पवन - दूतिका
'उद्धव-प्रसंग' की यह अत्यंत मार्मिक और भावपूर्ण कथा मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध 46वें और 47वें अध्याय से ली गई है I हिंदी साहित्य में इस कथानक को 'भ्रमरगीत' परंपरा के नाम से जाना…


'उद्धव-प्रसंग' की यह अत्यंत मार्मिक और भावपूर्ण कथा मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध 46वें और 47वें अध्याय से ली गई है I हिंदी साहित्य में इस कथानक को 'भ्रमरगीत' परंपरा के नाम से जाना जाता है, जिसे भक्तिकाल में महाकवि सूरदास जी ने 'सूरसागर' में अमर किया और आधुनिक काल में जगन्नाथदास 'रत्नाकर' जी ने ब्रजभाषा के इस विख्यात काव्य में पिरोया है I
श्रीकृष्ण का लालन-पालन ब्रज में माता यशोदा, नंद बाबा, गोपियों और ग्वाल-बालों के अगाध और निश्छल प्रेम के बीच हुआ था परंतु , जब कंस का अत्याचार बहुत बढ़ गया, तो श्रीकृष्ण को ब्रज छोड़कर मथुरा जाना पड़ा। मथुरा जाकर उन्होंने कंस का वध किया और वहाँ के राजा बने। मथुरा के राजसी वैभव में रहने के बाद भी श्रीकृष्ण का मन सदा ब्रजवासियों और गोपियों के निश्छल प्रेम को याद करके व्याकुल रहता था। वे अक्सर ब्रज की कुंज गलियों और सखाओं को याद कर भावुक हो उठते थे।
मथुरा में श्रीकृष्ण के एक परम मित्र और मंत्री थे, जिनका नाम उद्धव था। उद्धव परम ज्ञानी थे और निराकार ब्रह्म के बहुत बड़े उपासक थे। उन्हें अपने ज्ञान और योग-साधना पर बहुत अहंकार था। वे प्रेम और भक्ति जैसी सगुण भावनाओं को तुच्छ समझते थे। श्रीकृष्ण ने उद्धव के इस ज्ञान के अहंकार को दूर करने के लिए और साथ ही विरह में तड़पती हुई गोपियों को सांत्वना देने के लिए एक योजना बनाई। उन्होंने उद्धव से कहा कि वे उनका पत्र लेकर ब्रज जाएँ, वहाँ व्याकुल गोपियों को अपने निर्गुण ब्रह्म और योग का उपदेश देकर शांत करें। उद्धव सहर्ष तैयार हो गए और रथ पर सवार होकर ब्रज की ओर चल पड़े। रत्नाकर जी द्वारा रचित 'उद्धव-प्रसंग' कविता ठीक इसी मोड़ से शुरू होती है, जब उद्धव ब्रज की सीमा में प्रवेश करते हैं I कवि इस कविता के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि मानव-सेवा ही ईश्वर-सेवा है। वासना और स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के दीन-दुखियों के कष्टों को दूर करना और अपने व्यक्तिगत दुखों को भूलकर संपूर्ण संसार से प्रेम करना ही प्रेम की पराकाष्ठा है।

पद्य 1: राधा की विरह अवस्था और पवन का आगमन
पंक्ति 1: बैठी खिन्ना यक दिवस वे गेह में थीं अकेली,
कठिन शब्दों के अर्थ:
खिन्ना = दुखी, उदास
यक दिवस = एक दिन
गेह = घर
व्याख्या: एक दिन राधिका जी अत्यंत उदास और दुखी मन से अपने घर में अकेली बैठी हुई थीं I उनके मन में श्रीकृष्ण के वियोग का गहरा दुःख था I
पंक्ति 2: आके आँसू दृग-युगल में थे धरा को भिगोते।
कठिन शब्दों के अर्थ:
दृग-युगल = दोनों आँखें
धरा = पृथ्वी, जमीन
व्याख्या: विरह के दुःख के कारण उनकी दोनों आँखों से निरंतर आँसू बह रहे थे, जो नीचे गिरकर पृथ्वी को गीला कर रहे थे।
पंक्ति 3: आई धीरे इस सदन में पुष्प-सद्गंध को ले,
कठिन शब्दों के अर्थ:
सदन = घर, कमरा
पुष्प-सद्गंध = फूलों की सुंदर सुगंध
व्याख्या: उसी समय फूलों की मधुर सुगंध को साथ लेकर, इस घर के भीतर धीरे से हवा ने प्रवेश किया।
पंक्ति 4: प्रातः वाली सुपवन इसी काल वातायनों से।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सुपवन = सुंदर, शीतल हवा
काल = समय
वातायनों = झरोखों या खिड़कियों से
व्याख्या: सुबह के समय बहने वाली वह सुंदर और शीतल हवा उसी समय खिड़कियों के रास्ते कमरे के भीतर आई।

पद्य 2: राधा द्वारा पवन को फटकार
पंक्ति 1: संतापों को विपुल बढ़ता देख के दु:खिता हो,
कठिन शब्दों के अर्थ:
संतापों = दुखों, कष्टों को
विपुल = बहुत अधिक, भारी मात्रा में
दुखिता = दुखी होकर
व्याख्या: जब उस शीतल हवा के स्पर्श से राधिका जी का विरह-दुःख और अधिक बढ़ गया, तो वे और अधिक दुखी हो गईं।
पंक्ति 2: धीरे बोलीं स-दुख उससे श्रीमती राधिका यों।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सदुख = दुःख के साथ
यों = इस प्रकार
व्याख्या : उन्होंने अत्यंत दुखी होकर और संभलकर उस पवन से इस प्रकार अपनी बात कही।
पंक्ति 3: प्यारी प्रात: पवन इतना क्यों मुझे है सताती?
कठिन शब्दों के अर्थ:
प्रात-पवन = सुबह की हवा
व्याख्या: हे प्यारी सुबह की हवा! तू मुझे इस तरह क्यों तड़पा रही है और क्यों इतना कष्ट दे रही है?
पंक्ति 4: क्या तू भी है कलुषित हुई काल की क्रूरता से?
कठिन शब्दों के अर्थ:
कलुषित = दूषित, प्रभावित
काल = समय, भाग्य
क्रूरता = कठोरता, निर्दयता
व्याख्या: क्या तू भी समय या मेरे भाग्य की इस कठोरता से प्रभावित होकर मेरे प्रति निर्दयी हो गई है?

पद्य 3: कृष्ण के स्वरूप का वर्णन
पंक्ति 1: मेरे प्यारे नव जलद से कंज से नेत्र वाले,
कठिन शब्दों के अर्थ:
नव-जलद = नए बादल के समान सांवले
कंज = कमल
व्याख्या: मेरे प्रियतम श्री कृष्ण नवीन बादलों के समान सुंदर सांवले वर्ण वाले हैं और उनके नेत्र कमल के समान सुंदर हैं।
पंक्ति 2: जाके आये न मधुवन से औ न भेजा सँदेसा,
कठिन शब्दों के अर्थ:
मधुवन = मथुरा
सँदेसा= संदेश, समाचार
व्याख्या: वे जब से मथुरा गए हैं, तब से लौटकर वापस नहीं आए और न ही उन्होंने वहाँ से मेरे लिए कोई समाचार भेजा है।
पंक्ति 3: मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ,
कठिन शब्दों के अर्थ:
प्रिय-विरह = प्रियतम के वियोग में
बावली = पागल, विक्षिप्त
व्याख्या: अपने उस प्रियतम के वियोग में मैं रो-रोकर पागलों जैसी स्थिति में पहुँच चुकी हूँ।
पंक्ति 4: जाके मेरी सब दुख-कथा श्याम को तू सुना दे।
कठिन शब्दों के अर्थ:
श्याम = श्री कृष्ण
व्याख्या: इसलिए हे पवन! तू दूतिका बनकर मेरे पास से जा और मेरे इस सारे दुःख की कहानी श्री कृष्ण को सुना दे।

पद्य 4: मार्ग का दिशा - निर्देश
पंक्ति 1: ज्यों ही मेरा भवन तज तू अल्प आगे बढ़ेगी,
कठिन शब्दों के अर्थ:
भवन = घर
तज = छोड़कर
अल्प = थोड़ा सा
व्याख्या: जैसे ही तू मेरा यह घर छोड़कर थोड़ा सा ही आगे की ओर प्रस्थान करेगी,
पंक्ति 2: शोभावाली सुखद कितनी मंजु कुंजें मिलेंगी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सुखद = सुख देने वाली
मंजु = अत्यंत सुंदर
कुंजें = लताओं और पेड़ों के समूह
व्याख्या: तुझे रास्ते में अत्यंत सुंदर, मनमोहक और सुख देने वाली हरी-भरी लताओं के कुंज दिखाई देंगे।
पंक्ति 3: प्यारी छाया मृदुल स्वर से मोह लेंगी तुझे वे,
कठिन शब्दों के अर्थ:
मृदुल = मीठा, कोमल
स्वर = आवाज, पक्षियों की चहचहाहट
व्याख्या: उनकी शीतल छाया और वहाँ चहकने वाले पक्षियों की मीठी आवाजें तुझे अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करेंगी,
पंक्ति 4: तो भी मेरा दुख लख वहाँ जा न विश्राम लेना ।
कठिन शब्दों के अर्थ:
लख = देखकर, याद रखकर
विश्राम = आराम
व्याख्या: परंतु तू मेरे दुखों को याद रखना और उनके आकर्षण में फँसकर वहाँ आराम करने के लिए मत रुक जाना।
पंक्ति 1 : थोड़ा आगे सरस रव का धाम सत्पुष्पवाला।
शब्दार्थ:
सरस ~ रस से भरा हुआ या मधुर
रव ~ ध्वनि या आवाज, पक्षियों का चहकना
धाम ~ स्थान या घर
सत्पुष्पवाला ~ सुंदर और अच्छे फूलों से युक्त
व्याख्या : राधिका जी पवन से कहती हैं कि जब तुम यहाँ से थोड़ा सा आगे बढ़ोगी, तो तुम्हें मीठी आवाजों पक्षियों के मधुर कलरव से गूंजता हुआ और सुंदर फूलों से भरा हुआ एक बहुत ही प्यारा स्थान दिखाई देगा।
पंक्ति 2 : अच्छे-अच्छे बहु द्रुम लतावान सौंदर्यशाली।
शब्दार्थ:
बहु ~ बहुत सारे या अनेक
द्रुम ~ वृक्ष या पेड़
लतावान ~ लताओं से घिरे हुए या लताओं से युक्त
सौंदर्यशाली ~ अत्यंत सुंदर या आकर्षक
व्याख्या : उस स्थान पर तुम्हें बहुत सारे श्रेष्ठ और सुंदर पेड़ दिखाई देंगे, जो सुंदर लताओं से लिपटे हुए होंगे और देखने में बेहद खूबसूरत लगेंगे।
पंक्ति 3: प्यारा वृंदाविपिन मन को मुग्धकारी मिलेगा।
शब्दार्थ:
वृंदाविपिन ~ वृंदावन, तुलसी का जंगल
मुग्धकारी ~ मन को मोह लेने वाला या आकर्षित करने वाला
व्याख्या : वही तुम्हारा मन मोह लेने वाला सबका प्यारा वृंदावन है, जो अपनी सुंदरता से तुम्हारे दिल को खुश कर देगा।
पंक्ति : आना जाना इस विपिन से मुह्यमाना न होना।। 5 ।।
शब्दार्थ:
विपिन ~ जंगल या वन
मुह्यमाना ~ मोहित होना या सम्मोहित हो जाना
व्याख्या : तुम उस सुंदर वृंदावन के रास्ते से होकर गुजरना तो सही, लेकिन उसकी खूबसूरती के जाल में फंसकर या मोहित होकर वहीं ठहर मत जाना, तुम्हें आगे श्रीकृष्ण के पास जाना है।

पद्य 5: मार्ग में पीड़ित लोगों की सहायता का संदेश
पंक्ति 1: जाते-जाते अगर पथ में क्लांत कोई दिखावे,
कठिन शब्दों के अर्थ:
पथ = रास्ता
क्लांत = थका हुआ, व्याकुल व्यक्ति
व्याख्या: राधा पवन से कहती हैं कि मार्ग में जाते समय यदि तुझे रास्ते में कोई थका हुआ या दुखी व्यक्ति दिखाई दे
,
पंक्ति 2: तो जाके सन्निकट उसकी क्लांतियों को मिटाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सन्निकट = बिल्कुल पास, निकट
क्लांतियों = थकान को, कष्ट को
व्याख्या: तो तू उसके बिल्कुल पास जाना और अपनी शीतलता से उसकी संपूर्ण थकान और बेचैनी को दूर कर देना।
पंक्ति 3: धीरे-धीरे परस करके गात-उत्ताप खोना,
कठिन शब्दों के अर्थ:
परस = स्पर्श (छूकर)
गात = शरीर
उत्ताप = गर्मी, कष्ट
व्याख्या: उसे धीरे-धीरे स्पर्श करना और उसके शरीर की बढ़ी हुई गर्मी व व्याकुलता को पूरी तरह समाप्त कर देना।
पंक्ति 4: सदगंधों से श्रमित जन को हर्षितों सा बनाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
श्रमित जन = थका हुआ व्यक्ति
हर्षितों = प्रसन्न, आनंदित
व्याख्या: अपनी सुंदर सुगंध से उस थके हुए व्यक्ति के मन को प्रफुल्लित और अत्यंत प्रसन्न कर देना।

पद्य 6: मार्ग की लज्जाशील महिला की सहायता
पंक्ति 1: लज्जाशीला पथिक-महिला जो कहीं दृष्टि आये,
कठिन शब्दों के अर्थ:
लज्जाशीला = शर्मिली, संकोची स्वभाव वाली
पथिक-महिला = रास्ते में चलने वाली स्त्री
दृष्टि आये = दिखाई दे
व्याख्या: राधा पवन से कहती हैं कि हे पवन! यदि रास्ते में तुझे कहीं कोई लज्जाशील राहगीर महिला दिखाई दे,
पंक्ति 2: होने देना विकृत-वसना तो न तू सुंदरी को।
कठिन शब्दों के अर्थ:
विकृत-वसना = जिसके वस्त्र अस्त-व्यस्त या उड़ गए हों
सुंदरी = सुंदर स्त्री
व्याख्या: तो तू इतने वेग से मत बहना कि उस सुंदर स्त्री के वस्त्र उड़कर अस्त-व्यस्त हो जाएँ और उसकी लज्जा भंग हो।
पंक्ति 3: जो थोड़ी भी श्रमित वह हो गोद ले श्रांति खोना,
कठिन शब्दों के अर्थ:
श्रमित = थकी हुई
श्रांति = थकान
व्याख्या: यदि वह थोड़ी भी थकी हुई दिखाई दे, तो तू उसे चारों ओर से घेरकर गोद में लेकर उसकी सारी थकान को दूर कर देना।
पंक्ति 4: होठों की औ कमल-मुख की म्लानताएँ मिटाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
म्लानताएँ = उदासी, सूखापन या कुम्हारपन
व्याख्या: अपनी शीतलता से उसके प्यासे होठों और कमल जैसे सुंदर मुख की उदासी व सुस्ती को पूरी तरह मिटा देना।
पद्य 7: किसान की स्त्री की थकान दूर करना
पंक्ति 1: कोई क्लांता कृषक-ललना खेत में जो दिखावे,
कठिन शब्दों के अर्थ:
क्लांता = थकी हुई व्याकुल स्त्री
कृषक-ललना = किसान की पत्नी या स्त्री
व्याख्या: यदि खेत में काम करती हुई कोई थकी हुई किसान की स्त्री तुझे दिखाई दे,
पंक्ति 2: धीरे-धीरे परस कर उसकी क्लांतियों को मिटाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
परस = स्पर्श करके, छूकर
क्लांतियों = दुखों या थकान को
व्याख्या: तो तू उसके पास जाकर उसे धीरे-धीरे स्पर्श करना और उसकी सारी थकान को दूर कर देना।
पंक्ति 3: जाता कोई जलद यदि हो व्योम में तो उसे ला,
कठिन शब्दों के अर्थ:
जलद = बादल
व्योम = आकाश
व्याख्या: यदि आकाश में कोई बादल का टुकड़ा तैरता हुआ जा रहा हो, तो उसे उड़ाकर वहाँ ले आना,
पंक्ति 4: छाया द्वारा सुखित करना तप्त भूतांगना को।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सुखित = सुखी या शांत करना
तप्त = धूप से तपती हुई
भूतांगना = स्त्री, किसान की स्त्री
व्याख्या: और उस बादल से छाया करके धूप में तप रही उस कामकाजी स्त्री को शीतलता और सुख प्रदान करना।

पद्य 8: मथुरा नगरी का सौंदर्य
पंक्ति 1: जाते-जाते पहुँच मथुरा-धाम की उत्सुका हो,
कठिन शब्दों के अर्थ:
मथुरा-धाम = मथुरा नगरी
उत्सुक = तीव्र इच्छा या विकलता के साथ
व्याख्या: आगे बढ़ते-बढ़ते जब तू व्याकुल होकर भव्य मथुरा नगरी के पास पहुँचेगी,
पंक्ति 2: न्यारी शोभा वर-नगर की देखना मुग्ध होना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
न्यारी = अनोखी, अद्भुत
वर-नगर = श्रेष्ठ नगर की
मुग्ध = मोहित
व्याख्या: तब तू उस श्रेष्ठ नगर की अनुपम और अनोखी सुंदरता को देखना और उस पर मोहित हो जाना।
पंक्ति 3: तू होवेगी चकित लख के मेरु से मंदिरों को,
कठिन शब्दों के अर्थ:
चकित = आश्चर्यचकित
मेरु = सुमेरु पर्वत जैसे ऊँचे और विशाल
व्याख्या: वहाँ तू आश्चर्यचकित होकर सुमेरु पर्वत जैसे गगनचुंबी और ऊँचे-ऊँचे विशाल मंदिरों को देखेगी,
पंक्ति 4: आभा वाले कलश जिनके दूसरे अर्क से हैं।
कठिन शब्दों के अर्थ:
आभा वाले = चमक वाले
अर्क = सूर्य
व्याख्या: जिन मंदिरों के ऊपर सोने के चमकीले कलश स्थापित हैं, जो चमक में दूसरे सूर्य के समान प्रतीत होते हैं।
पद्य 9: मथुरा के उपवनों की शोभा
पंक्ति 1: देखे पूजा-समय मथुरा-मंदिरों मध्य जाना,
कठिन शब्दों के अर्थ:
पूजा-समय = शाम या सुबह की आरती का समय
मध्य = बीच में
व्याख्या: जब मथुरा के मंदिरों में पूजा या आरती का समय हो, तब तू उन मंदिरों के भीतर प्रवेश करना,
पंक्ति 2: नाना वाद्यों मधुर स्वर की मुग्धता को बढ़ाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
नाना वाद्यों = अनेक प्रकार के बाजों शंख, ढोल आदि के
मुग्धता = मधुरता, आकर्षण
व्याख्या: और वहाँ बजने वाले अनेक वाद्ययंत्रों की ध्वनि में अपनी गति मिलाकर उनके मधुर स्वर को और अधिक बढ़ा देना।
पंक्ति 3: किंवा लेके रुचिर तरु के शब्द-कारी फलों को,
कठिन शब्दों के अर्थ:
किंंवा = अथवा, या फिर
रुचिर = सुंदर
तरु = वृक्ष
शब्द-कारी फलों = ध्वनि उत्पन्न करने वाले फल या पत्तों को
व्याख्या: अथवा वहाँ के सुंदर वृक्षों के पत्तों और फूलों को झकझोरकर उनसे निकलने वाली प्राकृतिक ध्वनि को अपना साथ देना,
पंक्ति 4: धीरे-धीरे मधुर रव से मुग्ध हो-हो बजाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
रव = आवाज, ध्वनि
व्याख्या: और अत्यंत मधुर स्वर उत्पन्न करते हुए प्रेमपूर्वक अपनी लय में उन वाद्यों को बजाना।

पद्य 10: श्री कृष्ण के रूप-रंग की पहचान
पंक्ति 1: तू देखेगी जलद तन को जा वहीं तद्गता हो,
कठिन शब्दों के अर्थ:
सजग दृग = सचेत या ध्यानमग्न आँखों से
तद्गता = तद्रूप, वैसे ही स्वरूप वाले कृष्ण को
व्याख्या: जब तू वहाँ ध्यानपूर्वक देखेगी, तो तुझे वहाँ मेरे प्रियतम श्री कृष्ण दिखाई देंगे।
पंक्ति 2: होंगे लोने नयन उनके ज्योति-उत्कीर्णकारी,
कठिन शब्दों के अर्थ:
लोने नयन = सुंदर आँखें
ज्योति-उत्कीर्णकारी = प्रकाश बिखेरने वाले
व्याख्या: उनकी सुंदर आँखें ऐसी होंगी जिनसे दिव्य प्रकाश या तेज चारों ओर फैल रहा होगा।
पंक्ति 3: मुद्रा होगी वर-वदन की मूर्ति सी सौम्यता की,
कठिन शब्दों के अर्थ:
मुद्रा = भाव, हाव-भाव
वर-वदन = श्रेष्ठ मुख की
सौम्यता = सौम्य, शांत और सुंदर
व्याख्या: उनके श्रेष्ठ और सुंदर मुख का भाव किसी शांत और सुंदर मूर्ति के समान अत्यंत गंभीर और सौम्य होगा।
पद 4: सीधे-साधे वचन उनके सिक्त होंगे सुधा से।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सिक्त = भीगे हुए
सुधा = अमृत
व्याख्या: जब वे बोलेंगे, तो उनके सीधे-साधे और सरल वचन मानो अमृत के रस में भीगे हुए प्रतीत होंगे।
पद्य 11: कृष्ण के शरीर और वस्त्रों का वर्णन
पंक्ति 1: नीले फूले कमल-दल सी गात की श्यामता है,
कठिन शब्दों के अर्थ:
कमल-दल = कमल की पंखुड़ियाँ
गात = शरीर
श्यामलता = सांवलापन
व्याख्या: खिले हुए नीले कमल के पत्तों के समान उनके पूरे शरीर का सांवला रंग अत्यंत मनमोहक है।
पंक्ति 2: पीला प्यारा वसन कटि में पहनते हैं फबीला,
कठिन शब्दों के अर्थ:
वसन = वस्त्र
कटि = कमर
फबीला = सुशोभित होने वाला, जंचने वाला
व्याख्या: वे अपनी कमर में पीले रंग का सुंदर पीतांबर धारण करते हैं, जो उनके शरीर पर बहुत जंचता है।
पंक्ति 3: छोटी काली अलक मुख की कांति को है बढ़ाती,
कठिन शब्दों के अर्थ:
अलक = बालों की लट
कांति = चमक, सुंदरता
व्याख्या: उनके माथे पर लटकती हुई बालों की एक छोटी सी काली लट उनके चेहरे की सुंदरता को और अधिक बढ़ा देती है।
पंक्ति 4: सद्वस्त्रों में नवल-तन की फूटती सी प्रभा है।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सद्वस्त्रों = सुंदर वस्त्रों में
नवल-तन = नवीन सुंदर शरीर की
प्रभा = चमक, कांति
व्याख्या: उन सुंदर वस्त्रों के भीतर से उनके नूतन सांवले शरीर की दिव्य चमक बाहर निकलती हुई सी महसूस होती है।
पद्य 12: कृष्ण के शारीरिक अंगों की सुदृढ़ता
पंक्ति 1: सांचे ढाला सकल वपु है दिव्य सौंदर्यशाली,
कठिन शब्दों के अर्थ:
सकल = संपूर्ण
वपु = शरीर
व्याख्या: उनका पूरा शरीर ऐसा सुगठित है मानो किसी सांचे में ढालकर बनाया गया हो और वह दिव्य सुंदरता से युक्त है।
पंक्ति 2: सत-पुष्पों सी सुरभि उसकी प्राण-संपोषिका है।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सत-पुष्पों = श्रेष्ठ फूलों जैसी
सुरभि = सुगंध
प्राण-संपोषिका = प्राणों को तृप्त करने वाली या जीवन देने वाली
व्याख्या: उनके शरीर से निकलने वाली सुगंध उत्तम फूलों की खुशबू जैसी है, जो मन और प्राणों को तृप्त कर देती है।
पंक्ति 3: दोनों कंधे वृषभ-वर से हैं बड़े ही सजीले,
कठिन शब्दों के अर्थ:
वृषभ-वर = श्रेष्ठ बैल के समान
सजीले = मजबूत और सुंदर
व्याख्या: उनके दोनों कंधे किसी मजबूत और श्रेष्ठ बैल के कंधों की तरह अत्यंत बलशाली और सजीले हैं।
पंक्ति 4: लंबी बाहें कलभ-कर सी शक्ति की पेटिका हैं।
कठिन शब्दों के अर्थ:
कलभ-कर = हाथी के बच्चे की सूंड के समान
पेटिका = पिटारी, खजाना
व्याख्या: उनकी लंबी-लंबी भुजाएँ हाथी की सूंड के समान बलशाली हैं और वे असीम शक्ति का केंद्र या खजाना हैं।

पद्य 13: श्री कृष्ण के मुकुट और आभूषण
पंक्ति 1: राजाओं सा सिर पर लसा दिव्य आपीड़ होगा,
कठिन शब्दों के अर्थ:
लसा = सुशोभित, सजा हुआ
आपीड़ = मुकुट
व्याख्या: उनके सिर पर राजाओं की तरह एक अलौकिक और चमकीला मुकुट सजा हुआ दिखाई देगा।
पंक्ति 2: शोभा होगी उभय श्रुति में स्वर्ण के कुंडलों की।
कठिन शब्दों के अर्थ:
उभय = दोनों
श्रुति = कान
स्वर्ण = सोने के
व्याख्या: उनके दोनों कानों में सोने के सुंदर कुंडल हिलते हुए अत्यंत शोभायमान लग रहे होंगे।
पंक्ति 3: नाना रत्नाकलित भुज में मंजु केयूर होंगे,
कठिन शब्दों के अर्थ:
नाना = अनेक प्रकार के
रत्नाकलित = रत्नों से जड़े हुए
मंजु = सुंदर
केयूर = बाजूबंद, बाँह का आभूषण
व्याख्या: उनकी दोनों भुजाओं में अनेक रत्नों से जड़े हुए सुंदर बाजूबंद बंधे हुए होंगे।
पंक्ति 4: मोतीमाला लसित उनका कंबु स कंठ होगा,
कठिन शब्दों के अर्थ:
लसित: सुशोभित, सुंदर दिखने वाली
कंबु: शंख
व्याख्या: और उनके विशाल तथा स्वच्छ वक्षस्थल पर मोतियों की सुंदर माला सुशोभित हो रही होगी।
पद्य 14: पवन की मूकता और चतुर युक्ति का निर्देश
पंक्ति 1: तेरे में है न यह गुण जो तू व्यथाएँ सुनाये।
कठिन शब्दों के अर्थ:
व्यथाएँ = दुःख, पीड़ा
व्याख्या: राधिका जी पवन से कहती हैं कि हे पवन! तेरे पास बोलने के लिए वाणी रूपी गुण नहीं है, जिससे तू बोलकर मेरी पीड़ा श्री कृष्ण को सुना सके।
पंक्ति 2: व्यापारों को प्रखर मति औ युक्तियों से चलाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
व्यापारों = क्रियाकलापों, शारीरिक चेष्टाओं
प्रखर मति = तीव्र या तेज बुद्धि
औ = और
युक्तियों = उपायों, तरकीबों
व्याख्या: इसलिए तू वाणी के अभाव में अपने क्रियाकलापों को अपनी तीव्र बुद्धि और विभिन्न उपायों के माध्यम से संचालित करना।
पंक्ति 3: बैठे जो हों निज सदन में मेघ सी कांतिवाले।
कठिन शब्दों के अर्थ:
निज = अपने
सदन = भवन, राजमहल
मेघ सी कांतिवाले = बादलों जैसी सांवली आभा वाले श्री कृष्ण
व्याख्या: बादलों जैसी सुंदर सांवली आभा वाले श्री कृष्ण जब अपने राजभवन में बैठे हों,
पंक्ति 4: तो चित्रों को इस भवन के ध्यान से देख जाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
भवन = घर, कमरा
व्याख्या: तब तू उस राजभवन या कमरे में लगी सभी तस्वीरों को अत्यंत ध्यानपूर्वक देखना।

पद्य 15: विरह-विधुरा के चित्र द्वारा ध्यान आकर्षित करना
पंक्ति 1: जो चित्रों में विरह-विधुरा का मिले चित्र कोई।
कठिन शब्दों के अर्थ:
विरह-विधुरा = वियोग में तड़पने वाली व्याकुल स्त्री
व्याख्या: यदि उन चित्रों में तुझे किसी ऐसी स्त्री का चित्र दिखाई दे जो अपने प्रिय के वियोग में अत्यंत व्याकुल और दुखी हो,
पंक्ति 2: तो जा जाके निकट उसको भाव से यों हिलाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
भाव से = विशेष ढंग से, अर्थपूर्ण तरीके से
यों = इस प्रकार
व्याख्या: तो तू उस चित्र के बिल्कुल पास जाना और अपने झोंके से उसे इस प्रकार हिलाना,
पंक्ति 3: प्यारे हो के चकित जिससे चित्र को और देखें।
कठिन शब्दों के अर्थ:
चकित = आश्चर्यचकित, हैरान
व्याख्या: जिससे हमारे प्रियतम श्री कृष्ण आश्चर्यचकित होकर अचानक उस हिलते हुए चित्र की ओर देखने लगें।
पंक्ति 4: आशा है यों सुरति उनको हो सकेगी हमारी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सुरति = स्मृति, याद
व्याख्या: मुझे पूरी आशा है कि उस विरहणी के चित्र को देखकर उन्हें तुरंत मेरी याद आ जाएगी।

पद्य 16: उद्यान के चित्र द्वारा ब्रजवासियों की याद दिलाना
पंक्ति 1: जो कोई भी इस सदन में चित्र उद्यान का हो।
कठिन शब्दों के अर्थ:
उद्यान = बगीचा
व्याख्या: यदि उस कमरे की दीवारों पर कोई ऐसा चित्र टंगा हो जिसमें किसी सुंदर बगीचे का दृश्य अंकित हो,
पंक्ति 2: औ हों प्राणी विपुल उसमें घूमते बावले से।
कठिन शब्दों के अर्थ:
प्राणी = जीव-जंतु या मनुष्य
विपुल = बहुत अधिक, अनेक
बावले से = पागलों की तरह व्याकुल होकर
व्याख्या: और उस बगीचे के दृश्य में बहुत से लोग व्याकुल होकर पागलों की तरह इधर-उधर घूमते हुए दिखाई दे रहे हों,
पंक्ति 3: तो जाके सन्निकट उसके औ हिला के उसे भी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सन्निकट = अत्यंत समीप, बिल्कुल पास
व्याख्या: तो तू उस चित्र के भी बिल्कुल निकट जाना और अपनी वायु के वेग से उसे भी हिला देना,
पंक्ति 4: देवात्मा को सुरति ब्रज के व्याकुलों की कराना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
देवात्मा = दिव्य आत्मा स्वरूप श्री कृष्ण
व्याख्या: और उस दिव्य स्वरूप वाले कृष्ण को यह स्मरण कराना कि ब्रज के सभी नर-नारी उनके वियोग में इसी तरह व्याकुल होकर भटक रहे हैं।
पद्य 17: कुम्हलाए फूल से राधा की स्थिति दर्शाना
पंक्ति 1: कोई प्यारा कुसुम कुम्हला गेह में जो पड़ा हो।
कठिन शब्दों के अर्थ:
कुसुम = फूल
कुम्हला = मुरझाया हुआ
गेह = घर, कक्ष
व्याख्या: यदि उनके घर या कमरे में कोई सुंदर फूल मुरझाकर जमीन पर पड़ा हुआ दिखाई दे
पंक्ति 2: तो प्यारे के चरण पर ला डाल देना उसी को।
व्याख्या: तो तू उसे उड़ाकर प्रियतम श्री कृष्ण के पावन चरणों पर लाकर रख देना।
पंक्ति 3: यो देना ऐ पवन बतला फूल सी एक बाला।
कठिन शब्दों के अर्थ:
बाला = युवती
व्याख्या: हे पवन! इस प्रकार तू क्रिया के माध्यम से उन्हें यह बात स्पष्ट रूप से बता देना कि फूल जैसी कोमल एक युवती,
पंक्ति 4: म्लान हो हो कमल-पग को चूमना चाहती है।
कठिन शब्दों के अर्थ:
म्लान = उदास, मुरझाई हुई
कमल-पग = कमल जैसे सुंदर चरण
व्याख्या: आपके वियोग में दुखी और मुरझाकर आपके कमल जैसे सुंदर चरणों को बार-बार चूमना चाहती है।
पद्य 18: बाँसों के छिद्रों से बाँसुरी की याद दिलाना
पंक्ति 1: जो प्यारे मंजु उपवन या वाटिका में खड़े हों।
कठिन शब्दों के अर्थ:
मंजु = सुंदर
उपवन = बगीचा
व्याख्या: यदि प्रियतम श्री कृष्ण किसी सुंदर बगीचे या वाटिका में खड़े हों
,
पंक्ति 2: छिद्रों में जा क्वणित करना वेणु सा कीचकों को।
कठिन शब्दों के अर्थ:
छिद्रों = छेदों या सुराखों में
क्वणित करना = ध्वनि उत्पन्न करना, बजाना
वेणु = बाँसुरी
कीचकों = खोखले बाँसों को
व्याख्या: तो तू वहाँ के खोखले बाँसों के छिद्रों में प्रवेश करके उन्हें बाँसुरी की तरह मधुर ध्वनि में बजाना।
पंक्ति 3: यों होवेगी सुरति उनको सर्व गोपांगना की।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सर्व = सभी
गोपांगना = गोपियों की
व्याख्या: इस प्रकार जब बाँसुरी जैसी ध्वनि गूँजेगी, तो उन्हें ब्रज की उन सभी गोपियों की याद आएगी,
पंक्ति 4: जो हैं वंशी श्रवण-रुचि से दीर्घ उत्कंठ होतीं।
कठिन शब्दों के अर्थ:
वंशी = बाँसुरी
श्रवण-रुचि = सुनने की तीव्र इच्छा
दीर्घ उत्कंठ = अत्यधिक व्याकुल या उत्सुक
व्याख्या: जो उनकी बाँसुरी की तान सुनने की इच्छा में अत्यधिक व्याकुल और लालायित रहा करती थीं।

पद्य 19: कमल के पत्तों को जल में डुबोना
पंक्ति 1: ला के फूले कमलदल को श्याम के सामने ही।
कठिन शब्दों के अर्थ:
कमलदल = कमल की पंखुड़ी या पत्ता
व्याख्या: तू किसी खिले हुए कमल के पत्ते को लाकर सांवले श्री कृष्ण की आँखों के ठीक सामने ही,
पंक्ति 2: थोड़ा थोड़ा विपुल जल में व्यग्र हो हो डुबाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
विपुल जल = बहुत सारे पानी में
व्यग्र = बेचैन, व्याकुल
व्याख्या: किसी जल से भरे पात्र में व्याकुल होकर बार-बार थोड़ा-थोड़ा डुबोना।
पंक्ति 3: यों देना ऐ भगिनी जतला एक अंभोजनेत्रा।
कठिन शब्दों के अर्थ:
भगिनी = बहन -पवन को बहन संबोधित किया है
अंभोजनेत्रा = कमल जैसी आँखों वाली राधा
व्याख्या: हे बहन पवन! इस प्रकार तू उन्हें यह समझा देना कि कमल जैसी सुंदर आँखों वाली राधिका,
पंक्ति 4: आँखों को हो विरह-विधुरा वारि में बोरती है।
कठिन शब्दों के अर्थ:
वारि = जल, पानी
बोरती = डुबोती है
व्याख्या: आपके वियोग में अत्यंत दुखी होकर अपनी आँखों को सदैव आँसुओं के जल में डुबोए रखती है।

पद्य 20: कदंब के पुष्प से रोमांच का प्रदर्शन
पंक्ति 1: धीरे लाना वहन कर के नीप का पुष्प कोई।
कठिन शब्दों के अर्थ:
वहन कर के = उठाकर या उड़ाकर
नीप = कदंब का वृक्ष या फूल
व्याख्या: तू बहुत धीरे से कदंब का कोई एक फूल उड़ाकर ले आना,
पंक्ति 2: औ प्यारे के चपल दृग के सामने डाल देना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
चपल दृग = चंचल आँखों के
व्याख्या: और उसे प्रियतम श्री कृष्ण की चंचल आँखों के ठीक सामने लाकर गिरा देना।
पंक्ति 3: ऐसे देना प्रकट दिखला नित्य आशंकिता हो।
कठिन शब्दों के अर्थ:
नित्य = सदैव, हमेशा
आशंकिता = भयभीत या संशय में डूबी हुई
व्याख्या: इसके माध्यम से तू उनके समक्ष यह बात प्रकट कर देना कि मैं सदैव इस संशय और आशंका में जीती हूँ,
पंक्ति 4: कैसी होती विरहवश मैं नित्य रोमांचिता हूँ।
कठिन शब्दों के अर्थ:
विरहवश = वियोग के कारण
रोमांचिता = काँप उठना या शरीर के रोएँ खड़े होना -प्रेम और भय के कारण
व्याख्या: कि आपके वियोग के कारण मैं किस प्रकार भयभीत भी रहती हूँ और आपके मिलन की आशा में नित्य रोमांचित भी होती हूँ।

पद्य 21: वृक्ष के पत्ते को हिलाकर काँपते मन का बोध
पंक्ति 1: बैठे नीचे जिस विटप के श्याम होवें उसी का।
कठिन शब्दों के अर्थ:
विटप = वृक्ष, पेड़
व्याख्या: श्री कृष्ण जिस पेड़ के नीचे बैठे हुए हों, तू उसी पेड़ का,
पंक्ति 2: कोई पत्ता निकट उनके नेत्र के ले हिलाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
नेत्र = आँखों के
व्याख्या: कोई एक पत्ता उनकी आँखों के बिल्कुल समीप लाकर लगातार हिलाने लगना।
पंक्ति 3: यों प्यारे को विदित करना चातुरी से दिखाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
विदित करना = ज्ञान कराना, बताना
चातुरी = चतुरता, बुद्धिमानी
व्याख्या: इस प्रकार तू अपनी बुद्धिमानी से प्रियतम श्री कृष्ण को यह बात प्रत्यक्ष रूप से समझाना,
पंक्ति 4: मेरे चिंता-विजित चित का क्लांत हो काँप जाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
चिंता-विजित चित = चिंता द्वारा जीत लिए गए दुखी मन का
क्लांत = थका हुआ या दुखी होकर
व्याख्या: कि चिंता ने मेरे मन पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है, जिससे मेरा थका और हारा हुआ मन आपके वियोग में इसी पत्ते की तरह निरंतर काँपता रहता है।
पद्य 22: सूखी लता से राधा के सूखते शरीर का आभास
पंक्ति 1: सूखी जाती मलिन लतिका जो धरा में पड़ी हो।
कठिन शब्दों के अर्थ:
मलिन लतिका = कुम्हाई हुई या सूखी हुई बेल
धरा = जमीन, पृथ्वी
व्याख्या: यदि कोई सूखी और कुम्हलाई हुई लता जमीन पर गिरी हुई दिखाई दे,
पंक्ति 2: तो पाँवों के निकट उसको श्याम के ला गिराना।
व्याख्या: तो तू उसे हवा से उड़ाकर सीधे श्री कृष्ण के चरणों के पास लाकर गिरा देना।
पंक्ति 3: यों सीधे से प्रकट करना प्रीति से वंचिता हो।
कठिन शब्दों के अर्थ:
प्रीति = प्रेम
वंचिता = विमुख, अलग या रहित
व्याख्या: उस सूखी लता को दिखाकर तू स्पष्ट रूप से उनके सामने यह बात रख देना कि आपके प्रेम से अलग होकर,
पंक्ति 4: मेरा होना अति मलिन औ सूखते नित्य जाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
अति = अत्यधिक
व्याख्या: मैं भी इसी लता की तरह दिन-प्रतिदिन अत्यधिक दुखी हो रही हूँ और निरंतर सूखती जा रही हूँ।

पद्य 23: पीले पत्ते के माध्यम से प्रोषिता रूप का वर्णन
पंक्ति 1: कोई पत्ता नवल तरु का पीत जो हो रहा हो।
कठिन शब्दों के अर्थ:
नवल तरु = नए पेड़ का
पीत = पीला
व्याख्या: यदि किसी नए वृक्ष का कोई पत्ता सूखकर पीला पड़ रहा हो,
पंक्ति 2: तो प्यारे के दृग युगल के सामने ला उसे ही।
कठिन शब्दों के अर्थ:
दृग युगल = दोनों आँखें
व्याख्या: तो तू उस पीले पड़ चुके पत्ते को उड़ाकर प्रियतम श्री कृष्ण की दोनों आँखों के ठीक सामने ले आना।
पंक्ति 3: धीरे धीरे सँभल रखना औ उन्हें यो बताना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सँमल रखना = सावधानी से रखना
व्याख्या: उसे उनकी आँखों के आगे बहुत सावधानी से रखना और उन्हें अपनी क्रिया से यह समझाना,
पंक्ति 4: पीला होना प्रबल दुख से प्रोषिता सा हमारा।
कठिन शब्दों के अर्थ:
प्रबल = अत्यधिक, भारी
प्रोषिता = प्रोषितपतिका, वह स्त्री जिसका पति परदेस गया हो
व्याख्या: कि अपने प्रियतम से दूर रहने के अत्यधिक दुःख के कारण मैं भी इसी पत्ते की तरह प्रोषितपतिका स्त्री के समान पीली पड़ती जा रही हूँ।
पद्य 24: विरह व्यथा सुनाकर चरणों की धूलि लाने का आग्रह
पंक्ति 1: यों प्यारे को विदित करके सर्व मेरी व्यथाएँ।
कठिन शब्दों के अर्थ:
सर्व = सभी
व्याख्या: इस प्रकार मेरे प्रियतम श्री कृष्ण को मेरे सारे कष्टों और वियोग की दुर्दशा की जानकारी दे देने के बाद,
पंक्ति 2: धीरे धीरे वहन कर के पाँव की धूलि लाना।
कठिन शब्दों के अर्थ:
धूलि = धूल, रज
व्याख्या: तू आते समय बहुत आराम से उनके पावन चरणों की थोड़ी सी धूल उड़ाकर मेरे पास ले आना।
पंक्ति 3: थोड़ी सी भी चरण-रज जो ला न देगी हमें तू।
कठिन शब्दों के अर्थ:
चरण-रज = पैरों की धूल
व्याख्या: यदि तू मुझे उनके पैरों की थोड़ी सी भी धूल लाकर नहीं देगी,
पंक्ति 4: हा! कैसे तो व्यथित चित को बोध मैं दे सकूँगी।
कठिन शब्दों के अर्थ:
व्यथित चित = दुखी मन को
बोध = सांत्वना, धीरज या समझाना
व्याख्या: तो हाय! मैं अपने इस अत्यंत दुखी मन को किस प्रकार समझाऊँगी और कैसे धीरज बँधा पाऊँगी।

पद्य 25: अंतिम निवेदन - केवल चरणों का स्पर्श करके लौट आना
पंक्ति 1: पूरी होवें न यदि तुझसे अन्य बातें हमारी।
व्याख्या: राधा पवन से अपनी अंतिम विनती करते हुए कहती हैं कि हे पवन! यदि मेरे द्वारा बताए गए ऊपर के ये सारे उपाय और बातें तुझसे पूर्ण न हो पाएँ,
पंक्ति 2: तो तू मेरी विनय इतनी मान ले और चली जा।
कठिन शब्दों के अर्थ:
विनय = प्रार्थना
व्याख्या: तो तू मेरी बस इतनी सी छोटी सी प्रार्थना स्वीकार कर ले और तुरंत मथुरा के लिए प्रस्थान कर जा।
पंक्ति 3: छू के प्यारे कमल-पग को प्यार के साथ आ जा।
व्याख्या: तू वहाँ जाकर केवल मेरे प्रियतम श्री कृष्ण के कमल जैसे सुंदर चरणों को प्रेमपूर्वक स्पर्श करके वापस लौट आ।
पंक्ति 4: जी जाऊँगी हृदयतल में मैं तुझी को लगाके।
कठिन शब्दों के अर्थ:
हृदयतल = हृदय से, छाती से
व्याख्या: मैं केवल तुझको ही अपने हृदय से लगा लूँगी और इसी के सहारे अपने इस मृतप्राय जीवन को दोबारा जीवित रख सकूँगी।
काव्य सौंदर्य और केंद्रीय संदेश :
काव्य सौंदर्य:
रस: इस कविता में विप्रलंभ या वियोग शृंगार रस का अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी चित्रण हुआ है।
उदाहरण: मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ।
छंद: पूरी कविता में मन्दाक्रान्ता छंद का प्रयोग किया गया है, जो एक प्रवाहमयी लय वाला वर्णिक छंद है।
अलंकार:
मानवीकरण: यहाँ जड़ पवन को मानवीकृत कर उसे एक समझदार और संवेदनशील दूतिका का रूप दिया गया है।
उपमा: रूप और गुणों की तुलना के लिए इसका सुंदर प्रयोग हुआ है।
उदाहरण: प्यारे नव जलद से कंज से नेत्र वाले।
उदाहरण: नीले फूले कमल दल सी गात की श्यामता है।
पुनरुक्ति प्रकाश: शब्दों की आवृत्ति से काव्य में सौंदर्य की वृद्धि की गई है।
उदाहरण: धीरे-धीरे परस उसकी क्लांतियों को मिटाना।
रूपक: जहाँ उपमेय और उपमान में अभेद दर्शाया गया है।
उदाहरण: म्लान हो हो कमल-पग को चूमना चाहती है।
कविता का केंद्रीय संदेश :
1. इस कविता का मुख्य संदेश यह है कि सच्चा प्रेम केवल व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोक-कल्याण की भावना में परिणत हो जाता है।
2. राधिका जी अपने गहरे विरह-दुख के बावजूद, पवन को मार्ग में मिलने वाले थके यात्रियों, कृषक ललनाओं और असहायों की पीड़ा हरने का निर्देश देती हैं।
3. कवि ने यह स्पष्ट किया है कि परोपकार और दूसरों के दुखों के प्रति संवेदनशीलता ही मानवता का सबसे बड़ा और सच्चा धर्म है।
4. यहाँ राधा का चरित्र एक साधारण विरहिणी से ऊपर उठकर एक विश्व-प्रेमिका और करुणामयी परोपकारिणी के रूप में आदर्श प्रस्तुत करता है।
5. यह रचना हमें सिखाती है कि अपने निजी कष्टों को परे रखकर दूसरों के कष्टों को दूर करने में ही जीवन की सार्थकता और आत्मिक शांति निहित है।