प्रेम - माधुरी
प्रेम-माधुरी के सवैयों में जो विरह, उद्धव-गोपी संवाद और गोपियों की अनन्य प्रेम भावना दिखाई देती है, उसका मूल स्रोत श्रीमद्भागवत महापुराण का 'भ्रमरगीत' प्रसंग है। हिंदी साहित्य के इतिहास में इस पौराण…


प्रेम-माधुरी के सवैयों में जो विरह, उद्धव-गोपी संवाद और गोपियों की अनन्य प्रेम भावना दिखाई देती है, उसका मूल स्रोत श्रीमद्भागवत महापुराण का 'भ्रमरगीत' प्रसंग है। हिंदी साहित्य के इतिहास में इस पौराणिक घटना को आधार बनाकर सूरदास नें सूरसागर में , नंददास नें भ्रमरगीत में और आधुनिक काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने अपनी लेखनी चलाई है।
भगवान श्री कृष्ण का बाल्यकाल ब्रज में गोपियों, ग्वाल-बालों और राधा जी के साथ अत्यंत आनंदपूर्वक बीता। परंतु, जब कंस के अत्याचार बढ़ गए, तो कृष्ण को ब्रज छोड़कर मथुरा जाना पड़ा। मथुरा जाने के बाद कृष्ण वहाँ के राजा बन गए और राजकाज में व्यस्त हो गए, लेकिन उनके हृदय में ब्रजवासियों और गोपियों का निश्छल प्रेम सदा बना रहता था। मथुरा में कृष्ण के एक परम मित्र और मंत्री थे, जिनका नाम उद्धव था। उद्धव परम ज्ञानी थे और निराकार ब्रह्म (बिना रूप-रंग के ईश्वर) तथा योग-साधना के बहुत बड़े विद्वान थे। उन्हें अपने इस ज्ञान पर अहंकार भी था। वे प्रेम और भक्ति जैसी भावुक बातों को महत्व नहीं देते थे।
श्री कृष्ण उद्धव के इस ज्ञान के अहंकार को दूर करना चाहते थे और साथ ही ब्रजवासियों को यह सांत्वना भी देना चाहते थे कि वे उन्हें भूले नहीं हैं। इसलिए कृष्ण ने उद्धव को अपना दूत बनाकर ब्रज भेजा और कहा कि वे जाकर गोपियों को योग और निर्गुण ब्रह्म का उपदेश दें, ताकि उनका विरह-दुःख कम हो सके। उद्धव जब ब्रज पहुँचे, तो उन्होंने गोपियों को इकट्ठा करके ज्ञान, बुद्धि और निराकार ईश्वर की साधना का उपदेश देना शुरू किया। उन्होंने कहा कि कृष्ण को भूल जाओ और उस ईश्वर की आराधना करो जो हर जगह व्याप्त है। परंतु, गोपियाँ तो कृष्ण के साकार रूप से प्रेम करती थीं। उन्होंने उद्धव के रूखे ज्ञान को स्वीकार करने से मना कर दिया और अपने तर्कों से ज्ञानी उद्धव को निरुत्तर कर दिया। अंततः, गोपियों का अनन्य प्रेम देखकर उद्धव के ज्ञान का अहंकार टूट गया और वे स्वयं भी कृष्ण-भक्ति के रंग में रंग कर मथुरा वापस लौटे।
भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने 'प्रेम-माधुरी' के सवैयों में इसी 'भ्रमरगीत' की पृष्ठभूमि और गोपियों की मानसिक दशा को आधुनिक मोड़ देकर जोड़ा है। कवि भारतेंदु जी ने श्रीमद्भागवत की इस प्रसिद्ध कथा का सहारा लेकर 'प्रेम-माधुरी' में यह सिद्ध किया है कि ईश्वर को पाने के लिए बुद्धि, तर्क या सूखे ज्ञान की आवश्यकता नहीं है; ईश्वर तो केवल सच्चे, निश्छल और अनन्य प्रेम से ही प्राप्त हो सकते हैं।

सवैया 1 : प्रेम के मार्ग की कठिनता
पंक्ति 1 :
मारग प्रेम को को समुझै 'हरिचन्द' यथारथ होत यथा है।
शब्दार्थ :
मारग ➔ मार्ग/रास्ता
को ➔ कौन
यथारथ ➔ यथार्थ/वास्तविक
जथा ➔ जैसा
व्याख्या :
एक गोपी अपनी सखी से कहती है कि इस संसार में प्रेम के मार्ग की सच्चाई को भला कौन समझ सकता है? अर्थात् प्रेम का मार्ग वास्तव में जैसा है, उसे समझना अत्यंत कठिन है।
पंक्ति 2 :
लाभ कछू न पुकारन में बदनाम ही होन की सारी कथा है।
शब्दार्थ :
कछू ➔ कुछ
पुकारन में ➔ दूसरों के सामने रोने या दुःख व्यक्त करने में
व्याख्या :
अपने दुख और विरह की पीड़ा को दूसरों को बताने से कोई लाभ नहीं मिलने वाला है। यह प्रेम की कहानी तो ऐसी है कि इसे दूसरों को बताने से केवल बदनामी ही हाथ लगती है।
पंक्ति 3 :
जानत है जिय मेरो भली बिधि और उपाइ सबै बिरथा है।
शब्दार्थ :
जिय ➔ हृदय/मन
भली बिधि ➔ अच्छी तरह से
उपाइ ➔ उपाय/तरकीब
बिरथा ➔ व्यर्थ/बेकार
व्याख्या :
मेरा मन और हृदय इस बात को बहुत अच्छी तरह से जानता है कि इस प्रेम की पीड़ा से छुटकारा पाने के अन्य सभी उपाय बिल्कुल बेकार और व्यर्थ हैं।
पंक्ति 4 :
बावरे हैं बृज के सगरे मोहिं नाहक पूछत कौन बिथा है॥1॥
शब्दार्थ :
बावरे ➔ पागल
सगरे ➔ सभी/सारे
मोहिं ➔ मुझसे
नाहक ➔ व्यर्थ ही/बिना कारण
बिथा ➔ व्यथा/पीड़ा
व्याख्या :
ब्रज के ये सभी लोग शायद पागल हो गए हैं, जो सब कुछ जानते हुए भी मुझसे बिना कारण व्यर्थ में पूछते रहते हैं कि मुझे कौन सा कष्ट है या मेरी पीड़ा क्या है।
सवैया 2 : पति के परदेश जाते समय की दुविधा
पंक्ति 1 :
रोकहिं जो तो अमंगल होय औ प्रेम नसै जो कहैं पिय जाइए।
शब्दार्थ :
रोकहिं ➔ रोकना
अमंगल होय ➔ अपशकुन होना (जाते हुए को टोकना)
नसै ➔ नष्ट होता है
पिय ➔ प्रियतम/पति
व्याख्या :
नायिका कहती है कि यदि मैं अपने प्रियतम को जाते समय रोकती या टोकती हूँ, तो यह यात्रा के लिए अशुभ माना जाता है और यदि मैं कहती हूँ कि "हे प्रियतम! आप जाइए", तो इससे हमारे बीच का प्रेम नष्ट होता है ,उन्हें लगेगा कि मुझे उनके जाने का कोई दुख नहीं है।
पंक्ति 2 :
जौ कहैं जाहु न तो प्रभुता जौ कछू न कहैं तो सनेह नसाइए।
शब्दार्थ :
जाहु न ➔ मत जाओ
प्रभुता ➔ आदेश देना/हक जताना
सनेह ➔ स्नेह/प्रेम
नसाइए ➔ नष्ट होता है
व्याख्या :
यदि मैं उनसे कहती हूँ कि "मत जाइए", तो यह उन पर हुक्म चलाना या अधिकार जताना होगा। और यदि मैं चुप रहती हूँ और कुछ भी नहीं कहती, तो हमारा प्रेम ही नष्ट हो जाएगा।
पंक्ति 3 :
जो 'हरिचन्द' कहैं तुमरे बिनु जीहैं न तो यह क्यौ पतिआइए।
शब्दार्थ :
जीहैं न ➔ जीवित नहीं रहेंगे
पतिआइए ➔ विश्वास करेंगे
व्याख्या :
भारतेंदु हरिश्चंद्र जी कहते हैं कि नायिका सोचती है, यदि मैं उनसे यह कहूँ कि आपके बिना मैं जीवित नहीं रह पाऊँगी, तो वे मेरी इस बात पर भला क्यों विश्वास करेंगे?
पंक्ति 4 :
तासौ पयान समै तुमरे हम का कहैं आपै हमै समझाइए॥2॥
शब्दार्थ :
तासौ ➔ इसलिए/उस कारण
पयान समै ➔ प्रस्थान (जाने) के समय
का ➔ क्या
आपै ➔ आप ही
व्याख्या :
इसलिए हे प्रियतम! आपके जाने के इस समय मैं आपसे क्या कहूँ, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है, कृपया आप ही मुझे समझा दीजिए।
सवैया 3 : अनन्य प्रेम एवं अंतिम विदा की वेला
पंक्ति 1 :
आजु लौ जौ न मिले तो कहा हम तो तुमरे सब भाँति कहावैं।
शब्दार्थ :
आजु लौ ➔ आज तक
तो कहा ➔ तो क्या हुआ
सब भाँति ➔ सब प्रकार से
कहावैं ➔ कहलाते हैं
व्याख्या :
गोपी कहती है कि हे कृष्ण! यदि आज तक हम आपसे नहीं मिल पाए तो क्या हुआ, हम तो हर प्रकार से केवल आपके ही कहलाते हैं अर्थात् हम पूरी तरह से केवल आपको ही समर्पित हैं।
पंक्ति 2 :
मेरो उराहनो है कछु नाहिं सबै फल आपुने भाग को पावैं।
शब्दार्थ :
उराहनो ➔ उलाहना/शिकायत
कछु नाहिं ➔ कुछ भी नहीं
आपुने भाग को ➔ अपने भाग्य का
व्याख्या :
मेरी आपसे कोई भी शिकायत नहीं है, क्योंकि इस संसार में सभी लोग अपने-अपने भाग्य का ही फल प्राप्त करते हैं, शायद मेरे भाग्य में विरह का दुख ही लिखा था।
पंक्ति 3 :
जा 'हरिचन्द' भई सो भई अब प्रान चले चहैं तासों सुनावैं।
शब्दार्थ :
भई सो भई ➔ जो होना था वह हो गया
प्रान चले चहैं ➔ प्राण निकलने वाले हैं (मृत्यु निकट है)
तासों ➔ इसलिए
व्याख्या :
जो होना था सो हो गया, अब तो मेरे प्राण इस शरीर से निकलना ही चाहते हैं अर्थात मेरा अंतिम समय आ गया है, इसलिए मैं आपको अपनी यह आख़िरी बात सुना रही हूँ।
पंक्ति 4 :
प्यारे जू है जग की यह रीति बिदा की समै सब कंठ लगावैं॥3॥
शब्दार्थ :
प्यारे जू ➔ हे प्यारे कृष्ण!
रीति ➔ परंपरा/नियम
बिदा की समै ➔ विदाई के समय
कंठ लगावैं ➔ गले से लगाते हैं
व्याख्या :
हे प्यारे कृष्ण! इस संसार की यह परंपरा है कि अंतिम विदाई के समय सभी अपने प्रियजनों को गले लगाते हैं। इसलिए आप भी मुझे अंतिम समय में दर्शन देकर एक बार गले से लगा लीजिए।
सवैया 4 : निर्गुण ब्रह्म का खंडन और सगुण कृष्ण का मंडन
पंक्ति 1: व्यापक ब्रह्म सबै थल पूरन है हमहूँ पहचानती हैं।
शब्दार्थ :
व्यापक - हर जगह फैला हुआ
ब्रह्म - ईश्वर/परमात्मा
सबै - सभी
थल - स्थान
पूरन - भरा हुआ/विद्यमान
व्याख्या :
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! हम भी यह बात बहुत अच्छी तरह से जानती और मानती हैं कि परमात्मा इस संसार के कण-कण में और हर स्थान पर पूर्ण रूप से मौजूद है।
पंक्ति 2 : पै बिना नंदलाल बिहाल सदा 'हरिचंद' न ज्ञानहि ठानती हैं।
शब्दार्थ :
पै - परंतु
बिहाल - बेहाल/व्याकुल
ज्ञानहि - निर्गुण ज्ञान को
ठानती हैं - मानती हैं/स्वीकार करती हैं
व्याख्या :
परंतु हम नंद के लाल श्री कृष्ण के बिना हमेशा व्याकुल और बेचैन रहती हैं, और उनके प्रेम के अतिरिक्त आपके किसी भी ज्ञान या योग को हम बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करती हैं।
पंक्ति 3 : तुम ऊधौ यहै कहियो उनसों हम और कछू नहिं जानती हैं।
शब्दार्थ :
ऊधौ - हे उद्धव
कहियो - कहना
उनसों - उनसे (कृष्ण से)
व्याख्या :
हे उद्धव! तुम वापस जाकर श्री कृष्ण से केवल यही कह देना कि हम गोपियाँ उनके सिवाय इस संसार में और कुछ भी नहीं जानती हैं।
पंक्ति 4: पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अँखियाँ दुखियाँ नही मानती हैं।। 4 ।।
शब्दार्थ :
पिय - प्रियतम
तिहारे - आपको
निहारे बिना - देखे बिना
दुखियाँ - दुखी।
व्याख्या :
हे हमारे प्यारे प्रियतम! आपको अपनी आँखों से देखे बिना, हमारी ये दुखी आँखें किसी भी कीमत पर मानती नहीं हैं। इन्हें केवल आपके ही दर्शन की अभिलाषा है।
प्रेम - माधुरी : भाव - सौन्दर्य
प्रेम-माधुरी के इन सवैयों का भाव-सौंदर्य अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी है। सरल भाषा में कहें तो कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने यहाँ बनावटी या किताबी प्रेम का वर्णन नहीं किया है, बल्कि प्रेम में होने वाले वास्तविक सुख-दुःख, लाचारी और तड़प को सीधे दिल से पन्नों पर उतारा है।
सरल शब्दों में इसके भाव-सौंदर्य के प्रमुख बिंदु नीचे दिए गए हैं:
प्रेम की निश्छलता और सामाजिक विडंबना:
कवि ने दिखाया है कि सच्चा प्रेम करने वाले अपने दिल का दर्द किसी को बता भी नहीं पाते। गोपी जानती है कि दुनिया के सामने रोने से दर्द कम नहीं होता, बल्कि लोग मज़ाक उड़ाते हैं और बदनामी होती है। प्रेम की इस लोक-मर्यादा और पीड़ा को कवि ने बहुत खूबसूरती से उभारा है।
हृदय का असमंजस और दुविधा:
दूसरे सवैये में नारी के मन की उस गहरी दुविधा का सुंदर चित्रण है जब उसका प्रियतम परदेस जा रहा होता है। वह ऐसी स्थिति में खड़ी है जहाँ कुछ बोलना भी गलत है और चुप रहना भी। इस मनोवैज्ञानिक सच को कवि ने बहुत ही सरल ढंग से प्रकट किया है।
भाग्य को स्वीकारना और निश्छल समर्पण:
तीसरे सवैये में गोपी का समर्पण दिखाई देता है। वह कृष्ण से कोई शिकायत नहीं करती कि आप क्यों नहीं मिले। वह कहती है कि यह मेरे भाग्य का खेल था। परंतु, अंतिम विदाई के समय एक बार गले मिलने की चाह रखना, मानवीय हृदय की स्वाभाविक इच्छा का चरम सौंदर्य है।
ज्ञान पर प्रेम की विजय:
चौथे सवैये का भाव सबसे गहरा है। जब उद्धव आकर कहते हैं कि भगवान तो निराकार हैं, कण-कण में हैं, तो गोपियाँ इस ज्ञान को ठुकराती नहीं हैं। वे कहती हैं कि ज्ञान अपनी जगह सही होगा, पर हमारे पास जो आँखें हैं, वे तो केवल साकार कृष्ण को देखना चाहती हैं। यहाँ कवि ने स्पष्ट किया है कि बुद्धि के रूखे ज्ञान से बड़ा हृदय का सच्चा प्रेम होता है।
निष्कर्ष : इस कविता का भाव-सौंदर्य इस बात में है कि यह पाठक को केवल शब्दों से नहीं जोड़ती, बल्कि विरह की उस तड़प को महसूस कराती है जिसे हर प्रेमी हृदय कभी न कभी अनुभव करता है।
रस और अलंकार :
सवैया एक गद्यात्मक विधा न होकर भावप्रधान मुक्तक काव्य है, इसलिए रस पूरी कविता या पूरे पद में एक समान व्याप्त रहता है, जबकि अलंकार विशिष्ट पंक्तियों में शब्द-योजना के आधार पर होते हैं।
विशिष्ट पंक्तियाँ: उनमें निहित रस और अलंकार
सवैया 1 की पंक्तियाँ:
पंक्ति 1: मारग प्रेम को को समझै हरिचंद यथारथ होत यथा है।
रस: वियोग श्रृंगार रस।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार: यहाँ 'को को' शब्द लगातार दो बार आया है और दोनों बार इसका अर्थ एक ही है (कौन)।
अनुप्रास अलंकार: 'हरिचंद' और 'होत्' में 'ह' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास है।
पंक्ति 4: बावरे हैं बृज के सगरे मोहिं नाहक पूछत कौन बिथा है॥
रस: वियोग शृंगार रस ,गोपियों की खीझ और चिढ़।
अनुप्रास अलंकार: 'बृज' और 'बावरे' में 'ब' वर्ण की आवृत्ति है, जिससे यहाँ छेकानुप्रास अलंकार है।
सवैया 2 की पंक्तियाँ:
पंक्ति 1: रोकहिं जो तो अमंगल होय औ प्रेम नसै जो कहैं पिय जाइए।
रस: वियोग श्रृंगार रस (नायिका की अंतर्द्वंद्व की स्थिति)।
अनुप्रास अलंकार: 'प्रेम' और 'पिय' में 'प' वर्ण की आवृत्ति है।
पंक्ति 2: जौ कहैं जाहु न तो प्रभुता जौ कछू न कहैं तो सनेह नसाइए।
रस: वियोग शृंगार रस।
अनुप्रास अलंकार: 'जौ कहैं जाहु' में 'ज' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास की सुंदर छटा है।
सवैया 3 की पंक्तियाँ:
पंक्ति 3: जा 'हरिचंद' भई सो भई अब प्रान चले चहै तासों सुनावैं।
रस: वियोग श्रृंगार रस आसन्नमरण या विरह की अंतिम अवस्था।
अनुप्रास अलंकार: 'चले चहै' में 'च' वर्ण की तथा 'सो भई' में 'भ' वर्ण की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार है।
पंक्ति 4: प्यारे जू है जग की यह रीति बिदा की समै सब कंठ लगावैं॥
रस: वियोग श्रृंगार रस।
अनुप्रास अलंकार: 'जग' और 'जू' में 'ज' वर्ण की तथा 'समै सब' में 'स' वर्ण की आवृत्ति है।
सवैया 4 की पंक्तियाँ:
पंक्ति 4: पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अखियाँ दुखियाँ नही मानती हैं॥
रस: वियोग श्रृंगार रस ,चक्षु-प्रीति और दर्शन की व्याकुलता।
अनुप्रास अलंकार: 'पिय प्यारे' में 'प' वर्ण की आवृत्ति तथा 'तिहारे निहारे' में 'रे' वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास है।