पाठ - 6 बिहारी के दोहे
प्रिय विद्यार्थियों, हिंदी भाषा medhashine.in के इस सुंदर काव्य संसार में बिहारी के भक्ति और नीति के दोहे पढ़ेगें। आज हम सभी के जीवन की सच्ची राह दिखाने वाले बहुत ही सुंदर और गहरे अर्थ वाले दोहों को स…


प्रिय विद्यार्थियों,
हिंदी भाषा medhashine.in के इस सुंदर काव्य संसार में बिहारी के भक्ति और नीति के दोहे पढ़ेगें। आज हम सभी के जीवन की सच्ची राह दिखाने वाले बहुत ही सुंदर और गहरे अर्थ वाले दोहों को समझेंगे। यह दोहे सीधे हमारे हृदय को छूते हैं और हमें सही मार्ग पर चलना सिखाते हैं।
हमारी पाठ्यपुस्तक प्रज्ञा के बिहारी के दोहे पाठ की पंक्तियां हैं। इसके रचयिता प्रसिद्ध और अत्यंत संवेदनशील कवि बिहारीलाल जी हैं। इन दोहों में कवि ने जीवन के नैतिक मूल्यों और ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति का बहुत ही सरल और प्रभावशाली वर्णन किया है। आइए हम एक एक पंक्ति के माध्यम से इसके गहरे भावों को समझते हैं।

नीति और गुणों का सच्चा महत्व :
बड़े न हूजै गुनन बिन, विरद-बड़ाई पाय।
शब्दार्थ -
हूजै ~ होना
गुनन ~ गुण
बिन ~ बिना
विरद ~ यश या प्रसिद्धि
पाय ~ पाना
व्याख्या :
कवि कहते हैं कि कोई भी इंसान केवल झूठी तारीफ या प्रसिद्धि पाकर बड़ा नहीं बन जाता, यदि उसके अंदर अच्छे गुण न हों।
कहत धतूरे सों कनक, गहनों गढ़्यौ न जाय।।
शब्दार्थ -
सों ~ से
कनक ~ सोना या धतूरा
गढ़्यौ ~ बनाना
जाय ~ जाना
व्याख्या :
जैसे धतूरे को भी कनक यानी सोना कहा जाता है, लेकिन उस कनक से कोई सुंदर गहना नहीं बनाया जा सकता।
अति अगाध, अति ओथरो, नदी, कूप, सर बाइ।
शब्दार्थ -
अति ~ बहुत
अगाध ~ बहुत गहरा
ओथरो ~ उथला या कम गहरा
कूप ~ कुआं
सर ~ तालाब
बाइ ~ बावड़ी
व्याख्या :
कोई नदी कुआं तालाब या बावड़ी चाहे बहुत गहरी हो या बहुत कम गहरी हो इससे कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता।
सो ताकौ सागर जहाँ, जाकी प्यास बुझाइ।।
शब्दार्थ -
सो ~ वह
ताकौ ~ उसके लिए
सागर ~ समुद्र
जाकी ~ जिसकी
बुझाइ ~ बुझना
व्याख्या :
जिस पानी से किसी प्यासे की प्यास बुझ जाए, वही पानी उसके लिए विशाल समुद्र के समान महान होता है।
ओछे बड़े न ह्वै सकैं, लगौं सतर ह्वै गैन।
शब्दार्थ -
ओछे ~ छोटे या नीच स्वभाव वाले
ह्वै ~ होना
लगौं ~ लगकर
सतर ~ तनकर या क्रोध में
गैन ~ आसमान
व्याख्या :
ओछे या छोटी सोच वाले लोग कभी बड़े नहीं हो सकते, चाहे वे कितना भी तनकर आसमान को छूने की कोशिश क्यों न कर लें।
दीरघ होहिं न नैकहूँ, फारि निहारै नैन।।
शब्दार्थ -
दीरघ ~ बड़ा
होहिं ~ होना
नैकहूँ ~ थोड़ा सा भी
फारि ~ फाड़कर
निहारै ~ देखना
नैन ~ आंखें
व्याख्या :
जैसे कोई इंसान अपनी आंखें फाड़ फाड़कर बड़ी करने की कोशिश करे तो भी उसकी आंखें वास्तव में बड़ी नहीं हो जातीं।
कनक कनक तै सौगुनी, मादकता अधिकाय।
शब्दार्थ -
कनक ~ सोना और धतूरा
सौगुनी ~ सौ गुना
मादकता ~ नशा
अधिकाय ~ अधिक
व्याख्या :
सोने में धतूरे की तुलना में सौ गुना ज्यादा नशा होता है। यानी धन का नशा किसी भी दूसरे नशे से बहुत बड़ा और भयंकर होता है।
उहि खाये बौराय जग, इहिं पाये बौराय।।
शब्दार्थ -
उहि ~ उसे
खाये ~ खाने पर
बौराय ~ पागल होना
जग ~ संसार
इहिं ~ इसे
पाये ~ पाने पर
व्याख्या :
धतूरे को तो खाने के बाद इंसान पागल होता है, लेकिन सोने को तो केवल पा लेने भर से ही इंसान घमंड में पागल हो जाता है।
दिन दस आदरु पाइकै, करि लै आपु बखानु।
शब्दार्थ -
आदरु ~ सम्मान
पाइकै ~ पाकर
आपु ~ अपना
बखानु ~ तारीफ
व्याख्या :
कोई इंसान अगर कुछ दिनों के लिए झूठा सम्मान पा लेता है, तो वह अपनी तारीफ खुद ही करने लगता है।
जौ लगि काग सराध पखु, तौ लगि तौ सनमानु।।
शब्दार्थ -
जौ लगि ~ जब तक
काग ~ कौआ
सराध ~ श्राद्ध के दिन
पखु ~ पक्ष
तौ लगि ~ तब तक
सनमानु ~ सम्मान
व्याख्या :
जैसे श्राद्ध के दिनों में कौए को बहुत सम्मान मिलता है, लेकिन यह सम्मान केवल कुछ ही दिनों का होता है हमेशा का नहीं।

ईश्वर से एक सच्चे भक्त की शिकायत
बन्धु भये का दीन कै, को तारयौ रघुराइ।
शब्दार्थ -
बन्धु ~ भाई या मित्र
भये ~ हुए
दीन ~ गरीब या दुखी
तार्यौ ~ उद्धार करना
रघुराइ ~ भगवान राम
व्याख्या :
भक्त कवि कहता है कि हे भगवान आप किस दुखी इंसान के मित्र बने हैं और आपने किसका उद्धार किया है।
तूठे तूठे फिरत हौ, झूठे विरद कहाइ।।
शब्दार्थ -
तूठे ~ प्रसन्न होना
हौ ~ हो
विरद ~ यश
कहाइ ~ कहलाना
व्याख्या :
आप तो बस अपनी झूठी तारीफ सुनकर ही प्रसन्न हो जाते हैं, जबकि आपने मुझ जैसे सच्चे दुखी भक्त का अभी तक उद्धार नहीं किया है।
मोहन मूरति स्याम की, अति अद्भुत गति जोइ।
शब्दार्थ -
मोहन ~ मन को मोहने वाली
मूरति ~ मूर्ति या रूप
स्याम ~ भगवान कृष्ण
अद्भुत ~ अनोखी
गति ~ चाल या स्थिति
जोइ ~ देखना
व्याख्या :
भगवान कृष्ण की सांवली और मनमोहक छवि की लीला बहुत ही अद्भुत है।
बसतु सुचित-अन्तर तऊ, प्रतिबिम्बितु जग होइ।।
शब्दार्थ -
बसतु ~ बसना
सुचित ~ पवित्र मन
अन्तर ~ अंदर
तऊ ~ तो भी
प्रतिबिम्बितु ~ परछाई या झलक
जग ~ संसार
व्याख्या :
यह छवि भक्त के पवित्र मन के अंदर बसती है, लेकिन इसकी चमक और सुंदरता पूरे संसार में दिखाई देती है।
भजन कह्यौ, ताते भज्यौ, भज्यौ न एकौ बार।
शब्दार्थ -
भजन ~ ईश्वर का नाम जपना
कह्यौ ~ कहा
ताते ~ उससे
भज्यौ ~ भाग जाना
एकौ ~ एक भी
बार ~ बार
व्याख्या :
कवि कहते हैं कि हे मूर्ख मन मैंने तुझे जिस ईश्वर का नाम जपने के लिए कहा, तू उनकी भजन से ही दूर भाग गया।
दूरि भजन जातैं कह्यौ, सौ तैं भज्यौ गँवार।।
शब्दार्थ -
दूरि ~ दूर रहना
जातैं ~ जिससे
सौ ~ वही
तैं ~ तूने
भज्यौ ~ जपना या करना
गँवार ~ मूर्ख
व्याख्या :
और मैंने तुझे जिन बुरे कामों से दूर रहने के लिए कहा, तूने उन्हीं बेकार की चीजों को अपना लिया।
काव्य सौंदर्य और मूल भाव :
काव्य सौंदर्य :
* रस - इस पूरी कविता में शांत रस और भक्ति रस का बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण प्रयोग हुआ है।
* छंद - कवि ने अपनी बात कहने के लिए प्रसिद्ध दोहा छंद का प्रयोग किया है।
* अलंकार - कनक कनक में यमक अलंकार का बहुत सटीक प्रयोग है तथा अन्य स्थानों पर अनुप्रास अलंकार और दृष्टांत अलंकार की सुंदर छटा देखने को मिलती है।
मूल भाव :
हमें अपने जीवन में झूठे दिखावे और घमंड से दूर रहकर सच्चे गुण अपनाने चाहिए और निर्मल मन से ईश्वर की सच्ची भक्ति करनी चाहिए।