भरत महिमा
प्रस्तुत काव्य (यूपी बोर्ड कक्षा 11 )पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस के अयोध्या कांड से ली गई हैं। यह अंश भरत-महिमा शीर्षक के अंतर्गत संकलित है। इन पंक्तियों म…


प्रस्तुत काव्य (यूपी बोर्ड कक्षा 11 )पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित प्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस के अयोध्या कांड से ली गई हैं। यह अंश भरत-महिमा शीर्षक के अंतर्गत संकलित है।
इन पंक्तियों में उस समय का अत्यंत मार्मिक वर्णन है जब भरत जी अपने छोटे भाई शत्रुघ्न, माताओं और अयोध्या के संपूर्ण समाज के साथ श्री राम को वन से वापस लौटा लाने के लिए पैदल ही चित्रकूट की ओर जा रहे हैं। मार्ग में पड़ने वाले गाँवों की स्त्रियाँ और निवासी भरत जी के भ्रातृ-प्रेम, उनके त्याग और उनकी सादगी को देखकर अत्यंत प्रभावित होते हैं तथा आपस में उनके निर्मल गुणों की चर्चा करते हैं। इसके साथ ही पूरी अयोध्या के समाज का श्री राम के दर्शन के लिए उत्साह और मार्ग में होने वाले शुभ शकुनों का चित्रण किया गया है।

दोहा 1
चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।
जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु।।
शब्दार्थ–
पयादें – पैदल
तजि – त्याग कर
सरिस – समान
व्याख्या:
पिता दशरथ द्वारा दिए गए विशाल राज्य को त्याग कर, भरत जी कंद-मूल-फल खाते हुए और नंगे पैर पैदल चलते हुए श्री राम को मनाने के लिए वन जा रहे हैं। आज के इस समय में भरत जी के समान महान, त्यागी और भ्रातृ-प्रेमी भला कौन हो सकता है।
चौपाई 1
भायप भगति भरत आचरनू।
कहत सुनत दुख दूषन हरनू।।
शब्दार्थ–
भायप – भाईचारा या भ्रातृभाव
दूषन – दोष या पाप
हरनू – हरने वाला या दूर करने वाला
व्याख्या:
मार्ग के गाँव की स्त्रियाँ आपस में कहती हैं कि भरत जी का भाईचारा, उनकी राम के प्रति भक्ति और उनका आचरण इतना पवित्र है कि इसके बारे में केवल कहने और सुनने मात्र से ही मनुष्य के जीवन के सभी दुख और दोष दूर हो जाते हैं।
चौपाई 2
जो किछु कहब थोर सखि सोई।
राम बंधु अस काहे न होई।।
शब्दार्थ–
थोर – थोड़ा या कम
अस – ऐसा
व्याख्या:
हे सखी, भरत जी के शील और गुणों के विषय में जो कुछ भी कहा जाए, वह बहुत थोड़ा ही है। वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के भाई हैं, तो फिर वे इतने महान, श्रेष्ठ और सद्गुणी क्यों न हों।
चौपाई 3
हम सब सानुज भरतहि देखें।
भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें।।
शब्दार्थ–
सानुज – छोटे भाई अनुज अर्थात् शत्रुघ्न सहित
जुबती जन लेखें – भाग्यशाली स्त्रियों की गिनती में
व्याख्या:
छोटे भाई शत्रुघ्न के साथ भरत जी के पावन दर्शन करके हम सभी ग्रामीण स्त्रियाँ धन्य हो गई हैं और अब हमारा यह जीवन सफल और भाग्यशाली स्त्रियों की गिनती में आ गया है।
चौपाई 4
सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं।
कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं।।
शब्दार्थ–
दसा – दशा या वैराग्यपूर्ण स्थिति
जननि जोगु – माता के योग्य
व्याख्या:
भरत जी के इन महान गुणों को सुनकर और उनकी तपस्वी जैसी कठोर दशा देखकर स्त्रियाँ पछतावा करती हुई कहती हैं कि भरत जैसा श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ पुत्र कैकेयी जैसी कठोर और स्वार्थी माता के योग्य बिल्कुल नहीं था।
चौपाई 5
कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन।
बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन।।
शब्दार्थ–
दूषनु – दोष या अपराध
बिधि – विधाता या भाग्य
दाहिन – अनुकूल या मेहरबान
व्याख्या:
तभी उनमें से कोई दूसरी समझदार स्त्री कहती है कि इसमें रानी कैकेयी का भी कोई दोष नहीं है। यह सब तो स्वयं विधाता ने किया है, जो हम सब पर इतना प्रसन्न और अनुकूल है, इसी कारण हमें घर बैठे यह सौभाग्य मिला है।
चौपाई 6
कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी।
लघु तिय कुल करतूति मलीनी।।
शब्दार्थ–
हीनी – हीन या रहित
लघु तिय – तुच्छ या साधारण स्त्रियाँ
करतूति मलीनी – मलिन कर्मों वाली
व्याख्या:
कहाँ तो हम लोक-मर्यादा और वेदों की विधि से पूरी तरह हीन साधारण स्त्रियाँ हैं, जिनका कुल और कर्म दोनों ही मलिन अर्थात् बहुत ही तुच्छ स्तर के हैं।
चौपाई 7
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा।
कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा।।
शब्दार्थ–
कुदेस – पिछड़ा या खराब देश
कुबामा – निम्न कोटि की स्त्रियाँ
दरसु – दर्शन
व्याख्या:
हम खराब देश और खराब गाँव में निवास करने वाली निम्न कोटि की स्त्रियाँ हैं, और कहाँ भरत जी का यह पावन दर्शन प्राप्त होना, यह निश्चित रूप से हमारे किसी पिछले जन्म के महान पुण्य का ही सुंदर परिणाम है।
चौपाई 8
अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा।
जनु मरुभूमि कलपतरु जामा।।
शब्दार्थ–
अचिरिजु – आश्चर्य
मरुभूमि – रेगिस्तान
कलपतरु – मनोकामना पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष
व्याख्या:
भरत जी को इस प्रकार जाते देखकर रास्ते के प्रत्येक गाँव में लोगों के बीच ऐसा ही अपार आनंद और आश्चर्य छाया हुआ है, मानो किसी सूखे रेगिस्तान में अचानक कोई हरा-भरा कल्पवृक्ष उग आया हो।

दोहा 2
तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।
राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ।।
शब्दार्थ–
बासर – दिन
बसि – निवास करके या रुककर
लालसा – तीव्र इच्छा
सरिस – समान
व्याख्या:
उस दिन रास्ते में वहीं विश्राम करके, अगले दिन प्रातःकाल श्री रघुनाथ जी का स्मरण करते हुए भरत जी आगे बढ़े। भरत जी के समान ही उनके साथ चल रहे सभी लोगों के हृदय में भी श्री राम के दर्शन की अत्यंत तीव्र इच्छा थी।
चौपाई 1
मंगल सगुन होहिं सब काहू।
फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।।
शब्दार्थ–
मंगल सगुन – शुभ शकुन
फरकहिं – फड़कने लगे
बिलोचन – नेत्र
व्याख्या:
रास्ते में चलते हुए सभी लोगों को मंगलकारी और शुभ शकुन होने लगे। पुरुषों की दाईं और स्त्रियों की बाईं आँखें तथा भुजाएँ फड़कने लगीं, जो श्री राम से सुखद मिलन का स्पष्ट संकेत दे रही थीं।
चौपाई 2
भरतहिं सहित समाज उछाहू।
मिलिहहिं रामु मिटिहि दुख दाहू।।
शब्दार्थ–
समाज – साथ चल रहे लोग
उछाहू – उत्साह या उल्लास
दाहू – जलन या पीड़ा
व्याख्या:
भरत जी सहित पूरे समाज के हृदय में अपार उल्लास और उत्साह भरा हुआ है कि अब बहुत शीघ्र ही श्री राम से मिलन होगा और उनके वियोग से उत्पन्न होने वाला सारा दुख और संताप हमेशा के लिए मिट जाएगा।
चौपाई 3
करत मनोरथ जस जियँ जाके।
जाहिं सनेह सुराँ सब छाके।।
शब्दार्थ–
मनोरथ – मन की इच्छा
सुराँ – मदिरा
छाके – छके हुए या मग्न
व्याख्या:
जिसके मन में जैसी भावना है, वह वैसी ही सुंदर कल्पना और मनोरथ कर रहा है। सभी लोग श्री राम के प्रेम रूपी मदिरा का पान करके पूरी तरह से छके हुए अर्थात् प्रेम में मस्त होकर चले जा रहे हैं।
चौपाई 4
सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं।
बिहबल बचन पेम बस बोलहिं।।
शब्दार्थ–
सिथिल – थके हुए या प्रेम में ढीले
मग – मार्ग
बिहबल – भावुक या व्याकुल
व्याख्या:
राम के प्रेम के कारण उनके शरीर शिथिल हो गए हैं, जिससे रास्ते में चलते समय उनके पैर डगमगा रहे हैं। प्रेम के वशीभूत होकर वे सभी भावुकता से भरे हुए गदगद वचन बोल रहे हैं।
चौपाई 5
रामसखाँ तेहि समय देखावा।
सैल सिरोमनि सहज सुहावा।।
शब्दार्थ–
रामसखाँ – राम के सखा या मित्र निषादराज
सैल सिरोमनि – पर्वतों में श्रेष्ठ कामदगिरि
सुहावा – सुंदर
व्याख्या:
ठीक उसी समय राम के मित्र निषादराज गुह ने उन्हें पर्वतों में श्रेष्ठ और स्वाभाविक रूप से अत्यंत सुंदर कामदगिरि पर्वत दूर से दिखाया।
चौपाई 6
जासु समीप सरित पय तीरा।
सीय समेत बसहिं दोउ बीरा।।
शब्दार्थ–
सरित – नदी
पय – जल
तीरा – किनारा
व्याख्या:
निषादराज ने बताया कि जिस पर्वत के समीप पयस्विनी नदी बहती है, उसी नदी के किनारे सीता जी के साथ दोनों वीर भाई श्री राम और लक्ष्मण पर्णकुटी में निवास करते हैं।
चौपाई 7
देखि करहिं सब दंड प्रनामा।
कहि जय जानकि जीवन रामा।।
शब्दार्थ–
दंड प्रनामा – साष्टांग या दंडवत प्रणाम
जानकि जीवन – सीता जी के प्राणनाथ
व्याख्या:
उस पवित्र पर्वत को दूर से ही देखकर सभी लोगों ने जानकी-जीवन श्री राम की जय-जयकार पुकारते हुए वहीं से साष्टांग दंडवत प्रणाम किया।
चौपाई 8
प्रेम मगन अस राजसमाजू।
जनु फिरि अवध चले रघुराजू।।
शब्दार्थ–
मगन – डूबा हुआ
राजसमाजू – राजसी समाज
जनु – मानो
व्याख्या:
भरत जी के साथ आया हुआ वह पूरा राजसमाज श्री राम के प्रेम में इस प्रकार मग्न था, मानो स्वयं श्री राम ही अयोध्या लौटकर वापस जा रहे हों।

दोहा: 3
भरत प्रेमु तेहिसमय जस तस कहि सकइ न सेषु।
कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु।।3।।
शब्दार्थ–
जस – जैसा
सेषु – शेषनाग
अगम – कठिन या पहुँच से बाहर
जनेषु – मनुष्यों में
व्याख्या:
उस समय भरत जी का अपने भाई के प्रति जैसा प्रेम था, उसका वर्णन शेषनाग भी नहीं कर सकते। कवि के लिए उस प्रेम का वर्णन करना उसी प्रकार अगम्य है, जैसे मुझ जैसे साधारण और मलिन मनुष्यों के लिए ब्रह्मानंद या ईश्वर प्राप्ति का सुख अगम्य होता है।
चौपाई 1
सकल सनेह सिथिल रघुबर कें।
गए कोस दुइ दिनकर ढरकें।।
शब्दार्थ–
सकल – सभी
सिथिल – थके हुए
दिनकर ढरकें – सूर्य ढलने पर
व्याख्या:
श्री राम के प्रेम में सभी लोग इतने शिथिल हो गए थे कि सूर्य ढलने तक वे मुश्किल से दो कोस ही चल पाए।
चौपाई 2
जलु थलु देखि बसे निसि बीतें।
कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें।।
शब्दार्थ–
थलु – स्थान
गवन – प्रस्थान
पिरीतें – प्रेम से
व्याख्या:
रास्ते में अनुकूल जल और स्थान देखकर वे रात बिताने के लिए वहीं रुक गए। रात बीतने पर प्रातःकाल रघुनाथ जी के प्रेम में मग्न होकर उन्होंने पुनः आगे प्रस्थान किया।
चौपाई 3
उहाँ रामु रजनी अवसेषसा।
जागे सीयँ सपन अस देखा।।
शब्दार्थ–
रजनी – रात
अवसेषसा – शेष रहते हुए
व्याख्या:
उधर चित्रकूट में रात कुछ शेष रहते ही श्री राम जाग गए। उसी समय सीता जी ने एक ऐसा स्वप्न देखा जिसे उन्होंने राम जी को सुनाया।
चौपाई 4
सहित समाज भरत जनु आए।
नाथ बियोग ताप तन ताए।।
शब्दार्थ–
जनु – मानो
ताप – दुख की अग्नि
ताए – तपे हुए
व्याख्या:
सीता जी ने कहा कि मानो भरत जी पूरे समाज के साथ यहाँ आए हैं, और हे नाथ, आपके वियोग के दुख की अग्नि से उनके शरीर बुरी तरह तपे हुए हैं।
चौपाई 5
सकल मलिन मन दीन दुखारी।
देखीं सासु आन अनुहारी।।
शब्दार्थ–
सकल – सभी
आन अनुहारी – दूसरे ही रूप में
व्याख्या:
सीता जी ने आगे कहा कि उनके साथ आए सभी लोग मन से मलिन, दीन और दुखी हैं। मैंने सासुओं को भी किसी दूसरे ही रूप अर्थात् विधवा वेश में देखा है।
चौपाई 6
सुनि सिय सपन भरे जल लोचन।
भए सोचबस सोच बिमोचन।।
शब्दार्थ–
लोचन – आँखें
सोच बिमोचन – दूसरों की चिंता दूर करने वाले
व्याख्या:
सीता जी का यह स्वप्न सुनकर श्री राम की आँखों में आँसू भर आए। जो राम दूसरों का दुख दूर करने वाले हैं, वे स्वयं आज चिंता के वशीभूत हो गए।
चौपाई 7
लखन सपन यह नीक न होई।
कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।।
शब्दार्थ–
नीक – अच्छा
कुचाह – बुरा समाचार
व्याख्या:
श्री राम ने लक्ष्मण से कहा कि हे लक्ष्मण, यह स्वप्न अच्छा नहीं है। ऐसा लगता है कि कोई बहुत बुरा और हृदय विदारक समाचार सुनाएगा।
चौपाई 8
अस कहि बंधु समेत नहाने।
पूजि पुरारि साधु सनमाने।।
शब्दार्थ–
पुरारि – शिवजी
सनमाने – सम्मान किया
व्याख्या:
ऐसा कहकर श्री राम ने भाई लक्ष्मण के साथ स्नान किया। फिर उन्होंने भगवान शिव की पूजा की और वहाँ उपस्थित साधु-संतों का सम्मान किया।
छंद:
सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उतर दिसि देखत भए।
नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए।।
तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे।
सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे।।
शब्दार्थ–
नभ धूरि – आकाश में धूल
बिकल – व्याकुल
अवलोकि – देखकर
व्याख्या:
देवताओं और मुनियों का सम्मान कर श्री राम बैठे ही थे और उत्तर दिशा की ओर देखने लगे। उन्होंने देखा कि आकाश में धूल छाई है और पशु-पक्षी व्याकुल होकर भागते हुए प्रभु के आश्रम की ओर आ रहे हैं। तुलसीदास जी कहते हैं कि यह देखकर श्री राम उठ खड़े हुए और आश्चर्यचकित होकर कारण सोचने लगे। उसी अवसर पर कोल-भीलों ने आकर उन्हें सारा समाचार बताया।

सोरठा: 4
सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर।
सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल।।4।।
शब्दार्थ–
बैन – वचन
प्रमोद – आनंद
सरोरुह नैन – कमल के समान नेत्र
व्याख्या:
तुलसीदास जी कहते हैं कि कोल-भीलों के उन मंगलकारी वचनों को सुनते ही श्री राम के मन में महान आनंद छा गया। उनका शरीर पुलकित हो उठा और उनके शरत्काल के कमल के समान सुंदर नेत्र प्रेम के आँसुओं से भर गए।

दोहा 5
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।5।।
शब्दार्थ–
राजमदु – राज्य का अहंकार
बिधि हरि हर – ब्रह्मा, विष्णु, महेश
सीकरनि – बूँदों से
छीरसिंधु – क्षीरसागर
व्याख्या:
लक्ष्मण की शंका पर राम कहते हैं कि भरत को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पद मिल जाने पर भी राज्य का अहंकार नहीं हो सकता। क्या कभी काँजी की कुछ खट्टी बूँदों से विशाल क्षीरसागर नष्ट हो सकता है अर्थात् फट सकता है।
चौपाई 1
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई।
गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।
शब्दार्थ–
तिमिरु – अंधकार
तरनिहि – सूर्य को
मकु – शायद या चाहे
व्याख्या:
चाहे अंधकार दोपहर के प्रचंड सूर्य को निगल जाए, या आकाश चाहे बादलों में मिलकर विलीन हो जाए।
चौपाई 2
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी।
सहज छमा बरु छाड़ै छोनी।।
शब्दार्थ–
गोपद जल – गाय के खुर भर जल में
घटजोनी – अगस्त्य मुनि
छोनी – पृथ्वी
व्याख्या:
चाहे समुद्र सोखने वाले अगस्त्य मुनि गाय के खुर जितने जल में डूब जाएँ, या पृथ्वी भले ही अपनी स्वाभाविक क्षमाशीलता छोड़ दे।
चौपाई 3
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई।
होइ न नृपमदु भरतहि भाई।।
शब्दार्थ–
मसक – मच्छर
मेरु – सुमेरु पर्वत
नृपमदु – राजा होने का घमंड
व्याख्या:
चाहे मच्छर की फूँक से विशाल सुमेरु पर्वत उड़ जाए, परंतु हे भाई लक्ष्मण, भरत को कभी राजा होने का घमंड नहीं हो सकता।
चौपाई 4
लखन तुम्हार सपथ पितु आना।
सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।।
शब्दार्थ–
सपथ – कसम
आना – सौगंध
सुचि – पवित्र
व्याख्या:
हे लक्ष्मण, मैं तुम्हारी शपथ और पिता जी की सौगंध खाकर कहता हूँ कि भरत के समान पवित्र और श्रेष्ठ भाई इस संसार में कोई नहीं है।
चौपाई 5
सगुनु खीरु अवगुनु जलु ताता।
मिलइ रचइ परपंचु बिधाता।।
शब्दार्थ–
खीरु – दूध
ताता – हे भाई
परपंचु – सृष्टि का विस्तार
व्याख्या:
हे तात, विधाता इस सृष्टि की रचना सद्गुण रूपी दूध और अवगुण रूपी जल को मिलाकर करता है।
चौपाई 6
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा।
जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा।।
शब्दार्थ–
तड़ागा – तालाब
बिभागा – अलग-अलग
व्याख्या:
परंतु भरत ने सूर्यवंश रूपी तालाब में हंस रूप में जन्म लेकर गुण रूपी दूध और दोष रूपी जल को अलग-अलग कर दिया है।
चौपाई 7
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी।
निज जस जगत कीन्हि उजियारी।।
शब्दार्थ–
गहि – ग्रहण करके
पय – दूध
बारी – जल
व्याख्या:
भरत ने गुण रूपी दूध को ग्रहण करके और अवगुण रूपी जल को त्याग कर अपने यश से संपूर्ण जगत में प्रकाश फैला दिया है।
चौपाई 8
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ।
पेम पयोधि मगन रघुराऊ।।
शब्दार्थ–
सीलु – शील या सदाचार
पयोधि – समुद्र
मगन – डूब गए
व्याख्या:
इस प्रकार भरत जी के गुण, शील और स्वभाव का वर्णन करते-करते श्री रघुनाथ जी प्रेम के समुद्र में पूरी तरह मग्न हो गए।

दोहा: 6
सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।
सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु।।6।।
शब्दार्थ–
बिबुध – देवता
हेतु – प्रेम
कृपानिकेतु – कृपा के धाम
व्याख्या:
श्री राम के वचन सुनकर और भरत जी पर उनका अगाध प्रेम देखकर सभी देवता उनकी सराहना करने लगे कि श्री राम के समान कृपा का धाम प्रभु और कौन हो सकता है।
चौपाई 1
जौं न होत जग जनम भरत को।
सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
शब्दार्थ–
धुर – धुरी
धरनि – पृथ्वी
व्याख्या:
देवता कहते हैं कि यदि इस संसार में भरत का जन्म न हुआ होता, तो संपूर्ण धर्मों की धुरी को इस पृथ्वी पर कौन धारण करता।
चौपाई 2
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा।
को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।
शब्दार्थ–
कबि कुल – कवियों के समूह
अगम – अगम्य या पहुँच से बाहर
व्याख्या:
भरत जी के गुणों की कथा कवियों के लिए भी अगम्य है। हे रघुनाथ जी, आपके अतिरिक्त उसे भला और कौन जान सकता है।
चौपाई 3
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी।
अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी।।
शब्दार्थ–
सुर बानी – देवताओं की वाणी
लहेउ – प्राप्त किया
व्याख्या:
लक्ष्मण, श्री राम और सीता जी ने देवताओं की इस आकाशवाणी को सुनकर अत्यंत सुख प्राप्त किया, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
चौपाई 4
इहाँ भरतु सब सहित सहाए।
मंदाकिनी पुनीत नहाए।।
शब्दार्थ–
सहाए – साथ लेकर
पुनीत – पवित्र
व्याख्या:
यहाँ दूसरी ओर, भरत जी ने अपने सभी सहायकों और समाज के साथ पवित्र मंदाकिनी नदी में स्नान किया।
चौपाई 5
सरित समीप राखि सब लोगा।
मागि मातु गुर सचिव नियोगा।।
शब्दार्थ–
सरित – नदी
नियोगा – आज्ञा
व्याख्या:
नदी के समीप सभी लोगों को ठहराकर, और माता, गुरु तथा मंत्रियों से आज्ञा माँगकर भरत जी आगे बढ़े।
चौपाई 6
चले भरतु जहँ सिय रघुराई।
साथ निषादनाथु लघु भाई।।
शब्दार्थ–
रघुराई – श्री राम
लघु भाई – छोटे भाई शत्रुघ्न
व्याख्या:
जहाँ सीता जी और श्री राम विराजमान थे, भरत जी उसी ओर चल पड़े। उनके साथ निषादराज गुह और छोटे भाई शत्रुघ्न भी थे।
चौपाई 7
समुझि मातु करतब सकुचाहीं।
करत कुतरक कोटि मन माहीं।।
शब्दार्थ–
करतब – कृत्य या काम
कुतरक कोटि – करोड़ों बुरे तर्क
व्याख्या:
रास्ते में भरत जी अपनी माता कैकेयी के बुरे कृत्यों को याद करके संकोच कर रहे हैं और उनके मन में करोड़ों प्रकार के कुतर्क उठ रहे हैं।
चौपाई 8
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ।
उठि जानि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।
शब्दार्थ–
मम नाऊँ – मेरा नाम
अनत – कहीं और
ठाऊँ – स्थान
व्याख्या:
भरत जी सोचते हैं कि कहीं राम, लक्ष्मण और सीता मेरा नाम सुनकर उस स्थान को छोड़कर कहीं और न चले जाएँ।

दोहा 7
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।7।।
शब्दार्थ–
मते – सम्मति या योजना
अघ – पाप
छमि – क्षमा करके
व्याख्या:
भरत जी विचार करते हैं कि मुझे माता की योजना में शामिल मानकर राम जी जो भी दंड दें, वह थोड़ा ही होगा। या फिर वे अपने शील और स्वभाव को देखकर मेरे पाप और अवगुण क्षमा कर दें और मुझे आदर प्रदान करें।
चौपाई 1
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी।
जौं सनमानहिं सेवकु मानी।।
शब्दार्थ–
परिहरहिं – त्याग दें
सनमानहिं – सम्मान करें
व्याख्या:
चाहे वे मेरा मन मलिन जानकर मुझे त्याग दें, या अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें।
चौपाई 2
मोरे सरन रामहि की पनही।
राम सुस्वामि दोसु सब जनहीं।।
शब्दार्थ–
पनही – जूतियाँ
जनहीं – सेवक में
व्याख्या:
मेरे लिए तो श्री राम की जूतियों की ही शरण है। राम तो अत्यंत श्रेष्ठ स्वामी हैं, जो भी दोष है वह मुझ सेवक में ही है।
चौपाई 3
जग जस भाजन चातक मीना।
नेम पेम निज निपुन नबीना।।
शब्दार्थ–
भाजन – पात्र
मीना – मछली
नेम – नियम
व्याख्या:
इस संसार में यश के सच्चे पात्र तो चातक पक्षी और मछली ही हैं, जो अपने प्रेम के नियम को हमेशा नया और निपुण बनाए रखते हैं।
चौपाई 4
अस मन गुनत चले मग जाता।
सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।।
शब्दार्थ–
गुनत – विचार करते हुए
गाता – शरीर
व्याख्या:
मन में ऐसा विचार करते हुए भरत जी मार्ग में चले जा रहे हैं। संकोच और राम-प्रेम के कारण उनके शरीर के सभी अंग शिथिल हो गए हैं।
चौपाई 5
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी।
चलत भगति बल धीरज धोरी।।
शब्दार्थ–
खोरी – बुराई
धीरज धोरी – धैर्य धारण करने वाले
व्याख्या:
माता कैकेयी द्वारा की गई बुराई मानो उन्हें पीछे लौटा रही है, परंतु धैर्य धारण करने वाले भरत जी अपनी भक्ति के बल पर आगे बढ़ते जा रहे हैं।
चौपाई 6
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ।
तब पथ परत उताइल पाऊ।।
शब्दार्थ–
सुभाऊ – स्वभाव
उताइल पाऊ – जल्दी-जल्दी पैर
व्याख्या:
जब भरत जी श्री रघुनाथ जी के कोमल स्वभाव को याद करते हैं, तब उनके पैर रास्ते पर जल्दी-जल्दी पड़ने लगते हैं।
चौपाई 7
भरत दसा तेहि अवसर कैसी।
जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी।।
शब्दार्थ–
दसा – हालत
जल अलि – भँवरा
व्याख्या:
उस अवसर पर भरत जी की दशा वैसी ही थी, जैसी जल के प्रवाह में किसी भँवरे की गति होती है जो कभी आगे बढ़ता है और कभी पीछे आता है।
चौपाई 8
देखि भरत कर सोचु सनेहू।
भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू।।
शब्दार्थ–
सोचु – चिंता
बिदेहू – शरीर की सुध-बुध खो देना
व्याख्या:
भरत जी की चिंता और उनके अगाध प्रेम को देखकर उस समय निषादराज गुह भी अपने शरीर की सुध-बुध खो बैठे।

दोहा: 8
मिलि सपेम रिपुसूदनहिं केवटु भेंटेउ राम।
भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम।।8।।
शब्दार्थ–
रिपुसूदनहिं – शत्रुघ्न से
भूरि भायँ – अत्यधिक प्रेम से
व्याख्या:
शत्रुघ्न से प्रेमपूर्वक मिलकर केवट (निषादराज) ने श्री राम से भेंट की। उधर प्रणाम करते हुए भरत जी से लक्ष्मण जी अत्यधिक प्रेम से गले मिले।
चौपाई 1
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई।
बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।
शब्दार्थ–
ललकि – लपककर या उत्साह से
उर लाई – हृदय से लगा लिया
व्याख्या:
लक्ष्मण जी ने लपककर अपने छोटे भाई शत्रुघ्न को गले लगाया, और फिर निषादराज को भी हृदय से लगा लिया।
चौपाई 2
पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे।
अभिमत आसिष पाइ अनंदे।।
शब्दार्थ–
दुहुँ भाइन्ह – दोनों भाइयों (भरत-शत्रुघ्न) ने
अभिमत – मनचाहा
व्याख्या:
फिर भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों ने वहाँ उपस्थित मुनियों की वंदना की और उनसे मनचाहा आशीर्वाद पाकर वे अत्यंत आनंदित हुए।
चौपाई 3
सानुज भरत उमगि अनुरागा।
धरि सिर सिय पद पदुम परागा।।
शब्दार्थ–
सानुज – छोटे भाई सहित
पदुम परागा – कमल रूपी चरणों की धूल
व्याख्या:
छोटे भाई सहित भरत जी ने अगाध प्रेम में उमड़कर सीता जी के चरण कमलों की धूल को अपने सिर पर धारण किया।
चौपाई 4
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए।
सिर कर कमल परसि बैठाए।।
शब्दार्थ–
पुनि पुनि – बार-बार
परसि – स्पर्श करके
व्याख्या:
बार-बार प्रणाम करते हुए भरत जी को सीता जी ने उठाया और उनके सिर पर अपने कर-कमल (हाथ) स्पर्श करके उन्हें अपने पास बैठा लिया।
चौपाई 5
सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं।
मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं।।
शब्दार्थ–
असीस – आशीर्वाद
सुधि – होश
व्याख्या:
सीता जी ने मन ही मन उन्हें आशीर्वाद दिया। वे दोनों भाई राम-प्रेम में इतने मग्न थे कि उन्हें अपने शरीर का भी होश नहीं था।
चौपाई 6
सब बिधि सानुकूल लखि सीता।
भे निसोच उर अपडर बीता।।
शब्दार्थ–
सानुकूल – पक्ष में या प्रसन्न
निसोच – चिंतारहित
अपडर – बुरा डर
व्याख्या:
सीता जी को अपने प्रति सब प्रकार से अनुकूल और प्रसन्न देखकर भरत जी चिंतारहित हो गए और उनके हृदय का सारा डर समाप्त हो गया।
चौपाई 7
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा।
प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।।
शब्दार्थ–
छूँछा – खाली
निज गति – अपनी सामान्य स्थिति
व्याख्या:
उस समय मिलन के क्षणों में कोई न कुछ कह रहा था और न कोई कुछ पूछ रहा था। सभी का मन प्रेम से भरा हुआ था और अपनी सामान्य गति या सांसारिक व्यवहार से बिल्कुल खाली हो गया था।
चौपाई 8
तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि।
जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि।।
शब्दार्थ–
धीरजु धरि – धैर्य धारण करके
जोरि पानि – हाथ जोड़कर
व्याख्या:
उसी अवसर पर निषादराज केवट ने धैर्य धारण किया और हाथ जोड़कर तथा प्रणाम करके श्री राम से विनती की।

दोहा: 9
नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।
सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग।।9।।
शब्दार्थ–
मुनिनाथ – मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ
पुर लोग – नगरवासी
बिकल – व्याकुल
व्याख्या:
निषादराज ने कहा कि हे नाथ, मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी के साथ सभी माताएँ, नगरवासी, सेवक, सेनापति और मंत्री आपके वियोग में व्याकुल होकर यहाँ आए हैं।
चौपाई 1
सीलसिंधु सुनि गुर आवगवनू।
सिय समीप राखे रिपुदवनू।।
शब्दार्थ–
सीलसिंधु – शील के सागर राम
रिपुदवनू – शत्रुघ्न
व्याख्या:
शील के सागर श्री राम ने गुरु वशिष्ठ जी के आगमन का समाचार सुनकर शत्रुघ्न को सीता जी के पास उनकी रक्षा के लिए छोड़ दिया।
चौपाई 2
चले सबेग रामु तेहि काला।
धीर धरम धुर दीनदयाला।।
शब्दार्थ–
सबेग – तेजी से
दीनदयाला – दीनों पर दया करने वाले
व्याख्या:
धैर्य और धर्म की धुरी को धारण करने वाले, दीनों पर दया करने वाले श्री राम उसी समय अत्यंत वेग से गुरु से मिलने चल पड़े।
चौपाई 3
गुरहि देखि सानुज अनुरागे।
दंड प्रनाम करन प्रभु लागे।।
शब्दार्थ–
सानुज – लक्ष्मण सहित
अनुरागे – प्रेम से भर गए
व्याख्या:
गुरु वशिष्ठ को देखकर लक्ष्मण सहित प्रभु श्री राम प्रेम से भर गए और वे उन्हें साष्टांग दंडवत प्रणाम करने लगे।
चौपाई 4
मुनिवर धाइ लिए उर लाई।
प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई।।
शब्दार्थ–
धाइ – दौड़कर
उर लाई – हृदय से लगा लिया
व्याख्या:
मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ ने दौड़कर दोनों भाइयों को हृदय से लगा लिया और प्रेम में उमड़कर उनसे गले मिले।
चौपाई 5
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू।
कीन्ह दूरि ते दंड प्रनामू।।
शब्दार्थ–
पुलकि – प्रसन्न होकर
दूरि ते – दूर से ही
व्याख्या:
प्रेम से पुलकित होकर निषादराज केवट ने अपना नाम बताकर गुरु वशिष्ठ को दूर से ही दंडवत प्रणाम किया।
चौपाई 6
रामसखा रिषि बरबस भेंटा।
जनु महि लुठत सनेह समेटा।।
शब्दार्थ–
बरबस – बलपूर्वक या खींचकर
लुठत – लोटते हुए
व्याख्या:
ऋषि वशिष्ठ ने राम के सखा निषादराज को बलपूर्वक खींचकर गले लगा लिया, मानो उन्होंने पृथ्वी पर लोटते हुए साक्षात् प्रेम को ही समेट लिया हो।
चौपाई 7
रघुपति भगति सुमंगल मूला।
नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला।।
शब्दार्थ–
सुमंगल मूला – सुंदर मंगलों का मूल
सुर – देवता
व्याख्या:
श्री रघुनाथ जी की भक्ति सभी मंगलों का मूल है, आकाश से देवता इस बात की सराहना करते हुए फूलों की वर्षा करने लगे।
चौपाई 8
एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं।
बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।।
शब्दार्थ–
निपट – बिल्कुल
नीच – निम्न जाति का
व्याख्या:
देवता कहने लगे कि इस निषादराज के समान बिल्कुल नीच जाति का कोई नहीं है, और गुरु वशिष्ठ के समान महान इस संसार में कौन है।
दोहा 10
जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।
सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।10।।
शब्दार्थ–
लखि – देखकर
मुदित – प्रसन्न
प्रगट – प्रत्यक्ष
व्याख्या:
जिस निषादराज को देखकर मुनिराज वशिष्ठ अत्यंत प्रसन्न होकर लक्ष्मण से भी अधिक प्रेम से गले मिले, वह केवल सीतापति श्री राम के भजन का ही प्रत्यक्ष प्रताप और प्रभाव है।
काव्यगत विशेषताएँ:
भाषा:
संपूर्ण पदों में अवधी भाषा का अत्यंत प्रामाणिक, प्रवाहमयी और कोमल प्रयोग किया गया है।
रस और स्थायी भाव:
इसमें मुख्य रूप से भक्ति और शांत रस की प्रधानता है, जिसका स्थायी भाव ईश्वर-विषयक रति और निर्वेद है। भ्रातृ-प्रेम का अत्यंत उच्च आदर्श प्रस्तुत हुआ है।
अलंकार:
अनुप्रास, उपमा (जल अलि गति जैसी), रूपक (भक्ति बल) और उत्प्रेक्षा (जनु महि लुठत सनेह समेटा) अलंकारों का सुंदर तथा स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
छंद और गुण:
यहाँ पारंपरिक दोहा और चौपाई मात्रिक छंदों का उत्कृष्ट निर्वाह हुआ है। पदों में प्रसाद और माधुर्य गुण सर्वत्र व्याप्त है।
शैली और बिंब:
प्रबंधात्मक और वर्णनात्मक शैली का प्रयोग है, जिसके माध्यम से चित्रकूट के दृश्यों, सीता जी के स्वप्न और भरत जी की मानसिक उथल-पुथल का सजीव चित्रात्मक बिंब प्रस्तुत किया गया है।
भरत महिमा काव्य का सारांश:
भरत महिमा प्रसंग गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के अयोध्या कांड से लिया गया है, जिसमें भरत जी के अगाध भ्रातृ-प्रेम, उनके त्याग और उनकी महानता का मार्मिक वर्णन किया गया है।
कविता की शुरुआत में बताया गया है कि भरत जी पिता द्वारा दिए गए विशाल राज्य को त्यागकर, नंगे पैर और कंद-मूल खाते हुए श्री राम को वापस अयोध्या ले जाने के लिए चित्रकूट की ओर चल पड़ते हैं। मार्ग में पड़ने वाले गांवों की स्त्रियां भरत जी के इस निर्मल भ्रातृ-प्रेम और उनकी वैराग्यपूर्ण दशा को देखकर अत्यंत प्रभावित होती हैं। वे माता कैकेयी के कठोर हृदय की निंदा करती हैं और भरत जी के दर्शन को अपने किसी महान पुण्य का फल मानकर स्वयं को धन्य समझती हैं। भरत जी के साथ पूरा अयोध्या समाज भी श्री राम के दर्शन की तीव्र लालसा लिए पूरे उल्लास के साथ आगे बढ़ता है।
दूसरी ओर चित्रकूट में माता सीता एक स्वप्न देखती हैं कि भरत जी उदास मन से आए हैं और सभी माताएं दुखियारी स्थिति में हैं। श्री राम इसे एक अशुभ संकेत मानकर चिंतित होते हैं। इसी बीच कोल-भील आकर सूचना देते हैं कि भरत जी विशाल समाज के साथ आ रहे हैं। यह सुनकर लक्ष्मण जी को संदेह और क्रोध आ जाता है कि भरत राजा होने के घमंड में उन पर आक्रमण करने आ रहे हैं। तब श्री राम लक्ष्मण जी को शांत करते हुए कहते हैं कि भरत को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पद भी मिल जाए, तो भी उन्हें अहंकार नहीं हो सकता। राम जी भरत को अत्यंत पवित्र और अवगुणों को त्याग कर सद्गुणों को ग्रहण करने वाला हंस बताते हैं। राम जी का यह अगाध प्रेम और विश्वास देखकर आकाश से देवता भी भरत जी की प्रशंसा करते हैं।
भरत जी जब चित्रकूट के समीप पहुंचते हैं, तो उनके मन में अपनी माता के कर्मों को लेकर बहुत संकोच और आत्मग्लानि होती है। वे सोचते हैं कि कहीं श्री राम उन्हें भी दोषी न मान लें, लेकिन राम जी के कोमल स्वभाव को याद करके वे आगे बढ़ते हैं। जब उनका आमना-सामना होता है, तो लक्ष्मण जी अत्यंत उत्साह से अपने छोटे भाई शत्रुघ्न और निषादराज को हृदय से लगा लेते हैं। भरत जी भावविभोर होकर माता सीता और श्री राम के चरणों में गिर पड़ते हैं, जहां सीता जी उन्हें अपने पास बैठाकर आशीर्वाद देती हैं।
अंत में गुरु वशिष्ठ जी अयोध्या के नगरवासियों और माताओं के साथ वहां पहुंचते हैं। श्री राम तेजी से जाकर अपने गुरु को दंडवत प्रणाम करते हैं और गुरु वशिष्ठ दोनों भाइयों को प्रेम से गले लगाते हैं। इसके बाद मुनिराज वशिष्ठ निषादराज केवट को भी खींचकर अपने हृदय से लगा लेते हैं। देवता इस अद्भुत दृश्य को देखकर फूलों की वर्षा करते हैं और कहते हैं कि राम की भक्ति के प्रताप से ही एक निम्न जाति के समझे जाने वाले केवट को भी मुनि वशिष्ठ से इतना परम आदर प्राप्त हुआ है।
यह पूरी कविता भरत के निस्वार्थ प्रेम, श्री राम के अपने भाई पर अटूट विश्वास और सच्ची राम-भक्ति के प्रभाव का एक अत्यंत भावपूर्ण संदेश देती है।