भाषा और शब्द रचना के तत्त्व
भाषा वह साधन या माध्यम है, जिसके द्वारा हम अपने मन के भावों और विचारों को बोलकर या लिखकर दूसरों तक पहुँचाते हैं और दूसरों की बात को सुनकर या पढ़कर समझते हैं।



भाषा वह साधन या माध्यम है, जिसके द्वारा हम अपने मन के भावों और विचारों को बोलकर या लिखकर दूसरों तक पहुँचाते हैं और दूसरों की बात को सुनकर या पढ़कर समझते हैं।
भाषा :
भाषा के स्वरूप और उसकी परिभाषा को लेकर प्राचीन संस्कृत आचार्यों और पाश्चात्य विद्वानों से लेकर आधुनिक हिंदी वैयाकरणों ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए हैं-
पंडित कामता प्रसाद गुरु-
"भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टतया समझ सकता है।"
डॉ. श्यामसुंदर दास-
"मनुष्य और मनुष्य के बीच विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए जो ध्वनि-संकेतों का व्यवहार होता है, उसे भाषा कहते हैं।"
प्लेटो -
"विचार आत्मा की मूक बातचीत है, पर वही जब ध्वन्यात्मक होकर होठों पर प्रकट होती है, तो उसे भाषा की संज्ञा दी जाती है।"
महर्षि पतंजलि के अनुसार -
"व्यक्ता वाचि वर्णा ये त इमे व्यक्तवाचः।"
अर्थात् जो वाणी वर्णों के रूप में व्यक्त होती है, उसे भाषा कहते हैं।
इन सभी आचार्यों के विचारों का सार यह है कि भाषा केवल कोई भी आवाज़ नहीं है, बल्कि यह सार्थक ध्वनि-प्रतीकों की एक सुव्यवस्थित प्रणाली है। यह समाज में रहने वाले मनुष्यों को एक-दूसरे से जोड़ती है और आपसी संवाद का सबसे सशक्त और मुख्य आधार है।

शब्द रचना के आधार:
विचारों, भावों एवं सम्प्रेषण का सबसे प्रमुख साधन भाषा होती है तथा भाषा का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग शब्द होता है। ध्वनियों के मेल से बने सार्थक वर्ण समुदाय को शब्द कहते हैं। शब्द अकेले और कभी दूसरे शब्दों के साथ मिलकर अपना अर्थ प्रकट करते हैं। शब्द रचना में शब्दों की प्रक्रिया होती है। अतः शब्द रचना के चार आधार माने गये हैं: -
(1) अर्थ के आधार पर:
1. एकार्थी: वे शब्द जिनका केवल एक ही निश्चित अर्थ होता है। उदा: गंगा, पटना।
2. अनेकार्थी: वे शब्द जिनके एक से अधिक अर्थ होते हैं।
उदा: 1. कर - हाथ और टैक्स 2. कनक - सोना और धतूरा।
3. समानार्थी या पर्यायवाची: वे शब्द जो समान अर्थ देते हैं।
उदा: 1. जल - पानी और नीर 2. आकाश - नभ और गगन।
4. विपरीतार्थी या विलोम: वे शब्द जो एक-दूसरे का विपरीत अर्थ देते हैं। उदा: दिन - रात और सत्य - असत्य।
(2) प्रयोग के आधार पर:
1. विकारी: वे शब्द जिनके रूप में लिंग, वचन, कारक के कारण परिवर्तन होता है।
उदा: लड़का - लड़के, जाता है - जाती है।
2. अविकारी: वे शब्द जिनके रूप में कभी कोई परिवर्तन नहीं होता।
उदा: आज, धीरे-धीरे, तथा, एवं आदि।
(3) स्रोत या उत्पत्ति के आधार पर:
1. तत्सम: संस्कृत के वे शब्द जो हिंदी में ज्यों-के-त्यों प्रयोग होते हैं। उदा: अग्नि, सूर्य, मयूर वानर आदि।
2. तद्भव: संस्कृत से उत्पन्न होकर हिंदी में रूप बदलकर प्रयोग होने वाले शब्द। उदा: आग, सूरज, बंदर, मोर आदि।
3. देशज: वे शब्द जो देश के विभिन्न बोलियों से हिंदी में आए हैं। उदा: लोटा, खटिया,पगड़ी आदि।
4. विदेशी: वे शब्द जो विदेशी भाषाओं जैसे अंग्रेजी, अरबी, फारसी से हिंदी में आए हैं। उदा: स्कूल शब्द अंग्रेजी भाषा, किताब शब्द अरबी भाषा, रिक्शा शब्द जापानी भाषा से आदि ।
4. रचना या बनावट के आधार पर:
रूढ़:
वे शब्द जो किसी विशेष अर्थ के लिए प्रसिद्ध हो गए हैं और जिनके खंडों का कोई अर्थ नहीं होता।
उदाहरण: चावल, घोड़ा।
यौगिक:
दो या दो से अधिक सार्थक शब्दों के मेल से बने शब्द।
उदाहरण:
विद्यालय - विद्या+आलय, प्रधानमंत्री - प्रधान+मंत्री।
योगरूढ़:
वे यौगिक शब्द जो किसी विशेष अर्थ के लिए रूढ़ या प्रसिद्ध हो जाते हैं।
उदाहरण:
पंकज - कीचड़ में जन्म लेने वाला अर्थात पंकज शब्द कमल के लिए प्रयोग किया जाता है।
पीताम्बर - पीले वस्त्र वाला - विष्णु (राम और कृष्ण ) के लिए प्रयोग किया जाता है।