भारत माता का मंदिर यह
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने हमारे गौरवशाली देश भारत और उसकी पावन मातृभूमि के विषय में कहा है। कवि ने संपूर्ण भारत को एक ऐसे पवित्र मंदिर के रूप में चित्रित किया है जहाँ मानवता, धर्मनिरपेक्षता और…


राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने हमारे गौरवशाली देश भारत और उसकी पावन मातृभूमि के विषय में कहा है। कवि ने संपूर्ण भारत को एक ऐसे पवित्र मंदिर के रूप में चित्रित किया है जहाँ मानवता, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता सर्वोपरि है।
इस काव्यांश के माध्यम से कवि मुख्य रूप से यह कहना चाह रहे हैं कि भारत एक ऐसा अनूठा देश है जहाँ जाति, धर्म, संप्रदाय या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता और यहाँ सभी नागरिकों को समान अधिकार, सम्मान तथा उन्नति के अवसर प्राप्त हैं। वे देशवासियों का आह्वान करते हैं कि हमें अपने हृदय से संकीर्णताओं, आपसी वैर और नफरत को मिटाकर 'अजातशत्रु' बनना चाहिए, जिससे हम परस्पर भाई-चारे और प्रेम के साथ रह सकें। कवि यह संदेश भी देना चाहते हैं कि भारत माता की सच्ची संतान वही है जो देश की समस्याओं और उसकी पीड़ा को समझे। जब हम सब मिलकर अपने देश के महान आदर्शों को अपनाएँगे, एक-दूसरे के सुख-दुःख को साझा करेंगे और करोड़ों कंठों से एक सुर में भारत माता का जयघोष करेंगे, तभी एक अखंड, समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण संभव होगा।

गीत
पंक्ति 1 & 2 :
भारत माता का मंदिर यह
समता का संवाद जहाँ,
शब्दार्थ :
समता ➔ समानता, बराबरी
संवाद ➔ विचार-विमर्श, बातचीत
व्याख्या : कवि कहते हैं कि हमारा यह विशाल भारत देश साक्षात् भारत माता का एक पावन मंदिर है। इस दिव्य मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ सभी नागरिकों के बीच बिना किसी भेदभाव के समानता की बातें होती हैं।
पंक्ति 3 & 4 :
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
शब्दार्थ :
शिव ➔ मंगलकारी, शुभ
कल्याण ➔ भलाई
प्रसाद ➔ कृपा, ईश्वर का आशीर्वाद
व्याख्या : इस पावन भूमि पर प्रत्येक व्यक्ति का मंगल और कल्याण सुनिश्चित है। यहाँ रहने वाले सभी देशवासियों को सुख, शांति और समृद्धि रूपी ईश्वरीय प्रसाद समान रूप से प्राप्त होता है।
पंक्ति 5 & 6 :
जाति-धर्म या संप्रदाय का,
नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
शब्दार्थ :
संप्रदाय ➔ धार्मिक पंथ
भेद ➔ अंतर
व्यवधान ➔ रुकावट, बाधा
व्याख्या : भारत माता के इस मंदिर में जाति, धर्म, वर्ग या संप्रदाय के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता और न ही किसी के विकास में कोई रुकावट खड़ी की जाती है।
पंक्ति 7 & 8 :
सबका स्वागत, सबका आदर
सबका सम सम्मान यहाँ।
शब्दार्थ :
सम ➔ बराबर, एक जैसा
सम्मान ➔ आदर, प्रतिष्ठा
व्याख्या : इस देश में सभी संस्कृतियों, विचारधाराओं और मनुष्यों का खुले दिल से स्वागत और आदर किया जाता है। यहाँ समाज के प्रत्येक अंग को एक समान प्रतिष्ठा प्राप्त है।
पंक्ति 9 & 10 :
राम, रहीम, बुद्ध, ईसा का,
सुलभ एक सा ध्यान यहाँ,
शब्दार्थ :
सुलभ ➔ आसानी से प्राप्त होने वाला
ध्यान ➔ आराधना, चिंतन
व्याख्या : यहाँ राम, रहीम, महात्मा बुद्ध और ईसा मसीह—सभी महापुरुषों के प्रति समान श्रद्धाभाव रखना और उनकी आराधना करना बेहद सुगम है। सभी को अपनी आस्था के अनुसार ईश्वर का ध्यान करने की पूर्ण स्वतंत्रता है।
पंक्ति 11 & 12 :
भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के
गुण गौरव का ज्ञान यहाँ।
शब्दार्थ :
भव संस्कृतियाँ ➔ संसार की विभिन्न संस्कृतियाँ
गुण गौरव ➔ श्रेष्ठता, गरिमा
व्याख्या : इस पावन धरा पर संसार की अनेक भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के श्रेष्ठ गुणों और उनकी ऐतिहासिक गरिमा का आदरपूर्वक ज्ञान प्राप्त होता है।
पंक्ति 13 & 14 :
नहीं चाहिए बुद्धि बैर की
भला प्रेम का उन्माद यहाँ
शब्दार्थ :
बैर ➔ दुश्मनी, शत्रुता
उन्माद ➔ अत्यधिक उत्साह, सकारात्मक जुनून
व्याख्या : कवि कहते हैं कि हमें समाज में शत्रुता या नफरत फैलाने वाली बुद्धि की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके विपरीत, यहाँ सभी के हृदयों में परस्पर प्रेम का एक सकारात्मक और कल्याणकारी उत्साह होना चाहिए।
पंक्ति 15 & 16 :
सबका शिव कल्याण यहाँ है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
व्याख्या : इन पंक्तियों में कवि पूर्व की भाँति पुनः इस बात पर बल देते हैं कि यहाँ प्रत्येक मनुष्य का कल्याण निहित है और सभी को सुख-शांति का प्रसाद मिलता है।
पंक्ति 17 & 18 :
सब तीर्थों का एक तीर्थ यह
हृदय पवित्र बना लें हम।
शब्दार्थ :
पवित्र ➔ पावन, शुद्ध, निष्पाप
व्याख्या : यह भारत भूमि संसार के समस्त तीर्थ स्थलों से भी बढ़कर एक महान तीर्थ है। आइए, हम सभी देशवासी इस पावन भूमि पर आकर अपने हृदय को ईर्ष्या-द्वेष से मुक्त कर पूरी तरह शुद्ध और पवित्र बना लें।
पंक्ति 19 & 20 :
आओ यहाँ अजातशत्रु बन,
सबको मित्र बना लें हम।
शब्दार्थ :
अजातशत्रु ➔ जिसका कोई शत्रु जन्मा न हो
व्याख्या : कवि आह्वान करते हैं कि आइए, हम सब इस देश में अजातशत्रु बनकर रहें, अर्थात किसी से बैर न रखें और संसार के प्रत्येक प्राणी को अपना सच्चा मित्र बना लें।
पंक्ति 21 & 22 :
रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने
मन के चित्र बना लें हम।
शब्दार्थ :
प्रस्तुत ➔ उपस्थित, सामने
चित्र ➔ रूप, आकृति -यहाँ तात्पर्य सुंदर विचारों से है
व्याख्या : हमारे सामने इस देश के संविधान, संस्कृति और महान आदर्शों की सुंदर रूपरेखाएँ मौजूद हैं। अब हमें इनके अनुरूप अपने मन के सुंदर विचारों को धरातल पर उतारकर एक नए और आदर्श समाज का निर्माण करना है।
पंक्ति 23 & 24 :
सौ-सौ आदर्शों को लेकर
एक चरित्र बना लें हम।
शब्दार्थ :
आदर्श ➔ ऊँचे जीवन मूल्य
चरित्र ➔ आचरण, नैतिक मूल्य
व्याख्या : हमारे इतिहास और संस्कृति में सैकड़ों महान आदर्श विद्यमान हैं। उन सभी श्रेष्ठ जीवन मूल्यों को आत्मसात करके हमें अपने राष्ट्र के लिए एक महान और सुदृढ़ चरित्र का निर्माण करना चाहिए।
पंक्ति 25 & 26 :
बैठो माता के आँगन में
नाता भाई-बहन का
शब्दार्थ :
नाता ➔ रिश्ता, संबंध
व्याख्या : कवि कहते हैं कि आइए, हम सब भारत माता के इस विशाल और स्नेहिल आँगन में एक साथ मिलकर बैठें और आपस में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को स्वीकार कर उसे और मजबूत करें।
पंक्ति 27 & 28 :
समझे उसकी प्रसव वेदना
वही लाल है माई का
शब्दार्थ :
प्रसव वेदना ➔ जन्म देते समय होने वाली भारी पीड़ा -यहाँ तात्पर्य भारत माता के कष्टों से है)-
लाल ➔ पुत्र, संतान
व्याख्या : भारत माता का सच्चा सपूत या पुत्र वही है जो अपनी मातृभूमि के कष्टों, पीड़ाओं और उसकी समस्याओं को गहराई से समझता है तथा उन्हें दूर करने का प्रयास करता है।
पंक्ति 29 & 30 :
एक साथ मिल बाँट लो
अपना हर्ष विषाद यहाँ,
शब्दार्थ :
हर्ष ➔ खुशी, प्रसन्नता
विषाद ➔ दुःख, शोक
व्याख्या : हम सभी देशवासियों को मिलकर एक-दूसरे के सुख और दुःख को आपस में बाँटना चाहिए, ताकि परस्पर एकता और संवेदनशीलता की भावना सुदृढ़ हो सके।
पंक्ति 31 & 32 :
सबका शिव कल्याण यहाँ है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
व्याख्या : पुनरावृत्ति: इस देश में सबका कल्याण सुनिश्चित है और सब सुख-समृद्धि का आशीर्वाद पाते हैं।
पंक्ति 33 & 34 :
मिला सेव्य का हमें पुजारी
सकल काम उस न्यायी का
शब्दार्थ :
सेव्य ➔ सेवा करने योग्य, भारत माता
सकल ➔ समस्त, सारा
न्यायी ➔ न्याय करने वाला, ईश्वर
व्याख्या : हमें इस देश की सेवा करने का सुअवसर मिला है, जिससे हम इस आराध्य भारत माता के पुजारी बन गए हैं। हमारा प्रत्येक कार्य उस न्यायप्रिय परमेश्वर को समर्पित होना चाहिए, जो सबका भला करता है।
पंक्ति 35 & 36 :
मुक्ति लाभ कर्तव्य यहाँ है
एक एक अनुयायी का
शब्दार्थ :
मुक्ति लाभ ➔ दुखों व बंधनों से मुक्ति पाना
अनुयायी ➔ अनुसरण करने वाला
व्याख्या : इस देश के प्रत्येक नागरिक यह परम कर्तव्य है कि वह देश को हर प्रकार की बुराइयों, परतंत्रता और संकीर्णताओं से मुक्त कराए और लोक-कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़े।
पंक्ति 37 & 38 :
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
उठे एक जयनाद यहाँ
शब्दार्थ :
कोटि-कोटि ➔ करोड़ों
कंठ ➔ गला, आवाज़
जयनाद ➔ विजय की गूंज, जयकार
व्याख्या : जब देश के करोड़ों नागरिकों के कंठ एक सुर में मिलेंगे, तब संपूर्ण ब्रह्मांड में भारत माता की विजय का एक अखंड और महाशक्तिशाली जयघोष गूंजेगा।
पंक्ति 39 & 40 :
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
व्याख्या : अंतिम पुनरावृत्ति: इस पावन भूमि पर प्रत्येक देशवासी का कल्याण निहित है और सभी को समानता व सुख का दिव्य प्रसाद प्राप्त होता है।