भक्ति के दोहे
यह 'भक्ति के दोहे' संपूर्ण पाठ मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण, श्री राधा जी और परमेश्वर के प्रति अनन्य भक्ति, उनके अलौकिक रूप-सौंदर्य और मानवीय मन की प्रवृत्तियों के विषय में कहा गया है। इन दोहों के मा…


यह 'भक्ति के दोहे' संपूर्ण पाठ मुख्य रूप से भगवान श्री कृष्ण, श्री राधा जी और परमेश्वर के प्रति अनन्य भक्ति, उनके अलौकिक रूप-सौंदर्य और मानवीय मन की प्रवृत्तियों के विषय में कहा गया है। इन दोहों के माध्यम से महाकवि बिहारी हमें यह संदेश देना चाहते हैं कि सांसारिक कष्टों से मुक्ति के लिए ईश्वर और उनकी आह्लादिनी शक्ति राधा जी की कृपा अनिवार्य है। वे यह समझाते हैं कि भगवान का आश्रय लेते ही मनुष्य का अंतःकरण दोषमुक्त और पवित्र हो जाता है। इसके अतिरिक्त, वे हमें बाह्य आडंबरों, झूठे दिखावों, माला-तिलक जैसे पाखंडों को त्यागकर निष्कपट और सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करने की प्रेरणा देते हैं, क्योंकि परमात्मा किसी दिखावे से नहीं बल्कि केवल सत्य, निष्छल प्रेम और आंतरिक पवित्रता से ही रीझते हैं। साथ ही साथ जीवन में सदैव विनम्रता अपनानी चाहिए, धन का घमंड नहीं करना चाहिए, और किसी बाहरी ताकत के बहकावे में आकर अपने ही भाइयों या देशवासियों का अहित नहीं करना चाहिए।

दोहा 1 : मेरी भव-बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।
शब्दार्थ :
* भव-बाधा - सांसारिक कष्ट या परेशानियाँ
* हरौ - दूर करो या नष्ट करो
* नागरि - चतुर या ज्ञानमयी
* सोइ - वही
व्याख्या : कवि प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि वही चतुर राधिका जी मेरे इस सांसारिक जीवन के सभी कष्टों और दुखों को दूर करें।
जा तन की झाईं परै, स्यामु हरित-दुति होइ।
शब्दार्थ :
* जा - जिसके
* तन - शरीर
* झाईं - परछाई या झलक, ध्यान
* परै - पड़ने से
* स्यामु - श्रीकृष्ण या सांवला रंग, अज्ञान
* हरित-दुति - प्रसन्न होना या हरे रंग का होना,
नष्ट हो जाते हैं
व्याख्या 1 : जिन राधा जी के गोरे शरीर की परछाई पड़ने मात्र से ही सांवले रंग के श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न व कांतियुक्त हो जाते हैं, वे मेरे कष्टों का निवारण करें।
नोट - बिहारी के काव्य में गागर में सागर भरने वाली बात इस दोहे से पुष्टि की जा सकती है ,जिसके एक से अधिक अर्थ हैं I जो निम्न हैं -
व्याख्या 2 : हे ज्ञानमयी राधारानी ! मेरे सांसारिक दुखों को हर लें। जिस प्रकार हृदय में आपके दिव्य स्वरूप का ध्यान आते ही, मन के सारे काले पाप और अज्ञान नष्ट हो जाते हैं उसी प्रकार आप मेरे जीवन को शुद्ध कर दें।
व्याख्या 3 : हे चतुर राधिके! मेरे कष्टों को दूर करें। जब आपके गोरे, स्वर्णिम, पीले शरीर की आभा सांवले, नीले, काले श्रीकृष्ण पर पड़ती है, तो वे दोनों रंग मिलकर एक अद्भुत हरे रंग की चमक पैदा करते हैं।
दोहा 2 : मोर-मुकुट की चंद्रिकनु, यौं राजत नंदनंद।
शब्दार्थ :
* चंद्रिकनु - मोरपंख में बनी चंद्रमा जैसी आकृतियाँ
* यौं - इस प्रकार
* राजत - सुशोभित होना या सुंदर लगना
* नंदनंद - नंद जी के पुत्र श्रीकृष्ण
व्याख्या : नंद के लाल श्रीकृष्ण के सिर पर सजे हुए मोर-मुकुट की चंद्राकार आकृतियाँ देखने में इस प्रकार सुंदर लग रही हैं।
मनु ससि सेखर की अकस, किय सेखर सत चंद।
शब्दार्थ :
* मनु - मानो
* ससि सेखर - शिव जी, जिनके सिर पर चंद्रमा है
* अकस - ईर्ष्या या प्रतिस्पर्धा
* सेखर - सिर
* सत चंद - सौ चंद्रमा
व्याख्या : ऐसा प्रतीत होता है मानो भगवान शिव से ईर्ष्या के कारण श्रीकृष्ण ने अपने सिर पर सैकड़ों चंद्रमा धारण कर लिए हों।
दोहा 3 : सोहत ओढ़ै पीतु पटु, स्याम सलौनैं गात।
शब्दार्थ :
* सोहत - सुंदर लगना
* ओढ़ै - पहने हुए या धारण किए हुए
* पीतु पटु - पीला वस्त्र
* स्याम - सांवले
* सलौनैं - सुंदर
* गात - शरीर
व्याख्या : श्रीकृष्ण अपने सुंदर सांवले शरीर पर पीले रंग का वस्त्र ओढ़े हुए बहुत ही आकर्षक लग रहे हैं।
मनौ नीलमनि-सैल पर, आतपु परयौ प्रभात।
शब्दार्थ :
* मनौ - मानो
* नीलमनि-सैल - नीलमणि का पर्वत
* आतपु - धूप
* परयौ - पड़ना
* प्रभात - सुबह
व्याख्या : उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो नीलमणि के पर्वत पर सुबह की पीली-पीली धूप पड़ रही हो।
दोहा 4 : अधर धरत हरि कै परत, ओठ-डीठि-पट-जोति।
शब्दार्थ :
* अधर - होठों पर
* धरत - रखते ही
* हरि - श्रीकृष्ण
* कै परत - पड़ते ही
* ओठ - होठ (लाल रंग)
* डीठि - दृष्टि या आँखें
* पट - वस्त्र
* जोति - चमक या प्रकाश
व्याख्या : जब श्रीकृष्ण अपने होठों पर बांसुरी रखते हैं, तो उस पर उनके लाल होठों, श्वेत-श्याम आँखों और पीले वस्त्रों की चमक पड़ती है।
हरित बाँस की बाँसुरी, इंद्रधनुष रँग होति।
शब्दार्थ :
* हरित - हरे रंग की
* रँग - रंग जैसी
* होति - हो जाती है
व्याख्या : इन सभी रंगों के आपस में मिलने से वह हरे रंग की साधारण बाँसुरी इंद्रधनुष के विभिन्न रंगों की तरह चमकने लगती है।
दोहा 5 : या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोइ।
शब्दार्थ :
* अनुरागी - प्रेम से भरे हुए
* चित्त - मन या हृदय
* गति - दशा या व्यवहार
* समुझै - समझता
व्याख्या: श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबे हुए इस मन की दशा को कोई भी साधारण मनुष्य आसानी से नहीं समझ सकता।
ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रँग, त्यों-त्यों उज्जुलु होइ।
शब्दार्थ :
* ज्यों-ज्यों - जैसे-जैसे
* बूड़ै - डूबता है
* स्याम रँग - श्रीकृष्ण के प्रेम में या काले रंग में
* त्यों-त्यों - वैसे-वैसे
* उज्जुलु - पवित्र या स्वच्छ या सफेद
व्याख्या : यह मन जैसे-जैसे सांवले रंग के श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबता जाता है, वैसे-वैसे यह विकारों से मुक्त होकर और अधिक पवित्र एवं उज्ज्वल होता जाता है।
दोहा 6 : तौ लगु या मन-सदन मैं, हरि आवैं किहिं बाट।
शब्दार्थ :
* तौ लगु - तब तक
* या - इस
* मन-सदन - मन रूपी घर
* हरि - भगवान
* किहिं बाट - किस रास्ते से
व्याख्या : जब तक मनुष्य के इस मन रूपी घर में भगवान के आने का कोई साफ रास्ता नहीं होगा, तब तक वे भला किस रास्ते से प्रवेश करेंगे।
बिकट जटे जौ लगु निपट, खुटैं न कपट-कपाट।
शब्दार्थ :
* बिकट - मजबूती से
* जटे - बंद हैं
* जौ लगु - जब तक
* निपट - पूरी तरह से
* खुटैं - खुलते
* कपट-कपाट - छल और धोखे रूपी दरवाजे
व्याख्या : जब तक मन के भीतर मजबूती से बंद पड़े हुए छल-कपट रूपी किवाड़ पूरी तरह खुल नहीं जाते, तब तक ईश्वर का वास वहाँ नहीं हो सकता।
दोहा 7 : जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौ नाँहि।
शब्दार्थ :
* जगतु - संसार
* जनायौ - परिचय कराया या ज्ञान दिया
* जिहिं - जिसने
* सकलु - सारा या संपूर्ण
* सो - उस
* हरि - ईश्वर को
* जान्यौ नाँहि - नहीं जाना
व्याख्या : जिस परमेश्वर ने तुम्हें इस पूरे संसार का ज्ञान कराया और तुम्हें यहाँ भेजा, तुमने उस ईश्वर को ही पहचानना छोड़ दिया।
ज्यों आँखिनु सबु देखियै, आँखि न देखी जाहि।
शब्दार्थ :
* ज्यों - जिस प्रकार
* आँखिनु - आँखों से
* सबु - सब कुछ
* देखियै - देखा जाता है
* जाहि - जाती
व्याख्या : यह ठीक वैसा ही है जैसे हम अपनी आँखों से दुनिया की हर चीज देख सकते हैं, परंतु अपनी ही आँखों को स्वयं नहीं देख पाते।
दोहा 8 : जपमाला, छापै, तिलक सरै न एकौ कामु।
शब्दार्थ :
* जपमाला - नाम जपने की माला
* छापै - रामनामी वस्त्र छापना या
बदन पर राम-राम लिखवाना
* सरै न - सिद्ध नहीं होता
* एकौ - एक भी
* कामु - कार्य या उद्देश्य
व्याख्या : केवल हाथ में माला फेरने, चंदन का तिलक लगाने या रामनामी वस्त्र पहनने जैसे बाहरी आडंबरों से ईश्वर प्राप्ति का एक भी काम पूरा नहीं होता I
मन-काँचे नाचै वृथा, साँचै राँचै रामु।
शब्दार्थ :
* मन-काँचे - कच्चे या चंचल मन वाला व्यक्ति
* नाचै - भटकता है
* वृथा - बेकार में या व्यर्थ में
* साँचै - सच्चे मन में
* राँचै - प्रसन्न होते हैं या बसते हैं
व्याख्या : जिसका मन ईश्वर की भक्ति में कच्चा है, वह व्यर्थ ही यहाँ-वहाँ भटकता रहता है, क्योंकि भगवान राम तो केवल सच्चे मन वाले भक्तों से ही प्रसन्न होते हैं।