पाठ - 4 पेड़ों के संग बढ़ना सीखो
प्रिय विद्यार्थियों, हिंदी भाषा medhashine.in के इस सुंदर काव्य संसार में आपका स्वागत है। आज हम जिस कविता को पढ़ने जा रहे हैं, वह बहुत ही प्रेरणादायक है। एक शिक्षक के रूप में मेरा यह प्रयास रहेगा कि आ…


प्रिय विद्यार्थियों,
हिंदी भाषा medhashine.in के इस सुंदर काव्य संसार में आपका स्वागत है। आज हम जिस कविता को पढ़ने जा रहे हैं, वह बहुत ही प्रेरणादायक है। एक शिक्षक के रूप में मेरा यह प्रयास रहेगा कि आप इसके एक-एक शब्द और भाव को अपने हृदय से महसूस कर सकें।
संदर्भ और प्रसंग
पेड़ों के संग बढ़ना सीखो कविता हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक प्रज्ञा से ली गई है, जिसके रचयिता प्रसिद्ध कवि सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी हैं। इस सुंदर कविता में कवि ने पर्यावरण संरक्षण और पेड़ों के महत्त्व को बहुत ही सरल और मार्मिक ढंग से समझाया है। कवि हमें यह संदेश देना चाहते हैं कि प्रकृति के बिना मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है इसलिए हमें पेड़ों से प्रेम करना चाहिए।

प्रकृति से जुड़ने की अभिलाषा :
बहुत दिनों से सोच रहा था, थोड़ी-सी धरती पाऊँ
शब्दार्थ
धरती ~ जमीन
पाऊँ ~ प्राप्त करूँ
व्याख्या: कवि कहते हैं कि मैं काफी लंबे समय से यह विचार कर रहा था कि मुझे थोड़ी सी जमीन मिल जाए।
उस धरती में बाग-बगीचा, जो हो सके लगाऊँ,
शब्दार्थ
बाग-बगीचा ~ उपवन या वाटिका
व्याख्या: उस जमीन के टुकड़े पर मैं अपनी क्षमता के अनुसार एक सुंदर सा बगीचा लगाऊँ जिसमें हरियाली हो।
खिलें फूल-फल, चिड़ियाँ बोलें, प्यारी खुशबू डोले
शब्दार्थ
खुशबू ~ सुगंध
डोले ~ फैले या लहराए
व्याख्या: उस बगीचे में तरह तरह के फूल और फल खिलें और चिड़ियाँ मीठी आवाज में चहचहाएं तथा चारों ओर एक मनमोहक सुगंध फैल
जाए।
ताजी हवा जलाशय में अपना हर अंग भिगो ले।
शब्दार्थ
जलाशय ~ तालाब
अंग ~ शरीर का हिस्सा
व्याख्या: और वहाँ बहने वाली ताजी हवा उस तालाब के पानी से छूकर और भी अधिक ठंडी और आनंददायक हो जाए।
हो सकता है पास तुम्हारे, अपनी कुछ धरती हो
शब्दार्थ
पास ~ नजदीक या समीप
व्याख्या: कवि अपने पाठकों से कहते हैं कि ऐसा संभव है कि आप लोगों के पास अपनी खुद की कुछ जमीन हो।
फूल-फल लदे अपने उपवन हों, अपनी परती हो,
शब्दार्थ
लदे ~ भरे हुए
उपवन ~ बगीचा
परती ~ खाली छोड़ी गई जमीन
व्याख्या: हो सकता है कि आपके पास अपने ऐसे बगीचे हों जो फलों और फूलों से पूरी तरह भरे हों या खेती के लिए कोई खाली जमीन हो।
हो सकता है छोटी-सी क्यारी हो, महक रही हो
शब्दार्थ
क्यारी ~ पौधों के लिए बनाई गई जगह
महक ~ सुगंध
व्याख्या: यह भी संभव है कि आपके घर में पौधों की एक छोटी सी क्यारी हो जो सुंदर फूलों की खुशबू से सुगन्धित हो रही हो।
छोटी-सी खेती हो, जो फसलों से दहक रही हो।
शब्दार्थ
खेती ~ कृषि भूमि
दहक ~ चमक या लहलहाना
व्याख्या: या फिर आपके पास एक छोटा सा खेत हो जिसमें लहलहाती हुई सुनहरी फसलें अत्यंत सुंदर लग रही हों।
हो सकता है कहीं शांत चौपाए घूम रहे हों
शब्दार्थ
शांत ~ चुपचाप
चौपाए ~ चार पैरों वाले जानवर
व्याख्या: ऐसा भी हो सकता है कि आपके उस खेत या बगीचे में गाय और भैंस जैसे पालतू जानवर शांति से चर रहे हों।
हो सकता है कहीं सहन में पक्षी झूम रहे हों,
शब्दार्थ
सहन ~ घर का आँगन
झूम ~ आनंद से हिलना
व्याख्या: और यह भी संभव है कि आपके घर के खुले आँगन में पक्षी खुशी से चहचहा रहे हों और नाच रहे हों।

प्रकृति की रक्षा का विनम्र आग्रह :
तो विनती है यही, कभी मत उस दुनिया को खोना
शब्दार्थ
विनती ~ प्रार्थना या निवेदन
दुनिया ~ संसार
व्याख्या: इसलिए कवि हाथ जोड़कर आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप अपने आसपास की इस सुंदर प्राकृतिक दुनिया को कभी नष्ट मत होने देना।
पेड़ों को मत कटने देना, मत चिड़ियों को रोना।
शब्दार्थ
कटने ~ नष्ट होने
रोना ~ दुखी होना
व्याख्या: अपने आसपास लगे हुए पेड़ों को कभी कटने मत देना क्योंकि पेड़ कटने से बेचारी चिड़ियों का घर छिन जाएगा और वे रोने लगेंगी।
एक-एक पत्ती पर हम सबके सपने सोते हैं
शब्दार्थ
पत्ती ~ पेड़ का पत्ता
सपने ~ ख्वाब या भविष्य
व्याख्या: पेड़ों की एक एक पत्ती हमारे लिए अत्यंत मूल्यवान है क्योंकि इन्हीं पेड़ों की हरियाली से हमारा भविष्य और हमारे सपने सुरक्षित हैं।
शाखें कटने पर वे भोले शिशुओं-सा रोते हैं,
शब्दार्थ
शाखें ~ डालियाँ
शिशुओं ~ छोटे बच्चों
व्याख्या: जब भी पेड़ों की डालियाँ काटी जाती हैं तो वे पेड़ भी छोटे और मासूम बच्चों की तरह दर्द से रोने लगते हैं।
पेड़ों के संग बढ़ना सीखो, पेड़ों के संग हिलना
शब्दार्थ
संग ~ साथ
बढ़ना ~ विकास करना
व्याख्या: हमें पेड़ों के साथ ही अपना विकास करना चाहिए और हवा में झूमते पेड़ों के साथ हमें भी खुशियाँ मनाना सीखना चाहिए।
पेड़ों के संग-संग इतराना, पेड़ो के संग हिलना।
शब्दार्थ
इतराना ~ नखरे दिखाना या खुशी से झूमना
व्याख्या: जिस तरह पेड़ हवा में लहराते हुए गर्व से इतराते हैं हमें भी उनके साथ वैसे ही खुशी से झूमना चाहिए।

वर्तमान सभ्यता पर व्यंग्य और एक चेतावनी :
बच्चे और पेड़ दुनिया को हरा-भरा रखते हैं
शब्दार्थ
दुनिया ~ संसार
हरा-भरा ~ खुशहाल और जीवंत
व्याख्या: छोटे मासूम बच्चे और हरे भरे पेड़ ही इस पूरी दुनिया को खुशियों और जीवन से परिपूर्ण रखते हैं।
नहीं समझते जो, वे दुष्कर्मों का फल चखते हैं,
शब्दार्थ
दुष्कर्मों ~ बुरे कामों
फल ~ परिणाम या नतीजा
व्याख्या: जो अज्ञानी लोग इस सच्चाई को नहीं समझते हैं उन्हें भविष्य में अपने इन बुरे कर्मों का भयानक परिणाम भुगतना पड़ता है।
आज सभ्यता वहशी बन, पेड़ों को काट रही है
शब्दार्थ
सभ्यता ~ मानव समाज
वहशी ~ जंगली या क्रूर
व्याख्या: आज का आधुनिक मानव समाज अत्यंत क्रूर और लालची हो गया है जो अपने स्वार्थ के लिए लगातार पेड़ों को काट रहा है।
ज़हर फेफड़ों में भर, इंसानों को बाँट रही है।
शब्दार्थ
ज़हर ~ विष या घातक प्रदूषण
फेफड़ों ~ साँस लेने वाले अंग
व्याख्या: पेड़ों के कटने से हवा में प्रदूषण रूपी भयानक विष घुल रहा है जो सांसों के जरिए सभी इंसानों के फेफड़ों में जाकर उन्हें बीमार कर रहा है।
काव्य सौंदर्य और मूल भाव :
काव्य सौंदर्य :
* रस: शांत रस
* छंद: तुकांत मुक्त छंद
* अलंकार: अनुप्रास अलंकार, उपमा अलंकार शिशुओं सा में, पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार एक एक और संग संग में।
मूल भाव :
पर्यावरण और पेड़ों की रक्षा करना मानव जाति के अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है। हमें पेड़ों को अपने बच्चों के समान प्यार करना चाहिए और धरती को विनाश से बचाना चाहिए।