नीति के दोहे
यह 'नीति के दोहे' मुख्य रूप से मानव स्वभाव, व्यावहारिक समाज-नीति, राजनीति और लोक-व्यवहार के विषय में कहे गए हैं। इन दोहों के माध्यम से महाकवि बिहारी हमें यह संदेश देना चाहते हैं कि समाज में मान-सम्मान…


यह 'नीति के दोहे' मुख्य रूप से मानव स्वभाव, व्यावहारिक समाज-नीति, राजनीति और लोक-व्यवहार के विषय में कहे गए हैं। इन दोहों के माध्यम से महाकवि बिहारी हमें यह संदेश देना चाहते हैं कि समाज में मान-सम्मान पाने या पतन से बचने के लिए मनुष्य को हमेशा विनम्र रहना चाहिए और अपने भीतर के अहंकार को त्याग देना चाहिए। वे हमें सचेत करते हैं कि धन के बढ़ने पर अपनी इच्छाओं को अनियंत्रित न होने दें, अन्यथा धन नष्ट होने पर मनुष्य मानसिक रूप से पूरी तरह टूट जाता है। इसके अतिरिक्त, वे संदेश देते हैं कि सच्ची मित्रता को बनाए रखने के लिए उसमें कभी भी धन या घमंड का मैल नहीं आने देना चाहिए, और किसी भी शासक या व्यक्ति को दूसरों के बहकावे में आकर अपने ही लोगों का अहित नहीं करना चाहिए।

दोहा 1 : दुसह दुराज प्रजानु कौं, क्यों न बढ़ै दुख-दंदु।
शब्दार्थ :
* दुसह - जिसे सहना कठिन हो
* दुराज - दो राजाओं का शासन, अराजकता
* प्रजानु कौं - प्रजा का
* दुख-दंदु - दुख और आपसी झगड़े
व्याख्या : जिस राज्य में दो राजाओं का शासन एक साथ होता है, वहाँ की प्रजा का असहनीय दुख और आपसी कलह भला क्यों न बढ़े।
अधिक अँधेरौ जग करत, मिलि मावस रबि चंदु।
शब्दार्थ :
* अधिक - ज्यादा
* अँधेरौ - अंधकार
* जग - संसार में
* मिलि - मिलकर
* मावस - अमावस्या के दिन
* रबि - सूर्य
* चंदु - चंद्रमा
व्याख्या : जैसे अमावस्या की तिथि को सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में मिलकर पूरे संसार में बहुत गहरा अंधेरा फैला देते हैं, वैसे ही दो राजा मिलकर प्रजा का शोषण करते हैं।
दोहा 2 : बसै बुराई जासु तन, ताही कौ सनमानु।
शब्दार्थ :
* बसै - निवास करती है
* जासु - जिसके
* तन - शरीर या भीतर
* ताही कौ - उसी का
* सनमानु - आदर या सम्मान
व्याख्या : आजकल के समाज में जिस दुष्ट व्यक्ति के भीतर जितनी अधिक बुराई रहती है, लोग डर या स्वार्थ के कारण उसी का उतना ही ज्यादा सम्मान करते हैं।
भलौ भलौ कहि छोड़ियै, खोटैं ग्रह जपु दानु।
शब्दार्थ :
* भलौ - अच्छे व्यक्ति को
* कहि - कहकर
* छोड़ियै - अलग या शांत छोड़ दिया जाता है
* खोटैं ग्रह - अनिष्ट या बुरे ग्रह -जैसे राहु-केतु
* जपु दानु - जप और दान करना
व्याख्या : अच्छे इंसान को तो लोग भला कहकर छोड़ देते हैं, लेकिन जब कोई क्रूर या बुरा ग्रह आ जाता है, तो लोग अनिष्ट से बचने के लिए उसकी पूजा, जप और दान करने लगते हैं।
दोहा 3 : नर की अरु नल-नीर की, गति एकै करि जोइ।
शब्दार्थ :
* नर - मनुष्य
* अरु - और
* नल-नीर - नल का पानी
* गति - स्थिति या स्वभाव
* एकै - एक समान
* करि जोइ - देखकर समझो
व्याख्या : मनुष्य की और नल के पानी की स्थिति को हमेशा एक समान ही समझकर देखना चाहिए।
जेतौ नीचो ह्वै चलै, तेतौ ऊँचौ होइ।
शब्दार्थ :
* जेतौ - जितना
* नीचौ है - नीचे होकर या विनम्र होकर
* चलै - चलता है
* तेतौ - उतना ही
* ऊँचौ - ऊपर या महान
व्याख्या : नल का पानी जितना नीचे होकर बहता है, वह उतना ही ऊपर चढ़ता है; इसी प्रकार मनुष्य जितना अधिक विनम्रता से व्यवहार करता है, समाज में वह उतना ही उच्च स्थान और सम्मान पाता है।
दोहा 4 : बढ़त-बढ़त संपति-सलिलु, मन-सरोजु बढ़ि जाइ।
शब्दार्थ :
* संपति-सलिलु - धन रूपी जल
* मन-सरोजु - मन रूपी कमल का फूल
* बढ़ि जाइ - बढ़ जाता है
व्याख्या : जब मनुष्य के पास धन रूपी पानी बहुत अधिक बढ़ने लगता है, तो उसके साथ ही उसका मन रूपी कमल यानी उसकी इच्छाएं और वासनाएं भी बहुत बढ़ जाती हैं।
घटत-घटत सु न फिरि घटै, बरु समूल कुम्हिलाइ।
शब्दार्थ :
* घटत-घटत - कम होते-होते
* सु - वह, मन
* न फिरि घटै - दोबारा कम नहीं होता
* बरु - चाहे या भले ही
* समूल - जड़ सहित
* कुम्हिलाइ - मुरझा जाता है
व्याख्या : लेकिन जब वह धन रूपी पानी घटने लगता है, तो बढ़ी हुई इच्छाएं वापस कम नहीं होतीं, बल्कि मनुष्य अंदर से टूटकर जड़ सहित मुरझा जाता है।
दोहा 5 : जौ चाहत चटक न घटै, मैलौ होइ न मित्त।
शब्दार्थ :
* जौ - यदि
* चाहत - चाहते हो
* चटक - चमक या घनिष्ठता
* घटै - कम हो
* मैलौ - गंदा या खराब
* मित्त - मित्र या मित्रता
व्याख्या : हे मित्र! यदि तुम यह चाहते हो कि तुम्हारी मित्रता की चमक और आपसी गहरा प्रेम कभी कम न हो तथा उसमें कोई खटास न आए।
रज राजसु न छुवाइ तौ, नेह-चीकनौ चित्त।
शब्दार्थ :
* रज राजसु - धूल रूपी धन-दौलत या अहंकार , रजोगुण
* न छुवाइ - स्पर्श न होने देना
* नेह-चीकनौ - प्रेम से चिकना या कोमल बना हुआ
* चित्त - मन या हृदय
व्याख्या : ....तो अपने इस प्रेम से सराबोर कोमल मन को धन-दौलत के घमंड और ईर्ष्या रूपी धूल से कभी भी स्पर्श मत होने देना I वैसे ही, जैसे चिकनी वस्तु पर धूल जमने से वह खराब हो जाती है।
दोहा 6 : बुरौ बुराई जौ तजै, तौ चितु खरौ डरातु।
शब्दार्थ :
* बुरौ - दुष्ट या बुरा व्यक्ति
* तजै - त्याग दे या छोड़ दे
* तौ - तब भी
* चितु - मन
* खरौ - बहुत अधिक
* डरातु - डरता रहता है
व्याख्या : यदि कोई अचानक बहुत बुरा या दुष्ट व्यक्ति अपनी दुष्टता को पूरी तरह छोड़ भी दे, तब भी साधारण लोगों का मन उससे हमेशा डरता रहता है।
ज्यों निकलंकु मयंकु लखि, गनैं लोग उतपातु।
शब्दार्थ :
* ज्यों - जैसे
* निकलंकु - निष्कलंक या बिना दाग के
* मयंकु - चंद्रमा
* लखि - देखकर
* गनैं - मानने लगते हैं
* उतपातु - अपशकुन या अमंगल
व्याख्या : यह ठीक वैसा ही है जैसे आसमान में अचानक बिना किसी दाग का बिल्कुल साफ चंद्रमा देखकर लोग उसे किसी आने वाले अमंगल या अपशकुन का सूचक मानने लगते हैं।
दोहा 7 : स्वारथु सुकृत न, श्रमु बृथा, देखि, बिहंग, बिचारि।
शब्दार्थ :
* स्वारथु - अपना खुद का स्वार्थ
* सुकृत न - अच्छा कार्य नहीं है
* श्रमु - मेहनत
* बृथा - बेकार या व्यर्थ
* बिहंग - पक्षी (यहाँ बाज पक्षी के लिए आया है)
* बिचारि - सोच-विचार कर
व्याख्या : हे बाज पक्षी! तू अच्छी तरह सोच-विचार कर देख कि दूसरों के बहकावे में आकर अपनी ही जाति के छोटे पक्षियों को मारना न तो तेरा कोई स्वार्थ पूरा करता है और न ही यह कोई अच्छा काम है; तेरी यह मेहनत पूरी तरह बेकार है।
बाज, परायें पानि परि, तूँ पच्छीनु न मारि।
शब्दार्थ :
* परायें पानि - दूसरों के हाथ में या शिकारी के हाथ में
* परि - पड़कर या आकर
* पच्छीनु - अपनी ही जाति के निर्दोष पक्षियों को
* न मारि - मत मार
व्याख्या : इसलिए हे बाज! तू उस शिकारी के हाथों की कठपुतली बनकर अपनी ही जाति के इन मासूम और निर्दोष पक्षियों का शिकार मत कर अर्थात राजा जयसिंह के संदर्भ में - औरंगज़ेब के कहने पर अपने ही हिंदू भाइयों पर आक्रमण मत कर I
काव्य सौंदर्य :
रस: भक्ति के दोहों में भक्ति रस एवं शांत रस की प्रधानता है; नीति के दोहों में शांत रस है।
छंद: ये सभी रचनाएँ मात्रिक छंद 'दोहा' में लिखी गई हैं जिसके पहले व तीसरे चरण में 13-13 तथा दूसरे व चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं।
भाषा: शुद्ध, सरस और साहित्यिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया गया है। शैली चमत्कारपूर्ण है।
अलंकार:
अनुप्रास अलंकार: 'भव-बाधा', 'राधा नागरि', 'पीतु पटु', 'कपट-कपाट', 'दुसह दुराज', 'मैलौ होइ न मित्त' आदि में वर्णों की आवृत्ति है।
उत्प्रेक्षा अलंकार: 'मनु ससि सेखर की अकस...' तथा 'मनौ नीलमनि-सैल पर...' में मनु,मनौ वाचक शब्द के कारण।
पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार: 'ज्यों-ज्यों', 'त्यों-त्यों', 'बढ़त-बढ़त', 'घटत-घटत', 'भलौ-भलौ' शब्दों की पुनरावृत्ति के कारण।
रूपक अलंकार: 'मन-सदन' मन रूपी घर, 'कपट-कपाट' कपट रूपी किवाड़, 'संपति-सलिलु' धन रूपी जल 'मन-सरोजु' मन रूपी कमल में।
अन्यौक्ति अलंकार: अंतिम दोहे में बाज के माध्यम से राजा जयसिंह को सचेत किया गया है।