पद
महाकवि सूरदास जी ने इन पदों के माध्यम से मानव जीवन को भक्ति, वैराग्य और लोक-व्यवहार का एक व्यावहारिक संदेश दिया है। वे मुख्य रूप से यह प्रतिपादित करना चाहते हैं कि ईश्वर की असीम कृपा के बिना मानव ज…


महाकवि सूरदास जी ने इन पदों के माध्यम से मानव जीवन को भक्ति, वैराग्य और लोक-व्यवहार का एक व्यावहारिक संदेश दिया है। वे मुख्य रूप से यह प्रतिपादित करना चाहते हैं कि ईश्वर की असीम कृपा के बिना मानव जीवन का कल्याण असंभव है, क्योंकि उनकी दया से असंभव भी संभव हो जाता है। इसके साथ ही, उन्होंने निराकार ब्रह्म की साधना को अत्यंत कठिन और दुर्गम मानते हैं, जो सामान्य जन की पहुँच से बाहर है I उन्होंने सगुण साकार श्रीकृष्ण की लीलाओं और भक्ति को ही मोक्ष का सबसे सुलभ और आनंदमयी मार्ग बताया है।
बाल-लीलाओं के चित्रण के माध्यम से सूरदास जी ने मातृ-प्रेम की पराकाष्ठा दिखाते हुए यह संदेश दिया है कि भगवान किसी बाहरी आडंबर या कठिन तपस्या से नहीं, बल्कि निश्चल, निश्छल और सहज बाल-भाव के प्रेम से वशीभूत होते हैं। संक्षेप में, उनका संदेश यह है कि मनुष्य को अपने अहंकार का त्याग कर पूर्ण समर्पण के साथ ईश्वर के सगुण रूप की भक्ति में लीन हो जाना चाहिए, क्योंकि यही मन को शाश्वत संतोष और परम आनंद प्रदान करने वाला एकमात्र सच्चा मार्ग है।

पद संख्या - 1 श्रीकृष्ण के चरणों की वंदना
पंक्ति 1: चरन-कमल बंदौ हरि राइ।
कठिन शब्दार्थ:
चरन-कमल = कमल रूपी चरण (रूपक अलंकार)
बंदौ = वंदना करता हूँ
हरि राइ = भगवान श्रीकृष्ण,
राइ = राजा के राजा या सर्वोच्च स्वामी
व्याख्या : महाकवि सूरदास जी कहते हैं कि मैं भगवान श्री कृष्ण के कमल रूपी सुंदर चरणों की बार-बार वंदना करता हूँ।
पंक्ति 2: जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै,
अंधे को सब कछु दरसाइ।
कठिन शब्दार्थ:
जाकी = जिसकी
पंगु = लंगड़ा व्यक्ति
गिरि = पर्वत
लंघै = पार कर जाता है, लांघ जाता है
दरसाइ = दिखाई देने लगता है
व्याख्या: जिनकी कृपा हो जाने पर लंगड़ा व्यक्ति भी बड़े-से-बड़े पहाड़ को पार कर जाता है और अंधे व्यक्ति को सब कुछ दिखाई देने लगता है
पंक्ति 3: बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै,
रंक चलै सिर छत्र धराइ।
कठिन शब्दार्थ:
बहिरौ = बहरा व्यक्ति
पुनि = दोबारा, फिर से
रंक = अत्यंत दरिद्र या भिखारी व्यक्ति
छत्र धराइ = राजाओं की तरह सिर पर मुकुट या छाता धारण करके
व्याख्या: ईश्वर के चरणों की कृपा से बहरा आदमी सुनने लगता है, गूँगा व्यक्ति फिर से बोलने लगता है और अत्यंत गरीब व्यक्ति भी राजा बनकर अपने सिर पर छत्र धारण कर चलने लगता है।
पंक्ति 4: सूरदास स्वामी करुनामय,
बार-बार बंदौ तिहिं पाइ।
कठिन शब्दार्थ:
करुनामय = दया के सागर, करुणामयी
तिहिं = उन
पाइ = पैरों की , चरणों की
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि मेरे स्वामी श्री कृष्ण अत्यंत दयालु हैं, इसलिए मैं ऐसे कृपालु भगवान के चरणों की बार-बार वंदना करता हूँ।
पद संख्या - 2 निर्गुण ब्रह्म की साधना की कठिनाई और सगुण की श्रेष्ठता
पंक्ति 1: अबिगत-गति कछु कहत न आवै।
कठिन शब्दार्थ:
अबिगत = अज्ञात, निराकार, निर्गुण ब्रह्म
गति = दशा या स्थिति
कहत न आवै = कहते नहीं बनती, वर्णन नहीं किया जा सकता
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि निराकार ब्रह्म की स्थिति के बारे में कुछ भी कहते नहीं बनता, अर्थात उसका वर्णन करना असंभव है।
पंक्ति 2: ज्यौं गूँगे मीठे फल कौ रस,
अंतरगत ही भावै।
कठिन शब्दार्थ:
ज्यौं = जिस प्रकार
कौ = का
अंतरगत = हृदय के भीतर ही भीतर
भावै = अच्छा लगता है, आनंद देता है
व्याख्या: जिस प्रकार कोई गूँगा व्यक्ति मीठा फल खाकर उसके स्वाद को मन ही मन महसूस करता है और आनंदित होता है, लेकिन बोलकर उसका बखान नहीं कर सकता।
पंक्ति 3: परम स्वाद सबही सु निरंतर,
अमित तोष उपजावै।
कठिन शब्दार्थ:
सबही सु = सभी को
निरंतर = लगातार, सदा
अमित = असीमित, अत्यधिक
तोष = संतोष, आनंद
उपजावै = उत्पन्न करता है
व्याख्या: ठीक उसी तरह निराकार ईश्वर की भक्ति से मिलने वाला परम आनंद मन को हमेशा असीम संतोष देता है, जिसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता।
पंक्ति 4: मन-बानी कौ अगम-अगोचर,
सो जाने जो पावै।
कठिन शब्दार्थ:
मन-बानी = मन और वाणी से
अगम = जहाँ पहुँचना कठिन हो
अगोचर = जो इंद्रियों से परे हो, जो दिखाई न दे, सुनाई न दे
सो = वही
व्याख्या: वह निराकार ईश्वर मन और वाणी की पहुँच से दूर है। उसे न तो देखा जा सकता है और न महसूस किया जा सकता है; उसे तो केवल वही जान सकता है जिसने उसे प्राप्त कर लिया हो।
पंक्ति 5: रूप-रेख-गुन-जाति-जुगति-बिनु,
निरालंब कित धावै।
कठिन शब्दार्थ:
रेख = आकृति या चिह्न
जुगति = युक्ति, उपाय
बिनु = बिना
निरालंब = बिना किसी सहारे के
कित = कहाँ
धावै = भटके, दौड़े
व्याख्या: उस निराकार ब्रह्म का न तो कोई रूप है, न कोई पहचान है, न कोई निश्चित गुण है और न ही कोई जाति है। उसे पाने का कोई उपाय भी नहीं है; ऐसे में भक्त का मन बिना किसी सहारे के कहाँ-कहाँ भटकता फिरे? अर्थात साकार रूप के बिना मन कहीं टिक नहीं पाता।
पंक्ति 6: सब बिधि अगम बिचारहिं तातैं,
सूर सगुण-पद गावै।
कठिन शब्दार्थ:
बिधि = प्रकार से
तातैं = इसलिए, इस कारण
सगुण-पद = साकार लीला के पद
व्याख्या: सूसूरदास जी कहते हैं कि जब मैंने सब प्रकार से विचार कर लिया कि निराकार ईश्वर तक पहुँचना अत्यंत कठिन है, तब मैंने श्री कृष्ण के सगुण रूप की लीलाओं के पदों को गाना ही सही समझा।

पद संख्या - 3 श्रीकृष्ण की बाल-लीला का अनूठा वर्णन
पंक्ति 1: किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।
कठिन शब्दार्थ:
किलकत = किलकारी मारते हुए या हँसते हुए
कान्ह = बालक श्रीकृष्ण
घुटुरुवनि = घुटनों के बल
आवत = आ रहे हैं
व्याख्या: बाल कृष्ण राजा नंद के आँगन में प्रसन्न होकर किलकारी मारते हुए घुटनों के बल चले रहे हैं।
पंक्ति 2: मनिमय कनक नंद कै आँगन,
बिंब पकरिबै धावत।
कठिन शब्दार्थ:
मनिमय = मणियों से युक्त
कनक = सोना, स्वर्ण निर्मित
बिंब = परछाई, प्रतिबिंब
पकरिबै = पकड़ने के लिए
धावत = दौड़ते हैं
व्याख्या: बाबा नंद का आँगन सोने का बना है और उसमें अनेक मणियाँ जड़ी हुई हैं। उस आँगन में बालक कृष्ण अपनी ही परछाईं को पकड़ने के लिए आगे दौड़ते हैं।
पंक्ति 3: कबहुँ निरखि हरि आपु छाँह कौ,
कर सौं पकरन चाहत।
कठिन शब्दार्थ:
कबहुँ = कभी
निरखि = देखकर
आपु = अपनी स्वयं की
छाँह = परछाई
कर सौं = हाथों से
व्याख्या: कृष्ण कभी तो अपनी परछाईं को ध्यान से देखते हैं और फिर उसे अपने छोटे-छोटे हाथों से पकड़ना चाहते हैं।
पंक्ति 4: किलकि हँसत राजत द्वै दतियाँ,
पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत।
कठिन शब्दार्थ:
राजत = सुशोभित होते हैं, सुंदर लगते हैं
द्वै दतियाँ = आगे के दो नन्हे दांत
पुनि-पुनि = बार-बार
अवगाहत = दिखाते हैं, प्रकट करते हैं
व्याख्या: जब वे किलकारी मारकर हँसते हैं, तो उनके आगे के दो छोटे-छोटे दाँत बहुत सुंदर लगते हैं, और वे बार-बार हँसकर अपनी उसी क्रिया को दोहराते हैं।
पंक्ति 5: कनक-भूमि पर कर-पग छाया,
यह उपमा इक राजति।
कठिन शब्दार्थ:
कनक-भूमि = स्वर्ण रूपी धरती
कर-पग = हाथ और पैर
राजति = सुशोभित हो रही है
व्याख्या: उस सोने के आँगन की धरती पर उनके हाथ और पैरों की जो परछाईं पड़ती है, वह दृश्य देखकर एक अनोखी सुंदरता मन में आती है।
पंक्ति 6: करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा,
कमल बैठकी साझति।
कठिन शब्दार्थ:
प्रतिपद = प्रत्येक कदम पर
प्रतिमनि = प्रत्येक मणि में
बसुधा = पृथ्वी
बैठकी = आसन
साझति = सजाती है, तैयार करती है
व्याख्या: ऐसा लगता है मानो बालक कृष्ण के हर कदम पर और आँगन की प्रत्येक मणि में पृथ्वी ने उनके बैठने के लिए कमल का सुंदर आसन सजा दिया हो।
पंक्ति 7: बाल-दसा-सुख निरखि जसोदा,
पुनि-पुनि नंद बुलावति।
कठिन शब्दार्थ:
बाल-दसा = बाल लीला, बचपन की स्थिति
निरखि = देखकर
जसोदा = माता यशोदा
व्याख्या: श्री कृष्ण की इस बाल-लीला के सुख को देखकर माता यशोदा इतनी खुश होती हैं कि वे बार-बार बाबा नंद को भी यह दृश्य देखने के लिए बुलाती हैं।
पंक्ति 8: अँचरा तर लै ढाँकि,
सूर के प्रभु कौ दूध पियावति।
कठिन शब्दार्थ:
अँचरा तर = आंचल के नीचे
लै ढाँकि = ढककर
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि इसके बाद माता यशोदा अपने प्रभु बाल कृष्ण को अपने आँचल के नीचे ढक लेती हैं और प्रेमपूर्वक उन्हें दूध पिलाने लगती हैं।

पद संख्या - 4 श्रीकृष्ण का गाय चराने जाने का बाल-हठ
पंक्ति 1: मैं अपनी सब गाइ चरैहौं।
कठिन शब्दार्थ:
गाइ = गायें
चरैहौं = चराने जाऊंगा
व्याख्या: बाल कृष्ण अपनी माता यशोदा से जिद करते हुए कहते हैं कि हे माता! मैं भी अपनी सारी गायों को चराने के लिए जंगल जाऊँगा।
पंक्ति 2: प्रात होत बल कै संग जैहौं,
तेरे कहैं न रैहौं।
कठिन शब्दार्थ:
प्रात होत = सुबह होते ही
बल = दाऊ भाई बलराम
जैहौं = जाऊंगा
रैहौं = रुकूँगा, रहूँगा
व्याख्या: सुबह होते ही मैं भैया बलराम के साथ जंगल चला जाऊँगा और तुम्हारे रोकने पर भी घर में नहीं रुकूँगा।
पंक्ति 3: ग्वाल बाल गाइनि के भीतर,
नैकहूँ डर नहिं लागत।
कठिन शब्दार्थ:
गाइनि = गायों के
नैकहूँ = तनिक भी, थोड़ा सा भी
व्याख्या: मुझे जंगल में अन्य ग्वाल-बालों और गायों के बीच रहने में ज़रा सा भी डर नहीं लगता है।
पंक्ति 4: आजु न सोवौं नंद-दुहाई,
रैनि रहँगो जागत।
कठिन शब्दार्थ:
नंद-दुहाई = नंद बाबा की कसम खाकर
रैनि = रात भर
व्याख्या: मैं बाबा नंद की कसम खाकर कहता हूँ कि आज मैं रात भर नहीं सोऊँगा और जागता रहूँगा ,ताकि सुबह होते ही गाय चराने जा सकूँ।
पंक्ति 5: और ग्वाल सब गाइ चरैहैं,
मैं घर बैठो रैहौं?
कठिन शब्दार्थ:
बैठो रैहौं = बैठा रहूँगा
व्याख्या: कृष्ण कहते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है कि गाँव के सारे ग्वाल-बाल तो गाय चराने जाएँ और मैं घर पर अकेला बैठा रहूँ?
पंक्ति 6: सूर स्याम तुम सोइ रहौ अब,
प्रात जान मैं दैहौं।
कठिन शब्दार्थ:
सोइ रहौ = सो जाओ
जान मैं दैहौं = जाने दूंगी
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि बालक कृष्ण की ऐसी बातें सुनकर माता यशोदा कहती हैं कि हे श्याम! अब तुम चुपचाप सो जाओ, मैं वादा करती हूँ कि सुबह होते ही तुम्हें जंगल जाने दूँगी।

पद संख्या - 5 गायें चराने से परेशान होकर बालक कृष्ण की शिकायत
पंक्ति 1: मैया हौं न चरैहौं गाइ।
कठिन शब्दार्थ:
हौं = मैं
न चरैहौं = नहीं चराऊंगा
व्याख्या: जंगल से लौटने के बाद बालक कृष्ण माता यशोदा से शिकायत करते हैं कि हे माता! अब मैं गाय चराने कभी नहीं जाऊँगा।
पंक्ति 2: सिगरे ग्वाल घिरावत मोसौं,
मेरे पाइ पिराइ।
कठिन शब्दार्थ:
सिगरे = सारे, संपूर्ण
घिरावत मोसों = मुझसे ही गायों को हकवाते या इकट्ठा करवाते हैं
पाइ पिराइ = पैर दर्द करने लगे हैं
व्याख्या: जंगल में सभी ग्वाले मुझसे ही अपनी गायों को हाँकने या घेरने के लिए कहते हैं, इधर-उधर दौड़ते-दौड़ते मेरे छोटे-छोटे पैर दर्द करने लगे हैं।
पंक्ति 3: जौं न पत्याहि पूछि बलदाउहिं,
अपनी सौंह दिवाइ।
कठिन शब्दार्थ:
जौं न पत्याहि = यदि विश्वास न हो
बलदाउहिं = बलराम भैया से
सौंह दिवाइ = अपनी कसम खिलाकर
व्याख्या: यदि तुम्हें मेरी बात पर विश्वास न हो, तो तुम अपनी कसम दिलाकर भैया बलराम से पूछ लो ताकि वे सच बोल दें I
पंक्ति 4: यह सुनि माइ जसोदा ग्वालिन,
गारी देति रिसाइ।
कठिन शब्दार्थ:
माइ = माता
गारी देति = अपशब्द या डांटना
रिसाइ = क्रोधित होकर, गुस्सा होकर
व्याख्या: अपने नन्हे बालक कृष्ण की यह दुखभरी बात सुनकर माता यशोदा अन्य ग्वालों पर बहुत गुस्सा होती हैं और क्रोध में उन्हें भला-बुरा कहने लगती हैं।
पंक्ति 5: मैं पठवति अपने लरिका कौं,
आवै मन बहराइ।
कठिन शब्दार्थ:
पठवति = भेजती हूँ
लरिका कौं = अपने बच्चे को
मन बहराइ = मन बहलाने के लिए
व्याख्या: यशोदा जी कहती हैं कि मैं तो अपने छोटे से बच्चे को जंगल इसलिए भेजती हूँ ताकि वह वहाँ जाकर अपना मन बहला आए।
पंक्ति 6: सूर स्याम मेरौ अति बालक,
मारत ताहि रिंगाइ।
कठिन शब्दार्थ:
अति बालक = बहुत छोटा बच्चा
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा तड़पकर कहती हैं कि मेरा कृष्ण तो अभी बहुत छोटा है और ये निर्दयी ग्वाले उसे जंगल में दौड़ा-दौड़ा कर परेशान कर रहे हैं।

पद संख्या - 6 मुरली के प्रति गोपियों की ईर्ष्या - सौतिया डाह
पंक्ति 1: सखी री, मुरली लीजै चोरि।
कठिन शब्दार्थ:
मुरली = बांसुरी
लीजै चोरि = चुरा ली जाए
व्याख्या: कृष्ण के बाँसुरी-प्रेम से जलन रखने वाली गोपियाँ आपस में बात करती हैं कि हे सखी! हमें कृष्ण की इस बाँसुरी को चुरा लेना चाहिए।
पंक्ति 2: जिनि गुपाल कीन्हे अपनै बस,
प्रीति सबनि की तोरि।
कठिन शब्दार्थ:
जिनि = जिसने
गुपाल = श्रीकृष्ण को
अपनै बस = अपने वश में
सबनि की तोरि = हम सबका प्रेम तुड़वाकर
व्याख्या: क्योंकि इस बाँसुरी ने श्री कृष्ण को अपने वश में कर लिया है और हम सबके प्रति कृष्ण के प्रेम को तुड़वा दिया है।
पंक्ति 3: छिन इक घर-भीतर, निसि-बांसर,
धरत न कबहूँ छोरि।
कठिन शब्दार्थ:
छिन इक = एक क्षण के लिए भी
निसि-बांसर = रात और दिन, निसि = रात, बांसर = दिन
धरत न = नहीं रखते हैं
छोरि = छोड़कर, अलग करके
व्याख्या: कृष्ण इस बाँसुरी के प्रेम में इतने खोए रहते हैं कि घर के भीतर हों या बाहर, दिन हो या रात, वे इसे एक पल के लिए भी अपने से अलग करके नहीं रखते।
पंक्ति 4: कबहूँ कर, कबहूँ अधरनि,
कटि कबहूँ खोंसत जोरि।
कठिन शब्दार्थ:
कर = हाथ में
अधरनि = होठों पर
कटि = कमर में
खोंसत जोरि = कसकर खोंस लेते हैं या बाँध लेते हैं
व्याख्या: वे इसे कभी अपने हाथों में थामे रहते हैं, कभी अपने होठों पर लगा लेते हैं और कभी अपनी कमर के कपड़े (पीतांबर) में खोंस लेते हैंI
पंक्ति 5: ना जानौं कछु मेलि मोहिनी,
राखे अँग-अँग भोरि।
कठिन शब्दार्थ:
मेलि मोहिनी = मोहिनी मंत्र चलाकर, जादू करके
भोरि = भुलाकर, वश में करके
व्याख्या: समझ नहीं आता कि इस बाँसुरी ने कृष्ण पर ऐसा कौन सा जादू-टोना कर दिया है कि कृष्ण का अंग-अंग इसके वश में हो गया है।
पंक्ति 6: सूरदास, प्रभु कौ मन सजनी, बँध्यौ राग की डोरि।
कठिन शब्दार्थ:
सजनी = हे सखी
राग की डोरि = प्रेम या संगीत की डोरी से
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ कहती हैं कि हे सखी! हमारे प्रभु श्री कृष्ण का मन तो इस बाँसुरी के साथ प्रेम की डोर में पूरी तरह बँध चुका है।

पद संख्या - 7 श्रीकृष्ण का उद्धव से ब्रज की यादों को साझा करना
पंक्ति 1: ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
कठिन शब्दार्थ:
ऊधौ = उद्धव जी कृष्ण के परम मित्र
मोहिं = मुझे
बिसरत नाहीं = भूलता नहीं है
व्याख्या: जब उद्धव ब्रज से लौटकर मथुरा आते हैं, तो श्री कृष्ण उनसे अपने मन की बात कहते हैं कि हे उद्धव! मुझसे ब्रज की यादें किसी भी तरह भुलाई नहीं जाती हैं।
पंक्ति 2: वृंदावन गोकुल बन उपवन,
सघन कुँज की छाहीं।
कठिन शब्दार्थ:
सघन = घनी, गहरी
व्याख्या: वृंदावन और गोकुल के वे घने जंगल, बगीचे और वहाँ की लताओं की वह ठंडी और घनी छाया मुझे बहुत याद आती है।
पंक्ति 3: प्रात समय माता जसुमति अरु,
नंद देखि सुख पावत।
कठिन शब्दार्थ:
जसुमति अरु = यशोदा और
देखि सुख पावत = देखकर परम आनंद मिलता था
व्याख्या: सुबह के समय माता यशोदा और बाबा नंद मुझे देखकर जो परम आनंद और सुख पाते थे, वह मुझे बार-बार याद आता है।
पंक्ति 4: माखन रोटी दह्यौ सजायौ,
अति हित साथ खवावत।
कठिन शब्दार्थ:
दह्यौ सजायौ = जमाया हुआ गाढ़ा दही
अति हित = अत्यंत प्रेम के साथ
व्याख्या: माता यशोदा मक्खन, रोटी और बड़े प्यार से जमाया हुआ दही मुझे कितने स्नेह के साथ अपने हाथों से खिलाती थीं।
पंक्ति 5: गोपी ग्वाल बाल सँग खेलत,
सब दिन हँसत सिरात।
कठिन शब्दार्थ:
सब दिन = पूरा दिन
सिरात = बीत जाता था, समाप्त हो जाता था
व्याख्या: ब्रज में गोपियों और ग्वाल-बालों के साथ खेलते-कूदते मेरा पूरा दिन हँसते-हँसते कब बीत जाता था, पता ही नहीं चलता था।
पंक्ति 6: सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी,
जिनसौ हित जदुनाथ।
कठिन शब्दार्थ:
धनि-धनि = धन्य हैं, महान हैं
जिनसौ = जिनसे
हित = प्रेम, भलाई
जदुनाथ = यदुनाथ, श्रीकृष्ण
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि वे ब्रज के रहने वाले लोग सचमुच धन्य हैं, जिनसे स्वयं भगवान यदुनाथ इतना अगाध प्रेम करते हैं और उनके बारे में हर पल सोचते हैं।

पद संख्या - 8 गोपियों द्वारा उद्धव के ज्ञानयोग का खंडन
पंक्ति 1: ऊधौ मन न भए दस बीस।
कठिन शब्दार्थ:
मन न भए = हमारे पास कई मन नहीं हैं
व्याख्या: जब उद्धव गोपियों को निराकार ब्रह्म की साधना करने का उपदेश देते हैं, तब गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव! हमारे पास कोई दस या बीस मन नहीं हैं।
पंक्ति 2: एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग,
को अवराधै ईस।
कठिन शब्दार्थ:
हुतौ = था
को = कौन
अवराधै = आराधना या पूजा करे
ईस = तुम्हारे निराकार ईश्वर की
व्याख्या: हमारे पास तो केवल एक ही मन था, और वह भी श्री कृष्ण के साथ ही मथुरा चला गया। अब हम किस मन से आपके इस निराकार ईश्वर की आराधना करें?
पंक्ति 3: इंद्री सिथिल भई केसव बिनु,
ज्यौं देही बिनु सीस।
कठिन शब्दार्थ:
इंद्री सिथिल = हमारी ज्ञानेंद्रियां कमजोर या निष्क्रिय हो गई हैं
केसव बिनु = श्रीकृष्ण के बिना
देही = शरीर
सीस = सिर
व्याख्या: श्री कृष्ण के बिना हमारी सारी ज्ञानेंद्रियाँ वैसे ही शक्तिहीन और निर्जीव हो गई हैं, जैसे सिर कट जाने पर बिना सिर का धड़ (शरीर) बेजान हो जाता है।
पंक्ति 4: आसा लागि रहति तन स्वासा,
जीवहिं कोटि बरीस।
कठिन शब्दार्थ:
आसा लागि = मिलने की आशा में
तन स्वासा = शरीर में सांसें चल रही हैं
जीवहिं = जीवित रह सकती हैं
कोटि बरीस = करोड़ों वर्ष तक (कोटि = करोड़, बरीस = वर्ष)
व्याख्या: हमारे शरीर में साँसें केवल इस आशा में चल रही हैं कि एक दिन कृष्ण लौटकर ज़रूर आएँगे। इसी उम्मीद के सहारे हम करोड़ों वर्ष तक जीवित रह सकती हैं।
पंक्ति 5: तुम तौ सखा स्याम सुंदर के,
सकल जोग के ईस।
कठिन शब्दार्थ:
सखा = मित्र
सकल जोग = संपूर्ण योग साधना या मिलन के
ईस = ज्ञाता, स्वामी
व्याख्या: हे उद्धव! तुम तो श्याम सुंदर के परम मित्र हो और संपूर्ण योग विद्या के ज्ञाता हो। तुम चाहो तो हमारा मिलन कृष्ण से करा सकते हो।
पंक्ति 6: सूर हमारे नंदनंदन बिनु,
और नहीं जगदीस।
कठिन शब्दार्थ:
नंदनंदन = नंद के पुत्र श्रीकृष्ण
जगदीस = कोई दूसरा संसार का स्वामी या भगवान
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ साफ शब्दों में कहती हैं कि नंद के लाडले श्री कृष्ण के बिना हमारा इस दुनिया में कोई दूसरा आराध्य देव या ईश्वर नहीं है।

पद संख्या - 9 गोपियों का उद्धव पर करारा व्यंग्य
पंक्ति 1: ऊधौ जाहु तुमहिं हम जाने।
कठिन शब्दार्थ:
जाहु = चले जाओ, लौट जाओ
तुमहिं हम जाने = हम तुम्हें अच्छी तरह जान गई हैं
व्याख्या: गोपियाँ उद्धव पर व्यंग्य करते हुए कहती हैं कि हे उद्धव! तुम यहाँ से वापस चले जाओ, हम तुम्हारे ज्ञान और इरादों को अच्छी तरह समझ गई हैं।
पंक्ति 2: स्याम तुमहिं ह्याँ कौं नहिं पठयौ,
तुम हौ बीच भुलाने।
कठिन शब्दार्थ:
ह्याँ कौं = यहाँ के लिए
पठयौ = भेजा है
बीच भुलाने = रास्ता भूलकर भटक कर आ गए हो
व्याख्या: हमें पूरा यकीन है कि श्याम ने तुम्हें हमारे पास नहीं भेजा है, तुम स्वयं ही रास्ता भूलकर यहाँ ब्रज में आ गए हो।
पंक्ति 3: ब्रज नारिनि सौं जोग कहत हौ,
बात कहत न लजाने।
कठिन शब्दार्थ:
नारिनि = नारियों, स्त्रियों से
जोग = निर्गुण योग साधना
व्याख्या: तुम हम ब्रज की गोपियों से योग साधना करने की बात कह रहे हो, तुम्हें ऐसी बात कहते हुए ज़रा भी शर्म नहीं आती?
पंक्ति 4: बड़े लोग न बिबेक तुम्हारे,
ऐसे भए अयाने।
कठिन शब्दार्थ:
बिबेक तुम्हारे = तुम्हारे पास बुद्धि या विवेक नहीं है
अयाने = अज्ञानी, मूर्ख, नासमझ
व्याख्या: तुम दिखने में तो बड़े बुद्धिमान लगते हो, पर ऐसा लगता है कि तुम्हारे पास विवेक नहीं है, तभी तो तुम बच्चों जैसी नासमझ बातें कर रहे हो।
पंक्ति 5: हमसौ कही लई हम सहि कै,
जिय गुनि लेहु सयाने।
कठिन शब्दार्थ:
हमसौ कही = हमसे कहा
सहि कै = हमने बर्दाश्त कर लिया
जिय गुनि लेहु = अपने हृदय में विचार कर लो
सयाने = हे चतुर उद्धव
व्याख्या: तुमने यह योग की बात हमसे कही, सो हमने तो सह ली। लेकिन हे चतुर उद्धव! तुम खुद अपने दिल में विचार करो कि क्या यह बात सही है?
पंक्ति 6: कहँ अबला कहँ दसा दिगंबर,
मष्ट करौ पहिचाने।
कठिन शब्दार्थ:
कहँ अबला = कहाँ हम सुकुमार स्त्रियां
दसा दिगंबर = वस्त्रहीन या कठिन योगियों की अवस्था
मष्ट करौ = अब चुप हो जाओ, शांत रहो
व्याख्या: कहाँ हम कोमल स्त्रियाँ और कहाँ योगियों की कठिन वस्त्रहीन (निराकार) स्थिति! अब तुम चुप हो जाओ और अपनी सीमा पहचानो।
पंक्ति 7: साँच कहौ तुमकौ अपनी सौं,
बूझति बात निदाने।
कठिन शब्दार्थ:
साँच कहौ = सच-सच बताओ
अपनी सौं = तुम्हें तुम्हारी कसम है
बूझति = पूछती हूँ
निदाने = अंत में, सचमुच
व्याख्या: हम तुम्हें अपनी कसम देकर सच-सच पूछ रही हैं, तुम अंत में सच ही बताना, कोई झूठ मत बोलना।
पंक्ति 8: सूर स्याम जब तुमहिं पठायौ,
तब नैकहूँ मुसकाने।
कठिन शब्दार्थ:
पठायौ = भेजा था
नैकहूँ = थोड़ा सा भी
मुसकाने = हँसे थे
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ उद्धव से पूछती हैं कि जब श्याम तुम्हें यहाँ भेज रहे थे, तब क्या वे थोड़ा मुस्कुराए थे? अगर वे मुस्कुराए थे, तो समझो उन्होंने तुम्हारे साथ मज़ाक किया है।

पद संख्या - 10 निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप पर गोपियों के प्रश्न
पंक्ति 1: निरगुन कौन देस कौ बासी?
कठिन शब्दार्थ:
निरगुन = निराकार ब्रह्म
देस कौ बासी = किस देश का रहने वाला है
व्याख्या: गोपियाँ उद्धव से उनके निराकार ईश्वर के बारे में पूछती हैं कि हे उद्धव! तुम्हारा यह निराकार ब्रह्म किस देश का रहने वाला है? हमें उसका पता तो बताओ।
पंक्ति 2: मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै,
बूझति साँच न हाँसी।
कठिन शब्दार्थ:
मधुकर = भौंरा (यहाँ उद्धव के लिए संबोधन है)
सौंह दै = कसम देकर
बूझति = पूछ रही हूँ
हाँसी = मज़ाक नहीं कर रहीं
व्याख्या: हे उद्धव! हम तुम्हें अपनी कसम देकर सच-सच पूछ रही हैं, हम कोई मज़ाक नहीं कर रही हैं, तुम हमें अच्छी तरह समझाकर बताओ।
पंक्ति 3: को है जनक, कौन है जननी,
कौन नारि, को दासी?
कठिन शब्दार्थ:
को = कौन
जनक = पिता
जननी = माता
नारि = पत्नी
व्याख्या: उस निराकार ब्रह्म का पिता कौन है? उसकी माता कौन है? उसकी पत्नी कौन है और उसकी दासी कौन है?
पंक्ति 4: कैसे बरन, भेष है कैसो,
किहिं रस मैं अभिलाषी?
कठिन शब्दार्थ:
बरन = वर्ण, रंग
भेष = वेशभूषा, पहनावा
किहिं रस = किस आनंद या रस का
अभिलाषी = चाहने वाला, शौकीन
व्याख्या: उसका रंग कैसा है? उसकी वेशभूषा कैसी है? और वह किस रस आनंद को पसंद करने वाला है?
पंक्ति 5: पावैगो पुनि कियौ आपनौ,
जो रे करैगौ गाँसी।
कठिन शब्दार्थ:
पावैगो पुनि = वैसा ही फल पाओगे
कियौ आपनौ = अपने किए का
गाँसी = छल-कपट या झूठ
व्याख्या: हे उद्धव! याद रखना, यदि तुमने हमसे बात करने में जरा भी छल-कपट या झूठ का सहारा लिया, तो तुम अपने किए का फल खुद ही भुगतोगे।
पंक्ति 6: सुनत मौन ह्वै रह्यौ बावरौ,
सूर सबै मति नासी।
कठिन शब्दार्थ:
मौन ह्वै रह्यौ = चुप हो गया, अवाक रह गया
बावरौ = बावला, पागल सा
मति नासी = बुद्धि नष्ट हो गई
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों के इन सीधे और तार्किक प्रश्नों को सुनकर ज्ञानी उद्धव बिल्कुल चुप और पागलों की तरह अवाक रह गए, मानो उनकी सारी बुद्धि नष्ट हो गई हो।

पद संख्या - 11 माता यशोदा का देवकी को भेजा गया मार्मिक संदेश
पंक्ति 1: संदेसौ देवकी सौं कहियौ।
कठिन शब्दार्थ:
संदेसौ = संदेश, पैगाम
सौं = से
कहियौ = कह देना
व्याख्या: माता यशोदा कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद, वहाँ जाने वाले एक पथिक से कहती हैं कि हे भाई! मेरा यह संदेश कृष्ण की सगी माता देवकी से जाकर कह देना।
पंक्ति 2: हौं तो धाइ तिहारे सुत की,
मया करत ही रहियौ।
कठिन शब्दार्थ:
धाइ = पालन-पोषण करने वाली दाई मां
तिहारे सुत = तुम्हारे पुत्र की
मया करत = दया, स्नेह बनाए रखना
व्याख्या: मैं तो तुम्हारे बेटे कृष्ण की केवल एक धाय हूँ, फिर भी मेरा दिल उसके प्रति ममता से भरा रहता है, इसलिए मुझ पर अपनी कृपा बनाए रखना।
पंक्ति 3: जदपि टेव तुम जानति उनकी,
तऊ मोहिं कहि आवै।
कठिन शब्दार्थ:
जदपि = यद्यपि, हालाँकि
टेव = आदतें, हठ
तऊ = फिर भी
मोहिं कहि आवै = मेरा मन कहने के लिए व्याकुल हो रहा है
व्याख्या: हालाँकि तुम कृष्ण की माँ हो और उसकी सारी आदतों को अच्छी तरह जानती ही होगी, फिर भी एक माँ होने के नाते मुझसे कुछ बातें कहे बिना रहा नहीं जा रहा है।
पंक्ति 4: प्रात होत मेरे लाल लड़ैतैं,
माखन रोटी भावै।
कठिन शब्दार्थ:
लाल लड़ैतै = अत्यधिक लाडले और प्यारे बेटे को
भावै = अच्छी लगती है
व्याख्या: सुबह होते ही मेरे लाडले कृष्ण को खाने में माखन और रोटी सबसे ज़्यादा पसंद है, वह इसी की जिद करता है।
पंक्ति 5: तेल उबटनौ अरु तातौ जल,
ताहि देखि भजि जाते।
कठिन शब्दार्थ:
उबटनौ = शरीर पर लगाया जाने वाला सुगंधित लेप
तातौ जल = गर्म पानी
भजि जाते = भाग जाते थे
व्याख्या: स्नान के समय तेल, उबटन और गर्म पानी को देखते ही कृष्ण डरकर वहाँ से भाग जाता था (वह नहाने में नखरे करता था)।
पंक्ति 6: जोइ-जोइ माँगत सोइ-सोइ देती,
क्रम-क्रम करि कै न्हाते।
कठिन शब्दार्थ:
जोइ-जोइ = जो कुछ भी
सोइ-सोइ = वही सब
क्रम-क्रम = धीरे-धीरे, एक-एक करके
व्याख्या: उस समय वह जो-जो चीजें माँगता था, मैं उसे वही देती थी, तब कहीं जाकर वह धीरे-धीरे बड़ी मुश्किल से स्नान करता था।
पंक्ति 7: सूर पथिक सुनि मोहिं रैनि-दिन,
बढ़्यौ रहत उर सोच।
कठिन शब्दार्थ:
पथिक = हे राहगीर
रैनि-दिन = रात-दिन
उर सोच = हृदय में चिंता, दुख
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि माता यशोदा कहती हैं कि हे पथिक! मुझे रात-दिन बस अपने दिल में एक ही चिंता सताती रहती है।
पंक्ति 8: मेरौ अलक लड़ैतौ मोहन,
ह्वैहै करत सँकोच।
कठिन शब्दार्थ:
अलक लड़ैतौ = अत्यधिक दुलारा संकोची स्वभाव का
ह्वैहै करत सँकोच = वहां नई जगह पर अपनी मांगें रखने में संकोच करता होगा
व्याख्या: मेरा अत्यंत लाडला और सीधा स्वभाव का मोहन मथुरा में नई जगह पर देवकी से अपनी मनपसंद चीजें माँगने में बहुत संकोच कर रहा होगा।