माहेश्वर सूत्र और प्रत्याहार
संस्कृत व्याकरण की यह अद्भुत व्यवस्था महर्षि पाणिनि को भगवान शिव के आशीर्वाद से प्राप्त हुई थी। एक बार पाणिनि ने भगवान शिव की कठिन तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने अपने डमरू को चौदह बार…



संस्कृत व्याकरण की यह अद्भुत व्यवस्था महर्षि पाणिनि को भगवान शिव के आशीर्वाद से प्राप्त हुई थी। एक बार पाणिनि ने भगवान शिव की कठिन तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने अपने डमरू को चौदह बार बजाया। इस डमरू के नाद (ध्वनि) से चौदह विशेष ध्वनियां निकलीं, जिन्हें माहेश्वर सूत्र या शिवसूत्र कहा गया। संस्कृत व्याकरण और प्रत्याहारों की पूरी संरचना इन्हीं चौदह सूत्रों पर टिकी हुई है।
माहेश्वर सूत्रों की कुल संख्या 14 होती है। इन्हें भगवान शिव के डमरू की ध्वनि से प्रकट हुआ माना जाता है, इसीलिए इन्हें 'शिवसूत्र', 'माहेश्वर सूत्र' या 'वर्णसमाम्नाय' भी कहा जाता है।
प्रत्याहार का अर्थ और परिचय:
'प्रत्याहार' शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है— संक्षेप करना या संक्षिप्त कथन। जब हमें संस्कृत वर्णमाला के कई वर्णों को एक साथ एक छोटे नाम में कहना होता है, तब हम प्रत्याहार का प्रयोग करते हैं, जैसे -
इसे एक सरल कहानी से समझिए। मान लीजिए एक विद्यालय में कक्षा के सभी 40 बच्चों के अलग-अलग नाम हैं। शिक्षक को यदि सभी को एक साथ बुलाना हो, तो वे एक-एक करके 40 नाम नहीं पुकारेंगे। इसके बजाय वे कहेंगे- "कक्षा छह के सभी छात्र बाहर आएं।" यह 'कक्षा छह' शब्द उन सभी 40 बच्चों का संक्षेप (प्रत्याहार) बन गया। ठीक इसी प्रकार, संस्कृत व्याकरण में बड़े-बड़े वर्ण-समूहों को संक्षेप में कहने की जादुई चाबी का नाम प्रत्याहार है।
माहेश्वर सूत्र:
प्रत्याहार बनाने का नियम:प्रत्याहार बनाने के लिए महेश्वर सूत्रों का सहारा लिया जाता है। इसमें दो वर्णों को मिलाया जाता है:
पहला वर्ण- किसी भी महेश्वर सूत्र का मुख्य अक्षर।
दूसरा वर्ण- किसी भी महेश्वर सूत्र के अंत में आने वाला हलन्त (आधा) वर्ण जिसे 'इत्' संज्ञक कहा जाता है।
इन दोनों को मिलाकर प्रत्याहार बनता है। जब हम प्रत्याहार बनाते हैं, तो पहले वर्ण से शुरू करते हैं और अंतिम 'इत्' वर्ण तक के बीच के सभी स्वरों या व्यंजनों को गिन लेते हैं, लेकिन अंतिम 'इत्' वर्ण को गिनती में शामिल नहीं करते।
चौदह महेश्वर सूत्र:
1. अइउण्
2. ऋऌक्
3. एओङ्
4. ऐऔच्
5. हयवरट्
6. लण्
7. ञमङणनम्
8. झभञ्
9. घढधष्
10. जबगडदश्
11. खफछठथचटतव्
12. कपय्
13. शषसर्
14. हल्।
संस्कृत व्याकरण के आदि स्रोत माहेश्वर सूत्र चौदह वे आधारभूत सूत्र हैं, जिन पर संपूर्ण संस्कृत व्याकरण और पाणिनीय अष्टाध्यायी टिकी हुई है।
चौदह माहेश्वर सूत्रों की व्याख्या:
1. अ इ उ ण्
शामिल वर्ण: अ, इ, उ
विशेषता: यह पहला सूत्र है जिसमें संस्कृत के तीन मुख्य मूल ह्रस्व स्वर आते हैं।
व्याकरणिक प्रयोग: इसके 'अ' से चौथे सूत्र के 'च्' तक मिलने पर अच् प्रत्याहार बनता है, जिसके अंतर्गत सभी स्वर आते हैं। यह स्वर संधि (अच् संधि) का आधार है।
2. ऋ ऌ क्
शामिल वर्ण: ऋ, ऌ
विशेषता: इसमें ऋकार और ऌकार स्वर आते हैं।
व्याकरणिक प्रयोग: पहले और दूसरे सूत्र के वर्ण मिलकर इक प्रत्याहार ($इ, उ, ऋ, ऌ$) बनाते हैं, जो यण संधि में सबसे महत्वपूर्ण है (सूत्र: इको यणचि)। जैसे— पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा (ऋ को र् हुआ)।
3. ए ओ ङ्
शामिल वर्ण: ए, ओ
विशेषता: ये दोनों गुण संज्ञक स्वर हैं।
व्याकरणिक प्रयोग: इससे एङ् प्रत्याहार बनता है, जिसका प्रयोग पूर्वरूप संधि में होता है (सूत्र: एङः पदान्तादति). जैसे— ते + अपि = तेऽपि।
4. ऐ औ च्
शामिल वर्ण: ऐ, औ
विशेषता: ये दोनों वृद्धि संज्ञक स्वर हैं।
व्याकरणिक प्रयोग: यह सूत्र वृद्धि संधि को सिद्ध करता है (सूत्र: वृद्धिरेचि). जैसे— सदा + एव = सदैव (आ + ए = ऐ)।
5. ह य व र ट्
शामिल वर्ण: ह, य, व, र
विशेषता: इसमें एक ऊष्म व्यंजन ('ह') और तीन अंतस्थ व्यंजन ('य, व, र') आते हैं।
व्याकरणिक प्रयोग: यहाँ से यण प्रत्याहार (य, व, र, ल) और सघोष व्यंजनों की गणना शुरू होती है।
6. लण्
शामिल वर्ण: ल
विशेषता: इसके अंतर्गत 'ल' व्यंजन आता है।
व्याकरणिक प्रयोग: पाँचवें के 'य' से छठे के 'ण्' तक मिलकर यण प्रत्याहार पूरा होता है, जिससे लृ + आकृति = लाकृति जैसे रूप सिद्ध होते हैं।
7. ञ म ङ ण न म्
शामिल वर्ण: ञ, म, ङ, ण, न
विशेषता: इसके अंतर्गत सभी वर्गों के पंचम वर्ण (अनुनासिक व्यंजन) आते हैं।
व्याकरणिक प्रयोग: अनुस्वार और अनुनासिक संधियों में इनका व्यापक प्रयोग होता है (सूत्र: मोऽनुस्वारः). जैसे— हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे।
8. झ भ ञ्
शामिल वर्ण: झ, भ
विशेषता: वर्गों के चौथे वर्ण (महाप्राण सघोष)।
व्याकरणिक प्रयोग: झष् प्रत्याहार और झल् प्रत्याहार का निर्माण यहीं से होता है, जो वर्ण परिवर्तन को नियंत्रित करते हैं।
9. घ ढ ध ष्
शामिल वर्ण: घ, ढ, ध
विशेषता: वर्गों के चौथे वर्ण।
व्याकरणिक प्रयोग: इनका प्रयोग झष् प्रत्याहार के अंतर्गत होता है और हकार के स्थान पर ढकार होने वाले नियमों में इनका संदर्भ लिया जाता है (सूत्र: हो ढः).
10. ज ब ग ड द श्
शामिल वर्ण: ज, ब, ग, ड, द
विशेषता: सभी वर्गों के तृतीय वर्ण आते हैं।
व्याकरणिक प्रयोग: यह सूत्र जश्त्व संधि का केंद्र है (सूत्र: झलां जशोऽन्ते). यदि वर्ग के प्रथम वर्ण के बाद यह प्रत्याहार आए, तो वह अपने ही वर्ग के तीसरे वर्ण में बदल जाता है। जैसे— वाक् + ईशः = वागीशः (क् को ग् हुआ)।
11. ख फ छ ठ थ च ट त व्
शामिल वर्ण: ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त
विशेषता: सभी वर्गों के द्वितीय और प्रथम वर्ण (अघोष वर्ण) आते हैं।
व्याकरणिक प्रयोग: खरि च संधि नियम का आधार यही सूत्र है, जिसके अनुसार झल् के बाद खर आने पर प्रथम वर्ण हो जाता है। जैसे— उत् + त्सवः = उत्सवः।
12. क प य्
शामिल वर्ण: क, प
विशेषता: क वर्ग और प वर्ग के प्रथम वर्ण (अघोष अल्पप्राण)।
व्याकरणिक प्रयोग: जिह्वामूलीय और उपधानीय वर्णों के निर्धारण तथा चर्त्व संधियों में इनकी गणना होती है।
13. श ष स र्
शामिल वर्ण: श, ष, स
विशेषता: संस्कृत के तीनों ऊष्म (सकार/शकार) वर्ण आते हैं।
व्याकरणिक प्रयोग: इससे शर् प्रत्याहार बनता है, जिसका प्रयोग विसर्ग संधि में होता है (सूत्र: विसर्जनीयस्य सः). जैसे— रामः + च = रामश्च (विसर्ग को श् हुआ)।
14. ह ल्
शामिल वर्ण: ह, ल
विशेषता: इसमें 'ह'कार और 'ल'कार आते हैं (अंतिम हलन्त 'ल्' प्रत्याहार निर्माण के लिए है)।
व्याकरणिक प्रयोग: पाँचवें सूत्र के 'ह' से लेकर चौदहवें के 'ल्' तक मिलाने से हल् प्रत्याहार बनता है, जिसके अंतर्गत संस्कृत के सभी व्यंजन आ जाते हैं। सभी व्यंजन संधियों का आधार यही है।
माहेश्वर सूत्रों की संरचना और विशेषताएं:
इत् संज्ञक वर्ण:
प्रत्येक सूत्र के अंत में एक हलन्त (आधा) वर्ण होता है (जैसे— ण्, क्, ङ्, च् आदि), जिसे 'इत्' कहा जाता है। इसका मुख्य काम प्रत्याहार (संक्षिप्त नाम) बनाना होता है।
वर्णों की आवृत्ति:
पाणिनीय व्यवस्था में कुछ वर्णों (जैसे 'ह') की आवृत्ति दो बार हुई है— पाँचवें सूत्र (ह य व र ट्) में और चौदहवें सूत्र (ह ल्) में, ताकि अलग-अलग प्रत्याहारों को आसानी से बनाया जा सके।
वैज्ञानिक क्रम:
पहले चार सूत्रों में सभी स्वर हैं, पाँचवें से चौदहवें तक व्यंजन हैं। व्यंजनों में भी पहले अंतस्थ, फिर अनुनासिक, फिर चतुर्थ, तृतीय, द्वितीय और प्रथम वर्ण तथा अंत में ऊष्म वर्णों को वैज्ञानिक क्रम में सजाया गया है।
माहेश्वर सूत्रों का महत्व और प्रयोग
प्रत्याहारों का आधार:
इन्हीं चौदह सूत्रों से 42 या 44 प्रत्याहार (शॉर्टकट) बनते हैं (जैसे— अच् = स्वर, हल् = व्यंजन, इक् = मूल स्वर)। इनके बिना संस्कृत के संधि, समास और व्याकरण के सूत्रों को समझना असंभव है।
संधि और व्याकरण संचालन: संस्कृत की स्वर और व्यंजन संधियां (जैसे यण संधि, जश्त्व संधि, चर्त्व संधि) पूरी तरह इन्हीं सूत्रों और इनसे बने प्रत्याहारों के नियमों पर चलती हैं।
प्रत्याहार:
संस्कृत व्याकरण में महर्षि पाणिनि द्वारा रचित 42 प्रत्याहार मुख्य माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त, आचार्य वार्तिककार वररुचि (कात्यायन) और पाणिनीय शिक्षा के अनुसार 2 अन्य प्रत्याहार (आम और चूँ) भी जोड़े जाते हैं, जिससे इनकी कुल संख्या 44 हो जाती है।
नीचे सभी 44 प्रत्याहारों को उनके निर्माण, शामिल वर्णों, अर्थ और संधि आदि में सटीक प्रयोग के साथ विस्तार से समझाया गया है-
1. अच् प्रत्याहार
कैसे बनता है: पहले सूत्र (अ इ उ ण्) के 'अ' से लेकर चौथे सूत्र (ऐ औ च्) के 'च्' तक।
शामिल वर्ण: अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ
अर्थ: इसके अंतर्गत संस्कृत के सभी स्वर आते हैं।
उदाहरण और प्रयोग: अच् प्रत्याहार का प्रयोग मुख्य रूप से स्वर संधि (अच् संधि) में होता है। जैसे— कोऽपि (कः + अपि) में विसर्ग को ओ और पूर्व रूप संधि का नियम अच् वर्णों पर लागू होता है। इसी प्रकार दीर्घ संधि में ($अ + अ = आ$) स्वर वर्णों का मेल होता है।
2. हल् प्रत्याहार
कैसे बनता है: पाँचवें सूत्र (ह य व र ट्) के 'ह' से चौदहवें सूत्र (ह ल्) के 'ल्' तक।
शामिल वर्ण: ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स
अर्थ: इसके अंतर्गत सभी व्यंजन वर्ण आते हैं।
उदाहरण और प्रयोग: हल् प्रत्याहार का प्रयोग व्यंजन संधि (हल् संधि) में होता है। जैसे— वाग्मीशः (वाक् + ईशः) में ककार को गकार होना हल् संधि का नियम है।
3. अण् प्रत्याहार (लघु)
कैसे बनता है: पहले सूत्र (अ इ उ ण्) के 'अ' से पहले ही सूत्र के 'ण्' तक।
शामिल वर्ण: अ, इ, उ
अर्थ: ह्रस्व स्वर।
उदाहरण और प्रयोग: इसका प्रयोग उच्चारण काल (प्रयत्न) और काल-बोध के निर्धारण में होता है।
4. इक प्रत्याहार
कैसे बनता है: पहले सूत्र (अ इ उ ण्) के 'इ' से दूसरे सूत्र (ऋ ऌ क्) के 'क्' तक।
शामिल वर्ण: इ, उ, ऋ, ऌ
अर्थ: चार मूल स्वर।
उदाहरण और प्रयोग: यण् संधि का आधार यही प्रत्याहार है। नियम है— इको यणचि (इक प्रत्याहार के स्थान पर अच सामने होने पर यण् आदेश होता है)। जैसे— शुद्ध + आगमः = शुद्धागमः (इ को य् हुआ)।
5. अण् प्रत्याहार (दीर्घ)
कैसे बनता है: पहले सूत्र (अ इ उ ण्) के 'अ' से छठे सूत्र (लण्) के 'ण्' तक।
शामिल वर्ण: अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल
अर्थ: सभी स्वर और अंतस्थ व्यंजन।
उदाहरण और प्रयोग: सवर्ण दीर्घ और कुछ विशेष वैदिक व्याकरण के नियमों में इसका संदर्भ लिया जाता है।
6. अम् प्रत्याहार
कैसे बनता है: पहले सूत्र के 'अ' से सातवें सूत्र (ञ म ङ ण न म्) के 'म्' तक।
शामिल वर्ण: अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न
अर्थ: स्वर, अंतस्थ और पंचम वर्ण (अनुनासिक)।
उदाहरण और प्रयोग: अनुस्वार संधि में— मोऽनुस्वारः सूत्र के तहत पद के अंत में मकार के स्थान पर अनुस्वार होता है यदि आगे अम् प्रत्याहार (स्वर या व्यंजन) हो। जैसे— हरिं वन्दे।
7. अट् प्रत्याहार
कैसे बनता है: पहले सूत्र के 'अ' से पाँचवें सूत्र (ह य व र ट्) के 'ट्' तक।
शामिल वर्ण: अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र
अर्थ: स्वर, ह, य, व, र।
उदाहरण और प्रयोग: 'रुँ' को 'र' आदेश होने वाले नियमों में अट् प्रत्याहार का प्रयोग होता है।
8. अश् प्रत्याहार
कैसे बनता है: पहले सूत्र के 'अ' से दसवें सूत्र (ज ब ग ड द श्) के 'श्' तक।
शामिल वर्ण: अ से लेकर सभी स्वर, अंतस्थ और वर्गों के तीसरे-चौथे-पाँचवें वर्ण (हश् वाले वर्ण भी)।
अर्थ: घोष/सोंग वर्ण।
उदाहरण और प्रयोग: प्रकृतिभाव और संधि के विशेष रूपों में स्वर और घोष व्यंजनों के मेल को नियंत्रित करता है।
9. एण् प्रत्याहार
कैसे बनता है: तीसरे सूत्र (ए ओ ङ्) के 'ए' से तीसरे सूत्र के 'ङ्' तक (या चौथे सूत्र के च् तक? एण् में ए, ओ आते हैं)।
शामिल वर्ण: ए, ओ
अर्थ: गुण संज्ञक स्वर।
उदाहरण और प्रयोग: पूर्वरूप संधि में— एङः पदान्तादति (एङ् प्रत्याहार के बाद यदि ह्रस्व 'अ' आए, तो दोनों मिलकर पूर्वरूप हो जाते हैं)। जैसे— हरे + अव = हर ेऽव।
10. ऐच् प्रत्याहार
कैसे बनता है: चौथे सूत्र (ऐ औ च्) के 'ऐ' से 'च्' तक।
शामिल वर्ण: ऐ, औ
अर्थ: वृद्धि संज्ञक स्वर।
उदाहरण और प्रयोग: वृद्धि संधि में— वृद्धिरेचि (अ या आ के बाद ऐच् प्रत्याहार आने पर वृद्धि आदेश होता है)। जैसे— सदा + एव = सदैव (आ + ए = ऐ)।
11. एच प्रत्याहार
कैसे बनता है: तीसरे सूत्र के 'ए' से चौथे सूत्र के 'च्' तक।
शामिल वर्ण: ए, ओ, ऐ, औ
अर्थ: संयुक्त स्वर।
उदाहरण और प्रयोग: अयादि संधि में— एचोऽयवायावः (एच प्रत्याहार के स्थान पर क्रमशः अय, अव, आय, आव आदेश होते हैं)। जैसे— ने + अनम् = नयनम् (ए को अय् हुआ)।
12. हश् प्रत्याहार
कैसे बनता है: पाँचवें सूत्र के 'ह' से दसवें सूत्र (ज ब ग ड द श्) के 'श्' तक।
शामिल वर्ण: ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द
अर्थ: वर्गों के तीसरे, चौथे, पाँचवें वर्ण तथा ह, य, व, र, ल (सघोष वर्ण)।
उदाहरण और प्रयोग: जश्त्व संधि में— झलां जशोऽन्ते या हश् प्रत्याहार परे होने पर झल् को जश् होता है। जैसे— दिग् + गजः = दिग्गजः।
13. हसं प्रत्याहार
कैसे बनता है: पाँचवें सूत्र के 'ह' से दसवें सूत्र के 'म्' (ज ब ग ड द श् के बाद म् कहाँ से? हश् + म्)।
शामिल वर्ण: ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, म
अर्थ: घोष व्यंजन समूह।
उदाहरण और प्रयोग: उच्चारण और व्यंजन विनिमय के नियमों में प्रयुक्त।
14. झल् प्रत्याहार
कैसे बनता है: आठवें सूत्र (झ भ ञ्) के 'झ' से तेरहवें सूत्र (श ष स र्) के 'र्' तक।
शामिल वर्ण: झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स
अर्थ: सभी वर्ग के पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे वर्ण और ऊष्म वर्ण (श, ष, स)।
उदाहरण और प्रयोग: झल् प्रत्याहार का प्रयोग विसर्ग संधि और झल् प्रत्याहार के वर्णों के लोप/परिवर्तन में होता है। जैसे— झलां जशोऽन्ते।
15. झष् प्रत्याहार
कैसे बनता है: आठवें सूत्र के 'झ' से नौवें सूत्र (घ ढ ध ष्) के 'ष्' तक।
शामिल वर्ण: झ, भ, घ, ढ, ध
अर्थ: सभी वर्गों के चौथे वर्ण (महाप्राण सघोष)।
उदाहरण और प्रयोग: हो ढः सूत्र में (हकार के स्थान पर ढकार होता है यदि पूर्व में झष् प्रत्याहार हो)।
16. जश् प्रत्याहार
कैसे बनता है: दसवें सूत्र (ज ब ग ड द श्) के 'ज' से 'श्' तक।
शामिल वर्ण: ज, ब, ग, ड, द
अर्थ: सभी वर्गों के तीसरे वर्ण।
उदाहरण और प्रयोग: जश्त्व संधि में— झलां जश् झशि (झल् के स्थान पर जश् आदेश होता है यदि आगे झश् या हश् हो)। जैसे— सुहृद् + गच्छति = सुहृद्गच्छति (द् को द् ही रहा)।
17. भष् प्रत्याहार
कैसे बनता है: आठवें सूत्र के 'भ' से नौवें सूत्र (घ ढ ध ष्) के 'ष्' तक।
शामिल वर्ण: भ, घ, ढ, ध
अर्थ: वर्गों के चौथे वर्ण (झ को छोड़कर भ, घ, ढ, ध)।
उदाहरण और प्रयोग: पूर्वसवर्ण संधि में— झोः हथः आदि सूत्रों में।
18. खष् प्रत्याहार
कैसे बनता है: ग्यारहवें सूत्र (ख फ छ ठ थ च ट त व्) के 'ख' से नौवें सूत्र के 'ष्' तक (विशिष्ट क्रम)।
शामिल वर्ण: ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त
अर्थ: अघोष अल्पप्राण एवं महाप्राण के कुछ वर्ण।
19. छव् प्रत्याहार
कैसे बनता है: ग्यारहवें सूत्र के 'छ' से 'व्' तक।
शामिल वर्ण: छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प (व्यंजन समूह)
अर्थ: अघोष वर्णों का समूह।
20. मय प्रत्याहार
कैसे बनता है: सातवें सूत्र (ञ म ङ ण न म्) के 'म' से बारहवें सूत्र (क प य्) के 'य्' तक।
शामिल वर्ण: म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प
अर्थ: पंचम वर्ण से लेकर प्रथम वर्ण तक।
उदाहरण और प्रयोग: अनुनासिक संधि में— यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा (यर प्रत्याहार के स्थान पर अनुनासिक होता है यदि आगे मय हो)।
21. वय प्रत्याहार
कैसे बनता है: छठे सूत्र (लण्) या अन्य सूत्रों के व से य तक।
शामिल वर्ण: व, र, ल, ञ, म... (संदर्भानुसार अंतस्थ)।
22. यमय प्रत्याहार
कैसे बनता है: सातवें सूत्र के 'य' (ञ म ङ ण न म् के बीच के य) से म् तक।
शामिल वर्ण: य, म, ङ, ण, न
अर्थ: अनुनासिक वर्ण।
23. कव प्रत्याहार
कैसे बनता है: बारहवें सूत्र (क प य्) के क से व तक।
शामिल वर्ण: क, प, श, ष, स...
24. झय प्रत्याहार
कैसे बनता है: आठवें सूत्र के 'झ' से ग्यारहवें सूत्र के 'व्' तक।
शामिल वर्ण: झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प
अर्थ: सभी वर्गों के 1st, 2nd, 3rd, 4th वर्ण।
उदाहरण और प्रयोग: यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा सूत्र में 'यर्' की जगह झय प्रत्याहार के वर्णों पर अनुनासिक विकल्प से होता है।
25. ख्य प्रत्याहार
कैसे बनता है: ग्यारहवें सूत्र के ख से बारहवें सूत्र के य् तक।
शामिल वर्ण: ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प
26. यर् प्रत्याहार
कैसे बनता है: पाँचवें सूत्र (ह य व र ट्) के 'य' से तेरहवें सूत्र (श ष स र्) के 'र्' तक।
शामिल वर्ण: य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द, ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स
अर्थ: ह को छोड़कर सभी अंतस्थ, पंचम, चतुर्थ, तृतीय, द्वितीय, प्रथम और ऊष्म वर्ण।
उदाहरण और प्रयोग: यरोऽनुनासिके... संधि में यर् प्रत्याहार के वर्णों का अनुनासिक परिवर्तन होता है।
27. यण प्रत्याहार
कैसे बनता है: पाँचवें सूत्र के 'य' से छठे सूत्र (लण्) के 'ण्' तक।
शामिल वर्ण: य, व, र, ल
अर्थ: अंतस्थ वर्ण।
उदाहरण और प्रयोग: यण् संधि का मुख्य परिणाम यही है। इक के स्थान पर यण् होता है (इ->य, उ->व, ऋ->र, ऌ->ल)। जैसे— मधु + अरुः = मध्वरिः (उ को व् हुआ)।
28. रल् प्रत्याहार
कैसे बनता है: पाँचवें सूत्र के 'र' (ह य व र ट् के र) से चौदहवें सूत्र (ह ल्) के 'ल्' तक।
शामिल वर्ण: र, ल, ञ, म, ङ, ण, न, झ, भ... (ह को छोड़कर सभी व्यंजन)।
29. वल् प्रत्याहार
कैसे बनता है: पाँचवें सूत्र के 'व' से चौदहवें सूत्र के 'ल्' तक।
शामिल वर्ण: व, र, ल और शेष सभी व्यंजन।
30. अल् प्रत्याहार
कैसे बनता है: पहले सूत्र (अ इ उ ण्) के 'अ' से चौदहवें सूत्र (ह ल्) के 'ल्' तक।
शामिल वर्ण: संस्कृत वर्णमाला के सभी 42/44 वर्ण (स्वर और व्यंजन दोनों)।
अर्थ: सम्पूर्ण वर्णमाला।
उदाहरण और प्रयोग: पाणिनीय व्याकरण में संपूर्ण वर्णमाला को एक साथ पुकारने के लिए 'अल्' का प्रयोग होता है।
31. शल् प्रत्याहार
कैसे बनता है: तेरहवें सूत्र (श ष स र्) के 'श' से चौदहवें सूत्र (ह ल्) के 'ल्' तक।
शामिल वर्ण: श, ष, स, ह (श्ल् में श, ष, स और हल् का ह मिलकर शल् बनते हैं)।
अर्थ: ऊष्म वर्ण।
उदाहरण और प्रयोग: विसर्ग संधि में— विसर्जनीयस्य सः या शर्/शल् प्रत्याहार आने पर विसर्ग के स्थान पर श, ष, स आदेश होते हैं। जैसे— रामः + चलति = रामश्चलति (विसर्ग को श हुआ)।
32. खल् प्रत्याहार
कैसे बनता है: ग्यारहवें सूत्र के ख से चौदहवें सूत्र के ल् तक।
शामिल वर्ण: सभी अघोष व्यंजन और ऊष्म वर्ण।
33. मश् प्रत्याहार
कैसे बनता है: सातवें सूत्र के म से दसवें सूत्र के श् तक।
शामिल वर्ण: म, ङ, ण, न, झ, भ, घ, ढ, ध, ज, ब, ग, ड, द
34. जष् प्रत्याहार (दीर्घ/अन्य)
कैसे बनता है: ज से श् तक (विशिष्ट संदर्भ)।
35. बश् प्रत्याहार
कैसे बनता है: दसवें सूत्र (जबगडदश्) के ब से श् तक।
शामिल वर्ण: ब, ग, ड, द
36. कष् प्रत्याहार
कैसे बनता है: बारहवें सूत्र के क से नौवें सूत्र के ष् तक।
37. अम प्रत्याहार
कैसे बनता है: अ से म् तक (स्वर और पंचम वर्ण)।
शामिल वर्ण: अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ, ह, य, व, र, ल, ञ, म, ङ, ण, न
38. खप् प्रत्याहार
कैसे बनता है: ख से प् तक।
39. चर प्रत्याहार
कैसे बनता है: ग्यारहवें सूत्र के अंत या विशेष वर्णों से।
शामिल वर्ण: च, ट, त, क, प, श, ष, स (अघोष वर्ण)।
उदाहरण और प्रयोग: खरि च सूत्र के अनुसार झल् प्रत्याहार के वर्णों को चर (वर्ग का पहला वर्ण या श, ष, स) होता है यदि आगे खर/चर प्रत्याहार हो। जैसे— उत् + त्सवः = उत्सवः या विपद् + कालः = विपत्कालः (द् को त् हुआ)।
40. खर प्रत्याहार
कैसे बनता है: ग्यारहवें सूत्र (ख फ छ ठ थ च ट त व्) के 'ख' से तेरहवें सूत्र (श ष स र्) के 'र्' तक।
शामिल वर्ण: ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स
अर्थ: सभी वर्गों के पहले, दूसरे वर्ण और ऊष्म वर्ण (अघोष वर्ण)।
उदाहरण और प्रयोग: खरि च संधि नियम में— यदि झल् के आगे खर प्रत्याहार हो, तो झल् के स्थान पर चर (पहला वर्ण) हो जाता है। जैसे— तत् + समयः = तत्समयः।
41. शर् प्रत्याहार
कैसे बनता है: तेरहवें सूत्र (श ष स र्) के 'श' से 'र्' तक।
शामिल वर्ण: श, ष, स
अर्थ: तीनों शकार/सकार।
उदाहरण और प्रयोग: विसर्ग संधि में— वाशि या विसर्जनीयस्य सः के नियमों में शर् प्रत्याहार के आगे होने पर विसर्ग का विकल्प से 'स' या शर् होता है। जैसे— हरिः + शेते = हरिश्शेते।
42. अह प्रत्याहार
कैसे बनता है: अ से लेकर ह तक (विशेष प्रयोग)।
43. आम प्रत्याहार (वार्तिककार सम्मत)
शामिल वर्ण: आ से लेकर म् तक के स्वर/व्यंजन। (अव्ययीभाव या उणादिसूत्रों में प्रयुक्त)।
44. चूँ प्रत्याहार (वैदिक/विशिष्ट)
शामिल वर्ण: च से लेकर ूँ तक। पाणिनि के व्याकरण में कुछ स्थानीय व वैदिक रूपों को साधने के लिए इसका प्रयोग मिलता है।
निष्कर्ष:
इस प्रकार महेश्वर सूत्रों से बने ये 42 से 44 प्रत्याहार संस्कृत व्याकरण की रीढ़ हैं। संक्षेप में कहें तो— अच् यानी स्वर, हल् यानी व्यंजन, इक यानी मूल स्वर, और यण् यानी अंतस्थ— ये व्याकरण के वे जादुई सूत्र हैं जो हर संधि और समास को चंद सेकंड में हल कर देते हैं।