भ्रमर गीत
भ्रमर गीत प्रसंग कवि सूरदास जी द्वारा रचित महान ग्रंथ सूरसागर से लिया गया हैं। इनमें से विनय और वात्सल्य के पद भी सूरसागर का हिस्सा हैं, लेकिन जो सबसे मुख्य भाग है, वह भ्रमर गीत प्रसंग है। इन पदों म…


भ्रमर गीत प्रसंग कवि सूरदास जी द्वारा रचित महान ग्रंथ सूरसागर से लिया गया हैं। इनमें से विनय और वात्सल्य के पद भी सूरसागर का हिस्सा हैं, लेकिन जो सबसे मुख्य भाग है, वह भ्रमर गीत प्रसंग है।
इन पदों में श्रीकृष्ण और गोपियों के सच्चे तथा अनन्य प्रेम का अत्यंत मार्मिक और मनोवैज्ञानिक चित्रण किया गया है। जहाँ एक ओर मथुरा जाकर श्रीकृष्ण ब्रज की मधुर यादों में खोए हुए हैं, वहीं दूसरी ओर गोपियाँ श्रीकृष्ण के वियोग में तड़प रही हैं। उद्धव गोपियों को ज्ञान और योग का उपदेश देने ब्रज आते हैं, परंतु गोपियाँ अपने एकनिष्ठ सगुण प्रेम के तर्कों से उद्धव के निर्गुण ब्रह्म तथा योग को पूरी तरह नकार देती हैं। तो आइए, श्रीकृष्ण की माधुर्यमयी लीलाओं और भक्त-शिरोमणि सूरदास के अनुराग-सागर में एक ऐसी डुबकी लगाएँ, जिसकी हर लहर में केवल निश्छल प्रेम बसता है...

श्रीकृष्ण की ब्रज स्मृति:
ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
शब्दार्थ:
ऊधौ ~ उद्धव
मोहिं ~ मुझे
बिसरत ~ भूलता
नाहीं ~ नहीं
व्याख्या: श्रीकृष्ण मथुरा में अपने मित्र उद्धव से कहते हैं कि हे उद्धव, मुझसे ब्रज की यादें भुलाई नहीं जाती हैं।
हँस-सुता की सुंदर कगरी, अरु कुंजनि की छाँहीं।
शब्दार्थ:
हँस-सुता ~ यमुना नदी
कगरी ~ किनारा
अरु ~ और
कुंजनि ~ लताओं का समूह
छाँहीं ~ छाया
व्याख्या: मुझे यमुना नदी का वह सुंदर किनारा और लताओं की वह सुखद छाया बहुत याद आती है।
वै सुरभी वै बच्छ दोहिनी, खरिक दुहावन जाहीं।
शब्दार्थ:
सुरभी ~ गायें
बच्छ ~ बछड़े
दोहिनी ~ दूध दुहने का बर्तन या मटकी
खरिक ~ गौशाला
व्याख्या: मुझे वे गायें, उनके बछड़े, दूध दुहने की मटकी और गौशाला में दूध दुहने के लिए जाना याद आता है।
ग्वाल-बाल मिलि करत कुलाहल, नाचत गहि गहि बाहीं।
शब्दार्थ:
कुलाहल ~ शोर
गहि गहि ~ पकड़ पकड़ कर
बाहीं ~ बाहें
व्याख्या: हम सभी ग्वाल बाल मिलकर जो शोर मचाते थे और एक दूसरे की बाहें पकड़कर नाचते थे, वह सब मुझे भूलता नहीं है।
यह मथुरा कंचन की नगरी, मनि-मुक्ताहल जाहीं।
शब्दार्थ:
कंचन ~ सोना
मनि-मुक्ताहल ~ मणि और मोती
जाहीं ~ जहाँ
व्याख्या: यद्यपि यह मथुरा सोने की नगरी है और यहाँ मणियों तथा मोतियों की कोई कमी नहीं है।
जबहिं सुरति आवति वा सुख की, जिय उमगत तन नाहीं।
शब्दार्थ:
सुरति ~ याद
वा ~ उस
जिय ~ हृदय
उमगत ~ व्याकुल होना
तन नाहीं ~ शरीर की सुध न रहना
व्याख्या: फिर भी, जब मुझे ब्रज के उस असीम सुख की याद आती है, तो मेरा हृदय व्याकुल हो उठता है और मुझे अपने शरीर की कोई सुध बुध नहीं रहती।
अनगन भाँति करी बहु लीला, जसुदा नंद निबाहीं।
शब्दार्थ:
अनगन भाँति ~ अनगिनत प्रकार से
निबाहीं ~ साथ दिया या प्रेम से सहन किया
व्याख्या: मैंने ब्रज में अनगिनत प्रकार की बाल लीलाएं कीं और यशोदा माता तथा नंद बाबा ने उन्हें बहुत प्रेम से सहन किया।
सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै, यह कहि-कहि पछिताहीं।। 4 ।।
शब्दार्थ:
मौन ह्वै ~ चुप होकर
पछिताहीं ~ पछताते हैं
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि ब्रज की यादों का वर्णन करते करते प्रभु श्रीकृष्ण एकदम चुप हो गए और मथुरा आने पर पछतावा करने लगे।

गोपियों की विरह व्यथा और प्रकृति का विपरीत प्रभाव:
बिनु गुपाल बैरिनि भईं कुंजैं।
शब्दार्थ:
बिनु ~ बिना
गुपाल ~ श्रीकृष्ण
बैरिनि ~ शत्रु
कुंजैं ~ लताओं के समूह
व्याख्या: गोपियां उद्धव से कहती हैं कि श्रीकृष्ण के बिना ये सुंदर लताएं और वन अब हमारे लिए शत्रु के समान हो गए हैं।
तब वै लता लगतिं तन सीतल, अब भईं विषम ज्वाल की पुंजैं।
शब्दार्थ:
सीतल ~ ठंडी
विषम ~ भयंकर
ज्वाल ~ आग की लपटें
पुंजैं ~ समूह
व्याख्या: जब श्रीकृष्ण हमारे पास थे, तब ये लताएं हमारे शरीर को शीतलता देती थीं, लेकिन अब उनके बिना ये भयंकर आग की लपटों के समान हमें जला रही हैं।
बृथा बहति जमुना, खग बोलत, बृथा कमल-फूलनि अलि गुंजैं।
शब्दार्थ:
बृथा ~ व्यर्थ
खग ~ पक्षी
अलि ~ भौंरे
गुंजैं ~ गुंजार करते हैं
व्याख्या: अब तो ऐसा लगता है जैसे यमुना नदी व्यर्थ ही बह रही है, पक्षी व्यर्थ ही चहचहा रहे हैं और कमल के फूलों पर भौंरे व्यर्थ ही गूंज रहे हैं।
पवन, पान, घनसार, सजीवन, दधि-सुत किरनि भानु भईं भुंजैं।
शब्दार्थ:
पान ~ जल
घनसार ~ कपूर
सजीवन ~ संजीवनी बूटी
दधि-सुत ~ चंद्रमा
भानु ~ सूर्य
भुंजैं ~ जलाने वाली
व्याख्या: हवा, जल, कपूर, संजीवनी और चंद्रमा की शीतल किरणें भी अब हमारे लिए सूर्य की तेज किरणों के समान जलाने वाली बन गई हैं।
यह ऊधौ कहियौ माधौ सौं, मदन मारि कीन्हीं हम लुंजैं।
शब्दार्थ:
माधौ ~ श्रीकृष्ण
मदन ~ कामदेव
लुंजैं ~ अपाहिज या असहाय
व्याख्या: हे उद्धव, आप जाकर श्रीकृष्ण से कहिएगा कि कामदेव ने हमें मार मार कर पूरी तरह से असहाय और अपाहिज कर दिया है।
सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौं, मग जोवत अँखियाँ भईं छुंजैं।। 5 ।।
शब्दार्थ:
दरस ~ दर्शन
मग जोवत ~ रास्ता देखते देखते
छुंजैं ~ कमजोर या दृष्टिहीन
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां विलाप करते हुए कहती हैं कि हे प्रभु, आपका रास्ता देखते देखते हमारी आँखें कमजोर और दृष्टिहीन हो गई हैं।

गोपियों का एकनिष्ठ प्रेम और योग का तिरस्कार:
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
शब्दार्थ:
हरि ~ श्रीकृष्ण
हारिल ~ एक पक्षी जो हमेशा पैरों में लकड़ी पकड़े रहता है
लकरी ~ लकड़ी
व्याख्या: गोपियां उद्धव से कहती हैं कि हमारे लिए श्रीकृष्ण हारिल पक्षी की उस लकड़ी के समान हो गए हैं, जिसे हम कभी छोड़ नहीं सकतीं।
मनक्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
शब्दार्थ:
मनक्रम ~ मन और कर्म
नंद-नंदन ~ नंद बाबा के पुत्र
उर ~ हृदय
दृढ़ ~ मजबूती से
पकरी ~ पकड़ लिया है
व्याख्या: हमने अपने मन, कर्म और वचनों से नंद बाबा के पुत्र श्रीकृष्ण को अपने हृदय में पूरी मजबूती से पकड़ रखा है।
जागत-सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी।
शब्दार्थ:
दिवस-निसि ~ दिन और रात
जकरी ~ रटती रहती हैं
व्याख्या: हम जागते, सोते, सपनों में और दिन रात केवल कान्हा कान्हा ही रटती रहती हैं।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
शब्दार्थ:
जोग ~ योग का संदेश
करुई ~ कड़वी
ककरी ~ ककड़ी
व्याख्या: हे उद्धव, आपका यह योग का संदेश सुनकर हमें ऐसा लगता है, जैसे हमने कोई कड़वी ककड़ी खा ली हो।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
शब्दार्थ:
सु तौ ~ वह तो
ब्याधि ~ बीमारी
करी ~ भोगी
व्याख्या: आप तो हमारे लिए योग रूपी ऐसी बीमारी लेकर आ गए हैं, जिसके बारे में हमने पहले न कभी देखा, न सुना और न ही कभी भोगा है।
यह तौ सूर तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।। 6 ।।
शब्दार्थ:
तिनहिं ~ उनको
चकरी ~ चक्के के समान अस्थिर या घूमने वाला
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां कहती हैं कि हे उद्धव, यह योग का संदेश आप उन लोगों को जाकर सौंप दें, जिनका मन चकरी के समान अस्थिर रहता है।

योग साधना के प्रति गोपियों की असमर्थता:
ऊधौ जोग जोग हम नाहीं।
शब्दार्थ:
जोग पहला ~ योग साधना
जोग दूसरा ~ योग्य
नाहीं ~ नहीं
व्याख्या: हे उद्धव, हम गोपियां आपकी इस कठिन योग साधना के बिल्कुल योग्य नहीं हैं।
अबला सार-ज्ञान कह जानैं, कैसैं ध्यान धराहीं।
शब्दार्थ:
अबला ~ कमजोर स्त्रियां
सार-ज्ञान ~ गहरा ब्रह्म ज्ञान
धराहीं ~ लगाएं
व्याख्या: हम तो कमजोर स्त्रियां हैं, हम भला इस गहरे ब्रह्म ज्ञान को कैसे समझ सकती हैं और हम कैसे ध्यान लगा सकती हैं।
तेई मूँदन नैन कहत हौ, हरि मूरति जिन माहीं।
शब्दार्थ:
तेई ~ उन्हीं
मूँदन ~ बंद करने को
माहीं ~ अंदर
व्याख्या: आप हमें उन्हीं आँखों को बंद करके ध्यान लगाने को कह रहे हैं, जिन आँखों के अंदर पहले से ही श्रीकृष्ण की सुंदर मूर्ति बसी हुई है।
ऐसी कथा कपट की मधुकर, हमतैं सुनी न जाहीं।
शब्दार्थ:
कपट ~ धोखा
मधुकर ~ भौंरा या उद्धव
व्याख्या: हे उद्धव, आपके इस योग संदेश में हमें धोखा नजर आता है और हमसे आपकी ये छल कपट भरी बातें सुनी नहीं जाती हैं।
स्रवन चीरि सिर जटा बंधावहु, ये दुख कौन समाहीं।
शब्दार्थ:
स्रवन ~ कान
चीरि ~ फाड़कर
समाहीं ~ सहेगा
व्याख्या: आप हमें कान छिदवाकर सिर पर साधुओं जैसी जटाएं बांधने को कह रहे हैं, इतना बड़ा दुख हम गोपियां कैसे बर्दाश्त कर सकती हैं।
चंदन तजि अँग भस्म बतावत, बिरह-अनल अति दाहीं।
शब्दार्थ:
तजि ~ छोड़कर
भस्म ~ राख
बिरह-अनल ~ वियोग की आग
दाहीं ~ जला रही है
व्याख्या: आप हमें शरीर पर शीतल चंदन लगाना छोड़कर राख मलने को कह रहे हैं, जबकि हम पहले ही श्रीकृष्ण के वियोग की आग में बुरी तरह जल रही हैं।
जोगी भ्रमत जाहि लगि भूले, सो तौ है अप माहीं।
शब्दार्थ:
जोगी ~ योगी लोग
भ्रमत ~ भटकते हैं
अप माहीं ~ अपने ही अंदर
व्याख्या: योगी लोग जिस ईश्वर की खोज में भूलकर इधर उधर भटकते रहते हैं, वह ईश्वर तो सबके अपने अंदर ही निवास करता है।
सूर स्याम तैं न्यारी न पल-छिन, ज्यौं घट तैं परछाहीं।। 7 ।।
शब्दार्थ:
स्याम ~ श्रीकृष्ण
न्यारी ~ अलग
पल-छिन ~ एक पल के लिए भी
घट ~ शरीर
परछाहीं ~ परछाईं
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां कहती हैं कि हम श्रीकृष्ण से एक पल के लिए भी उसी तरह अलग नहीं हो सकतीं, जैसे शरीर से उसकी परछाईं अलग नहीं होती है।

बचपन के अटूट प्रेम की गहराई:
लरिकाई कौ प्रेम कहौ अलि, कैसे छूटत।
शब्दार्थ:
लरिकाई ~ बचपन
अलि ~ भौंरा या उद्धव
व्याख्या: गोपियां कहती हैं कि हे उद्धव, हमारा और श्रीकृष्ण का प्रेम बचपन का है, यह भला इतनी आसानी से कैसे छूट सकता है।
कहा कहौं ब्रजनाथ चरित, अंतरगति लूटत।।
शब्दार्थ:
ब्रजनाथ ~ ब्रज के स्वामी श्रीकृष्ण
चरित ~ लीलाएं
अंतरगति ~ हृदय की गहराई को
लूटत ~ मोह लेते हैं
व्याख्या: मैं ब्रज के स्वामी श्रीकृष्ण की उन लीलाओं के बारे में क्या कहूं, जो आज भी हमारे हृदय को पूरी तरह मोह लेती हैं।
वह चितवनि वह चाल मनोहर, वह मुसकानि मंद-धुनि गावनि।
शब्दार्थ:
चितवनि ~ देखने का अंदाज
मनोहर ~ मन को हरने वाली
मंद-धुनि ~ धीमी आवाज
गावनि ~ गाना
व्याख्या: श्रीकृष्ण का वह तिरछी नजर से देखना, उनकी वह मनमोहक चाल, उनकी वह प्यारी मुस्कान और धीमी आवाज में उनका गाना हमें बहुत याद आता है।
नटवर भेष नंद-नंदन कौ वह विनोद, वह बन तैं आवनि।।
शब्दार्थ:
नटवर ~ श्रेष्ठ नर्तक
विनोद ~ हंसी मजाक
बन तैं आवनि ~ वन से लौटकर आना
व्याख्या: नंद बाबा के पुत्र का वह सुंदर नर्तक जैसा रूप, उनका वह हंसी मजाक करना और गायें चराकर वन से लौटकर आना हमें भूलता नहीं है।
चरन कमल की सौंह करति हौं, यह सँदेस मोहिं बिष सम लागत।
शब्दार्थ:
सौंह ~ कसम
बिष सम ~ जहर के समान
व्याख्या: मैं श्रीकृष्ण के कमल रूपी चरणों की कसम खाकर कहती हूं कि तुम्हारा यह योग का संदेश मुझे जहर के समान लगता है।
सूरदास पल मोहिं न बिसरति, मोहन मूरति सोवत जागत।। 8 ।।
शब्दार्थ:
बिसरति ~ भूलती
मूरति ~ मूर्ति
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां कहती हैं कि सोते जागते किसी भी पल हमसे श्रीकृष्ण की वह मनमोहक मूरत भुलाई नहीं जाती है।

श्रीकृष्ण के वादे का टूटना और विरह की अधिकता:
सूरदास जी के भ्रमर गीत का यह 9वाँ पद हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। इसे साहित्य की भाषा में कूट पद कहा जाता है। कूट पद का अर्थ है ऐसी कविता जिसमें कवि पहेली, ज्योतिष और गणित के माध्यम से अपनी बात को घुमाकर कहता है।
प्रसंग: गोपियों की विरह वेदना अब अपनी चरम सीमा को पार कर चुकी है। श्रीकृष्ण के न लौटने पर उनके भीतर निराशा, क्रोध और असीम पीड़ा है। वे उद्धव को उलाहना देते हुए अपने प्राण त्यागने की बात कर रही हैं।
पंक्ति 1: कहत कत परदेसी की बात।
शब्दार्थ:
कत ~ क्यों
परदेसी ~ श्रीकृष्ण
व्याख्या: गोपियां अत्यंत दुखी और आहत होकर उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव, तुम उस निर्मोही परदेसी श्रीकृष्ण की बातें हमसे क्यों कर रहे हो। अब वे हमारे अपने नहीं रहे, बल्कि परदेसी हो गए हैं।
पंक्ति 2: मंदिर अरध अवधि बदि हमसौ, हरि अहार चलि जात।
शब्दार्थ:
मंदिर अरध ~ घर का आधा हिस्सा अर्थात् एक पखवाड़ा या 15 दिन
अवधि ~ समय
बदि ~ वादा करके
हरि अहार ~ हरि शेर का भोजन अर्थात् मांस, जिसका अर्थ यहाँ मास या महीना है
व्याख्या: इस पंक्ति में गोपियों का दर्द और सूरदास जी की विद्वता दोनों झलकते हैं। गोपियां कहती हैं कि श्रीकृष्ण हमसे केवल 15 दिन में लौट आने का वादा करके गए थे, लेकिन अब तो पूरा एक महीना बीतने को है और उनका कहीं अता-पता नहीं है।
पंक्ति 3: ससि-रिपु बरष, सूर-रिपु जुग बर, हर-रिपु कीन्हौं घात।
शब्दार्थ:
ससि-रिपु ~ चंद्रमा का शत्रु अर्थात् दिन
बरष ~ वर्ष या साल
सूर-रिपु ~ सूर्य का शत्रु अर्थात् रात
जुग बर ~ युगों के समान लंबी
हर-रिपु ~ शिव के शत्रु अर्थात् कामदेव
घात ~ प्रहार या हमला
व्याख्या: श्रीकृष्ण के बिना समय काटना कितना भारी है, इसे गोपियां समझाती हैं। वे कहती हैं कि उनके वियोग में हमारा एक-एक दिन एक साल के बराबर और एक-एक रात युगों के समान लंबी बीत रही है। उस पर भी कामदेव हमें अपनी यादों से तड़पा-तड़पा कर हम पर लगातार प्रहार कर रहा है।
पंक्ति 4: मघ पंचक लै गयौ साँवरौ, तातैं अति अकुलात।
शब्दार्थ:
मघ पंचक ~ मघा नक्षत्र से पांचवां नक्षत्र, जो चित्रा होता है। चित्रा से यहाँ तात्पर्य चित्त या मन से है।
साँवरौ ~ सांवले श्रीकृष्ण
अकुलात ~ व्याकुल होना
व्याख्या: यहाँ कवि का ज्योतिष ज्ञान अद्भुत है। गोपियां कहती हैं कि सांवले सलोने श्रीकृष्ण जाते समय केवल हमारा शरीर यहाँ छोड़ गए, हमारा चित्त और मन तो वे अपने साथ ही ले गए हैं। हृदय पास न होने के कारण ही हम इतनी अधिक बेचैन और तड़प रही हैं।
पंक्ति 5: नखत, वेद, ग्रह, जोरि, अर्ध करि, सोइ बनत अब खात।
शब्दार्थ:
नखत ~ सत्ताईस नक्षत्र
वेद ~ चार वेद
ग्रह ~ नौ ग्रह
जोरि ~ जोड़कर
अर्ध करि ~ आधा करके
खात ~ खाना
व्याख्या: यह इस पद की सबसे गूढ़ और भावपूर्ण पंक्ति है जहाँ विरह की चरम सीमा दिखती है। गोपियां एक गणित का सहारा लेती हैं। सत्ताईस नक्षत्र, चार वेद और नौ ग्रह को आपस में जोड़ने पर चालीस की संख्या बनती है। चालीस का आधा बीस होता है, जिसे ब्रजभाषा में बिस या विष कहा जाता है। गोपियां कहती हैं कि अब हमारी पीड़ा इतनी बढ़ गई है कि हमारे लिए बस यही विष खाकर प्राण त्यागना ही शेष रह गया है।
पंक्ति 6: सूरदास बस भई बिरह के, कर मींजैं पछितात।। 9 ।।
शब्दार्थ:
बस भई ~ पूरी तरह वश में हो जाना या हार जाना
बिरह ~ वियोग
कर मींजैं ~ हाथ मलना
पछितात ~ पछताना
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां अब वियोग की पीड़ा के आगे पूरी तरह हार चुकी हैं और बेबस हो गई हैं। वे केवल अपने हाथ मलते हुए इस बात पर पछतावा कर रही हैं कि उन्होंने उस परदेसी श्रीकृष्ण से इतना गहरा प्रेम क्यों किया।
काव्य सौंदर्य
रस: यहाँ वियोग शृंगार रस अपने चरम उत्कर्ष पर है, जहाँ नायिका मृत्यु को गले लगाने तक की बात सोचती है।
अलंकार: इस पद में श्लेष अलंकार का ऐसा बेहतरीन और बौद्धिक प्रयोग हुआ है, जो पूरे हिंदी साहित्य में दुर्लभ है। शब्दों के पीछे छिपे अर्थों ने इसे एक महान कूट पद बना दिया है।
भाव-पक्ष: इस पद में सूरदास जी ने यह सिद्ध किया है कि प्रेम में डूबा हुआ हृदय जब टूटता है, तो वह कितनी गहरी पीड़ा से गुजरता है। यहाँ गोपियों का विलाप केवल रोना नहीं है, बल्कि उसमें एक अत्यंत तार्किक और बौद्धिक पीड़ा है जो सीधे सुनने वाले के हृदय में उतर जाती है।

आंसुओं की अविरल धारा:
निसि दिन बरषत नैन हमारे।
शब्दार्थ:
निसि दिन ~ रात और दिन
बरषत ~ बरसते हैं
नैन ~ आँखें
व्याख्या: गोपियां उद्धव से कहती हैं कि श्रीकृष्ण के बिना रात दिन हमारी आँखों से आंसुओं की बारिश होती रहती है।
सदा रहति बरषा रितु हम पर, जब तैं स्याम सिधारे।
शब्दार्थ:
बरषा रितु ~ बरसात का मौसम
सिधारे ~ गए हैं
व्याख्या: जब से सांवले श्रीकृष्ण मथुरा गए हैं, तब से हमारे ऊपर हमेशा बरसात का मौसम ही छाया रहता है, अर्थात् हम हमेशा रोती रहती हैं।
दृग अंजन न रहत निसि बासर, कर कपोल भए कारे।
शब्दार्थ:
दृग ~ आँखें
अंजन ~ काजल
निसि बासर ~ रात दिन
कर ~ हाथ
कपोल ~ गाल
कारे ~ काले
व्याख्या: आंसुओं के लगातार बहने से हमारी आँखों में दिन रात काजल नहीं टिक पाता है और काजल के बहने से हमारे गाल और हाथ काले हो गए हैं।
कंचुकि-पट सूखत नहिं कबहुँ, उर बिच बहत पनारे।
शब्दार्थ:
कंचुकि-पट ~ चोली का कपड़ा
उर ~ सीना या हृदय
पनारे ~ पानी के नाले
व्याख्या: आंसुओं की झड़ी के कारण हमारे वस्त्र कभी सूख नहीं पाते हैं और हमारी छाती के बीच से आंसुओं के नाले बहते रहते हैं।
आँसू सलिल सबै भइ काया, पल न जात रिस टारे।
शब्दार्थ:
सलिल ~ जल
काया ~ शरीर
रिस ~ गुस्सा
टारे ~ टालने से
व्याख्या: ऐसा लगता है जैसे हमारा पूरा शरीर ही आंसुओं के रूप में जल बन गया है, और श्रीकृष्ण के प्रति हमारा गुस्सा एक पल के लिए भी टाले नहीं टलता है।
सूरदास प्रभु यहै परेखौ, गोकुल काहैं बिसारे।। 10 ।।
शब्दार्थ:
परळखौ ~ शिकायत
काहैं ~ क्यों
बिसारे ~ भुला दिया
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां कहती हैं कि हमें बस इसी बात की शिकायत और दुख है कि प्रभु श्रीकृष्ण ने गोकुल को क्यों भुला दिया।

उद्धव पर गोपियों का तीखा व्यंग्य:
ऊधौ भली भई ब्रज आए।
शब्दार्थ:
भली भई ~ बहुत अच्छा हुआ
व्याख्या: गोपियां उद्धव पर व्यंग्य करते हुए कहती हैं कि हे उद्धव, बहुत अच्छा हुआ जो आप ब्रज आ गए।
बिधि कुलाल कीन्हे काँचे घट ते तुम आनि पकाए।
शब्दार्थ:
बिधि ~ ब्रह्मा
कुलाल ~ कुम्हार
काँचे घट ~ कच्चे घड़े
आनि ~ आकर
व्याख्या: ब्रह्मा रूपी कुम्हार ने हमारे शरीर रूपी जो कच्चे घड़े बनाए थे, उन्हें आपने यहाँ आकर योग की अग्नि से अच्छी तरह पका दिया है।
रँग दीन्हौ हो कान्ह साँवरैं, अँग-अँग चित्र बनाए।
शब्दार्थ:
कान्ह साँवरैं ~ सांवले कान्हा
अँग-अँग ~ शरीर के प्रत्येक हिस्से पर
व्याख्या: सांवले श्रीकृष्ण ने इन घड़ों को अपने प्रेम के रंग से रंग दिया था और हमारे अंग अंग पर अनेक प्रकार के सुंदर चित्र बना दिए थे।
पातैं गरे न नैन नेह तैं, अवधि अटा पर छाए।
शब्दार्थ:
गरे न ~ गले नहीं
नेह ~ प्रेम रूपी आंसुओं का जल
अवधि ~ लौटने का समय
अटा ~ छत
छाए ~ सुरक्षित रखे
व्याख्या: हमारी आँखों से बहने वाले आंसुओं के जल से ये कच्चे घड़े गल सकते थे, लेकिन उनके लौटने की समय रूपी छत ने इन्हें बचाकर रखा।
ब्रज करि आँवा जोग ईंधन करि, सुरति आनि सुलगाए।
शब्दार्थ:
आँवा ~ कुम्हार की भट्टी
जोग ~ योग का संदेश
सुरति ~ यादें
सुलगाए ~ जला दिए
व्याख्या: अब आपने आकर पूरे ब्रज को कुम्हार की भट्टी बना दिया है, योग के संदेश को ईंधन बनाया है और श्रीकृष्ण की यादों की आग सुलगा दी है।
फूँक उसास बिरह प्रजरनि सँग, ध्यान दरस सियराए।
शब्दार्थ:
उसास ~ गहरी सांसें
प्रजरनि ~ जलना
सियराए ~ ठंडे किए
व्याख्या: हमारे वियोग की गहरी सांसों ने उस आग को और भड़का दिया है, लेकिन हमने उनके दर्शन का ध्यान करके इन घड़ों को ठंडा कर लिया है।
भरे सँपूरन सकल प्रेम-जल, छुवन न काहू पाए।
शब्दार्थ:
सँपूरन ~ पूरी तरह
सकल ~ सभी
व्याख्या: अब हमारे ये शरीर रूपी घड़े पूरी तरह से श्रीकृष्ण के प्रेम रूपी जल से भरे हुए हैं, और इन्हें श्रीकृष्ण के अलावा और कोई छू भी नहीं पाया है।
राज काज तैं गए सूर प्रभु, नंद नंदन कर लाए।। 11 ।।
शब्दार्थ:
राज काज ~ मथुरा का राज काज
नंद नंदन ~ नंद के पुत्र
कर लाए ~ साथ ले गए
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां कहती हैं कि नंद के पुत्र प्रभु श्रीकृष्ण तो राजकाज के लिए मथुरा गए हैं, और जाते समय हमारा मन भी अपने साथ ही ले गए हैं।

कृष्ण के दर्शन की तीव्र लालसा:
अँखियाँ हरि दरसन की भूखीं।
शब्दार्थ:
दरसन ~ दर्शन
भूखीं ~ प्यासी
व्याख्या: गोपियां उद्धव से कहती हैं कि हमारी ये आँखें केवल श्रीकृष्ण के दर्शन करने के लिए भूखी और तड़पती रहती हैं।
कैसैं रहतिं रूप-रस राँची, ये बतियाँ सुनि रूखीं।
शब्दार्थ:
रूप-रस ~ सुंदरता का रस
राँची ~ रंगी हुई
रूखीं ~ नीरस
व्याख्या: जो आँखें श्रीकृष्ण के सुंदर रूप और प्रेम रस में हमेशा डूबी रहती थीं, वे भला तुम्हारे योग की नीरस बातें सुनकर कैसे शांत रह सकती हैं।
अवधि गनत, इकटक मग जोवत, तब इतनौ नहिं झूखीं।
शब्दार्थ:
अवधि गनत ~ समय गिनते हुए
इकटक ~ बिना पलक झपकाए
मग जोवत ~ रास्ता देखते हुए
झूखीं ~ दुखी हुईं
व्याख्या: उनके लौटने के दिन गिनते हुए और बिना पलक झपकाए उनका रास्ता देखते हुए भी हमारी आँखें इतनी अधिक दुखी नहीं हुई थीं।
अब यह जोग संदेसौ सुनि-सुनि, अति अकुलानी दूखीं।
शब्दार्थ:
संदेसौ ~ संदेश
अति अकुलानी ~ बहुत अधिक व्याकुल
दूखीं ~ दुखी हो गई हैं
व्याख्या: लेकिन अब तुम्हारा यह कठोर योग संदेश सुन सुनकर हमारी आँखें बहुत अधिक व्याकुल और दुखी हो गई हैं।
बारक वह मुख आनि दिखावहु, दुहि पय पिबत पतूखीं।
शब्दार्थ:
बारक ~ एक बार
आनि ~ आकर
दुहि ~ दुहकर
पय ~ दूध
पतूखीं ~ पत्तों के दोने में
व्याख्या: हे उद्धव, बस एक बार हमें श्रीकृष्ण का वह मुख लाकर दिखा दो, जब वे गाय का दूध दुहकर पत्तों के दोने में पिया करते थे।
सूर सु कत हठि नाव चलावत, ये सरिता हैं सूखीं।। 12 ।।
शब्दार्थ:
कत ~ क्यों
हठि ~ जिद करके
सरिता ~ नदी
सूखीं ~ सूखी हुई
व्याख्या: सूरदास जी कहते हैं कि गोपियां कहती हैं कि हे उद्धव, तुम क्यों सूखी हुई नदी में जिद करके नाव चलाने की कोशिश कर रहे हो, अर्थात् हम पर तुम्हारे योग का कोई असर नहीं होने वाला है।
काव्य सौंदर्य:
किसी भी कविता का काव्य सौंदर्य दो भागों में बँटा होता है, भाव पक्ष और कल-
रस:
भ्रमर गीत में मुख्य रूप से वियोग शृंगार रस का अत्यंत गहरा और मार्मिक प्रयोग हुआ है, क्योंकि इसमें नायक और नायिकाओं के बिछड़ने का दुःख है।
उदाहरण: निसि दिन बरषत नैन हमारे। जैसे - यहाँ गोपियों के लगातार रोने और उनके विरह का बहुत ही सुंदर वर्णन है।
भाषा:
सूरदास जी ने अत्यंत मधुर, सरस और आम बोलचाल की ब्रज भाषा का प्रयोग किया है। इसमें मिठास इतनी है कि सीधे मन को छू जाती है।
छंद:
इन सभी पदों में ज्ञेय पद छंद का प्रयोग हुआ है। इसका अर्थ है कि इन पदों को संगीत के सुर और ताल के साथ बहुत आसानी से गाया जा सकता है।
अलंकार:
सूरदास जी ने अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए अनेक अलंकारों का बहुत ही स्वाभाविक प्रयोग किया है। यहाँ कुछ प्रमुख अलंकारों के उदाहरण दिए गए हैं-
अनुप्रास अलंकार: (जहाँ एक ही वर्ण की आवृत्ति बार-बार हो )
उदाहरण: निसि दिन बरषत नैन हमारे। (इस पंक्ति में न अक्षर की आवृत्ति बार-बार हुई है, जिससे भाषा में सुंदरता आ गई है।)
उपमा अलंकार: (जहाँ किसी एक वस्तु की तुलना किसी दूसरी प्रसिद्ध चीज़ से की जाती है)
उदाहरण: सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी। (यहाँ गोपियों ने उद्धव के योग संदेश की तुलना एक बहुत कड़वी ककड़ी से की है।)
रूपक अलंकार: (जहाँ दो चीज़ों को बिल्कुल एक समान मान लिया जाता है और उनमें कोई अंतर नहीं रखा जाता)
उदाहरण: बिधि कुलाल कीन्हे काँचे घट। (यहाँ गोपियों ने अपने शरीर को कुम्हार द्वारा बनाए गए कच्चे घड़े के बिल्कुल समान मान लिया है।)