर मेरे प्रियतम से मेरा यह संदेश कह देना।
दोहा
सो धनि बिरहै जरि मुई,
तेहि का धुआँ हम्ह लाग।।6।।
शब्दार्थ–
धनि – स्त्री या पत्नी
मुई – मर गई
व्याख्या: उनसे कहना कि तुम्हारी पत्नी विरह की आग में जलकर मर गई है। उसी के जलने का काला धुआँ हम भौंरे और कौए को लग गया है, जिससे हम काले हो गए हैं।

पूस मास का वर्णन
चौपाई
पूस जाड़ थर थर तन काँपा।
सुरुजु जाइ लंका दिसि चाँपा।।
शब्दार्थ–
पूस – पौष का महीना
जाड़ – जाड़ा या सर्दी
सुरुजु – सूर्य
लंका दिसि – दक्षिण दिशा
व्याख्या: पूस के महीने में जाड़े के कारण शरीर थर-थर काँप रहा है। ऐसा लगता है मानो ठंड से डरकर सूर्य भी दक्षिण दिशा में जाकर छिप गया है।
चौपाई
बिरह बाढ़, दारुन भा सीऊ।
कँपि कँपि मरौं, लेइ हरि जीऊ।।
शब्दार्थ–
दारुन – भयंकर
सीऊ – शीत या सर्दी
व्याख्या: मेरा विरह और बढ़ गया है तथा सर्दी बहुत भयंकर हो गई है। मैं काँप-काँप कर मर रही हूँ, यह सर्दी मेरे प्राणों का हरण कर रही है।
चौपाई
कंत कहाँ लागौं ओहि हियरे।
पंथ अपार, सूझ नहिं नियरे।।
शब्दार्थ–
हियरे – हृदय से
पंथ – रास्ता
नियरे – निकट
व्याख्या: मेरे पति कहाँ हैं जिन्हें मैं अपने गले से लगा लूँ? उनके पास जाने का रास्ता बहुत लंबा है, और पास का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है।
चौपाई
सौर सपेती आवै जूड़ी।
जानहु सेज हिवंचल बूड़ी।।
शब्दार्थ–
सौर सपेती – रजाई और चादर
जूड़ी – कंपकंपी वाली ठंड
हिवंचल – हिमालय]
व्याख्या: रजाई और सफेद चादर ओढ़ने पर भी मुझे कंपकंपी वाली ठंड लग रही है। मुझे ऐसा लग रहा है मानो मेरा बिस्तर हिमालय की बर्फ में डूब गया हो।
चौपाई
चकई निसि बिछुरै दिन मिला।
हौं दिन राति बिरह कोकिला।।
शब्दार्थ–
चकई – चकवा पक्षी की मादा
निसि – रात
कोकिला – कोयल
व्याख्या: चकवी पक्षी तो केवल रात में अपने साथी से बिछड़ती है और दिन में मिल जाती है। लेकिन मैं तो दिन-रात विरह में कोयल की तरह रोती रहती हूँ।
चौपाई
रैनि अकेलि साथ नहिं सखी।
कैसे जियै बिछोही पखी।।
शब्दार्थ–
रैनि – रात
बिछोही – बिछड़ा हुआ
पखी – पक्षी
व्याख्या: रात के समय मैं अकेली होती हूँ और मेरी सखियाँ भी मेरे साथ नहीं होतीं। ऐसे में यह अपने प्रिय से बिछड़ी हुई पक्षी रूपी नागमती कैसे जीवित रहे?
चौपाई
बिरह सचान भएउ तन जाड़ा।
जियत खाइ औ मुए न छाँड़ा।।
शब्दार्थ–
सचान – बाज़ पक्षी
तन – शरीर
मुए – मरने पर
व्याख्या: यह विरह रूपी बाज़ इस जाड़े में मेरे शरीर को नोच रहा है। यह मुझे जीते जी खा रहा है और मरने के बाद भी मुझे नहीं छोड़ेगा।
दोहा
रकत ढुरा माँसू गरा,
हाड़ भएउ सब संख।
शब्दार्थ–
ढुरा – बह गया या सूख गया
गरा – गल गया
हाड़ – हड्डियाँ
संख – शंख के समान खोखली
व्याख्या: मेरे शरीर का सारा खून सूख गया है और मांस गल गया है। मेरी सारी हड्डियाँ सूखकर शंख के समान सफेद और खोखली हो गई हैं।
दोहा
धनि सारस होइ ररि मुई,
पीऊ समेटहि पंख।।7।।
शब्दार्थ–
धनि – स्त्री
ररि – रट-रट कर या रो-रो कर
समेटहि – समेटना
व्याख्या: तुम्हारी पत्नी सारस पक्षी की तरह तुम्हारे वियोग में रो-रो कर मर गई है। हे प्रियतम! अब तो आकर उसके पंखों और हड्डियों के ढाँचे को समेट लो।

माघ मास का वर्णन :
चौपाई
लागेउ माघ परै अब पाला।
बिरहा काल भएउ जड़काला।।
शब्दार्थ–
माघ – सर्दियों का एक महीना
पाला – बर्फ या अत्यधिक ठंड
बिरहा – वियोग
काल – मृत्यु
जड़काला – जाड़े का समय या शीत ऋतु
व्याख्या: माघ का महीना लग गया है और अब बहुत अधिक पाला या कड़ाके की ठंड पड़ने लगी है। इस भयंकर जाड़े के समय में पति का वियोग मेरे लिए साक्षात मृत्यु के समान हो गया है।
चौपाई
पहल पहल तन रूई झाँपै।
हहरि हहरि अधिकौ हिय काँपै।।
शब्दार्थ–
पहल पहल – पहले-पहले या थोड़ी-थोड़ी
तन – शरीर
रूई – कपास या गर्म कपड़े
झाँपै – ढकता है
हहरि हहरि – काँप-काँप कर
हिय – हृदय या दिल
व्याख्या: ठंड से बचने के लिए शरीर को रूई या गर्म कपड़ों से ढका जाता है, लेकिन इसके बावजूद ठंड कम नहीं होती और मेरा हृदय इस सर्दी और वियोग के कारण काँप-काँप कर और अधिक सिहरने लगता है।
चौपाई
आइ सूर होइ तपु रे नाहा।
तोहि बिनु जाड़ न छूटै माहा।।
शब्दार्थ–
सूर – सूर्य
तपु – तपन या गर्मी दो
नाहा – स्वामी या पति
जाड़ – जाड़ा या ठंड
माहा – माघ महीने की
व्याख्या: हे मेरे स्वामी, अब आप ही सूर्य बनकर आइए और मुझे अपने प्रेम की गर्मी दीजिए। आपके बिना मेरे शरीर से इस माघ महीने की भयानक ठंड दूर नहीं हो सकती।
चौपाई
एहि माह उपजै रसमूलू।
तू सो भौंर मोर जोबन फूलू।।
शब्दार्थ–
रसमूलू – कामेच्छा या प्रेम का रस
भौंर – भौंरा
जोबन – यौवन या जवानी
फूलू – फूल
व्याख्या: माघ के इसी महीने में प्रकृति में प्रेम के रस का संचार होने लगता है। हे पतिदेव, आप भौंरे के समान हैं और मेरा यौवन एक फूल के समान है जो आपके आने का इंतजार कर रहा है।
चौपाई
नैन चुवहिं जस महवट नीरू।
तोकह बिनु अंग लग सर चीरू।।
शब्दार्थ–
नैन – आँखें
चुवहिं – टपक रही हैं या बह रही हैं
महवट – सर्दियों की बारिश
नीरू – पानी
तोकह बिनु – तुम्हारे बिना
सर – बाण या तीर
चीरू – कपड़े
व्याख्या: वियोग के कारण मेरी आँखों से लगातार इस तरह आँसू बह रहे हैं जैसे सर्दियों में बारिश हो रही हो। तुम्हारे बिना मेरे शरीर पर पहने हुए कपड़े भी मुझे बाणों के समान चुभ रहे हैं और कष्ट दे रहे हैं।
चौपाई
टप टप बूँद परहिं जस ओला।
बिरह पवन होइ मारै झोला।।
शब्दार्थ–
ओला – बर्फ के टुकड़े
पवन – हवा
झोला – झोंका
व्याख्या: आँखों से टपकने वाली आँसुओं की बूँदें मुझे ओलों के समान ठंडी और कठोर लग रही हैं। ऊपर से यह वियोग ठंडी हवा का झोंका बनकर मुझे लगातार मार रहा है और मेरे दुख को बढ़ा रहा है।
चौपाई
केहि क सिंगार को पहिरु पटोरा।
गीउ न हार रही होइ डोरा।।
शब्दार्थ–
सिंगार – शृंगार या सजावट
पहिरु – पहनूँ
पटोरा – रेशमी वस्त्र
गीउ – गर्दन
डोरा – धागा
व्याख्या: जब मेरे पति ही मेरे पास नहीं हैं, तो मैं किसके लिए शृंगार करूँ और किसके लिए रेशमी वस्त्र पहनूँ। वियोग में सूखकर मेरी गर्दन धागे के समान पतली हो गई है, अब इसमें हार भी नहीं पहना जा सकता।
दोहा
तुम बिनु काँपै धनि हिया,
तन तिनउर भा डोल।
शब्दार्थ–
धनि – पत्नी या स्त्री
हिया – हृदय
तिनउर – तिनका
भा – हो गया है
डोल – डोलना या काँपना
व्याख्या: नागमती कहती हैं कि हे प्रियतम, तुम्हारे बिना तुम्हारी पत्नी का हृदय काँप रहा है और मेरा शरीर सूखकर तिनके के समान कमजोर होकर हवा में डोल रहा है।
दोहा
तेहि पर बिरह जराइ कै,
चहै उड़ावा झोल।।
शब्दार्थ–
जराइ कै – जला कर
चहै – चाहता है
उड़ावा – उड़ाना
झोल – राख
व्याख्या: उस तिनके जैसे शरीर को भी यह वियोग रूपी आग जलाकर राख कर देना चाहती है और फिर उस राख को भी हवा में उड़ा देना चाहती है।

फाल्गुन मास का वर्णन :
चौपाई
फागुन पवन झकोर बहा।
चौगुन सीउ जाइ नहिं सहा।।
शब्दार्थ–
फागुन – फाल्गुन का महीना
झकोर – हवा का तेज झोंका
बहा – बहने लगा
चौगुन – चार गुना
सीउ – सर्दी या ठंड
व्याख्या: फाल्गुन के महीने में हवा के तेज झोंके बहने लगे हैं। इन ठंडी हवाओं के कारण सर्दी अब चार गुना अधिक बढ़ गई है, जिसे अब मेरे लिए सहना असंभव हो गया है।
चौपाई
तन जस पियर पात भा मोरा।
तेहि पर बिरह देइ झकझोरा।।
शब्दार्थ–
तन – शरीर
पियर – पीला
पात – पत्ता
झकझोरा – झकझोरना या हिलाना
व्याख्या: पति के वियोग में मेरा शरीर सूखकर पीले पत्ते के समान कमजोर और बेजान हो गया है। उस पर से यह विरह मुझे बार-बार तेज हवा की तरह झकझोर रहा है और कष्ट दे रहा है।
चौपाई
तरिवर झरहिं झरहिं बन ढाखा।
भइ ओनंत फूलि फरि साखा।।
शब्दार्थ–
तरिवर – पेड़ या वृक्ष
झरहिं – पत्ते गिर रहे हैं
ढाखा – पलाश के पेड़
ओनंतर – पत्रहीन या बिना पत्तों के
फूलि फरि – फूलने और फलने लगीं
साखा – डालियाँ
व्याख्या: वसंत ऋतु के आने से पेड़ों के पुराने पत्ते झड़ रहे हैं और पलाश के जंगलों में भी पत्ते गिर गए हैं। उनके स्थान पर नई डालियाँ फूलों और फलों से लदने लगी हैं।
चौपाई
करहिं बनसपति हिये हुलासू।
मो कहँ भा जग दून उदासू।।
शब्दार्थ–
बनसपति – वनस्पतियाँ या पेड़-पौधे
हिये – हृदय में
हुलासू – उल्लास या खुशी
मो कहँ – मेरे लिए
दून – दुगुना या दोगुना
व्याख्या: प्रकृति में नया जन्म देखकर सभी वनस्पतियाँ अपने हृदय में उल्लास और खुशी मना रही हैं। लेकिन मेरे स्वामी मेरे पास नहीं हैं, इसलिए मेरे लिए यह संसार दोगुना उदास और दुखी हो गया है।
चौपाई
फागु करहिं सब चाँचरि जोरी।
मोहिं तन लाइ दीन्ह जस होरी।।
शब्दार्थ–
फागु – फाग का खेल या होली
चाँचरि जोरी – समूह बनाकर नाच-गाना
मोहिं तन – मेरे शरीर में
होरी – होली की आग]
व्याख्या: सभी लोग समूह बनाकर खुशी से फाग खेल रहे हैं और नाच-गा रहे हैं। लेकिन मेरे मन में कोई खुशी नहीं है, ऐसा लगता है जैसे विरह ने मेरे शरीर में ही होली की आग लगा दी है।
चौपाई
जो पै पीउ जरत अस पावा।
जरत मरत मोहि रोष न आवा।।
शब्दार्थ–
जो पै – यदि
पीउ – प्रियतम
जरत – जलते हुए
अस – ऐसा
पावा – प्राप्त हो
रोष – गुस्सा या दुख]
व्याख्या: नागमती कहती हैं कि यदि मेरे इस प्रकार जलने और मरने से मेरे प्रियतम मुझे मिल जाएँ, तो मुझे इस आग में जलकर मरने में भी कोई दुख या क्रोध नहीं होगा।
चौपाई
राति दिवस सब यह जिउ मोरे।
लगौं निहोर कंत अब तोरे।।
शब्दार्थ–
दिवस – दिन
जिउ – हृदय या मन
लगौं निहोर – विनती करना
कंत – स्वामी
व्याख्या: हे मेरे स्वामी, रात-दिन मेरे हृदय में बस यही एक इच्छा रहती है कि मैं कब आपसे विनती करूँगी और आपके पैरों में पड़कर आपसे प्रार्थना करूँगी।
दोहा
यह तन जारौं छार कै,
कहौं कि पवन उडाव।
शब्दार्थ–
जारौं – जला दूँ
छार कै – राख करके
पवन – हवा
व्याख्या: मैं अपने इस शरीर को विरह की आग में जलाकर राख कर दूँगी और फिर हवा से प्रार्थना करूँगी कि वह मेरी इस राख को उड़ाकर ले जाए।
दोहा
सकु तेहि मारग उड़ि परै,
कंत धरैं जहँ पाव।।
शब्दार्थ–
सकु – शायद
तेहि मारग – उस रास्ते पर
धरैं – रखें
पाव – पैर
व्याख्या: शायद हवा मेरी राख को उड़ाकर उस रास्ते पर ले जाकर गिरा दे, जहाँ मेरे प्रियतम अपने पैर रखें, ताकि मरने के बाद ही सही मुझे उनका स्पर्श तो मिल सके।

चैत्र मास का वर्णन
चौपाई
चैत बसंता होइ धमारी।
मोहि लेखें संसार उजारी।।
शब्दार्थ–
चैत – चैत्र का महीना
बसंता – वसंत ऋतु
धमारी – धमाचौकड़ी या उत्सव
मोहि लेखें – मेरे लिए
उजारी – उजड़ गया है या वीरान है
व्याख्या: चैत्र के महीने में वसंत ऋतु का उत्सव और धमाचौकड़ी मची हुई है। सभी लोग खुशी मना रहे हैं, लेकिन पति के बिना मेरे लिए तो यह सारा संसार ही उजड़ा हुआ और वीरान हो गया है।
चौपाई
पंचम बिरह पंच सर मारै।
रकत रोइ सगरौं बन ढारै।।
शब्दार्थ–
पंचम – कोयल की मीठी आवाज या कामदेव
सर – बाण या तीर
रकत – रक्त या खून
सगरौं – सारा
ढारै – भिगो दिया है
व्याख्या: वसंत में कोयल की मीठी आवाज भी मुझे कामदेव के पाँच बाणों के समान घायल कर रही है। मेरे नेत्र खून के आँसू रो रहे हैं, जिससे ऐसा लगता है मानो मैंने पूरे जंगल को ही खून से लाल कर दिया है।
चौपाई
बूड़ि उठे सब तरिवर पाता।
भीजि मजीठ टेसु बन राता।।
शब्दार्थ–
बूड़ि उठे – डूब गए या भर गए
तरिवर पाता – पेड़ों के पत्ते
मजीठ – एक लाल रंग की वनस्पति
टेसु – पलाश के फूल
राता – लाल रंग का हो गया
व्याख्या: मेरे खून के आँसुओं में डूबकर ही शायद पेड़ों के नए पत्ते लाल हो गए हैं। ऐसा लगता है जैसे मजीठ और पलाश के जंगल मेरे ही रक्त से भीग कर इतने गहरे लाल रंग के हो गए हैं।
चौपाई
बौरे आम फरै अब लागे।
अबहूँ आउ घर कंत सभागे।।
शब्दार्थ–
बौरे – बौर आ जाना या मंजरियाँ आ जाना
फरै – फलने
अबहूँ – अब तो
सभागे – भाग्यवान
व्याख्या: आम के पेड़ों पर बौर आ गए हैं और अब उनमें फल भी लगने लगे हैं। हे मेरे भाग्यवान स्वामी, प्रकृति में हर जगह खुशहाली आ गई है, अब तो आप घर लौट आइए।
चौपाई
सहस भाव फूलीं बनसपती।
मधुकर घूमहिं सँवरि मालती।।
शब्दार्थ–
सहस भाव – हज़ारों प्रकार से
मधुकर – भौंरे
सँवरि – याद करके या पास आकर
मालती – मालती का फूल
व्याख्या: जंगलों में हज़ारों प्रकार की वनस्पतियाँ और फूल खिल उठे हैं। मालती के खिले हुए फूलों को देखकर भौंरे उनके चारों ओर खुशी से मँडरा रहे हैं।
चौपाई
मो कहँ फूल भए सब काँटे।
दिस्टि परत जस लागहिं चाँटे।।
शब्दार्थ–
काँटे – शूल या दर्द देने वाले
दिस्टि परत – दिखाई पड़ते ही
चाँटे – थप्पड़
व्याख्या: दुनिया के लिए जो फूल सुंदर हैं, पति के बिना मेरे लिए वे सभी फूल काँटों के समान हो गए हैं। इन फूलों पर नज़र पड़ते ही मुझे ऐसा लगता है जैसे किसी ने मुझे थप्पड़ मार दिया हो।
चौपाई
फरि जोबन भए नारँग साखा।
सुआ बिरह अब जाइ न राखा।।
शब्दार्थ–
फरि – फलकर
जोबन – यौवन
नारँग – संतरा या नारंगी
सुआ – तोता]
व्याख्या: जिस प्रकार डालियों पर नारंगी के फल पक गए हैं, उसी प्रकार मेरा यौवन भी पूर्ण हो गया है। लेकिन अब इस यौवन को विरह रूपी तोते से बचाकर रखना मेरे लिए असंभव हो गया है।
दोहा
घिरिनि परेवा होइ पिउ,
आउ बेगि परु टूटि।
शब्दार्थ–
घिरिनि – बाज पक्षी
परेवा – कबूतर या तोता
बेगि – जल्दी
परु टूटि – टूट पड़ो या झपट पड़ो
व्याख्या: हे मेरे प्रियतम, आप बाज पक्षी बनकर जल्दी से आइए और मेरे यौवन को नष्ट करने वाले इस विरह रूपी पक्षी पर टूट पड़िए ताकि मेरे प्राण बच सकें।
दोहा
नारि पराए हाथ है,
तोहि बिनु पाव न छूटि।।
शब्दार्थ–
पराए हाथ – दूसरों के हाथ में या वश में
पाव न छूटि – छुटकारा नहीं पा सकती
व्याख्या: आपकी यह पत्नी अब विरह के वश में हो चुकी है। आपके आए बिना मुझे इस भयंकर विरह से किसी भी प्रकार से छुटकारा नहीं मिल सकता है।

वैशाख मास का वर्णन :
चौपाई
भा बैसाख तपनि अति लागी।
चोआ चीर चँदन भी आगी।।
शब्दार्थ–
बैसाख – वैशाख का महीना
तपनि – भयंकर गर्मी
चोआ – सुगंधित जल
चीर – वस्त्र
आगी – आग
व्याख्या: वैशाख का महीना आ गया है और सूर्य की भयंकर गर्मी पड़ने लगी है। इस गर्मी और विरह के कारण शरीर पर लगाए जाने वाले सुगंधित जल, पहने हुए रेशमी वस्त्र और ठंडा चंदन भी आग के समान जलते हुए महसूस हो रहे हैं।
चौपाई
सूरुज जरत हिवंचल ताका।
बिरह बजागि सौंह रथ हाँका।।
शब्दार्थ–
सूरुज – सूर्य
जरत – जलता हुआ
हिवंचल – हिमालय पर्वत
बजागि – भयंकर आग
सौंह – सामने की ओर
हाँका – चलाया
व्याख्या: सूर्य की गर्मी इतनी अधिक है कि ऐसा लगता है जैसे वह खुद जलने से बचने के लिए हिमालय की ओर देख रहा है। लेकिन विरह ने अपनी भयानक आग का रथ ठीक मेरे सामने ही लाकर खड़ा कर दिया है।
चौपाई
जरत बजागिनि करु पिउ छाहाँ।
आइ बुझाउ अंगारन्ह माहाँ।।
शब्दार्थ–
बजागिनि – आग
छाहाँ – छाया
अंगारन्ह – दहकते हुए कोयले
व्याख्या: हे प्रियतम, मैं विरह की इस भयंकर आग में जल रही हूँ, अब आप ही आकर मुझ पर अपनी छाया कीजिए। इस दहकती हुई आग में आकर केवल आप ही मुझे शीतलता देकर बचा सकते हैं।
चौपाई
तोहि दरसन होइ सीतल नारी।
आइ आगि तें करु फलवारी।।
शब्दार्थ–
दरसन – दर्शन या देखने से
सीतल – ठंडी या शांत
आगि तें – आग से
व्याख्या: हे पतिदेव, आपके दर्शन मात्र से ही आपकी इस तपती हुई पत्नी का शरीर शीतल हो जाएगा। कृपया जल्दी आइए और मेरे इस जलते हुए शरीर को फिर से एक खिली हुई फुलवारी बना दीजिए।
चौपाई
लागिउँ जरै जरै जस भारू।
फिर फिर भूँजेसि तजेउँ न बारू।।
शब्दार्थ–
जरै – जलने
भारू – भाड़
भूँजेसि – भून रहा है
तजेउँ – नहीं छोड़ा
बारू – बालू या रेत
व्याख्या: मैं इस विरह की आग में इस तरह जलने लगी हूँ जैसे भाड़ में चने भुने जाते हैं। यह विरह मुझे बार-बार भून रहा है, लेकिन फिर भी यह रेत मुझे जलने के लिए नहीं छोड़ रही है।
चौपाई
सरवर हिया घटत निति जाई।
टूक टूक होइ कै बिहराई।।
शब्दार्थ–
सरवर – सरोवर या तालाब
हिया – हृदय
घटत निति – रोज़ाना कम हो रहा है
टूक टूक – टुकड़े-टुकड़े
बिहराई – फटना या टूटना
व्याख्या: मेरा हृदय एक सरोवर के समान है, जिसका पानी इस भयंकर गर्मी के कारण रोज़ कम होता जा रहा है। पानी सूखने के कारण अब मेरा हृदय गर्मी से टुकड़े-टुकड़े होकर फट रहा है।
चौपाई
बिहरत हिया करहु पिउ टेका।
दीठि दवँगरा मेरवहु एका।।
शब्दार्थ–
बिहरत – टूटते या फटते हुए
टेका – सहारा दो
दीठि – दृष्टि या नज़र
दवँगरा – वर्षा की पहली बूँद
मेरवहु – मिला दो या डाल दो
व्याख्या: हे प्रियतम, मेरे इस फटते हुए हृदय को आकर अपना सहारा दीजिए। अपनी प्रेम भरी दृष्टि रूपी बारिश की पहली बूँद मुझ पर डाल दीजिए ताकि मेरा हृदय शांत हो सके।
दोहा
कँवल जो बिगसा मानसर,
बिनु जल गयउ सुखाइ।
शब्दार्थ–
कँवल – कमल का फूल
बिगसा – खिला था
मानसर – मानसरोवर
सुखाइ – सूख गया
व्याख्या: मेरे मन रूपी मानसरोवर में जो प्रेम रूपी कमल का फूल खिला हुआ था, वह अब तुम्हारे प्रेम रूपी जल के बिना पूरी तरह से सूख गया है।
दोहा
कबहुँ बेलि फिरि पलुहै,
जौ पिउ सींचैं आइ।।
शब्दार्थ–
बेलि – लता या बेल
पलुहै – हरी-भरी हो सकती है
सींचैं – सिंचाई करें
व्याख्या: नागमती कहती हैं कि मेरी यह सूखी हुई प्रेम की बेल अब तभी फिर से हरी-भरी हो सकती है, जब मेरे प्रियतम स्वयं आकर इसे अपने प्रेम के जल से सींचेंगे।

ज्येष्ठ मास का वर्णन :
चौपाई
तपै लागि अब जेठ असाढ़ी।
मोहि पिउ बिनु छाजनि भइ गाढ़ी।।
शब्दार्थ–
तपै – तपने
जेठ असाढ़ी – ज्येष्ठ और आषाढ़ के महीने की गर्मी
छाजनि – छप्पर या घर की छत
गाढ़ी – मुश्किल
व्याख्या: अब ज्येष्ठ और आषाढ़ के महीनों की भयंकर गर्मी पड़ने लगी है। मेरे पति मेरे पास नहीं हैं, इसलिए मेरे लिए अपने घर पर छप्पर डलवाना बहुत मुश्किल हो गया है।
चौपाई
तन तिनउर भा झूरौं खरी।
भइ बरखा दुख आगरि जरी।।
शब्दार्थ–
तिनउर – तिनका
झूरौं खरी – पूरी तरह सूख गई हूँ
बरखा – बारिश या आग की वर्षा
आगरि – आग की तरह
व्याख्या: मेरा शरीर सूखकर तिनके के समान हो गया है। इस भयंकर गर्मी में आसमान से जैसे आग की वर्षा हो रही है और मेरा दुख उस आग में और अधिक जल रहा है।
चौपाई
बँध नाहिं और कंध न कोई।
बात न आव कहाँ का रोई ?
शब्दार्थ–
बँध – बाँधने वाला
कंध – कंधा देने वाला या सहारा
बात न आव – कुछ समझ नहीं आता
व्याख्या: इस टूटे हुए घर को बाँधने वाला और मुझे सहारा देने वाला अब कोई नहीं है। मुझे कुछ समझ नहीं आता कि मैं अपनी यह दुख भरी कहानी किससे कहूँ और किसके सामने रोऊँ।
चौपाई
साँठि नाठि जग बात को पूछा ?
बिनु जिउ फिरै मूँज तनु छूँछा।।
शब्दार्थ–
साँठि नाठि – धन-संपत्ति नष्ट हो जाने पर
बिनु जिउ – बिना प्राण के
मूँज – एक प्रकार की सूखी घास
छूँछा – खाली या बेकार
व्याख्या: जब इंसान की धन-संपत्ति और सुहाग नष्ट हो जाता है, तो इस संसार में उसकी कोई बात नहीं पूछता। मेरे शरीर से प्राण निकल चुके हैं और अब यह मूँज की सूखी घास की तरह एकदम खाली और बेकार हो गया है।
चौपाई
भई दुहेली टेक बिहूनी।
थाँभ नाहिं उठि सकै न थूनी।।
शब्दार्थ–
दुहेली – दुखी या बेसहारा
टेक बिहूनी – बिना सहारे के
थाँभ – खंभा
थूनी – छत को रोकने वाली लकड़ी
व्याख्या: मैं बिना किसी सहारे के बहुत ही बेसहारा और दुखी हो गई हूँ। मेरे जीवन रूपी घर में अब कोई ऐसा खंभा या लकड़ी नहीं बची है जो इस गिरती हुई छत को रोक सके।
चौपाई
बरसै मेघ चुवहिं नैनाहा।
छपर छपर होइ रहि बिनु नाहा।।
शब्दार्थ–
मेघ – बादल
चुवहिं – टपकते हैं
नैनाहा – आँखें
छपर छपर – जलमग्न या आँसुओं से भरा हुआ
नाहा – स्वामी
व्याख्या: आसमान से बारिश के बादल बरस रहे हैं और मेरी आँखों से लगातार आँसू टपक रहे हैं। स्वामी के बिना मेरा घर और मेरा जीवन पूरी तरह से आँसुओं और दुख के जल से भर गया है।
चौपाई
कोरौं कहाँ ठाट नव साजा?
तुम बिनु कंत न छाजनि छाजा।।
शब्दार्थ–
कोरौं – कैसे करूँ
ठाट नव साजा – नया शृंगार या नई सजावट
छाजनि छाजा – घर की छत सुधर सकती है
व्याख्या: हे स्वामी, जब आप ही नहीं हैं तो मैं अपना नया शृंगार कैसे करूँ और अपने घर को कैसे सजाऊँ? आपके बिना मेरे इस उजड़ते हुए घर की छत को ठीक नहीं किया जा सकता है।
दोहा
अबहूँ मया दिसिट करि
नाह निठुर घर आउ।
शब्दार्थ–
अबहूँ – अब तो
मया दिसिट – दया की दृष्टि
नाह – स्वामी
निठुर – कठोर
व्याख्या: हे मेरे कठोर हृदय वाले स्वामी, अब तो मुझ पर थोड़ी सी दया की दृष्टि कीजिए और जल्दी से अपने घर लौट आइए।
दोहा
मँदिर उजार होत है
नव कै आइ बसाउ।।
शब्दार्थ–
मँदिर – महल या घर
उजार – उजड़ रहा है
नव कै – नए सिरे से
बसाउ – बसा लीजिए
व्याख्या: मेरा यह सुंदर महल और मेरा जीवन आपके बिना उजड़ रहा है और नष्ट हो रहा है। कृपया वापस आकर मेरे इस घर और जीवन को फिर से नए सिरे से बसा लीजिए।
काव्य सौंदर्य और मूल भाव :
रस : संपूर्ण काव्यांश में अत्यंत मार्मिक और हृदय को छू लेने वाला वियोग शृंगार रस है।
छंद : कवि ने अवधी भाषा के अत्यंत लोकप्रिय दोहा और चौपाई छंद का प्रयोग किया है।
अलंकार : पंक्तियों में अनुप्रास, उपमा, रूपक और अतिशयोक्ति अलंकार का बहुत ही सजीव चित्रण मिलता है।
भाषा : जायसी ने अत्यंत मधुर, ठेठ अवधी भाषा का प्रयोग किया है, जो लोक जीवन और भावनाओं के बहुत करीब है।
कविता का केंद्रीय संदेश :
मलिक मोहम्मद जायसी ने बारहमासा के अंतर्गत 12 महीनों के माध्यम से नागमती की गहरी विरह-वेदना और एकनिष्ठ प्रेम को दर्शाया है। इसमें बताया गया है कि जब प्रियतम पास नहीं होता, तो वसंत का उल्लास भी दुख देने लगता है और गर्मी-सर्दी के मौसम शरीर को अंदर तक जला देते हैं। नागमती का वियोग केवल एक स्त्री का दुख नहीं है, बल्कि यह सच्चे प्रेम में त्याग, समर्पण और परमात्मा से मिलने के लिए तड़पती आत्मा का प्रतीक है। सच्चा प्रेम हमेशा परीक्षा लेता है और वियोग की आग में तपकर ही कुंदन बनता है।
पद्मावत महाकाव्य का मूल स्रोत :
मलिक मोहम्मद जायसी जी द्वारा रचित यह नागमती-वियोग-वर्णन उनके प्रसिद्ध और अमर महाकाव्य पद्मावत का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। पद्मावत के अंतर्गत कुल 57 खंड हैं, जिनमें से यह नागमती वियोग खंड से लिया गया है। इसे हिंदी साहित्य में विरह वर्णन की सबसे उत्कृष्ट, अद्वितीय और कालजयी रचना माना जाता है।
महाकाव्य लिखने का आधार :
जायसी जी ने इस महाकाव्य की रचना किसी एक जगह या केवल कोरी कल्पना से नहीं की है, बल्कि इसके पीछे ऐतिहासिक तथ्यों, लोककथाओं और गहरे आध्यात्मिक दर्शन का एक अद्भुत संगम है। पद्मावत महाकाव्य को लिखने के मुख्य आधार निम्नलिखित हैं-
राजपूताना इतिहास और लोककथाएं : जायसी ने चित्तौड़ के राजा रत्नसेन, रानी नागमती, सिंहल द्वीप आधुनिक श्रीलंका की राजकुमारी पद्मावती और दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की ऐतिहासिक और लोक-प्रचलित कथा को अपने महाकाव्य की नींव बनाया। उन्होंने उस समय समाज में फैले किस्से-कहानियों को एक सुंदर और व्यवस्थित काव्य का रूप दिया।
सूफी काव्य परंपरा या मसनवी शैली : जायसी जी एक सूफी संत थे। सूफी विचारधारा में प्रेम को ईश्वर तक पहुँचने का सबसे बड़ा और पवित्र साधन माना जाता है। इस महाकाव्य का सबसे बड़ा वैचारिक आधार इश्क मिजाजी यानी सांसारिक प्रेम के माध्यम से इश्क हकीकी यानी ईश्वरीय प्रेम को प्राप्त करना है।
आध्यात्मिक रूपक : यह सबसे महत्वपूर्ण आधार है। पद्मावत केवल एक राजा और दो रानियों की प्रेम कहानी बिल्कुल नहीं है, बल्कि यह मानव आत्मा और परमात्मा के मिलन का एक बहुत ही गहरा रूपक या प्रतीक है। जायसी ने प्रत्येक पात्र को एक दार्शनिक अर्थ दिया है-
राजा रत्नसेन : मानव मन या साधक यानी भक्त का प्रतीक हैं।
पद्मावती : परम सत्ता, ईश्वर या सात्विक बुद्धि की प्रतीक हैं, जिसे पाने के लिए साधक तड़पता है।
नागमती : सांसारिक माया, आकर्षण और मोह का प्रतीक हैं, जो आत्मा को परमात्मा से मिलने के मार्ग में रोकती हैं।
हीरामन तोता : गुरु का प्रतीक है, जो ईश्वर रूपी पद्मावती का रास्ता दिखाता है और साधक का मार्गदर्शन करता है।
अलाउद्दीन खिलजी : शैतान या माया का प्रतीक है, जो साधक की साधना में बाधा डालता है।
चित्तौड़गढ़ : मानव शरीर का प्रतीक है।
भारतीय बारहमासा परंपरा : जायसी ने नागमती के विरह को दर्शाने के लिए भारतीय साहित्य की प्राचीन बारहमासा परंपरा को आधार बनाया। इस परंपरा में साल के बारह महीनों में प्रकृति के बदलते स्वरूप जैसे बारिश, सर्दी, गर्मी के साथ-साथ वियोगी स्त्री के मन की दशा का बहुत ही मनोवैज्ञानिक और सूक्ष्म चित्रण किया जाता है।
निष्कर्ष :
जायसी जी ने इतिहास की एक साधारण प्रेम कथा को अपने सूफी दर्शन और ज्ञान के सांचे में ढालकर पद्मावत जैसा महाकाव्य रच दिया। नागमती का यह दुख केवल एक पति से बिछड़ने का दुख नहीं है, बल्कि यह उस सांसारिकता का प्रतीक है जो तब तड़पती और रोती है, जब मनुष्य का मन (रत्नसेन) सब कुछ छोड़कर ईश्वर (पद्मावती) की खोज में निकल पड़ता है।