यमुना - छवि
छप्पय छंदों के माध्यम से कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र यमुना नदी के पावन तट की नैसर्गिक और अलौकिक सुंदरता को स्पष्ट करना चाहते हैं। कवि का मुख्य भाव प्रकृति के विभिन्न रूपों में साक्षात भगवान श्री कृष्…


छप्पय छंदों के माध्यम से कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र यमुना नदी के पावन तट की नैसर्गिक और अलौकिक सुंदरता को स्पष्ट करना चाहते हैं। कवि का मुख्य भाव प्रकृति के विभिन्न रूपों में साक्षात भगवान श्री कृष्ण की दिव्य उपस्थिति का दर्शन करना है। वे यमुना के किनारे झुके तमाल वृक्षों को देखकर यह भाव व्यक्त करते हैं कि मानो वे वृक्ष जल रूपी दर्पण में अपनी शोभा निहार रहे हैं या कृष्ण सेवा के लिए झुके हैं। पूर्णिमा की रात में जब चंद्रमा का प्रतिबिंब चंचल लहरों पर पड़ता है, तो कवि को उसमें चंद्रमा द्वारा जल-क्रीड़ा करना, कसरत करना या कृष्ण के मुकुट की आभा दिखाई देना जैसे दिव्य भ्रम होते हैं। अंततः, पक्षियों के मधुर कलरव और यमुना के पवित्र वातावरण का चित्रण करके कवि प्रकृति के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा, सगुण भक्ति और असीम आत्मिक सुख को उजागर करते हैं।

छप्पय 1: यमुना तट के तमाल वृक्षों की शोभा
पंक्ति 1 :
तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।
शब्दार्थ :
तरनि-तनूजा ➔ सूर्य की पुत्री (यमुना नदी)
तट ➔ किनारा
तमाल ➔ एक सदाबहार वृक्ष
तरुवर ➔ श्रेष्ठ वृक्ष
बहु ➔ बहुत से
व्याख्या :
कवि कहते हैं कि यमुना नदी के किनारे पर तमाल के बहुत सारे सुंदर और विशाल पेड़ छाए हुए हैं अर्थात घने रूप से उगे हुए हैं।
पंक्ति 2 :
झुके कूल सों जल परसन हित मनहुँ सुहाए।।
शब्दार्थ :
कूल ➔ किनारा
सों ➔ से
परसन हित ➔ स्पर्श करने के लिए
मनहुँ ➔ मानो
सुहाए ➔ सुंदर लग रहे हैं
व्याख्या :
वे पेड़ किनारे की ओर इस तरह झुके हुए हैं, मानो वे यमुना के पवित्र जल को छूने के लिए झुके हों और ऐसा करते हुए वे बहुत ही सुंदर लग रहे हैं।
पंक्ति 3 :
किधौं मुकुर मैं लखत उझकि सब निज-निज सोभा।
शब्दार्थ :
किधौं ➔ अथवा / या
मुकुर ➔ दर्पण (शीशा)
लखत ➔ देख रहे हैं
उझकि ➔ उचककर / झाँककर
निज-निज ➔ अपनी-अपनी
सोभा ➔ सुंदरता
व्याख्या :
या फिर ऐसा लग रहा है कि वे सभी पेड़ यमुना के साफ़ पानी रूपी शीशे में झुक-झुक कर अपनी-अपनी सुंदरता निहार रहे हैं।
पंक्ति 4 :
कै प्रनवत जल जानि परम पावन फल लोभा।।
शब्दार्थ :
कै ➔ अथवा
प्रनवत ➔ प्रणाम कर रहे हैं
परम पावन ➔ अत्यंत पवित्र
फल लोभा ➔ फल की प्राप्ति के लोभ में
व्याख्या :
या फिर वे पेड़ यमुना के जल को बहुत पवित्र मानकर, अच्छे फलों (पुण्य) की प्राप्ति की इच्छा से उसे झुककर प्रणाम कर रहे हैं।
पंक्ति 5 :
मनु आतप वारन तीर कौ सिमिटि सबै छाए रहत।
शब्दार्थ :
मनु ➔ मानो
आतप ➔ धूप / गरमी
वारन ➔ रोकने के लिए
तीर कौ ➔ किनारे की
सिमिटि ➔ सिमटकर / एकत्र होकर
व्याख्या :
ऐसा भी लगता है मानो किनारे को धूप की गर्मी से बचाने के लिए, वे सभी पेड़ एक साथ इकट्ठे होकर छाया कर रहे हैं।
पंक्ति 6 :
कै हरि सेवा हित नै रहे निरखि नैन मन सुख लहत।।
शब्दार्थ :
हरि ➔ भगवान श्री कृष्ण
हित ➔ के लिए
नै रहे ➔ झुके हुए हैं
निरखि ➔ देखकर
नैन ➔ आँखें
लहत ➔ प्राप्त करते हैं
व्याख्या :
या फिर वे पेड़ भगवान श्रीकृष्ण की सेवा करने के लिए विनम्रता से झुके हुए हैं। इन झुके हुए पेड़ों को देखकर आँखों और मन को बहुत सुख मिलता है।
छप्पय 2: पूर्णिमा की रात में यमुना और चंद्र-ज्योति
पंक्ति 1 :
तिन पै जेहि छिन चंद जोति राका निसि आवति।
शब्दार्थ :
तिन पै ➔ उन वृक्षों पर / उस यमुना जल पर
जेहि छिन ➔ जिस क्षण
चंद जोति ➔ चंद्रमा की चाँदनी
राका निसि ➔ पूर्णिमा की रात
आवति ➔ आती है
व्याख्या :
पूर्णिमा की रात को जिस समय चंद्रमा की चाँदनी यमुना के उस जल पर पड़ती है।
पंक्ति 2 :
जल मैं मिलिकै नभ अवनी लौं तान तनावति।।
शब्दार्थ :
नभ ➔ आकाश
अवनी ➔ पृथ्वी
लौं ➔ तक
तान तनावति ➔ तंबू सा तान देती है (चाँदनी का प्रकाश फैला देती है)
व्याख्या :
तब वह चाँदनी जल में मिलकर आकाश से लेकर धरती तक एक चमकीले तंबू की तरह तन जाती है अर्थात चारों ओर प्रकाश फ़ैल जाता है।
पंक्ति 3 :
होत मुकुरमय सबै तबै उज्जल इक ओभा।
शब्दार्थ :
मुकुरमय ➔ दर्पण जैसा चमकदार
सबै ➔ सब कुछ
तबै ➔ तब
उज्जल ➔ श्वेत/चमकदार
ओभा ➔ आभा / कांति
व्याख्या :
उस समय सारी प्रकृति शीशे के समान चमकीली हो जाती है और सब जगह एक जैसी उज्ज्वल चमक फ़ैल जाती है।
पंक्ति 4 :
तन मन नैन जुड़ात देखि सुंदर सो सोभा।।
शब्दार्थ :
जुड़ात ➔ शीतल होते हैं / तृप्त होते हैं
सो सोभा ➔ उस सुंदरता को
व्याख्या :
यमुना की उस अत्यंत सुंदर शोभा को देखकर शरीर, मन और आँखों को बहुत शांति मिलती है।
पंक्ति 5 :
सो को कबि जो छबि कहि सकै ता छन जमुना नीर की।
शब्दार्थ :
सो को कबि ➔ ऐसा कौन सा कवि है
छबि ➔ सौंदर्य
कहि सकै ➔ वर्णन कर सके
ता छन ➔ उस क्षण
जमुना नीर ➔ यमुना का जल
व्याख्या :
दुनिया में ऐसा कौन सा कवि है जो उस समय की, यमुना नदी के जल की सुंदरता का शब्दों में पूरी तरह वर्णन कर सके? अर्थात कोई नहीं कर सकता।
पंक्ति 6 :
मिलि अवनि और अंबर रहत छबि इक सी नभ तीर की।।
शब्दार्थ :
अवनि ➔ पृथ्वी
अंबर ➔ आकाश
इक सी ➔ एक जैसी
नभ तीर ➔ आकाश और नदी के किनारे की
व्याख्या :
उस समय चाँदनी के कारण धरती और आसमान आपस में मिले हुए लगते हैं और आकाश से लेकर यमुना के किनारे तक की सुंदरता एक जैसी दिखाई देती है।
छप्पय 3: यमुना जल में चंद्रमा का प्रतिबिंब
पंक्ति 1 :
परत चंद्र प्रतिबिंब कहूँ जल मधि चमकायो।
शब्दार्थ :
परत ➔ पड़ता हुआ
प्रतिबिंब ➔ परछाईं
कहूँ ➔ कहीं
जल मधि ➔ जल के बीच में
चमकायो ➔ चमक रहा है
व्याख्या :
यमुना के जल के बीच में चंद्रमा की परछाईं पड़कर बहुत जोर से चमक रही है।
पंक्ति 2 :
लोल लहर लहि नचत कबहुँ सोई मन भायो।।
शब्दार्थ :
लोल ➔ चंचल
लहर ➔ तरंगें
लहि ➔ पाकर/सहारे
नचत ➔ नाचता हुआ
मन भायो ➔ मन को अच्छा लगता है
व्याख्या :
जब यमुना में चंचल लहरें उठती हैं, तो चाँद की वह परछाईं उन लहरों के साथ नाचती हुई सी लगती है, जो मन को बहुत लुभाती है।
पंक्ति 3 :
मनु हरि दरसन हेत चंद्र जल बसत सुहायो।
शब्दार्थ :
मनु ➔ मानो
हरि दरसन हेत ➔ भगवान कृष्ण के दर्शन के लिए
बसत ➔ निवास कर रहा है
व्याख्या :
उसे देखकर ऐसा लगता है मानो चंद्रमा भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन पाने के लिए यमुना के जल में आकर बस गया हो।
पंक्ति 4 :
कै तरंग कर मुकुर लिये सोभित छबि छायो।।
शब्दार्थ :
कै ➔ अथवा
तरंग कर ➔ लहर रूपी हाथों में
मुकुर ➔ दर्पण / शीशा
सोभित ➔ सुशोभित
छबि छायो ➔ शोभा छा रही है
व्याख्या :
या फिर ऐसा लगता है मानो यमुना की लहरों ने अपने हाथों में चाँद रूपी शीशा ले रखा हो, जिससे उनकी सुंदरता और बढ़ गई है।
पंक्ति 5 :
कै रास रमन मैं हरि मुकुट आभा जल दिखरात है।
शब्दार्थ :
रास रमन मैं ➔ रासलीला के समय
हरि मुकुट ➔ कृष्ण का मुकुट
आभा ➔ चमक
जल दिखरात है ➔ जल में दिखाई दे रही है
व्याख्या :
या फिर ऐसा प्रतीत होता है कि रासलीला खेलते हुए भगवान श्रीकृष्ण के सिर पर रखे मुकुट की चमक यमुना के जल में दिखाई दे रही है।
पंक्ति 6 :
कै जल उर हरि मूरति बसति ता प्रतिबिंब लखात है।।
शब्दार्थ :
जल उर ➔ जल के हृदय में
हरि मूरति ➔ श्री कृष्ण की छवि
ता प्रतिबिंब ➔ उसका अक्स / परछाईं
लखात है ➔ दिखाई दे रही है
व्याख्या :
या फिर यमुना के हृदय में श्रीकृष्ण की जो मूर्ति बसी हुई है, चंद्रमा के रूप में उसी का सुंदर प्रतिबिंब (परछाईं) दिखाई दे रहा है।
छप्पय 4: लहरों के संग चंद्रमा की क्रीड़ा
पंक्ति 1 :
कबहूँ होत सत चंद कबहूँ प्रगटत दुरि भाजत।
शब्दार्थ :
सत चंद ➔ सौ चंद्रमा
प्रगटत ➔ प्रकट होता है/दिखता है
दुरि भाजत ➔ छिपकर भाग जाता है/लुप्त हो जाता है
व्याख्या :
लहरों के हिलने से वह चाँद कभी सौ-सौ चाँद में बँट जाता है, और कभी प्रकट होकर तुरंत छिपकर भागता हुआ सा लगता है।
पंक्ति 2 :
पवन गवन बस बिंब रूप जल मैं बहु साजत।।
शब्दार्थ :
पवन गवन बस ➔ वायु के चलने के कारण
बिंब रूप ➔ प्रतिबिंब/परछाईं का स्वरूप
बहु साजत ➔ अनेक रूपों में सुशोभित होता है
व्याख्या :
हवा के चलने के कारण, चंद्रमा की परछाईं यमुना के जल में कई प्रकार के सुंदर रूप धारण करके सजती रहती है।
पंक्ति 3 :
मनु ससि भरि अनुराग जमुन जल लोटत डोलै।
शब्दार्थ :
मनु ➔ मानो
ससि ➔ चंद्रमा
भरि अनुराग ➔ प्रेम से भरकर
लोटत डोलै ➔ करवटें ले रहा हो या लोट रहा हो (अठखेलियाँ करना)
व्याख्या :
इस दृश्य को देखकर ऐसा लगता है मानो चंद्रमा प्रेम में डूबकर यमुना के जल में ख़ुशी से इधर-उधर लोट-पोट हो रहा हो।
पंक्ति 4 :
कै तरंग की डोर हिंडोरनि करत कलोलै।।
शब्दार्थ :
कै ➔ अथवा
तरंग की डोर ➔ लहरों रूपी रस्सी
हिंडोरनि ➔ झूला
करत कलोलै ➔ क्रीड़ा / खेल करना
व्याख्या :
या फिर ऐसा लगता है मानो चंद्रमा लहरों रूपी डोरी से बंधे झूले पर बैठकर खेल-कूद कर रहा हो।
पंक्ति 5 :
कै बालगुड़ी नभ मैं उड़ी सोहत इत उत धावती।
शब्दार्थ :
बालगुड़ी ➔ बच्चों की पतंग
नभ ➔ आकाश
सोहत ➔ सुंदर लगती है
इत उत धावती ➔ इधर-उधर दौड़ती हुई
व्याख्या :
या फिर चाँद की परछाईं ऐसी लगती है जैसे आसमान में बच्चों की कोई पतंग उड़ते हुए इधर-उधर भाग रही हो।
पंक्ति 6 :
कै अवगाहत डोलत कोऊ ब्रजरमनी जल आवती।।
शब्दार्थ :
अवगाहत ➔ स्नान करती हुई / डुबकी लगाती हुई
कोऊ ➔ कोई
ब्रजरमनी ➔ ब्रज की सुंदरी / गोपी
जल आवती ➔ जल में आती हुई
व्याख्या :
या ऐसा लगता है मानो ब्रज की कोई सुंदर गोपी जल में डुबकी लगाती हुई तैर रही हो, और उसका गोरा मुखड़ा चाँद जैसा चमक रहा हो।
छप्पय 5: चंद्रमा के विविध रूप एवं कसरत का भ्रम
पंक्ति 1 :
मनु जुग पच्छ प्रतच्छ होत मिटि जात जमुन जल।
शब्दार्थ :
जुग पच्छ ➔ दोनों पक्ष (कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष)
प्रतच्छ ➔ प्रत्यक्ष / सामने
मिटि जात ➔ गायब हो जाता है
व्याख्या :
लहरों के कारण चाँद के छिपने और निकलने से ऐसा लगता है मानो महीने के दोनों पक्ष (उजाला शुक्ल पक्ष और अँधेरा कृष्ण पक्ष) यमुना के जल में एक साथ सामने आ रहे हैं और मिट रहे हैं।
पंक्ति 2 :
कै तारागन ठगन लुकत प्रगटत ससि अबिकल।।
शब्दार्थ :
तारागन ➔ तारों का समूह
ठगन ➔ ठगने के लिए
लुकत ➔ छिपता है
ससि अबिकल ➔ पूर्ण चंद्रमा
व्याख्या :
या फिर ऐसा लगता है कि पूर्ण चंद्रमा, तारों के समूह को धोखा देने (लुका-छिपी खेलने) के लिए बार-बार छिपता है और प्रकट हो जाता है।
पंक्ति 3 :
कै कालिंदी नीर तरंग जितो उपजावत।
शब्दार्थ :
कालिंदी नीर ➔ यमुना का जल
जितो ➔ जितनी
उपजावत ➔ पैदा करती है
व्याख्या :
या फिर यमुना नदी अपने जल में जितनी भी लहरें पैदा करती है...
पंक्ति 4 :
तितनो ही धरि रूप मिलन हित तासों धावत।।
शब्दार्थ :
तितनो ही ➔ उतने ही
धरि रूप ➔ रूप धारण करके
तासों ➔ उनसे
धावत ➔ दौड़ता है
व्याख्या :
...चंद्रमा उतने ही रूप धारण करके, उन सभी लहरों से मिलने के लिए उनकी ओर दौड़ पड़ता है।
पंक्ति 5 :
कै बहुत रजत चकई चलत कै फुहार जल उच्छरत।
शब्दार्थ :
रजत चकई ➔ चाँदी के खिलौने / चकरघिन्नी
फुहार ➔ जल की बूंदें
उच्छरत ➔ ऊपर उछल रही हैं
व्याख्या :
लहरों पर चमकता चाँद ऐसा लगता है मानो चाँदी की बहुत सारी चकरियाँ चल रही हों, या फिर पानी के सुंदर फुहारे उछल रहे हों।
पंक्ति 6 :
कै निसिपति मल्ल अनेक बिधि उठि बैठत कसरत करत।।
शब्दार्थ :
निसिपति ➔ चंद्रमा (रात का स्वामी)
मल्ल ➔ पहलवान
अनेक बिधि ➔ अनेक प्रकार से
कसरत करत ➔ व्यायाम कर रहा हो
व्याख्या :
या फिर ऐसा लगता है मानो चंद्रमा रूपी कोई पहलवान लहरों के अखाड़े में उठ-बैठ कर अनेक प्रकार से कसरत कर रहा हो।
छप्पय 6: यमुना तट पर पक्षियों का कलरव
पंक्ति 1 :
कूजत कहुँ कलहंस कहूँ मज्जत पारावत।
शब्दार्थ :
कूजत ➔ मधुर ध्वनि (कलरव) कर रहे हैं
कलहंस ➔ सुंदर हंस
मज्जत ➔ स्नान कर रहे हैं
पारावत ➔ कबूतर
व्याख्या :
यमुना के किनारे का दृश्य बहुत सुंदर है; कहीं मधुर आवाज़ में राजहंस बोल रहे हैं, तो कहीं कबूतर पानी में स्नान कर रहे हैं।
पंक्ति 2 :
कहुँ कारंडव उड़त कहूँ जल कुक्कुट धावत।।
शब्दार्थ :
कारंडव ➔ जलमुर्गा / एक प्रकार का जलपक्षी
जल कुक्कुट ➔ जंगली जल-मुर्गी
धावत ➔ दौड़ रहे हैं
व्याख्या :
कहीं पर बत्तखें उड़ रही हैं, तो कहीं पानी में रहने वाली मुर्गियां (जलमुर्गी) इधर-उधर दौड़ रही हैं।
पंक्ति 3 :
चक्रवाक कहुँ बसत कहूँ बक ध्यान लगावत।
शब्दार्थ :
चक्रवाक ➔ चकवा-चकवी पक्षी
बसत ➔ निवास कर रहे हैं
बक ➔ बगुला
ध्यान लगावत ➔ ध्यान मग्न है (मछली पकड़ने के लिए)
व्याख्या :
कहीं पर चकवा पक्षी बसेरा डाले हुए बैठे हैं, तो कहीं बगुला पानी में मछली पकड़ने के लिए एकाग्र होकर ध्यान लगाए खड़ा है।
पंक्ति 4 :
सुक पिक जल कहुँ पियत कहूँ भ्रमरावलि गावत।।
शब्दार्थ :
सुक ➔ तोता
पिक ➔ कोयल
भ्रमरावलि ➔ भँवरों की पंक्तियाँ
व्याख्या :
कहीं तोते और कोयल यमुना का मीठा जल पी रहे हैं, तो कहीं फूलों पर बैठकर भौंरों का समूह गुनगुना कर गीत गा रहा है।
पंक्ति 5 :
कहुँ तट पर नाचत मोर बहु रोर बिबिध पच्छी करत।
शब्दार्थ :
बहु ➔ बहुत से
रोर ➔ शोर / कोलाहल (कलरव)
बिबिध ➔ विभिन्न प्रकार के
पच्छी ➔ पक्षी
व्याख्या :
कहीं किनारे पर सुंदर मोर नाच रहे हैं, और कई अलग-अलग प्रकार के पक्षी मिलकर मीठा शोर (कलरव) कर रहे हैं।
पंक्ति 6 :
जन पान न्हान करि सुख भरे तट सोभा सब जिय धरत।।
शब्दार्थ :
जन ➔ मनुष्य / श्रद्धालु
पान ➔ जल पीना
न्हान ➔ स्नान करना
जिय धरत ➔ अपने हृदय में धारण करते हैं
व्याख्या :
ये सभी पक्षी यमुना का जल पीकर और उसमें स्नान करके अत्यंत सुखी महसूस कर रहे हैं, और यमुना तट की इस अद्भुत सुंदरता को अपने हृदय में बसा रहे हैं।
विशेष :
उक्त छप्पयों में मुख्य रूप से निम्नलिखित रस और अलंकारों का प्रयोग हुआ है:
मुख्य रस :
श्रृंगार रस :(संयोग):
यमुना तट के अत्यंत रमणीय, प्राकृतिक और मनमोहक वातावरण का चित्रण होने के कारण यहाँ मुख्य रूप से संयोग श्रृंगार रस है। चंद्रमा की किरणें, लहरों की क्रीड़ा और पक्षियों का विलास इस रस को पुष्ट करते हैं।
भक्ति रस:
तमाल वृक्षों का 'हरि सेवा' के लिए झुकना, चंद्रमा का 'हरि दर्शन' के लिए जल में
बसना और अंत में श्रद्धालुओं द्वारा 'पान-न्हान' कर सुख प्राप्त करना—यह सब भारतेंदु जी की अनन्य कृष्ण-भक्ति भावना को दर्शाता है। इसलिए यहाँ भक्ति रस का भी सुंदर परिपाक हुआ है।
अद्भुत रस:
चंद्रमा के एक साथ सैकड़ों रूप धारण करने, जल के भीतर कसरत करने और प्रकृति के अलौकिक दृश्यों को देखकर मन में विस्मय (आश्चर्य) का भाव जगता है, जिससे अद्भुत रस की निष्पत्ति होती है।
मुख्य अलंकार :
अनुप्रास अलंकार: जहाँ वर्णों की बार-बार आवृत्ति होती है। प्रथम छप्पय की प्रथम पंक्ति—"तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए" में 'त' वर्ण की बार-बार आवृत्ति होने के कारण यहाँ छेकानुप्रास और वृत्त्यानुप्रास अलंकार का अत्यंत सुंदर उदाहरण है।
उत्प्रेक्षा अलंकार :
जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना या कल्पना की जाए। इसके वाचक शब्द 'मनु', 'मानो', 'जनु' आदि होते हैं। कविता में प्रयुक्त पंक्तियाँ जैसे—"मनहुँ सुहाए", "मनु आतप वारन", "मनु हरि दरसन हेत" और "मनु ससि भरि अनुराग" में पूर्ण रूप से उत्प्रेक्षा अलंकार है।
संदेह अलंकार :
जहाँ उपमेय और उपमान में समता देखकर यह निश्चित न हो पाए कि वास्तव में वस्तु क्या है। भारतेंदु जी ने 'कै' और 'किधौं' शब्दों का प्रयोग करके संदेह की सुंदर सृष्टि की है; जैसे—"किधौं मुकुर मैं लखत", "कै प्रनवत जल जानि", अथवा "कै तरंग कर मुकुर लिये"।
मानवीकरण अलंकार :
जहाँ जड़ प्रकृति पर मानवीय क्रियाओं का आरोप किया जाए। वृक्षों का दर्पण में अपनी शोभा देखना, यमुना को प्रणाम करना, चंद्रमा का प्रेमवश जल में लोटना और पहलवान की तरह कसरत करना—ये सभी जड़ प्रकृति की मानवीय चेष्टाएँ हैं, इसलिए यहाँ मानवीकरण अलंकार विद्यमान है।
पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार :
जहाँ एक ही शब्द की आवृत्ति लगातार हो पर अर्थ न बदले। "निज-निज" शब्द के प्रयोग में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।