रस
साहित्य में कविता पढ़ने से, कहानी सुनने से और नाटक देखने से पाठक, श्रोता या दर्शक को जिस आनंद की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं। रस को 'काव्य की आत्मा' माना गया है। रस संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भर…


रस और परिभाषा :
साहित्य में कविता पढ़ने से, कहानी सुनने से और नाटक देखने से पाठक, श्रोता या दर्शक को जिस आनंद की अनुभूति होती है, उसे रस कहते हैं। रस को 'काव्य की आत्मा' माना गया है। रस संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भरतमुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ नाट्यशास्त्र में सबसे पहले रस की व्याख्या की थी। उनका एक बहुत ही प्रसिद्ध सूत्र है-"विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" अर्थात: विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की उत्पत्ति होती है।
रस का अर्थ है - 'आनंद'। मूल रूप से रस 9 माने गए हैं, लेकिन बाद में विद्वानों ने वात्सल्य और भक्ति को भी रस माना है, जिससे अब इनकी कुल संख्या 11 हो गई है। वास्तविक जीवन में यदि आपको दुख मिले, तो आप परेशान होते हैं, लेकिन जब आप कोई दुखद फिल्म देखते हैं या कविता पढ़ते हैं और रोते हैं, तब भी आपको भीतर से एक अजीब सी शांति या आनंद मिलता है। वहीं वास्तविक जीवन का दुख, कष्ट देता है, लेकिन साहित्य का दुख करुण रस बन जाता है, जो अंततः आनंद ही देता है। इसीलिए रस को ब्रह्मानंद सहोदर अर्थात ईश्वर प्राप्ति के आनंद के समान कहा गया है।
रस के अंग या अवयव
किसी भी रस के पूर्ण रूप से जाग्रत होने में चार तत्वों का योगदान होता है। इन्हें ही रस के अवयव या अंग कहते हैं। रस के अंगों को समझने के लिए हम एक दृश्य की कल्पना करते हैं-
कल्पना करें कि आप रात के समय एक घने और सुनसान जंगल से गुजर रहे हैं, तभी अचानक आपके सामने एक खूंखार शेर आ जाता है और वह जोर से दहाड़ता है। आप डर के मारे काँपने लगते हैं, आपको पसीना आ जाता है और मन में खयाल आता है कि "अब मैं नहीं बचूँगा।" इस पूरी घटना के आधार पर हम रस के चारों अंगों को आसानी से समझ सकते हैं-
I. स्थायी भाव :
यह वह मूल भाव है, जो मनुष्य के मन में जन्म से ही हमेशा मौजूद रहता है, बस सोयी हुई अवस्था में होता है। उन्हें स्थायी भाव कहते हैं। रस का मुख्य आधार यही होता है, जैसे- हँसी, दुख, क्रोध, डर आदि।
उदाहरण : आपके मन में 'डर' हमेशा से मौजूद था। शेर को देखने से पहले वह सोया हुआ था। यहाँ 'भय' स्थायी भाव है।
प्रमुख रस और उनके स्थायी भाव नीचे दिए गए हैं :
1. शृंगार रस – रति या प्रेम, 2. हास्य रस – हास या हँसी, 3. करुण रस – शोक या दुःख, 4. रौद्र रस – क्रोध, 5. वीर रस – उत्साह, 6. भयानक रस – भय या डर, 7. वीभत्स रस – जुगुप्सा या घृणा, 8. अद्भुत रस – विस्मय या आश्चर्य, 9. शांत रस – निर्वेद, वैराग्य या शांति, 10. वात्सल्य रस – वत्सल रति या संतान-प्रेम, 11. भक्ति रस – भगवद् विषयक रति या ईश्वर के प्रति प्रेम।
विशेष -
1. काव्यशास्त्र में वात्सल्य को 10वें रस के रूप में स्वतंत्र रूप से स्थापित करने का श्रेय आचार्य विश्वनाथ को जाता है।
2. भक्ति को 11वें रस के रूप में शास्त्रीय मान्यता दिलाने का मुख्य श्रेय आचार्य रूप गोस्वामी और आचार्य मधुसूदन सरस्वती को जाता है।
II. विभाव :
जिस व्यक्तियों और वस्तुओं के कारणों से आपके अंदर सोया हुआ स्थायी भाव जाग जाता है, उसे विभाव कहते हैं। सरल शब्दों में-भाव जगाने वाला कारण।
उदाहरण : जंगल का सन्नाटा, अँधेरा और शेर की दहाड़।
III. अनुभाव :
अनु का अर्थ है - पीछे या बाद में, भाव का अर्थ है - भावना के। यानी भावना पैदा होने के बाद शरीर जो करे अर्थात भाव जागने के बाद आपके शरीर में जो हरकतें या प्रतिक्रियाएँ होती हैं, उन्हें अनुभाव कहते हैं।
उदाहरण : डर के मारे आपका काँपना, पसीना आना, चीख निकलना या भागने की कोशिश करना अनुभाव है।
IV. संचारी या व्यभिचारी भाव :
मन में पानी के बुलबुलों की तरह बहुत कम समय के लिए उठने और मिटने वाले भावों को संचारी भाव कहते हैं। ये स्थायी भाव को और अधिक मजबूत बनाते हैं। इनकी संख्या 33 मानी गई है।
उदाहरण : उस डरावने पल में आपके मन में जो क्षणिक विचार आए- जैसे चिंता - "क्या कोई मुझे बचाएगा?", शंका -"क्या मैं मर जाऊँगा?", या स्मृति - घर वालों की याद आना। ये सब संचारी भाव हैं।
निष्कर्ष सूत्र:
जब आपका स्थायी भाव - भय, विभाव - शेर या अँधेरा, अनुभाव - काँपना और संचारी भाव - चिंता से जा कर मिलता है, तब आपके भीतर 'भयानक रस' की उत्पत्ति होती है। दुनिया की हर कविता और हर फिल्म इसी फॉर्मूले पर काम करती है।
हास्य और करुण रस :
हास्य रस :
स्थायी भाव: हास या हँसी
परिभाषा :
जब किसी व्यक्ति की विचित्र वेशभूषा और शारीरिक चेष्टाओं को देखकर को देखकर मन में जो 'हास' नामक स्थायी भाव जागृत होता है, तब वहाँ हास्य रस होता है।
उदाहरण :
1. तंबूरा लिए मंच पर बैठे प्रेम प्रताप,
राग मिले पंद्रह मिनट घंटा भर आलाप।
2. विंध्य के वासी उदासी तपोब्रतधारी माहाबिनु नारि
दुखारे।
3. आधा पात बबूल का, तामें में तनिक पिसान ।
पंडित जी करने लगे, छठे समासे दान।
4. सीस पर गंगा हंसै, भुजनि भुजंगा हंसै,
हास भयो नंगा के विवाह में।
5. बुरे समय को देखकर गंजे तू क्यों रोए,
किसी भी हालत में तेरा बाल न बांका होय।
6. हाथी जैसी देह, गैंडे जैसी चाल।
तरबूजे सी खोपड़ी, खरबूजे से गाल।
7. नारि मुई घर संपति नासी,
मूड़ मुड़ाई होइ संन्यासी।
करुण रस :
स्थायी भाव: शोक या दुख
परिभाषा :
जब किसी प्रिय व्यक्ति के हमेशा के लिए बिछड़ जाने, किसी वस्तु के नष्ट हो जाने या किसी भारी दुख के कारण मन में 'शोक' नामक स्थायी भाव जागृत होता है, तब वह करुण रस कहलाता है।
उदाहरण :
1. देखि सुदामा की दीन दसा,
करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं,
नैनन के जल सों पग धोये॥
2. मणि खोए भुजंग-सी जननी,
फन-सा पटक रही थी शीश,
अन्धी आज बनाकर मुझको,
किया न्याय तुमने जगदीश?
3. शोक विकल सब रोवही रानी,
रूप सील बल देख बखानी।
4. हाय फूल सी कोमल बच्ची हुई राख की थी ढेरी,
5. उजड़ गया जो आशियाना हमारा,
न बचा कोई भी सहारा,
आँखों में आँसू की धारा,
जग हुआ सूना सारा।
6. तड़प रहा था बिन भोजन के, शिशु गोदी में सोता था,
भाग्यहीन इस दुनिया में, कौन किसी का होता था।
7. अभी तो मुकुट बँधा था माथ,
हुए कल ही हल्दी के हाथ,
खुले भी न थे लाज के बोल,
खिले थे चुम्बन-शून्य कपोल,
हाय रुक गया यहीं संसार
बना सिन्दूर अनल अंगार