वन – पथ पर
'वन - पथ पर' महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित उनके सुप्रसिद्ध ग्रन्थ कवितावली के अयोध्याकांड से उद्धृत है। इसमें कवि ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र, माता सीता और लक्ष्मण जी के वन गमन का अत…


'वन - पथ पर' महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित उनके सुप्रसिद्ध ग्रन्थ कवितावली के अयोध्याकांड से उद्धृत है। इसमें कवि ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र, माता सीता और लक्ष्मण जी के वन गमन का अत्यंत मर्मस्पर्शी चित्रण किया है। जब ये तीनों राजसी सुखों का परित्याग कर तप्त और कँटीले वन मार्ग पर पैदल आगे बढ़ते हैं, तब मार्ग में आने वाले कष्टों, उनकी सुकुमारता तथा उनके प्रति ग्रामीण नारियों की अगाध सहानुभूति और कौतूहल को इस काव्य का विषय बनाया गया है।
इस सुंदर रचना के माध्यम से कवि तुलसीदास जी समाज को अनेक गहरे संदेश देना चाहते हैं। वे सबसे पहले दांपत्य प्रेम और पारिवारिक निष्ठा की पराकाष्ठा को दिखाना चाहते हैं, जहाँ माता सीता और लक्ष्मण अपने सुखों को भूलकर केवल कर्तव्य और प्रेम के वश में होकर श्री राम के साथ चल पड़ते हैं।

सवैया 1: वन मार्ग में सीता जी की सुकुमारता
पंक्ति 1:
पुरतें निकसी रघुबीर-बधू, धरि धीर दए मग में डग द्वै।
शब्दार्थ:
पुरतें = नगर से या अयोध्यापुरी से,
निकसी = निकलीं
रघुबीर-बधू = श्री रामचंद्र जी की पत्नी
धरि = धारण करके
धीर = धैर्य
दए = रखे, बढ़ाए
मग में = मार्ग में
डग = कदम
द्वै = दो
व्याख्या:
महाकवि तुलसीदास जी कहते हैं कि महलों के वैभव में पली-बढ़ी सुकुमारी सीता जी जैसे ही अयोध्यापुरी से बाहर वन मार्ग पर निकलीं, उन्होंने अपने मन में बहुत धीरज धारण किया। उन्होंने अभी मार्ग में केवल दो ही कदम बढ़ाए थे अर्थात् वह थोड़ी ही दूर चली थीं।
पंक्ति 2:
झलकीं भरि भाल कनीं जलकी, पुट सूखि गए मधुराधर वै।
शब्दार्थ:
झलकीं = दिखाई दीं, चमक उठीं
भरि भाल = पूरे माथे पर
कनीं = कण, बूँदें
जल की = पानी की, यहाँ तात्पर्य पसीने की बूँदों से है
पुट = संपुट, होंठों के दोनों भाग
सूखि गए = सूख गए
मधुराधर =मधुर और कोमल होंठ
व्याख्या:
थोड़ी ही दूर चलने के बाद सीता जी अत्यधिक थक गईं। उनके माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं, जिससे उनकी सुकुमारता और अधिक स्पष्ट हो जाती है। इसके साथ ही, तीखी धूप और पैदल चलने के परिश्रम के कारण उनके कोमल और मधुर होंठ प्यास के कारण सूख गए।
पंक्ति 3:
फिरि बूझति हैं, चलनो अब केतिक, पर्नकुटी करिहौं कित ह्वै?
शब्दार्थ:
फिरि = दोबारा, फिर से
बूझति हैं = पूछती हैं
चलनो = चलना है
केतिक = कितनी दूर
पर्नकुटी = पत्तों की कुटिया
करिहौं = बनाएंगे
कित ह्वै = कहाँ पर
व्याख्या:
शारीरिक रूप से अत्यधिक थक जाने के बाद भी सीता जी अपने पति श्री राम के सम्मुख अपनी थकान को सीधे प्रकट नहीं करतीं। वह अत्यंत व्याकुल होकर अत्यंत कोमलता से अपने प्रियतम से पूछती हैं कि हे स्वामी, अभी हमें और कितनी दूर चलना है? और आप हमारे रहने के लिए पत्तों की कुटिया किस स्थान पर बनाएंगे?
पंक्ति 4:
तियकी लखि आतुरता पियकी, अँखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै।
शब्दार्थ:
तिय की = पत्नी की
लखि = देखकर
आतुरता = व्याकुलता, अधीरता
पिय की = प्रियतम की
अँखियाँ = आँखें
अति चारु = अत्यंत सुंदर
चलीं जल च्वै = जल टपकने लगा अर्थात आँसू बहने लगे
व्याख्या:
अपनी प्राणप्रिय पत्नी सीता जी की इस प्रकार की शारीरिक शिथिलता और मानसिक व्याकुलता को देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी का हृदय द्रवित हो उठा। वे समझ गए कि जो सीता कभी महलों से बाहर नहीं निकलीं, वे आज उनके कारण इस तप्त मार्ग पर इतनी विकल हो रही हैं। अपनी अर्धांगिनी के इस कष्ट को देखकर श्री राम की आँखों से प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लगी।

सवैया 2: श्री राम का सीता जी के प्रति प्रेम
द्वितीय सवैया
पंक्ति 1:
जल को गए लक्खनु हैं लरिका, परिखौ पिय ! छाँह घरीक ह्वै ठाढ़े।
शब्दार्थ:
जल को = पानी लेने के लिए
गए = गए हैं
लक्खनु= लक्ष्मण जी
लरिका = लड़का
परिखौ = प्रतीक्षा कर लीजिए
पिय = प्रियतम
छाँह = छाया में
घरीक = एक घड़ी, थोड़ी देर
ह्वै ठाढ़े = खड़े होकर
व्याख्या:
सीता जी अत्यधिक थक चुकी हैं, किंतु वे सीधे अपनी थकान न कहकर चतुरतापूर्वक श्री राम से विश्राम करने का आग्रह करती हैं। वे कहती हैं कि हे स्वामी! लक्ष्मण जी बालक हैं और वे हमारे लिए जल लेने गए हैं। जब तक वे लौटकर नहीं आते, तब तक आप किसी वृक्ष की शीतल छाया में थोड़ी देर खड़े होकर उनकी प्रतीक्षा कर लीजिए।
पंक्ति 2:
पोंछि पसेउ बयारि करौं , अरु पाय पखारिहौं भूभुरि-डाढ़े।
शब्दार्थ:
पोंछि = पोंछकर
पसेउ = पसीना
बयारि = हवा
करौं = कर देती हूँ
अरु = और
पाय = पैर
पखारिहौं = धो देती हूँ
भूभुरि-डाढ़े = गर्म रेत, धूल से जले हुए
व्याख्या:
सीता जी कहती हैं कि जितनी देर हम यहाँ छाया में रुकेंगे, उतनी देर में मैं आपका पसीना पोंछकर आपको अपने अंचल से हवा कर देती हूँ, जिससे आपकी थकान दूर हो जाए। इसके साथ ही, मार्ग की अत्यधिक गर्म धूल और रेत से झुलस गए आपके सुंदर चरणों को जल से धोकर शीतल कर देती हूँ।
पंक्ति 3:
तुलसी रघुबीर प्रिया स्रम जानि कै, बैठि बिलंब लौं कंटक काढ़े।
शब्दार्थ:
रघुबीर = श्री रामचंद्र जी
प्रिया = प्रियतमा
स्रम = श्रम, थकान
जानि कै = जानकर
बैठि = बैठकर
बिलंब लौं = देर तक, बहुत समय तक
कंटक = काँटे
काढ़े = निकाले
व्याख्या:
महाकवि तुलसीदास जी कहते हैं कि अंतर्यामी श्री राम ने अपनी प्रियतमा सीता जी के मन की बात को भली-भाँति समझ लिया। वे जान गए कि सीता स्वयं बहुत थक चुकी हैं और विश्राम करना चाहती हैं। अतः अपनी पत्नी को विश्राम देने के उद्देश्य से श्री राम वहाँ बैठ गए और बहुत देर तक जानकी जी के पैरों में चुभे हुए काँटों को निकालने का उपक्रम करने लगे, ताकि सीता जी को अधिक समय तक विश्राम मिल सके।
पंक्ति 4:
जानकीं नाहको नेहु लख्यो, पुलको तनु, बारि बिलोचन बाढ़े।
शब्दार्थ:
जानकी = जनकपुत्री सीता जी
नाह को = नाथ का,पति का
नेहु = स्नेह, प्रेम
लख्यो = देखा
पुलको = पुलकित हो गया, रोमांचित हो गया
तनु = शरीर
बारि = जल, आँसू
बिलोचन = नेत्र
बाढ़े = बढ़ गए, उमड़ आए
व्याख्या:
जब सीता जी ने अपने पति श्री रामचंद्र जी के इस अगाध प्रेम और दयालुता को देखा कि वे स्वयं कष्ट सहकर भी उनके काँटे निकाल रहे हैं, तब उनका मन भावविभोर हो उठा। अपने स्वामी के इस अनन्य अनुराग को देखकर सीता जी का पूरा शरीर रोमांच से भर गया और उनके सुंदर नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल उमड़ आया। यह दांपत्य प्रेम की पराकाष्ठा है जहाँ बिना कहे ही एक-दूसरे के प्रति समर्पण भाव प्रकट होता है।

सवैया 3: ग्रामवधुओं की कैकेयी और राजा दशरथ पर टिप्पणी
तृतीय सवैया
पंक्ति 1:
रानी मैं जानी अजानी महा, पबि पाहनहूँ ते कठोर हियो है।
शब्दार्थ:
रानी = रानी, यहाँ अर्थ कैकेयी से है
मैं जानी = मैंने जान लिया है, समझ लिया है
अजानी = अज्ञानी, मूर्ख
महा = बहुत बड़ी
पबि = वज्र
पाहनहूँ ते= पत्थर से भी अधिक
कठोर = कड़ा, निष्ठुर
हियो है = हृदय है
व्याख्या:
श्री राम, सीता और लक्ष्मण जब वन के मार्ग से गुजर रहे हैं, तो ग्रामीण स्त्रियाँ आपस में विलाप और चर्चा कर रही हैं। एक ग्रामीण स्त्री दूसरी से कहती है कि हे सखी! अब मैंने भली-भाँति समझ लिया है कि रानी कैकेयी महा अज्ञानी और विवेकहीन है। उसका हृदय वज्र और पत्थर से भी अधिक कठोर है, जिसने इन सुकुमार राजकुमारों को ऐसा घोर कष्ट दिया है।
पंक्ति 2:
राजहुँ काजु अकाजु न जान्यो, कह्यो तियको जेहिं कान कियो है।
शब्दार्थ:
राजहूँ = राजा ने भी, यहाँ अर्थ राजा दशरथ से है
काजु अकाजु= उचित और अनुचित, कार्य और अकार्य
न जान्यो = नहीं समझा
कह्यो = कहने पर
तिय को = स्त्री के, कैकेयी के
जेहिं = जिन्होंने
कान कियो है = कहना मान लिया है
व्याख्या:
वह ग्रामीण स्त्री राजा दशरथ के प्रति भी अपना क्षोभ प्रकट करते हुए कहती है कि केवल रानी ही नहीं, बल्कि राजा दशरथ ने भी अपने भले-बुरे, उचित-अनुचित का विचार नहीं किया। उन्होंने केवल अपनी स्त्री के कहने पर और उसके वचनों के जाल में आकर इन देवतुल्य बच्चों को वन भेज दिया। राजा को प्रजा और पुत्र के हित का ध्यान रखना चाहिए था, पर उन्होंने विवेक खो दिया।
पंक्ति 3:
ऐसी मनोहर मूरति ए, बिछुरे कैसे प्रीतम लोगु जियो हैं।
शब्दार्थ:
ऐसी = इस प्रकार की
मनोहर = मन को हरने वाली, अत्यंत सुंदर
मूरति = मूर्तियाँ, स्वरूप
ए= ये सब
बिछुरे = अलग होने पर
कैसे = किस प्रकार
प्रीतम लोगु = इनसे प्रेम करने वाले लोग, अयोध्यावासी
जियों हैं = जीवित रहे होंगे, जी रहे हैं
व्याख्या:
ग्रामीण स्त्रियाँ भावुक होकर कहती हैं कि ये तीनों (राम, लक्ष्मण, सीता) इतनी सुंदर और मन को मोह लेने वाली आकृतियों वाले हैं कि इन्हें देखकर ही आँखों को तृप्ति मिलती है। इनसे अलग होकर इनके माता-पिता और इनसे अगाध प्रेम करने वाले अयोध्या के लोग भला किस प्रकार जीवित होंगे? इनका वियोग तो किसी के लिए भी सहना असंभव है।
पंक्ति 4:
आँखिन में, सखि ! राखिबे जोगु , इन्हैं किमि कै बनबासु दियो है ?
शब्दार्थ:
आँखिन में = आँखों में
सखि = हे सखी
राखिबे जोग = रखने के योग्य
इन्हें = इनको
किमि के = किस प्रकार, क्यों
बनबास = वनवास
दियो है = दिया है
व्याख्या:
ग्रामीण स्त्री अपनी सखी से करुण स्वर में कहती है कि हे सखी! ये तीनों तो सदैव आँखों में बसा कर रखने के योग्य हैं, इन्हें महलों के सुख मिलने चाहिए थे। न जाने किस निष्ठुर ने और क्यों इन्हें इस प्रकार का कठिन वनवास दे दिया है?

सवैया 4: ग्रामवधुओं का श्री राम के बारे में पूछना
चतुर्थ सवैया
पंक्ति 1:
सीस जटा, उर-बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछी-सी भौंहें।
शब्दार्थ:
सीस = सिर पर
जटा = जटाएँ हैं
उर = हृदय, वक्षस्थल
बाहु = भुजाएँ
बिसाल = विशाल, बड़ी-बड़ी
बिलोचन = नेत्र
लाल = लालिमा युक्त
तिरीछी सी = थोड़ी टेढ़ी
व्याख्या:
मार्ग में ग्रामीण स्त्रियाँ सीता जी से मर्यादापूर्वक श्री राम के रूप का वर्णन करते हुए कहती हैं कि हे सखी! जिनके सिर पर सुंदर जटाएँ बँधी हुई हैं, जिनका वक्षस्थल और भुजाएँ अत्यंत विशाल हैं, जिनके नेत्र लालिमा लिए हुए मनोहर हैं और जिनकी भौंहें सुंदर रूप से थोड़ी तिरछी हैं; उनका स्वरूप अत्यंत आकर्षक है।
पंक्ति 2:
तून सरासन-बान धरें, तुलसी बन-मारग में सुठि सोहै।
शब्दार्थ:
तून = तरकस, बाण रखने का साधन
सरासन = धनुष
बान = बाण
धरे = धारण किए हुए हैं
बन-मारग में = वन के रास्ते में
सुठि = अत्यंत, बहुत अधिक
सोहै = सुशोभित हो रहे हैं
व्याख्या:
वे स्त्रियाँ कहती हैं कि जो अपनी पीठ पर तरकस और हाथों में धनुष-बाण धारण किए हुए हैं, वे वन के इस उबड़-खाबड़ और कठिन मार्ग में चलते हुए भी अत्यंत सुंदर और लग रहे हैं। उनकी चाल और तेज को देखकर ऐसा लगता है जैसे वे इस मार्ग के कष्टों से सर्वथा अप्रभावित हैं।
पंक्ति 3:
सादर बारहिं बार सुभायँ चितै, तुम त्यों हमरो मन मोहैं।
शब्दार्थ:
सादर = आदर के साथ, सम्मान पूर्वक
बारहिं बार = बार-बार
सुभायँ = स्वाभाविक रूप से, प्रेम के वशीभूत होकर
चितै = देखते हैं
तुम त्यों = तुम्हारी तरफ
हमरो = हमारा भी
मन = मन
मोहैं = मोहित कर रहे हैं
व्याख्या:
स्त्रियाँ सीता जी से कहती हैं कि ये सुंदर श्यामवर्ण पुरुष जो आदर और स्वाभाविक प्रेम के साथ बार-बार तुम्हारी ओर देखते हैं, उनके उस सुंदर ढंग से देखने के कारण हमारा मन भी पूरी तरह उन पर मोहित हो गया है। वे केवल तुम्हें ही नहीं देख रहे, बल्कि अपने सौंदर्य से हम सभी को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं।
पंक्ति 4:
पूँछति ग्रामबधू सिय सों, कहौ, सांँवरे-से सखि ! रावरे को हैं ?
शब्दार्थ:
पूँछति = पूछती हैं
ग्रामबधू = गाँव की स्त्रियाँ, वधुएँ
सिय सों = सीता जी से
कहौ = कहो, बताओ
सांँवरे-से = सांवले रंग के जो हैं
सखि = हे सखी
रावरे = आपके
को हैं = कौन लगते हैं
व्याख्या:
गाँव की वे चतुर स्त्रियाँ सीता जी से प्रश्न पूछती हैं कि हे सखी! यह जो सांवले सलोने रंग के सुंदर युवक हैं, वे रिश्ते में आपके क्या लगते हैं? कृपा करके हमें इनका और आपका संबंध बताइए।

सवैया 5: सीता जी का चतुर उत्तर
पंचम सवैया
पंक्ति 1:
सुनि सुंदर बैन सुधारस-साने, सयानी हैं जानकी जानी भली।
शब्दार्थ:
सुनि = सुनकर
सुंदर = प्यारे, मनोहर
बैन = वचन, वाणी
सुधारस = अमृत रूपी रस में
साने = सने हुए, डूबे हुए
सयानी हैं = अत्यंत चतुर हैं
जानकी = सीता जी
जानी भली = अच्छी तरह से जान गईं
व्याख्या:
तुलसीदास जी कहते हैं कि ग्रामीण स्त्रियों के अमृत के समान मधुर और रसभरे वचनों को सुनकर चतुर शिरोमणि जानकी जी तुरंत समझ गईं कि ये स्त्रियाँ अत्यंत चालाक हैं और परिहास के माध्यम से मुझसे मेरे पति का नाम और रिश्ता पूछना चाहती हैं।
पंक्ति 2:
तिरछे करि नैन, दै सैन, तिन्हैं समुझाई कछू मुसकाइ चली।
शब्दार्थ:
तिरछे करि = तिरछे करके
नैन = नेत्र, आँखें
दै सैन = इशारा देकर, संकेत करके
तिन्हैं = उनको, ग्रामीण स्त्रियों को
समुझाई = समझा दिया
कछू = कुछ
मुसकाइ = मुस्कुराकर
चली = आगे बढ़ गईं
व्याख्या:
भारतीय नारी की लज्जा और मर्यादा का परिचय देते हुए सीता जी ने मुख से कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपने नेत्रों को थोड़ा तिरछा किया और इशारे से ही उन स्त्रियों को सब कुछ समझा दिया कि वे सांवले युवक उनके पति हैं। इसके बाद वे अत्यंत मंद और मधुर मुस्कान बिखेरती हुई आगे की ओर बढ़ गईं।
पंक्ति 3:
तुलसी तेहि औसर सोहैं सबै अवलोकति लोचनलाहु अलीं।
शब्दार्थ:
तेहि औसर = उस अवसर पर, उस समय
सोहैं = सुशोभित हो रहे थे
सबै = सभी
अवलोकति = देखती हुई
लोचन-लाहु = आँखों का लाभ, दर्शन का सुख
अलीं = सखियाँ, ग्रामीण स्त्रियाँ
व्याख्या:
तुलसीदास जी कहते हैं कि उस अनूठे और गरिमापूर्ण क्षण में वहाँ खड़ी वे सभी ग्रामीण स्त्रियाँ श्री राम के अद्भुत सौंदर्य को एकटक निहारती हुई अपने जीवन और नेत्रों का परम लाभ प्राप्त कर रही थीं। सीता जी का वह लज्जापूर्ण संकेत और राम जी का स्वरूप, दोनों मिलकर उस पूरे वातावरण को अलौकिक बना रहे थे।
पंक्ति 4:
अनुराग-तड़ाग में भानु उदैं बिगसीं मनो मंजुल कंजकलीं।
शब्दार्थ:
अनुराग-तड़ाग = प्रेम रूपी सरोवर में
भानु = सूर्य, यहाँ अर्थ राम रूपी सूर्य से है
उदै = उदित होने पर
बिगसीं = खिल उठीं
मंजुल = सुंदर
कंजकली = कमल की कलियाँ
व्याख्या:
उस समय का दृश्य ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रेम के किसी विशाल सरोवर में श्री राम रूपी सूर्य का उदय हो गया हो, और उस सूर्य की किरणों के स्पर्श से ग्रामीण स्त्रियों के नेत्र रूपी कमल की कलियाँ पूर्ण रूप से खिल उठी हों। कवि का तात्पर्य यह है कि राम जी के दर्शन पाकर उन स्त्रियों के हृदय में छुपा प्रेम जागृत हो उठा और उनकी आँखें आनंद से प्रफुल्लित हो गईं।
काव्य-सौंदर्य एवं भाषिक विशेषताएँ:
रस: संपूर्ण पाठ में श्रृंगार रस तथा करुण रस दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण है।
छंद: सवैया छंद का सर्वश्रेष्ठ प्रयोग है, जो गेयता और संगीतात्मकता से परिपूर्ण है।
अलंकार विन्यास:
रूपक अलंकार: अनुराग-तड़ाग-प्रेम रूपी सरोवर और भानु उदै -राम रूपी सूर्य I
उत्प्रेक्षा अलंकार: मानो मंजुल कंज-कली में मानो शब्द के प्रयोग से।
अनुप्रास अलंकार: लोचन-लाहु ,सयान हैं जानकी जानी भली, कंज-कली आदि में वर्णों की सुंदर आवृत्ति है।
शैली: मुक्तक काव्य शैली के अंतर्गत तुलसीदास जी की चित्रात्मक और संवादात्मक शैली दर्शनीय है।