पदावली
प्यारे विद्यार्थियों, प्रस्तुत पदावली हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित है और इसके रचयिता भक्तिकाल के महान संत कबीरदास जी हैं। इन पदों में कबीरदास जी ने जीवात्मा और परमात्मा के अद्भुत प्रेम, ज्ञान की आंधी …


प्यारे विद्यार्थियों,
प्रस्तुत पदावली हमारी पाठ्यपुस्तक में संकलित है और इसके रचयिता भक्तिकाल के महान संत कबीरदास जी हैं। इन पदों में कबीरदास जी ने जीवात्मा और परमात्मा के अद्भुत प्रेम, ज्ञान की आंधी के प्रभाव, केवल नाम रटने के खोखलेपन, आत्मा की अमरता और परमात्मा के साथ एकाकार होने की स्थिति का अत्यंत मार्मिक और दार्शनिक वर्णन किया है।

जीवात्मा और परमात्मा का अद्भुत विवाह :
दुलहिन गावहु मंगलचार।
शब्दार्थ-
दुलहिन ~ सौभाग्यवती स्त्रियां
गावहु ~ गाओ
मंगलचार ~ मंगल गीत या शुभ गीत
व्याख्या : कबीरदास जी जीवात्मा रूपी स्त्रियों से कहते हैं कि हे सौभाग्यवती सखियों तुम सब मिलकर खुशी के मंगल गीत गाओ।
हम घरि आए हो राजा राम भरतार।।
शब्दार्थ-
घरि ~ घर में
भरतार ~ स्वामी या पति
व्याख्या : क्योंकि आज मेरे घर में स्वयं राजा राम यानी परमात्मा मेरे पति के रूप में पधारे हैं।
तन रति करि मैं, मन रति करिहूँ पंचतत बराती।।
शब्दार्थ-
तन रति ~ शरीर से प्रेम
मन रति ~ मन से प्रेम
पंचतत ~ पांच तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश)
व्याख्या : मैं अपने तन और मन दोनों से अपने प्रभु से सच्चा प्रेम करूंगी और इस अनोखे विवाह में पांचों तत्व बाराती बनकर आए हैं।
रामदेव मोरैं पाहुँनैं आये, मैं जोबन मैं माती।।
शब्दार्थ-
रामदेव ~ भगवान राम या परमात्मा
पाहुँनैं ~ मेहमान या दूल्हा
जोबन ~ यौवन या भक्ति का जोश
माती ~ मस्त या मगन
व्याख्या : परमात्मा स्वयं मेरे घर मेहमान या दूल्हे के रूप में आए हैं और मैं उनकी भक्ति के प्रेम और यौवन में पूरी तरह मगन हूँ।
सरीर सरोवर बेदी करिहूँ, ब्रह्मा बेद उचार।।
शब्दार्थ-
सरीर ~ शरीर
सरोवर ~ तालाब
बेदी ~ विवाह का मंडप
उचार ~ उच्चारण
व्याख्या : मैं अपने शरीर रूपी पवित्र तालाब को विवाह का मंडप बनाऊंगी और स्वयं ब्रह्मा जी आकर हमारे विवाह में वेदों के मंत्र पढ़ेंगे।
रामदेव संगि भाँवरी लैहूँ, धनि धनि भाग हमार।।
शब्दार्थ-
संगि ~ साथ में
भाँवरी ~ फेरे
धनि धनि ~ धन्य है
व्याख्या : मैं अपने परमात्मा राम के साथ विवाह के फेरे लूंगी और यह मेरे लिए बहुत ही सौभाग्य और धन्य होने की बात है।
सुर तेतीसूँ कौतिग आये, मुनिवर सहस अठ्यासी।।
शब्दार्थ-
सुर तेतीसूँ ~ तैंतीस कोटि देवता
कौतिग ~ आश्चर्य या तमाशा देखने
सहस अठ्यासी ~ अट्ठासी हजार मुनि
व्याख्या : मेरे इस दिव्य विवाह को देखने के लिए तैंतीस करोड़ देवता और अट्ठासी हजार श्रेष्ठ मुनि भी आश्चर्य के साथ आए हैं।
कहै कबीर हँम व्याहि चले हैं, पुरिष एक अबिनासी।।
शब्दार्थ-
व्याहि ~ विवाह करके
पुरिष ~ पुरुष
अबिनासी ~ जिसका कभी नाश न हो
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मैं उस एक अविनाशी परमात्मा से विवाह करके हमेशा के लिए उनके साथ जा रहा हूँ।

प्रभु प्राप्ति का असीम आनंद :
बहुत दिनन थैं मैं प्रीतम पाये।
शब्दार्थ-
थैं ~ से
प्रीतम ~ प्रियतम या परमात्मा
व्याख्या : जीवात्मा कहती है कि मैंने बहुत दिनों की लंबी तपस्या और इंतजार के बाद अपने प्रियतम परमात्मा को पाया है।
भाग बड़े घरि बैठे आये।।
शब्दार्थ-
भाग बड़े ~ बहुत अच्छी किस्मत
घरि बैठे ~ बिना कहीं भटके घर पर ही
व्याख्या : यह मेरी बहुत अच्छी किस्मत है कि मुझे उन्हें खोजने के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ा और वे मुझे घर बैठे ही मिल गए।
मंगलाचार माँहि मन राखौँ, राम रसाँइण रसना चाषौँ।।
शब्दार्थ-
मंगलाचार ~ शुभ आनंद
रसाँइण ~ रस या आनंद
रसना ~ जीभ
चाषौँ ~ चखूं
व्याख्या : अब मैं अपना मन इसी शुभ आनंद में लगाए रखूंगी और अपनी जीभ से केवल राम नाम के मीठे रस का ही स्वाद लूंगी।
मंदिर माँहि भयो उजियारा, ले सूतो अपना पीव पियारा।।
शब्दार्थ-
मंदिर ~ शरीर रूपी घर
उजियारा ~ ज्ञान का प्रकाश
सूतो ~ सोऊंगी या मगन रहूंगी
पीव ~ प्रियतम
व्याख्या : परमात्मा के आने से मेरे शरीर रूपी मंदिर में ज्ञान का प्रकाश हो गया है और अब मैं अपने प्यारे प्रियतम के साथ आनंद मगन रहूंगी।
मैं रनि राती जे निधि पाई, हमहिं कहाँ तुमहिं बड़ाई।
शब्दार्थ-
रनि राती ~ प्रेम में रंगी हुई या पूरी तरह समर्पित
निधि ~ खजाना
बड़ाई ~ कृपा या महानता
व्याख्या : मैंने प्रेम में पूरी तरह डूबकर जो यह भक्ति का अनमोल खजाना पाया है। इसमें मेरी कोई योग्यता नहीं है, बल्कि यह सब आपकी ही कृपा है।
कहै कबीर मैं कछु न कीन्हा, सखी सुहाग मोहिं दीन्हाँ।।
शब्दार्थ-
कीन्हा ~ किया
सुहाग ~ सौभाग्य
दीन्हाँ ~ दिया
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि जीवात्मा अपनी सखियों से कह रही है कि मैंने कुछ नहीं किया। यह सुहाग और सौभाग्य तो स्वयं प्रभु ने मुझे दिया है।

ज्ञान की आंधी और भ्रम का नाश :
संतौ भाई आई ग्यान की आँधी रे।
शब्दार्थ-
ग्यान ~ ज्ञान
व्याख्या : हे संत भाइयो मेरे जीवन में ज्ञान की बहुत तेज आंधी आ गई है।
भ्रम की टाटी सबै उड़ाणी , माया रहै न बाँधी रे।
शब्दार्थ-
भ्रम ~ संदेह
टाटी ~ छप्पर की दीवार या परदा
उड़ाणी ~ उड़ गई
व्याख्या : ज्ञान की आंधी आने से मेरे मन का सारा संदेह रूपी परदा उड़ गया है और अब मुझे माया के बंधन भी नहीं बांध पा रहे हैं।
दुचिते की द्वै थूँनी गिरानी, मोह बलिंडा टूटा।
शब्दार्थ-
दुचिते ~ दुविधा या दोहरी सोच
थूँनी ~ खंभा
बलिंडा ~ छप्पर को रोकने वाली मुख्य लकड़ी
व्याख्या : इस आंधी से मेरे मन की दुविधा रूपी दोनों खंभे गिर गए हैं और मोह रूपी मुख्य लकड़ी भी टूट कर गिर गई है।
त्रिस्नाँ छाँनि परि घर ऊपरि, कुबुधि का भाँडाँ फूटा।।
शब्दार्थ-
त्रिस्नाँ ~ तृष्णा या लालच
छाँनि ~ छप्पर
कुबुधि ~ बुरी बुद्धि
भाँडाँ ~ बर्तन
व्याख्या : ज्ञान के आने से लालच रूपी छप्पर घर के ऊपर से उड़ गया है और जब छप्पर गिरा तो बुरी बुद्धि रूपी सारे बर्तन फूट गए।
जोग जुगति करि संतौ बाँधी, निरचू चुवै न पाँणी।
शब्दार्थ-
जोग जुगति ~ योग की युक्ति या उपाय
निरचू ~ जरा सा भी
चुवै ~ टपकना
पाँणी ~ पानी या विषय वासना
व्याख्या : इसके बाद संतों ने योग और साधना के उपायों से एक नया और मजबूत छप्पर बांधा है, जिसमें से वासना रूपी पानी जरा सा भी नहीं टपकता है।
कूड़ कपट काया का निकस्या, हरि की गति जब जाँणी।
शब्दार्थ-
कूड़ कपट ~ कूड़ा कचरा या बुराइयां
काया ~ शरीर
निकस्या ~ निकल गया
जाँणी ~ जानी या समझी
व्याख्या : जब मैंने भगवान की असली गति और उनके स्वरूप को समझ लिया तो मेरे शरीर से सारी बुराइयों का कूड़ा पूरी तरह बाहर निकल गया।
आँधी पीछे जो जल बूठा, प्रेम हरि जन भींनाँ।।
शब्दार्थ-
बूठा ~ बरसा
भींनाँ ~ भीग गया
व्याख्या : ज्ञान की इस आंधी के बाद ईश्वर की कृपा और प्रेम की जो बारिश हुई, उसमें भगवान का यह भक्त पूरी तरह से भीग कर आनंदित हो गया।
कहै कबीर भाँन के प्रगटे, उदित भया तम षीनाँ।।
शब्दार्थ-
भाँन ~ भानु या सूर्य
उदित ~ उगना
तम ~ अंधकार
छींनाँ ~ क्षीण या खत्म होना
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार सूर्य के उगने से अंधेरा खत्म हो जाता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से सारा अज्ञान हमेशा के लिए मिट गया है।

नाम रटने का खंडन और सच्ची भक्ति :
पंडित बाद बदंते झूठा।
शब्दार्थ-
बाद ~ विवाद या चर्चा
बदंते ~ बोलते हैं
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि विद्वान और पंडित लोग ईश्वर के बारे में जो केवल बाहरी और किताबी चर्चा करते हैं। वह सब पूरी तरह झूठी है।
राम कह्याँ दुनियाँ गति पावै, खाँड कह्याँ मुख मीठा।
शब्दार्थ-
कह्याँ ~ कहने से
गति ~ मोक्ष या उद्धार
खाँड ~ चीनी
व्याख्या : अगर केवल मुंह से राम कहने भर से संसार का उद्धार हो जाता तो, केवल मुंह से चीनी शब्द बोलने से ही सबका मुंह मीठा हो जाना चाहिए था।
पावक कह्याँ पाँव जे दाझैं, जल कहि त्रिषा बुझाई।
शब्दार्थ-
पावक ~ आग
दाझैं ~ जल जाए
त्रिषा ~ प्यास
व्याख्या : अगर केवल आग शब्द बोलने से पैर जल जाएं और केवल पानी शब्द बोलने से प्यास बुझ जाए, तभी राम शब्द रटने से मोक्ष मिल सकता है।
भोजन कह्याँ भूष जे भाजै, तौ सब कोइ तिरि जाई।।
शब्दार्थ-
भूष ~ भूख
भाजै ~ भाग जाए
तिरि जाई ~ पार उतर जाए या मोक्ष पा ले
व्याख्या : अगर केवल भोजन शब्द कहने से भूख मिट जाती तो, दुनिया का हर इंसान बिना कुछ किए ही भवसागर पार कर लेता।
नर कै साथ सूवा हरि बोलै, हरि परताप न जाणै।
शब्दार्थ-
नर ~ मनुष्य
सूवा ~ तोता
परताप ~ प्रताप या महिमा
जाणै ~ जाने
व्याख्या : मनुष्य के साथ रहकर तोता भी राम का नाम रट लेता है, लेकिन वह भगवान की सच्ची महिमा और उनके प्रताप को बिल्कुल नहीं जानता।
जो कबहुँ उड़ि जाइ जंगल में, बहुरि न सुरतै आणै।।
शब्दार्थ-
कबहुँ ~ कभी
बहुरि ~ दोबारा
सुरतै आणै ~ याद आना
व्याख्या : अगर वह तोता कभी उड़कर वापस जंगल में चला जाए तो, उसे राम का नाम दोबारा कभी याद नहीं आता।
साची प्रीति विषै माया सूँ, हरि भगतिनि सूँ हासी।
शब्दार्थ-
साची ~ सच्ची
विषै माया ~ सांसारिक विषय वासना
हासी ~ मजाक
व्याख्या : लोग सच्ची प्रीति तो सांसारिक मोह माया से करते हैं और भगवान की सच्ची भक्ति का केवल दिखावा करके उसका मजाक उड़ाते हैं।
कहै कबीर प्रेम नहिं उपज्यौ, बाँध्यौ जमपुरि जासी।।
शब्दार्थ-
उपज्यौ ~ पैदा हुआ
जमपुरि ~ यमलोक या नर्क
जासी ~ जाएगा
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि जिसके हृदय में ईश्वर के लिए सच्चा प्रेम पैदा नहीं हुआ वह अंत में बंधकर यमलोक ही जाएगा।

आत्मा की अमरता का सत्य :
हम न मरैं मरिहैं संसारा।
शब्दार्थ-
मरिहैं ~ मरेगा
संसारा ~ संसार के अज्ञानी लोग
व्याख्या : कबीरदास जी पूरे विश्वास से कहते हैं कि मेरी आत्मा कभी नहीं मरेगी, बल्कि यह अज्ञानी संसार मरेगा, जो जन्म और मृत्यु के चक्कर में फंसा है।
हम कूँ मिल्या जियावनहारा।
शब्दार्थ-
कूँ ~ को
जियावनहारा ~ जिलाने वाला या जीवन देने वाला
व्याख्या : मुझे तो जीवन देने वाला और जन्म मरण से मुक्त करने वाला सच्चा परमात्मा मिल गया है।
अब न मरौं मरनैं मन माना, ते मूए जिनि राम न जाँना।
शब्दार्थ-
मरौं ~ मरूंगा
माना ~ मान लिया या समझ लिया
ते मूए ~ वे लोग मरे
जिनि ~ जिन्होंने
व्याख्या : अब मैं कभी नहीं मरूंगा, क्योंकि मैंने मृत्यु की सच्चाई को समझ लिया है। वास्तव में वे लोग मरते हैं, जिन्होंने कभी भगवान को नहीं जाना।
साकत मरैं संत जन जीवै, भरि भरि राम रसायन पीवै।।
शब्दार्थ-
साकत ~ शक्ति के उपासक या माया में फंसे लोग
रसायन ~ रस या अमृत
पीवै ~ पीते हैं
व्याख्या : सांसारिक मोह माया में फंसे लोग ही बार बार मरते हैं, जबकि सच्चे संत जन्म मरण से मुक्त होकर ईश्वर की भक्ति का रस छककर पीते हैं।
हरि मरिहैं तौ हमहूँ मरिहैं, हरि न मरैं हँम काहे कूँ मरिहैं।
शब्दार्थ-
हरि ~ भगवान
हमहूँ ~ हम भी
काहे कूँ ~ किसलिए
व्याख्या : मेरी आत्मा परमात्मा का ही अंश है, इसलिए यदि भगवान मरेंगे तभी मैं मरूंगा और जब भगवान अमर हैं, तो भला मेरी मृत्यु कैसे हो सकती है।
कहै कबीर मन मनहि मिलावा, अमर भये सुख सागर पावा।।
शब्दार्थ-
मनहि ~ मन से
मिलावा ~ मिला दिया
सुख सागर ~ सुखों का सागर
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मैंने अपने मन को परमात्मा के मन से मिला दिया है और अब मैं अमर होकर सुखों के सागर परमात्मा में डूब गया हूँ।

जीवात्मा और परमात्मा का अटूट संबंध :
काहे री नलिनी तूँ कुम्हिलानीं,
शब्दार्थ-
नलिनी ~ कमलिनी या जीवात्मा
कुम्हिलानीं ~ मुरझा रही है
व्याख्या : कबीरदास जी कमलिनी रूपी जीवात्मा से पूछते हैं कि हे कमलिनी तू बिना किसी कारण के क्यों मुरझा रही है और दुखी क्यों है।
तेरे ही नालि सरोवर पाँनी।
शब्दार्थ-
नालि ~ डंठल
सरोवर ~ तालाब
पाँनी ~ पानी या परमात्मा रूपी जल
व्याख्या : तेरी डंठल तो हमेशा तालाब के पानी में डूबी रहती है और तू उसी परमात्मा रूपी जल से जुड़ी हुई है, फिर तू सूख क्यों रही है।
जल मैं उतपति जल में बास, जल में नलिनी तोर निवास।।
शब्दार्थ-
उतपति ~ जन्म
बास ~ रहना
तोर ~ तेरा
व्याख्या : हे कमलिनी तेरा जन्म भी जल में हुआ है, तू रहती भी जल में है और अंत में तेरा निवास भी उसी जल में ही होना है।
ना तलि तपति ना ऊपरि आगि, तोर हेतु कहु कासनि लागि।।
शब्दार्थ-
तलि ~ नीचे
तपति ~ तपन या गर्मी
हेतु ~ प्रेम या लगाव
कासनि ~ किससे
व्याख्या : तुम्हें न तो नीचे से कोई तपन सता रही है और न ही ऊपर से कोई आग बरस रही है, फिर सच बताओ कि तुम्हारा प्रेम किस सांसारिक विषय से हो गया है, जो तुम दुख में सूख रही हो।
कहैं कबीर जे उदिक समान, ते नहीं मूए हँमरे जाँन।।
शब्दार्थ-
उदिक ~ जल या परमात्मा
समान ~ समान हो गए या लीन हो गए
जाँन ~ ज्ञान या समझ में
व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं कि मेरी समझ में जो कमलिनी रूपी जीवात्मा परमात्मा रूपी जल के समान हो गई है वह कभी नहीं मर सकती । वह अमर हो जाती है।
काव्य सौंदर्य और मूल भाव :
* रस: इन पदों में शांत रस, भक्ति रस और संयोग शृंगार रस का अत्यंत सुंदर परिपाक हुआ है।
* छंद: कबीरदास जी ने इन सभी रचनाओं में गेय पद या गाए जाने योग्य पद का प्रयोग किया है।
* अलंकार: यहाँ अनुप्रास अलंकार, रूपक अलंकार (ज्ञान की आंधी, शरीर रूपी सरोवर) और दृष्टांत अलंकार का बहुत ही मनमोहक प्रयोग किया गया है।
* भाषा: सधुक्कड़ी या पंचमेल खिचड़ी भाषा का उपयोग हुआ है जो सहजता से सीधे हृदय में उतर जाती है।
कविता का केंद्रीय संदेश:
ईश्वर की प्राप्ति केवल बाहरी दिखावे या कोरे शब्दों को रटने से नहीं होती बल्कि सच्चे ज्ञान और पवित्र प्रेम से होती है। जब जीवात्मा का अहंकार नष्ट हो जाता है और वह ज्ञान के प्रकाश में परमात्मा से एकाकार कर लेती है तब वह जन्म-मरण के बंधन से हमेशा के लिए मुक्त होकर अमर हो जाती है।