बोलता कागज़
मोहन अपने पिता की हर नसीहत को टोकना समझता था। पिता की डाँट, उनकी सलाह, उसे हर पल एक बोझ लगती थी। अचानक एक दिन पिताजी से ज़ोरदार बहस के बाद उसने गुस्से में कहा - मुझे आपकी किसी सीख की कोई ज़रूरत नहीं ह…



मोहन अपने पिता की हर नसीहत को टोकना समझता था। पिता की डाँट, उनकी सलाह, उसे हर पल एक बोझ लगती थी। अचानक एक दिन पिताजी से ज़ोरदार बहस के बाद उसने गुस्से में कहा - मुझे आपकी किसी सीख की कोई ज़रूरत नहीं है! आप कभी मुझे समझ नहीं सकते! हमेशा डांट-फटकार कर नीचा दिखाने की कोशिश करते-रहते हैं ?
पिता जी चुप रहे और कमरे से बाहर चले गए।
उस रात पिता जी ने उसे एक छोटा सा पत्र भेजा, पर उसने गुस्से में उसे पढ़ा तक नहीं।
कुछ दिन बाद, एक सड़क हादसे में पिताजी अचानक इस दुनिया से रुखसत हो गए।
एक दिन पिताजी के कमरे में सफाई करते वक्त मोहन की नज़र एक पत्र पर पड़ी। उसने लिफाफा खोला।
अंदर लिखा था-
" बेटा, अगर कभी लगे कि मैं तुझे समझ नहीं पाया, तो मुझे माफ़ कर देना। मैं हर बार सही नहीं था, लेकिन मैंने तेरा बुरा कभी नहीं चाहा। दुनिया तुझे गिरते देखेगी, पर तेरा पिता हमेशा तुझे उठता देखना चाहेगा।"
पत्र पढ़ते ही मोहन की चीख निकल पड़ी। जिस आवाज़ को वह शोर समझता था, आज वही हमेशा के लिए खामोश हो चुकी थी। उस रात के गहरे आत्ममंथन ने मोहन की दुनिया बदल दी। उसे समझ में आ गया कि अपनों की कीमत उनके जाने के बाद नहीं, बल्कि समय रहते पहचानी जानी चाहिए।
इस घटना ने उसके भीतर एक ऐसा जोश और जुनून जगाया कि उसने अपने अहंकार गुस्सा और आलस्य को त्यागकर अपने पिता के हर सपने को सच करने की ठान ली।
संदेश:
समय और अपने कभी दोबारा लौटकर नहीं आते। अपनों के प्रति अपनापन और सम्मान दिखाइए, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।