प्रथम: पाठ: भारतीया संस्कृति:
संस्कृत: मानव-जीवनस्य संस्करणं संस्कृतिः। शब्दार्थ: मानव-जीवनस्य = मानव जीवन को; संस्करणं = संवारना या दोष दूर करना; संस्कृतिः = संस्कृति है। अनुवाद: मानव जीवन को संवारना ही संस्कृति है। संस्कृत: अ…


संस्कृत: मानव-जीवनस्य संस्करणं संस्कृतिः।
शब्दार्थ: मानव-जीवनस्य = मानव जीवन को; संस्करणं = संवारना या दोष दूर करना; संस्कृतिः = संस्कृति है।
अनुवाद: मानव जीवन को संवारना ही संस्कृति है।
संस्कृत: अस्माकं पूर्वजा: मानवजीवनं संस्कर्तुं महान्तं प्रयत्नम् अकुर्वन्।
शब्दार्थ: अस्माकं = हमारे; पूर्वजा: = पूर्वजों ने; संस्कर्तुं = संवारने के लिए या शुद्ध करने के लिए; महान्तं = महान; प्रयत्नम् = प्रयत्न या प्रयास; अकुर्वन् = किया।
अनुवाद: हमारे पूर्वजों ने मानव जीवन को संवारने के लिए महान प्रयत्न किया था।
संस्कृत: ते अस्माकं जीवनस्य संस्करणाय यान् आचारान् विचारान् च अदर्शयन् तत् सर्वम् अस्माकं संस्कृतिः।
शब्दार्थ: ते = उन्होंने; संस्करणाय = संवारने के लिए; यान् = जिन; आचारान् = आचरणों को; विचारान् च = और विचारों को; अदर्शयन् = दिखाया; तत् सर्वम् = वह सब।
अनुवाद: उन्होंने हमारे जीवन को संवारने के लिए जिन आचरणों और विचारों को दिखाया, वह सब हमारी संस्कृति है।
संस्कृत: विश्वस्य स्रष्टा ईश्वरः एक एव इति भारतीय-संस्कृतेः मूलम्।
शब्दार्थ: विश्वस्य = संसार का; स्रष्टा = रचयिता ; एक एव = एक ही है; इति = यह; मूलम् = मूल या आधार है।
अनुवाद: संसार का रचयिता ईश्वर एक ही है, यह भारतीय संस्कृति का मूल है।
संस्कृत: विभिन्नमतावलम्बिनः विविधैः नामभिः एकम् एव ईश्वरं भजन्ते।
शब्दार्थ: विभिन्नमतावलम्बिनः = अलग-अलग धर्मों के अनुयायी; विविधैः = विविध या अनेक; नामभिः = नामों से; एकम् एव = एक ही; भजन्ते = भजते हैं।
अनुवाद: विभिन्न मतों को मानने वाले अनेक नामों से एक ही ईश्वर का भजन करते हैं।
संस्कृत: अग्निः, इन्द्रः, कृष्णः, करीमः, रामः, रहीमः, जिनः, बुद्धः, ख्रिस्तः, अल्लाहः इत्यादीनि नामानि एकस्य एव परमात्मनः सन्ति।
शब्दार्थ: इत्यादीनि = ये सभी; नामानि = नाम; एकस्य एव = एक ही; परमात्मनः = परमात्मा के; सन्ति = हैं।
अनुवाद: अग्नि, इन्द्र, कृष्ण, करीम, राम, रहीम, जिन, बुद्ध, ईसा मसीह, अल्लाह इत्यादि नाम एक ही परमात्मा के हैं।
संस्कृत: तम् एव ईश्वरं जनाः गुरुः इत्यपि मन्यन्ते।
शब्दार्थ: तम् एव = उसी ही; जनाः = लोग; इत्यपि = ऐसा भी; मन्यन्ते = मानते हैं।
अनुवाद: उसी ईश्वर को लोग गुरु भी मानते हैं।
संस्कृत: अतः सर्वेषां मतानां समभावः सम्मानश्च अस्माकं संस्कृतेः सन्देशः।
शब्दार्थ: अतः = इसलिए; सर्वेषां = सभी; मतानां = मतों का; समभावः = समान भाव; सम्मानश्च = और सम्मान; सन्देशः = सन्देश है।
अनुवाद: इसलिए सभी मतों के प्रति समान भाव और सम्मान हमारी संस्कृति का सन्देश है।
संस्कृत: भारतीया संस्कृतिः तु सर्वेषां मतावलम्बिनां संगमस्थली।
शब्दार्थ: तु = तो; मतावलम्बिनां = मतों को मानने वालों की; संगमस्थली = मिलन का स्थान।
अनुवाद: भारतीय संस्कृति तो सभी मतों को मानने वालों की संगमस्थली है।
संस्कृत: काले काले विविधाः विचाराः भारतीय-संस्कृतौ समाहिताः।
शब्दार्थ: काले काले = समय-समय पर; विविधाः = अनेक प्रकार के; समाहिताः = मिल गए।
अनुवाद: समय-समय पर अनेक प्रकार के विचार भारतीय संस्कृति में आकर मिल गए।
संस्कृत: एषा संस्कृतिः सामासिकी संस्कृतिः यस्याः विकासे विविधानां जातीनां सम्प्रदायानां विश्वासानांच योगदानं दृश्यते।
शब्दार्थ: एषा = यह; सामासिकी =मिली-जुली; यस्याः = जिसके; विकासे = विकास में; विविधानां = विभिन्न; विश्वासानांच = और विश्वासों का; दृश्यते = दिखाई देता है।
अनुवाद: यह संस्कृति एक मिली-जुली संस्कृति है, जिसके विकास में विभिन्न जातियों, सम्प्रदायों और विश्वासों का योगदान दिखाई देता है।
संस्कृत: अतएव अस्माकं भारतीयानाम् एका संस्कृतिः एका च राष्ट्रीयता।
शब्दार्थ: अतएव = इसलिए; अस्माकं भारतीयानाम् = हम भारतीयों की; एका = एक ही; च = और।
अनुवाद: इसलिए हम सब भारतीयों की एक ही संस्कृति और एक ही राष्ट्रीयता है।
संस्कृत: सर्वेऽपि वयं एकस्याः संस्कृतेः समुपासकाः, एकस्य राष्ट्रस्य च राष्ट्रियाः।
शब्दार्थ: सर्वेऽपि = हम सभी; वयं = हम; एकस्याः = एक ही; समुपासकाः = उपासक या मानने वाले; राष्ट्रस्य = राष्ट्र के; राष्ट्रियाः = नागरिक हैं।
अनुवाद: हम सभी एक ही संस्कृति के उपासक हैं, और एक ही राष्ट्र के नागरिक हैं।
संस्कृत: यथा भ्रातरः परस्परं मिलित्वा सहयोगेन सौहार्देन च परिवारस्य उन्नतिं कुर्वन्ति तथैव अस्माभिः अपि सहयोगेन सौहार्देन च राष्ट्रस्य उन्नतिः कर्तव्या।
शब्दार्थ: यथा = जिस प्रकार; भ्रातरः = भाई; परस्परं मिलित्वा = आपस में मिलकर; सहयोगेन = सहयोग से; सौहार्देन च = और प्रेम से; कुर्वन्ति = करते हैं; तथैव = उसी प्रकार; अस्माभिः अपि = हमें भी; कर्तव्या = करनी चाहिए।
अनुवाद: जिस प्रकार भाई आपस में मिलकर, सहयोग और प्रेम से परिवार की उन्नति करते हैं, उसी प्रकार हमें भी सहयोग और प्रेम से राष्ट्र की उन्नति करनी चाहिए।
संस्कृत: अस्माकं संस्कृतिः सदा गतिशीला वर्तते।
शब्दार्थ: सदा = हमेशा; गतिशीला = निरंतर चलने वाली; वर्तते = है।
अनुवाद: हमारी संस्कृति हमेशा से गतिशील है।
संस्कृत: मानवजीवनं संस्कर्तुम् एषा यथासमयं नवां नवां विचारधारां स्वीकरोति, नवां शक्तिं च प्राप्नोति।
शब्दार्थ: एषा = यह; यथासमयं = समय के अनुसार; नवां नवां = नई-नई; स्वीकरोति = स्वीकार करती है; प्राप्नोति = प्राप्त करती है।
अनुवाद: मानव जीवन को संवारने के लिए यह समय-समय पर नई-नई विचारधाराओं को स्वीकार करती है, और नई शक्ति प्राप्त करती है।
संस्कृत: अत्र दुराग्रहः नास्ति, यत् युक्तियुक्तं कल्याणकारि च तदत्र सहर्षं गृहीतं भवति।
शब्दार्थ: अत्र = यहाँ (इस संस्कृति में); दुराग्रहः = अनुचित जिद; नास्ति = नहीं है; यत् = जो; युक्तियुक्तं = तर्कसंगत या उचित; तदत्र = वह यहाँ; सहर्षं = हर्ष सहित; गृहीतं भवति = ग्रहण किया जाता है
अनुवाद: इसमें कोई दुराग्रह नहीं है; जो तर्कसंगत और कल्याणकारी है, वह यहाँ खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया जाता है।
संस्कृत: एतस्याः गतिशीलतायाः रहस्यं मानव-जीवनस्य शाश्वतमूल्येषु निहितम्, तद् यथा सत्यस्य प्रतिष्ठा, सर्वभूतेषु समभावः विचारेषु औदार्यम्, आचारे दृढता चेति।
शब्दार्थ: एतस्याः = इसकी; रहस्यं = रहस्य; शाश्वतमूल्येषु = सदा रहने वाले मूल्यों में; निहितम् = छिपा है; तद् यथा = जैसे कि; सत्यस्य = सत्य की; प्रतिष्ठा = सम्मान; सर्वभूतेषु = सभी प्राणियों में; समभावः = समान भाव; औदार्यम् = उदारता; दृढता = मजबूती; चेति = (च + इति) और ऐसा।
अनुवाद: इसकी गतिशीलता का रहस्य मानव जीवन के शाश्वत मूल्यों में निहित है, जैसे - सत्य का सम्मान, सभी प्राणियों के प्रति समान भाव, विचारों में उदारता और आचरण में दृढ़ता।
संस्कृत: एषा कर्मवीराणां संस्कृतिः।
शब्दार्थ: एषा = यह; कर्मवीराणां = कर्मवीरों की।
अनुवाद: यह कर्मवीरों की संस्कृति है।
संस्कृत: कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः इति अस्याः उद्घोषः।
शब्दार्थ: कुर्वन्नेवेह (कुर्वन् + एव + इह) = इस संसार में कर्म करते हुए ही; कर्माणि = कर्मों को; जिजीविषेच्छतं (जिजीविषेत् + शतं) = सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिए; समाः = वर्ष; अस्याः = इसका; उद्घोषः = घोषणा है।
अनुवाद: इस संसार में कर्म करते हुए ही सौ वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। यह इसकी घोषणा है।
संस्कृत: पूर्वं कर्म, तदनन्तरं फलम् इति अस्माकं संस्कृते नियमः।
शब्दार्थ: पूर्वं = पहले; तदनन्तरं = उसके बाद; नियमः = नियम है।
अनुवाद: पहले कर्म करो, उसके बाद फल की प्राप्ति - यह हमारी संस्कृति का नियम है।
संस्कृत: इदानीं यदा वयं राष्ट्रस्य नवनिर्माणे संलग्नाः स्मः निरन्तरं कर्मकरणम् अस्माकं मुख्यं कर्त्तव्यम्।
शब्दार्थ: इदानीं = इस समय; यदा = जब; वयं = हम; संलग्नाः स्मः = लगे हुए हैं; निरन्तरं = लगातार; कर्मकरणम् = कर्म करना ही; मुख्यं = मुख्य।
अनुवाद: इस समय जब हम राष्ट्र के नवनिर्माण में लगे हुए हैं, तो लगातार कर्म करना ही हमारा मुख्य कर्त्तव्य है।
संस्कृत: निजस्य श्रमस्य फलं भोग्यं, अन्यस्य श्रमस्य शोषणं सर्वथा वर्जनीयम्।
शब्दार्थ: निजस्य = अपने; श्रमस्य = परिश्रम का; भोग्यं = भोगने योग्य है; अन्यस्य = दूसरे के; शोषणं = शोषण; सर्वथा = पूरी तरह से; वर्जनीयम् = वर्जित है।
अनुवाद: अपने परिश्रम का फल ही भोगने योग्य है, दूसरे के श्रम का शोषण करना हर प्रकार से अनुचित है।
संस्कृत: यदि वयं विपरीतम् आचरामः तदा न वयं सत्यं भारतीय-संस्कृतेः उपासकाः।
शब्दार्थ: यदि = अगर; विपरीतम् = उलटा; आचरामः = आचरण करते हैं; तदा = तो; सत्यं = सच्चे; उपासकाः = उपासक हैं।
अनुवाद: यदि हम इसके विपरीत आचरण करते हैं, तो हम भारतीय संस्कृति के सच्चे उपासक नहीं हैं।
संस्कृत: वयं तदैव यथार्थं भारतीयाः यदा अस्माकम् आचारे विचारे च अस्माकं संस्कृतिः लक्षिता भवेत्।
शब्दार्थ: तदैव = तभी; यथार्थं = वास्तव में; यदा = जब; आचारे = आचरण में; विचारे च = और विचारों में; लक्षिता भवेत् = दिखाई दे।
अनुवाद: हम वास्तव में तभी सच्चे भारतीय हैं, जब हमारे आचरण और विचारों में हमारी संस्कृति दिखाई दे।
संस्कृत: अभिलाषामः वयं यत् विश्वस्य अभ्युदयाय भारतीय संस्कृतेः एषः दिव्यः सन्देशः लोके सर्वत्र प्रसरेत्।
शब्दार्थ: अभिलाषामः = चाहते हैं; यत् = कि; अभ्युदयाय = कल्याण के लिए; एषः = यह; दिव्यः = अलौकिक; लोके = संसार में; सर्वत्र = सब जगह; प्रसरेत् = फैले।
अनुवाद: हम चाहते हैं कि विश्व के कल्याण के लिए भारतीय संस्कृति का यह दिव्य सन्देश संसार में सब जगह फैले।
श्लोक
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुःखभाग् भवेत्।।
शब्दार्थ:
सर्वे = सभी; भवन्तु = हों; सुखिनः = सुखी; सन्तु = हों; निरामयाः = रोगमुक्त।
भद्राणि = कल्याण; पश्यन्तु = देखें; मा = नहीं; कश्चिद = कोई भी; दुःखभाग् = दुःख का भागी; भवेत् = हो।
अनुवाद:
सब सुखी हों, सब रोगमुक्त हों।
सब कल्याण को देखें, कोई भी दुःख का भागी न हो।