रीतिकाल
साहित्यिक दृष्टि से, काव्य रचना के वे नियम जैसे - रस, छंद, अलंकार ,नायक – नायिका भेद आदि जिनके आधार पर कविता रची जाती है, रीति कहलाती है।रीति का अर्थ है – मार्ग, पद्धति या प्रणाली। रस, अलंकार, गुण, ध्…


रीतिकाल : 1700 - 1900 संवत्
साहित्यिक दृष्टि से, काव्य रचना के वे नियम जैसे - रस, छंद, अलंकार ,नायक – नायिका भेद आदि जिनके आधार पर कविता रची जाती है, रीति कहलाती है।रीति का अर्थ है – मार्ग, पद्धति या प्रणाली। रस, अलंकार, गुण, ध्वनि और नायिका भेद आदि काव्य के अंगों का विवेचन तथा लक्षण बताते हुए रचे गये काव्य की प्रधानता के कारण इसे रीतिकाल कहा गया। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने शृंगार रस की प्रधानता होने के कारण इसे शृंगार काल भी कहा गया।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार – "जिस काल में कवियों ने काव्य के अंगों रस, छंद, अलंकार आदि के लक्षण देते हुए काव्य की रचना की, उसे रीतिकाल कहा।"
यह समय भारतीय इतिहास में सुख और वैभव का काल था। राजदरबारों में कवियों का सम्मान था, जिसके कारण दरबारी संस्कृति का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। साथ ही कुछ कवि ऐसे हुए जो स्वच्छंद होकर रचना कर रहे थे। काव्य की प्रवृत्ति और शैली के आधार पर रीतिकाल की तीन धाराएं स्वीकार की गयीं —
रीतिकाल की धाराएं:
- रीतिबद्ध काव्यधारा
- रीतिसिद्ध काव्यधारा
- रीतिमुक्त काव्यधारा
रीतिबद्ध काव्यधारा:
वे कवि जिन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्र के नियमों या लक्षण-ग्रंथों का कड़ाई से पालन किया। इन्होंने पहले कविता करने के नियम बताये, फिर इसके उदाहरण स्वरूप कविताएं लिखीं।
विशेषताएँ : अलंकार, छंद, रस और नायिका भेद का शास्त्रीय विवेचन।
प्रमुख कवि : केशवदास, मतिराम, चिन्तामणि, देव।
रीतिसिद्ध काव्यधारा:
इन कवियों ने लक्षण ग्रन्थ तो नहीं लिखे, लेकिन काव्यशास्त्र के नियमों की पूरी जानकारी थी। इनकी रचनाओं में वे नियम स्वतः झलकते थे।
विशेषता: गागर में सागर भरना, संक्षिप्तता और गहरी अर्थ व्यंजना।
प्रमुख कवि : बिहारी
इनकी एकमात्र रचना 'बिहारी सतसई' इस धारा का सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है।
रीतिमुक्त काव्यधारा:
ये कवि रीति या नियम के बन्धन को तोड़कर पूरी तरह स्वतंत्र होकर अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करते थे। इनका काव्य 'हृदय की पुकार' था न कि किसी शास्त्र का प्रदर्शन।
विशेषता : प्रेम की पीर, आत्मानुभूति और स्वच्छंदता।
प्रमुख कवि : घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर।
नामकरण:
इस काल में रीति की प्रधानता होने के कारण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसे रीतिकाल कहा। विभिन्न विद्वानों द्वारा दिए गए अन्य नाम इस प्रकार हैं:
मिश्र बंधु: इसे 'अलंकृत काल' कहा।
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र: 'शृंगार काल' कहते हैं।
रमाशंकर शुक्ल 'रसाल': 'कलाकाल'।
काल की अन्य विशेषताएँ:
इस काल की भाषा: ब्रजभाषा रही।
मुख्य रस: शृंगार और वीर रस की प्रधानता।
प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ:
बिहारी: बिहारी सतसई
घनानंद: सुजान हित प्रबंध, कृपाकंद निबंध, इश्कलता, यमुनायश
केशवदास: रामचंद्रिका, कविप्रिया, रसिकप्रिया, रतनबावनी
भूषण: शिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रशाल दशक
मतिराम: ललित ललाम, रसराज, मतिराम सतसई
देव: भाव विलास, अष्टयाम, भवानी विलास, प्रेम तरंग
पद्माकर: जगद्विनोद, पद्माभरण, गंगालहरी, प्रबोध पचासा
बोधा: विरह वारीश, इश्कनामा
आलम: आलमकेलि
ठाकुर: ठाकुर ठसक
दरबारी संस्कृति:
अधिकांश कवि राजाओं के आश्रय में रहते थे, इसलिए काव्य में विलासिता और अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन अधिक मिलते हैं।
निष्कर्ष-
रीतिकाल हिंदी साहित्य का वह दौर है, जहाँ कविता 'लोक' (जनता) से कटकर दरबार (राजाओं) तक सीमित हो गई थी। कला की दृष्टि से यह युग अत्यंत समृद्ध था, परंतु भाव की दृष्टि से इसमें भक्तिकाल जैसी गहराई की कमी थी।
रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियां:
रीति-निरूपण या काव्यांग विवेचन (लक्षण-ग्रंथों का निर्माण):
इस काल के कवि केवल कविता नहीं लिख रहे थे, बल्कि वे खुद को आचार्य साबित करना चाहते थे। वे कविता लिखने के नियमों जैसे- रस, अलंकार, छंद, नायक-नायिका भेद को समझाते हुए ग्रंथ लिखते थे। पहले वे दोहे में नियम बताते थे, फिर उसे समझाने के लिए कविता उदाहरण लिखते थे। इसी को काव्यांग विवेचन कहा जाता है।
अलंकार और काव्यांग आधारित प्रमुख ग्रंथ:
कविप्रिया और रसिकप्रिया (आचार्य केशवदास) – यह रीतिकाल का शुरुआती और सबसे प्रमुख अलंकार व रस ग्रंथ है।
शिवराज भूषण (कवि भूषण) – यह पूरी तरह अलंकारों पर आधारित ग्रंथ है, जिसमें 105 अलंकारों के लक्षण और उदाहरण दिए गए हैं।
ललित ललाम (मतिराम) – अलंकारों का सरल विवेचन करने वाला ग्रंथ।
काव्य रसायन (देव) – काव्यांगों का विस्तृत विवेचन।
शृंगार रस की प्रधानता और नख-शिख वर्णन:
रीतिकाल का मुख्य रस 'शृंगार' (प्रेम और सौंदर्य) है। कवियों का ध्यान नारी के शारीरिक सौंदर्य, उसके हाव-भाव और नायक-नायिका के मिलने पर सबसे ज्यादा था।
उदाहरण (कवि रसलीन):
"अमिय हलाहल मदभरे, सेत, स्याम, रतनार।
जियत, मरत, झुकि-झुकि परत, जेहि चितवत इक बार॥"
अर्थ: यहाँ कवि रसलीन नायिका की सुंदर आँखों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उसकी आँखों में तीन रंग हैं— श्वेत , श्याम और रत्नार । ये तीनों रंग क्रमशः अमृत, जहरऔर शराब से भरे हैं। नायिका जिसे एक बार देख लेती है, वह अमृत के प्रभाव से जीता है, जहर के प्रभाव से मरता है और शराब के नशे में झूमने लगता है।
आश्रयदाताओं की प्रशंसा:
सरल अर्थ: रीतिकाल के कवि स्वतंत्र नहीं थे, वे राजाओं के दरबार में रहते थे। अपनी जीविका चलाने और राजा से हाथी, घोड़े, धन पाने के लिए वे राजाओं की अत्यधिक कई बार झूठी और बढ़ा-चढ़ाकर तारीफ करते थे।
उदाहरण -महाकवि भूषण - राजा छत्रसाल की तलवार की प्रशंसा में :
"निकसत म्यान तें मयूखें प्रलयभानु जैसी, फारे तमतोम से गयंदन के जाल को।"
अर्थ: भूषण कहते हैं कि जब महाराजा छत्रसाल की तलवार म्यान से निकलती है, तो वह प्रलय काल के सूर्य की किरणों की तरह चमकती है और दुश्मनों के हाथियों के समूह को वैसे ही चीर देती है जैसे सूर्य का प्रकाश घने अंधकार को काट देता है।
चमत्कार प्रदर्शन और कला पक्ष की प्रधानता:
इस काल के कवियों का उद्देश्य पाठकों के दिल को छूना नहीं, बल्कि अपनी बुद्धिमानी और भाषा की कारीगरी से राजा को हैरान करना था। वे जानबूझकर कठिन शब्दों, शब्दों के खेल (यमक, श्लेष अलंकार) का प्रयोग करते थे ताकि कविता में 'चमत्कार' पैदा हो।
उदाहरण बिहारीलाल:
"कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय।
उहि खाए बौरात जग, इहि पाए बौराय॥"
अर्थ: यहाँ 'कनक' शब्द का दो बार अलग-अलग अर्थों में प्रयोग करके चमत्कार दिखाया गया है (यमक अलंकार)। एक कनक का अर्थ 'धूतरा' नशीला फल है और दूसरे का अर्थ सोना है। कवि कहते हैं कि सोने में धतूरे से सौ गुना ज्यादा नशा होता है, क्योंकि धतूरे को तो खाने पर इंसान पागल होता है, लेकिन सोने को तो केवल पाने मात्र से ही इंसान घमंड में पागल हो जाता है।
ब्रजभाषा का चरमोत्कर्ष :
रीतिकाल में केवल ब्रजभाषा का राज था। कवियों ने इसमें से कठोर शब्दों को हटाकर इसे इतना कोमल और मधुर बना दिया कि यह संगीत की तरह कानों में घुलने लगी।
प्रचलित उदाहरण (कवि घनानन्द):
"रावरे रूप की रीति अनूप, नयो-नयो लागत ज्यों-ज्यों निहारिये।"
अर्थ: घनानन्द अपनी प्रेमिका सुजान से कहते हैं कि आपके रूप की रीति बहुत अनोखी है। मैं आपको जितनी बार देखता हूँ, आप हर बार मुझे बिल्कुल नई और पहले से ज्यादा सुंदर लगती हैं। ब्रजभाषा की यह तरलता इस काल की विशेषता है।
मुक्तक शैली और दोहा छंद का प्रयोग:
दरबार में राजाओं के पास लंबी कहानियां (महाकाव्य) सुनने का समय नहीं था। इसलिए कवियों ने 'मुक्तक शैली' चुनी, जहाँ हर दोहा या सवैया अपने आप में स्वतंत्र और पूरा अर्थ रखने वाला होता था। कम से कम शब्दों में पूरी बात कह देना इस काल की कला थी।
प्रचलित उदाहरण (बिहारीलाल):
"बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सोह करै, भौंहनु हँसे, दैन कहै नटि जाय॥"
अर्थ: राधा जी कृष्ण से बात करने के लालच में उनकी बांसुरी छुपा देती हैं। जब कृष्ण बांसुरी मांगते हैं, तो राधा जी कसम खाकर मना करती हैं कि उनके पास नहीं है, लेकिन आँखों ही आँखों में मुस्कुरा देती हैं। जब कृष्ण देने को कहते हैं, तो वे साफ मना कर देती हैं।
निष्कर्ष :
"निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि रीतिकाल की कविता लोकमंगल' या समाज कल्याण की कविता न होकर लोकरंजन मनोरंजन और विलास की कविता थी। जहाँ भक्तिकाल में कविता आत्मा की आवाज थी, वहीं रीतिकाल में आकर वह राजदरबारों की दासी बन गई। इसके बावजूद, कलात्मक दृष्टि से यह युग हिंदी साहित्य का स्वर्णकाल माना जा सकता है। कवियों ने ब्रजभाषा को जिस मिठास और ऊँचाई पर पहुँचाया, वह अद्वितीय है। रसलीन का 'श्वेत-श्याम-रत्नार' वाला दोहा और बिहारी के गागर में सागर भरते मुक्तक इस बात के गवाह हैं कि रीतिकाल के कवियों के पास भले ही व्यापक सामाजिक सोच न रही हो, लेकिन शब्दों से सौंदर्य की सृष्टि करने की जो चमत्कारी कला उनके पास थी, उसने हिंदी काव्य-जगत को हमेशा के लिए समृद्ध कर दिया I