प्रश्नोत्तर
निम्नलिखित पंक्तियों में काव्य सौन्दर्य : 1. नीले फूले कमल-दल सी गात की श्यामलता है। भाव-पक्ष : इन पंक्तियों में द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि 'हरिऔध' जी ने श्री कृष्ण के अलौकिक और मनमोहक रूप-सौंदर्य…


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निम्नलिखित पंक्तियों में काव्य सौन्दर्य :
1. नीले फूले कमल-दल सी गात की श्यामलता है।
भाव-पक्ष : इन पंक्तियों में द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवि 'हरिऔध' जी ने श्री कृष्ण के अलौकिक और मनमोहक रूप-सौंदर्य का चित्रण किया है। वे पवन से कहते हैं कि श्री कृष्ण के सांवले शरीर की आभा किसी खिले हुए नीले कमल के पत्तों के समूह के समान अत्यंत नयनसुखद और सम्मोहक है।
कला-पक्ष :
भाषा: शुद्ध, परिमार्जित और संस्कृतनिष्ठ तत्सम प्रधान खड़ी बोली।
अलंकार: पूर्णोपमा अलंकार; क्योंकि यहाँ श्री कृष्ण के सांवले शरीर उपमेय की तुलना नीले कमल उपमान से 'सी' वाचक शब्द के माध्यम से 'श्यामलता' साधारण धर्म के आधार पर की गई है।
छंद: वर्णिक छंद के अंतर्गत मंदाक्रांता छंद 17 वर्ण।
रस: शृंगार रस माधुर्य गुण I
2. लंबी बाँहें कलभ-कर-सी शक्ति की पेटिका हैं।
भाव-पक्ष : यहाँ कवि ने श्री कृष्ण के केवल सौंदर्य का ही नहीं, अपितु उनके वीर और बलशाली पुरुषत्व का भी अंकन किया है। श्री कृष्ण की सुगठित और लंबी भुजाएँ हाथी के बच्चे की सूंड के समान पराक्रमी हैं, जो संसार की रक्षा करने वाली असीम शक्ति का आधार हैं।
कला-पक्ष :
भाषा: संस्कृत की सामासिक पदावली से युक्त साहित्यिक खड़ी बोली।
अलंकार: 'कलभ-कर-सी' में उपमा अलंकार है तथा 'शक्ति की पेटिका' में रूपक अलंकार का सहज प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। 'क' वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार भी है।
रस: वीर रस से मिश्रित शृंगार रस ओज और प्रसाद गुण।
छंद: मंदाक्रांता छंद।
3. उपमा अलंकार की परिभाषा देते हुए पाठ से एक उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
परिभाषा: जहाँ किसी वस्तु या व्यक्ति उपमेय के रूप, गुण, क्रिया या स्वभाव की तुलना किसी अन्य सुप्रसिद्ध वस्तु या व्यक्ति उपमान से किसी समान धर्म के आधार पर की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है।
इसके चार अनिवार्य अंग होते हैं- उपमेय जिसकी तुलना हो, उपमान जिससे तुलना हो, साधारण धर्म समान गुण, और वाचक शब्द सी, सा, से, सरिस सम।
उदाहरण:
मेरे प्यारे नव-जलद से कंज से नेत्र वाले।
स्पष्टीकरण: यहाँ श्री कृष्ण के नेत्रों की तुलना कमल के समान सुंदर होने के कारण उपमा अलंकार है।
4. शृंगार रस की परिभाषा देते हुए संयोग तथा वियोग रस का एक-एक उदाहरण लिखिए।
परिभाषा: नायक और नायिका के मन में संस्कार रूप में स्थित 'रति' नामक स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से परिपुष्ट होकर आस्वादन के योग्य हो जाता है, तब उसे शृंगार रस कहते हैं। शृंगार रस को 'रसराज' यानी रसों का राजा भी कहा जाता है। इसके दो भेद होते हैं:
(i) संयोग शृंगार रस
जब नायक और नायिका के परस्पर मिलन, वार्तालाप, दर्शन और प्रेमपूर्ण चेष्टाओं का वर्णन होता है, वहाँ संयोग शृंगार होता है।
उदाहरण :
बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सोह करै भौंहनु हँसे, दैन कहै नटि जाय॥
-बिहारीलाल
(ii) वियोग (विप्रलंभ) शृंगार रस :
जब नायक और नायिका एक-दूसरे से दूर होते हैं और उनके वियोग, तड़प तथा विरह की अवस्था का वर्णन होता है, वहाँ वियोग शृंगार होता है।
पवन दूतिका पाठ से उदाहरण:
मैं रो-रो के प्रिय-विरह से बावली हो रही हूँ,
जाके मेरी सब दुख-कथा श्याम को तू सुना दे।