रस
रस शब्द का सबसे पहला और प्राचीन उल्लेख हमारे वेदों और उपनिषदों में मिलता है। तैत्तिरीय उपनिषद में एक बहुत ही प्रसिद्ध पंक्ति है - रसो वै सः। प्राचीन काल में रस का अर्थ किसी कविता के आनंद से नहीं, बल्क…


रस शब्द का सबसे पहला और प्राचीन उल्लेख हमारे वेदों और उपनिषदों में मिलता है। तैत्तिरीय उपनिषद में एक बहुत ही प्रसिद्ध पंक्ति है - रसो वै सः। प्राचीन काल में रस का अर्थ किसी कविता के आनंद से नहीं, बल्कि ब्रह्मानंद यानी ईश्वर को पाने के सर्वोच्च आनंद से था। यह आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक था।
1. रस का अर्थ और परिभाषा :
रस का शाब्दिक अर्थ है आनंद। किसी कविता को पढ़ने, कहानी को सुनने और नाटक को देखने से पाठक, श्रोता या दर्शक के मन में जिस विशेष आनंद की अनुभूति होती है, उसे साहित्य में रस कहा जाता है। जिस प्रकार प्राण के बिना हमारा शरीर व्यर्थ है, ठीक उसी प्रकार रस के बिना किसी भी कविता या काव्य को निर्जीव माना जाता है। इसलिए विद्वानों ने रस को काव्य की आत्मा कहा है। यह किसी भी पाठक या श्रोता के मन को पूरी तरह से भाव-विभोर कर देता है।
आचार्य भरत मुनि को रस संप्रदाय का जनक माना जाता है। ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी के आसपास उन्होंने नाट्यशास्त्र नामक विश्वप्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसी ग्रंथ में पहली बार कला, नाटक और रस का अत्यंत वैज्ञानिक तथा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया। काव्यशास्त्र या साहित्य में रस सिद्धांत को विधिवत रूप से स्थापित करने का पूरा श्रेय आचार्य भरत मुनि को जाता है।
भारतीय काव्यशास्त्र में रस को काव्य की आत्मा या प्राण-तत्त्व माना गया है। जिस प्रकार आत्मा के बिना शरीर निर्जीव और व्यर्थ है, ठीक उसी प्रकार रस के बिना कोई भी रचना काव्य नहीं कहला सकती। आचार्य विश्वनाथ ने अपने ग्रंथ साहित्य दर्पण में स्पष्ट रूप से कहा है - वाक्यं रसात्मकं काव्यम्। अर्थात्, रस से परिपूर्ण वाक्य ही सच्ची कविता है।
भारतीय दर्शन में रस से मिलने वाले आनंद को ब्रह्मानंद सहोदर कहा गया है। यह एक बहुत ही गूढ़ और महत्वपूर्ण बात है। इसका अर्थ यह है कि कविता पढ़ने से जो आनंद मिलता है, वह हमारे रोजमर्रा के सांसारिक सुखों से बहुत ऊपर होता है। यह आनंद उस परम शांति और सुख के समान है, जो किसी सच्चे योगी को ईश्वर के ध्यान में प्राप्त होता है।
संक्षिप्त शब्दों में कहें तो,रस केवल कविता का एक तकनीकी हिस्सा नहीं है, बल्कि वह चरम मनोवैज्ञानिक बिंदु है जहाँ पहुँचकर एक साधारण पाठक अपनी सारी सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर कला के परमानंद में पूरी तरह लीन हो जाता है।
2. रस के अंग या अवयव
हमारे मन में सोए हुए भावों को जगाने और उन्हें 'रस' के रूप में बदलने के लिए जिन तत्वों की आवश्यकता होती है, उन्हें ही रस के अवयव या रस के अंग कहते हैं। रस हमारे मन में अचानक से प्रकट नहीं होता, बल्कि इसकी उत्पत्ति एक व्यवस्थित प्रक्रिया के तहत होती है। रस संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भरतमुनि ने अपने ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' में रस की उत्पत्ति का एक प्रसिद्ध सूत्र दिया है:
"विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः।"
अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के मिलने से ही रस की उत्पत्ति होती है। रस के मुख्य रूप से चार अंग होते हैं। रस के मुख्य रूप से चार अंग माने गए हैं। आइए इन्हें आसान भाषा में समझते हैं-
स्थायी भाव: जो भाव हमारे मन में हमेशा जन्म से ही सोई हुई अवस्था में रहते हैं और उचित समय या परिस्थिति आने पर जागृत हो जाते हैं, वे स्थायी भाव कहलाते हैं।
रस और उनके स्थायी भाव निम्नलिखित हैं :
1. शृंगार रस – रति या प्रेम,
2. हास्य रस – हास या हँसी,
3. करुण रस – शोक या दुःख,
4. रौद्र रस – क्रोध,
5. वीर रस – उत्साह,
6. भयानक रस – भय या डर,
7. वीभत्स रस – जुगुप्सा या घृणा,
8. अद्भुत रस – विस्मय या आश्चर्य,
9. शांत रस – निर्वेद, वैराग्य या शांति,
10. वात्सल्य रस – वत्सल रति या संतान-प्रेम,
11. भक्ति रस – भगवद् विषयक रति या ईश्वर के प्रति प्रेम।
विशेष - भरतमुनि ने मूल रूप से 8 रस माने थे, बाद में शांत रस को 9वाँ रस माना गया। वात्सल्य और भक्ति रस को मिलाकर अब कुल 11 रस माने जातेहैं।
1. उदभट्ट और आचार्य अभिनवगुप्त जैसे विद्वानों ने शांत रस को नौवें रस के रूप में स्थापित किया। यहीं से भारतीय साहित्य में नवरस की अवधारणा लोकप्रिय हुई।
2. काव्यशास्त्र में वात्सल्य को 10वें रस के रूप में स्वतंत्र रूप से स्थापित करने का श्रेय आचार्य विश्वनाथ को जाता है।
3. भक्ति को 11वें रस के रूप में शास्त्रीय मान्यता दिलाने का मुख्य श्रेय आचार्य रूप गोस्वामी और आचार्य मधुसूदन सरस्वती को जाता है।
विभाव: जिन बाहरी कारणों या वस्तुओं को देखकर हमारे मन में सोए हुए स्थायी भाव जागृत होते हैं, उन्हें विभाव कहते हैं।
अनुभाव: मन के भाव जागृत होने के बाद हमारे शरीर में जो प्रतिक्रियाएं होती हैं (जैसे कांपना, पसीना आना, या हंसना), उन्हें अनुभाव कहते हैं।
संचारी भाव: जो भाव पानी के बुलबुलों की तरह मन में पल भर के लिए उठते और मिटते रहते हैं, वे संचारी भाव कहलाते हैं। इनकी संख्या 33 मानी गई है।
दैनिक जीवन का एक सरल उदाहरण से समझे -
मान लीजिए आप एक अंधेरे कमरे में जाते हैं और अचानक वहां एक सांप देख लेते हैं।
सांप को देखकर आपके मन में जो डर हमेशा से छिपा था, वह जाग गया। यह डर आपका स्थायी भाव है।
डर किसके कारण जगा? सांप के कारण। तो सांप विभाव है।
सांप को देखकर आप डर के मारे कांपने लगे या जोर से चिल्लाए। कांपना और चिल्लाना आपका अनुभाव है।
उसी समय आपके मन में कई छोटे-छोटे विचार आए, जैसे - भाग जाऊं, किसी को बुलाऊं, या कहीं यह काट न ले। पल भर के लिए आने-जाने वाले ये विचार संचारी भाव हैं।
3. रस परिचय :
1. शृंगार रस
परिभाषा: काव्य में जब नायक और नायिका के मन में प्रेम का भाव उत्पन्न होता है, तब वहां शृंगार रस होता है। शृंगार रस को रसराज अर्थात रसों का राजा भी कहा जाता है।
उदाहरण:
बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय। सौंह करै भौंहनि हँसै, दैन कहै नटि जाय।
(अर्थ: राधा ने कृष्ण से बातें करने के लालच में उनकी बांसुरी छिपा दी है और वे हंसी-मजाक कर रही हैं।)
राम को रूप निहारति जानकी, कंकन के नग की परछाहीं।
(अर्थ: सीता जी अपनी चूड़ी के नग में राम का प्रतिबिंब देखकर मुग्ध हो रही हैं।)
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।
(अर्थ: राम वन के पशु-पक्षियों से सीता जी के बारे में व्याकुल होकर पूछ रहे हैं।)
दूलह श्रीरघुनाथ बने, दुलही सिय सुंदर मंदिर माहीं।
(अर्थ: श्रीराम चंद्र जी दूल्हा बने हुए हैं और सीता जी एक सुंदर दुल्हन के रूप में सुशोभित हैं।)
अति मलीन वृषभानु कुमारी। अधमुख रहति उरध नहिं चितवति।
(अर्थ: कृष्ण के वियोग में राधा जी अत्यंत उदास और मलिन हो गई हैं।)
2. हास्य रस
परिभाषा: किसी व्यक्ति की अजीब वेशभूषा, अनोखी वाणी या चेष्टा को देखकर मन में जो हंसी (हास) का भाव उत्पन्न होता है, उसे हास्य रस कहते हैं।
उदाहरण:
तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप, साज मिले पंद्रह मिनट, घंटा भर आलाप।
(अर्थ: एक खराब गायक का मंच पर हास्यास्पद प्रदर्शन दिखाया गया है।)
सीस पर गंगा हँसै, भुजनि भुजंगा हँसैं। हास ही को दंगा भयो, नंगा के विवाह में।
(अर्थ: शिव जी के सिर पर गंगा और गले में सांप हंस रहे हैं, यह शिव विवाह का हास्य वर्णन है।)
हाथी जैसी देह है, गैंडे जैसी चाल। तरबूजे सी खोपड़ी, खरबूजे से गाल।
(अर्थ: किसी व्यक्ति के अजीबोगरीब शरीर का मजाकिया वर्णन किया गया है।)
हंसी-हंसी भाजैं देखि दूलह दिगम्बर को, पाहुनी जे आवैं हिमाचल के उछाह में।
(अर्थ: शिव जी के अनोखे दूल्हे वाले रूप को देखकर विवाह में आए लोग हंस-हंस कर भाग रहे हैं।)
मैं ऐसा शूरवीर हूँ, पापड़ तोड़ सकता हूँ। अगर गुस्सा आ जाए, तो कागज मरोड़ सकता हूँ।
(अर्थ: एक कायर व्यक्ति अपनी वीरता का बेहद हास्यास्पद वर्णन कर रहा है।)
3. करुण रस
परिभाषा: किसी प्रिय वस्तु, व्यक्ति या साथी के हमेशा के लिए दूर चले जाने या नष्ट हो जाने पर मन में जो शोक या दुःख उत्पन्न होता है, उसेकरुण रस कहते हैं।
उदाहरण:
सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी।
(अर्थ: राजा दशरथ की मृत्यु पर रानियां उनके गुणों को याद करके विलाप कर रही हैं।)
अभी तो मुकुट बंधा था माथ, हुए कल ही हल्दी के हाथ।
(अर्थ: एक नवविवाहिता का पति मृत्यु को प्राप्त हो गया है, जिससे उसका पूरा संसार उजड़ गया है।)
मणि खोये भुजंग सी जननी, फन सा पटक रही थी शीश।
(अर्थ: श्रवण कुमार की मृत्यु पर उनकी अंधी माता सांप की तरह तड़प-तड़प कर अपना सिर पटक रही हैं।)
दुख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही।
(अर्थ: कवि निराला जी अपने जीवन के अपार दुखों और पीड़ा को व्यक्त कर रहे हैं।)
विस्तृत नभ का कोई कोना, मेरा न कभी अपना होना।
(अर्थ: कवयित्री महादेवी वर्मा जी अपने गहरे अकेलेपन और पीड़ा का करुण चित्रण कर रही हैं।)
4. रौद्र रस
परिभाषा: किसी विरोधी, दुष्ट या शत्रु द्वारा अपना या अपने गुरु का अपमान होने पर मन में जो भयंकर क्रोध का भाव उत्पन्न होता है, वह रौद्र रस कहलाता है।
उदाहरण:
उस काल मारे क्रोध के, तन कांपने उनका लगा। मानो हवा के जोर से, सोता हुआ सागर जगा।
(अर्थ: अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार सुनकर अर्जुन का शरीर भयंकर क्रोध से कांपने लगा।)
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।
(अर्थ: लक्ष्मण जी के कड़वे वचन सुनकर परशुराम जी ने भारी क्रोध में अपना फरसा उठा लिया।)
श्रीकृष्ण के सुन वचन, अर्जुन क्षोभ से जलने लगे। सब शील अपना भूल कर, करतल युगल मलने लगे।
(अर्थ: कुरुक्षेत्र में कृष्ण जी की बातें सुनकर अर्जुन का सारा क्रोध जाग उठा।)
रे नृप बालक कालबस, बोलत तोहि न संभार।
(अर्थ: परशुराम जी क्रोध में लक्ष्मण को चेतावनी दे रहे हैं कि तू काल के वश में होकर बिना विचारे बोल रहा है।)
भाखे लखन कुटिल भईं भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें।
(अर्थ: परशुराम की बातें सुनकर लक्ष्मण जी की भौंहें तिरछी हो गईं और वे क्रोध से कांपने लगे।)
5. वीर रस
परिभाषा: युद्ध करने, किसी कठिन कार्य को पूरा करने या देश की रक्षा के लिए मन में जो उत्साह का भाव उत्पन्न होता है, उसे वीर रस कहते हैं
उदाहरण:
वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो। हाथ में ध्वजा रहे, बाल दल सजा रहे।
(अर्थ: सैनिकों को बिना डरे आगे बढ़ने और देश की रक्षा करने के लिए पूरे उत्साह से प्रेरित किया जा रहा है।)
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी। खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
(अर्थ: झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की असीम वीरता और साहस का गान किया गया है।)
साजि चतुरंग सैन अंग में उमंग धरि। सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत हैं।
(अर्थ: छत्रपति शिवाजी महाराज अपनी विशाल सेना के साथ भारी उत्साह में युद्ध जीतने जा रहे हैं।)
मैं सत्य कहता हूँ सखे, सुकुमार मत जानो मुझे। यमराज से भी युद्ध में, प्रस्तुत सदा मानो मुझे।
(अर्थ: अभिमन्यु अपनी वीरता दिखाते हुए कहते हैं कि वे साक्षात यमराज से भी लड़ने को तैयार हैं।)
चरचेक में घाव असंख लगे, फिर भी रण में वह डटा रहा।
(अर्थ: महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की वीरता बताई गई है कि अनगिनत घाव लगने पर भी वह युद्ध में डटा रहा।)
6. भयानक रस
परिभाषा: किसी भयंकर दृश्य को देखने या भयानक बात को सुनने से मन में जो भय या डर का भाव पैदा होता है, उसे भयानक रस कहते हैं।
उदाहरण:
एक ओर अजगरहि लखि, एक ओर मृगराय। विकल बटोही बीच ही, परयो मूरछा खाय।
(अर्थ: एक राहगीर ने एक तरफ अजगर और दूसरी तरफ शेर देखा, तो डर के मारे वह बेहोश होकर गिर पड़ा।)
हाहाकार हुआ क्रंदनमय, कठिन वज्र होते थे चूर।
(अर्थ: प्रलय के समय का ऐसा भयानक दृश्य था कि कठोर पत्थर भी चूर-चूर हो रहे थे और हर तरफ चीख-पुकार मची थी।)
लंका की ओर से आती भयंकर ज्वालाओं को देख, सभी वानर कांपने लगे।
(अर्थ: रावण की सेना के भयंकर प्रहार और अग्नि बाणों से डरे हुए वानरों के भय का वर्णन है।)
नव ते झपट्टत बाज लखि, भूल्यो सकल प्रपंच।
(अर्थ: आसमान से एक बाज को अपनी तरफ झपटते देखकर पक्षी डर के मारे सब कुछ भूल गया।)
बालधी बिसाल बिकराल ज्वाल जाल मानौ, लंक लीलिबे को काल रसना पसारी है।
(अर्थ: हनुमान जी की पूंछ की भयानक आग ऐसी लग रही है मानो स्वयं काल ने लंका को निगलने के लिए अपनी जीभ निकाली हो।)
7. वीभत्स रस
परिभाषा: घृणित या गंदी वस्तुओं, खून, सड़े हुए मांस आदि को देखकर या उनके बारे में सुनकर मन में जो घृणा उत्पन्न होती है, उसे वीभत्स रस कहते हैं।
उदाहरण:
सिर पर बैठ्यो काग, आँखि दोउ खात निकारत। खींचत जीभहिं स्याल, अतिहि आनंद उर धारत।
(अर्थ: युद्धभूमि में शवों के सिर पर बैठकर कौवे आंखें निकाल रहे हैं और सियार जीभ खींच रहे हैं, जो अत्यंत घृणित दृश्य है।)
रक्त मांस के सड़े पंक से, उठ रही थी भयंकर दुर्गंध।
(अर्थ: सड़े हुए खून और मांस के कीचड़ से उठने वाली बदबू का घिनौना वर्णन किया गया है।)
गिद्ध जांघ को खोदि-खोदि कै मांस उपारत। स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत।
(अर्थ: गिद्ध शवों की जांघों से मांस नोच रहे हैं और कुत्ते उंगलियां काट कर खा रहे हैं।)
अंतड़ियों की पहन माल, पिशाच नाच रहे थे।
(अर्थ: भूत-पिशाच मरे हुए लोगों की अंतड़ियों की माला पहनकर नाच रहे हैं, जिससे अत्यंत घृणा पैदा होती है।)
पीब और मवाद से सना शरीर देख, उबकाई आ गई।
(अर्थ: घावों से भरे और मवाद से सने हुए शरीर को देखकर उल्टी आने जैसा घृणित महसूस हो रहा है।)
8. अद्भुत रस
परिभाषा: किसी अनोखी, आश्चर्यजनक या असाधारण वस्तु को देखकर मन में जो विस्मय (आश्चर्य) का भाव उत्पन्न होता है, वह अद्भुत रस कहलाता है।
उदाहरण:
अखिल भुवन अचर-चर, हरि मुख में लखि मातु। चकित भई गदगद बचन, विकसित दृग पुलकातु।
(अर्थ: बाल कृष्ण के मुँह में पूरा ब्रह्मांड देखकर माता यशोदा आश्चर्य से भर गईं।)
यहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर की आन बिसेषा।
(अर्थ: माता कौशल्या ने राम को एक ही समय पर दो अलग-अलग जगह देखा, जिससे वे भारी आश्चर्य में पड़ गईं।)
आगे नदियां पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार। राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार।
(अर्थ: जब तक महाराणा प्रताप ने विशाल नदी पार करने का सोचा, तब तक उनका घोड़ा पलक झपकते ही नदी पार कर चुका था।)
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।
(अर्थ: ईश्वर के अद्भुत स्वरूप का वर्णन है कि वह बिना पैरों के चलता है, बिना कानों के सुनता है और बिना हाथों के सारे काम करता है।)
अंबर में कुंतल-जाल देख, पद के नीचे पाताल देख।
(अर्थ: भगवान कृष्ण ने जब अपना विराट रूप दिखाया तो उसे देखकर सब चकित रह गए।)
9. शांत रस
परिभाषा: संसार की मोह-माया से विरक्ति होने पर या ईश्वर की प्राप्ति का ज्ञान होने पर मन में जो शांति का भाव आता है, उसे शांत रस कहते हैं।
उदाहरण:
मन रे तन कागद का पुतला। लागै बूंद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना।
(अर्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि यह शरीर कागज के पुतले के समान है जो क्षण भर में नष्ट हो सकता है, इसलिए इस पर घमंड नहीं करना चाहिए।)
माटी कहै कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोय। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोय।
(अर्थ: संसार की नश्वरता का बोध कराया गया है कि मिट्टी अंततः सब कुछ अपने में मिला लेगी।)
राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। अंत काल पछताएगा, जब प्राण जाएंगे छूट।
(अर्थ: मोह-माया छोड़कर ईश्वर का नाम जपने की प्रेरणा दी गई है क्योंकि अंत समय में सिर्फ यही काम आएगा।)
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। सब अंधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माहिं।
(अर्थ: जब तक मन में अहंकार था, तब तक ईश्वर नहीं मिले। ज्ञान का प्रकाश होने पर सारा अहंकार और मोह मिट गया।)
बुढ़िया काल न पहिचानैं। मोह नींद में सोवै मूरख, जग जंजाल न जानैं।
(अर्थ: इंसान अज्ञानता और मोह-माया की नींद में सोया रहता है और जीवन की वास्तविक सच्चाई को नहीं समझता।)
10. वात्सल्य रस
परिभाषा: छोटे बच्चों की प्यारी हरकतों को देखकर माता-पिता या बड़ों के मन में जो स्नेह या प्रेम का भाव उमड़ता है, उसे वात्सल्य रस कहते हैं।
उदाहरण:
जसोदा हरि पालने झुलावै। हलरावै दुलराइ मल्हावै जोइ-सोइ कछु गावै।
(अर्थ: माता यशोदा अपने बाल कृष्ण को प्यार से पालने में झुला रही हैं और मीठी लोरी गा रही हैं।)
किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत। मनिमय कनक नंद कैं आंगन, बिंब पकरिबै धावत।
(अर्थ: बाल कृष्ण घुटनों के बल चलते हुए अपनी ही परछाई को पकड़ने के लिए दौड़ रहे हैं, जो बहुत प्यारा लग रहा है।)
मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो।
(अर्थ: बाल कृष्ण बड़ी मासूमियत से माता यशोदा से कह रहे हैं कि मैंने माखन नहीं खाया है।)
ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां।
(अर्थ: बालक राम जब ठुमक-ठुमक कर चलते हैं, तो उनके पैरों की पायल बजती है, जिसे देखकर माताएं स्नेह से भर जाती हैं।)
धूरि भरे अति सोभित स्याम जू, तैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
(अर्थ: धूल से सने हुए बाल कृष्ण बहुत ही प्यारे लग रहे हैं और उनके सिर पर सुंदर चोटी बंधी है।)