प्रगतिवाद
अब हम आधुनिक हिंदी कविता के उस पड़ाव पर हैं जहाँ कल्पना के सुंदर महल ढह जाते हैं और धूल-मिट्टी से सनी 'ज़मीन की सच्चाई' सामने आती है। इसे हम 'प्रगतिवाद' (1936 – 1943 ई.) कहते हैं। छायावाद में कवि बादल…


प्रगतिवाद: सामाजिक यथार्थ का युग : (1936-1943)
अब हम आधुनिक हिंदी कविता के उस पड़ाव पर हैं जहाँ कल्पना के सुंदर महल ढह जाते हैं और धूल-मिट्टी से सनी 'ज़मीन की सच्चाई' सामने आती है। इसे हम 'प्रगतिवाद' (1936 – 1943 ई.) कहते हैं।
छायावाद में कवि बादलों और तितलियों की बात कर रहा था, लेकिन प्रगतिवाद में कवि ने देखा कि बाहर सड़क पर बच्चा भूख से रो रहा है और मज़दूर पसीने में तर-बतर है। युग पूरी तरह से कार्ल मार्क्स की 'मार्क्सवादी' (साम्यवादी) विचारधारा पर टिका है। 1936 में लखनऊ में 'प्रगतिशील लेखक संघ' का पहला अधिवेशन हुआ, जिसकी अध्यक्षता मुंशी प्रेमचंद ने की थी। उन्होंने कहा था— "साहित्य केवल मनोरंजन की वस्तु नहीं है, उसका उद्देश्य समाज को बदलना है।"
प्रगतिवाद की मुख्य विशेषताएँ और विश्लेषण:
शोषितों के प्रति सहानुभूति :
प्रगतिवादी कवि का हृदय उन लोगों के लिए धड़कता है जो समाज में दबे-कुचले हैं— जैसे किसान, मज़दूर, और विधवाएँ।
कविता का उदाहरण सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' - 'वह तोड़ती पत्थर' से:
"वह तोड़ती पत्थर;
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर—
कोई न छायादार पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार।"
विश्लेषण: यहाँ कवि एक मज़दूरनी की कठिन मेहनत का वर्णन कर रहा है जो चिलचिलाती धूप में पत्थर तोड़ रही है। यहाँ कोई कल्पना नहीं, सिर्फ कड़वा सच है।
शोषक वर्ग के प्रति घृणा :
कवि उन लोगों पर आग उगलता है जो दूसरों का हक मारकर अमीर बने हैं (ज़मींदार, सेठ, पूँजीपति)।
कविता का उदाहरण रामधारी सिंह 'दिनकर':
"श्वानों को मिलता दूध-वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं,
माँ की हड्डी से चिपक, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं।"
विश्लेषण: कवि गुस्से में कहता है कि अमीरों के कुत्तों को तो दूध और कपड़े मिल रहे हैं, जबकि गरीब के बच्चे भूख और ठंड से मर रहे हैं। यह सामाजिक असमानता पर करारा प्रहार है।
धर्म और ईश्वर का विरोध:
प्रगतिवादी कवि मानता है कि धर्म और भाग्य की बातें गरीबों को सुलाने की 'अफीम' हैं। वे कहते हैं कि भाग्य के भरोसे मत बैठो, अपना हक छीन कर लो।
कविता का उदाहरण नागार्जुन:
"भीतर-भीतर गल रहा है जन-जन का मन,
ओ ईश्वर! कहाँ हो तुम? क्या सचमुच हो?
नारी का यथार्थ चित्रण:
छायावाद में नारी 'देवी' थी, लेकिन प्रगतिवाद में वह 'श्रमिक' (काम करने वाली) है। वह घर और बाहर दोनों जगह संघर्ष कर रही है।
सरल और सीधी भाषा:
चूँकि यह कविता आम आदमी के लिए थी, इसलिए कवियों ने कठिन संस्कृत शब्दों को छोड़कर आम बोलचाल की भाषा अपनाई।
प्रगतिवाद के प्रमुख कवि और रचनाएँ
कवि का नाम उपनाम/विशेषता प्रमुख रचनाएँ:
कवि का नाम उपनाम/विशेषता प्रमुख रचनाएँ
1. सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' छायावाद से प्रगतिवाद की ओर आए- कुकुरमुत्ता, नये पत्ते
2. नागार्जुन- 'जन-जन के कवि' (बाबा) युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, भस्मांकुर
3. रामधारी सिंह 'दिनकर'- 'ओज और विद्रोह के कवि' कुरुक्षेत्र, हुंकार, रश्मिरथी
4. केदारनाथ अग्रवाल- 'प्रकृति और श्रम के कवि'
प्रगतिवाद के प्रमुख कवि और उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं: कवि प्रमुख रचनाएँ
सुमित्रानंदन पंत - युगांत, युगवाणी, ग्राम्या
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' - कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नये पत्ते
रामधारी सिंह 'दिनकर'- हुंकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा
नागार्जुन- युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, प्यासी पथराई आँखें, तुमने कहा था
केदारनाथ अग्रवाल- नींद के बादल, युग की गंगा, फूल नहीं रंग बोलते हैं
शिवमंगल सिंह 'सुमन'- हिलोल, जीवन के गान, प्रलय सृजन, विंध्य हिमालय
त्रिलोचन शास्त्री -धरती, गुलाब और बुलबुल, उस जनपद का कवि हूँ
प्रगतिवाद की एक यादगार कविता : (परीक्षा के लिए)
जब हम प्रगतिवाद की बात करते हैं, तो निराला की 'कुकुरमुत्ता' कविता का ज़िक्र ज़रूर होता है। इसमें कुकुरमुत्ता जो गंदगी में उगता है - गरीब का प्रतीक हैI'गुलाब' अमीर का प्रतीक को गाली देते हुए कहता है:
"अबे, सुन बे गुलाब!
भूल मत गर पाई खुशबू, रंग-ओ-आब,
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट
अर्थ:
इस कविता में 'कुकुरमुत्ता' जो सर्वहारा/मजदूर वर्ग का प्रतीक है 'गुलाब' जो पूंजीपति वर्ग का प्रतीक है को फटकारते हुए कहता है कि हे गुलाब! तू अपनी इस सुंदरता, रंगत और खुशबू पर इतना घमंड मत कर। तू यह मत भूल कि तेरा यह अस्तित्व समाज के शोषित और गरीब वर्ग का खून चूसकर अर्थात जमीन की खाद और खाद डालने वाले मजदूरों की मेहनत से बना है। तू केवल दूसरों के श्रम का शोषण करके पूंजीपति की तरह इस डाल पर इतरा रहा है।
निष्कर्ष:
प्रगतिवाद ने साहित्य को ज़मीन से जोड़ा। इसने सिखाया कि पेट की भूख, आभूषणों के सौंदर्य से कहीं बड़ी सच्चाई है। लेकिन, क्या हुआ जब कविता केवल राजनीति और उपदेश बनकर रह गई? कवियों को लगा कि कविता अपनी नवीनता खो रही है। तब जन्म हुआ प्रयोगवाद का, जहाँ अज्ञेय जी ने कहा कि हमें शब्दों और विषयों के साथ नए प्रयोग करने चाहिए।