वर्षा सुंदरी के प्रति
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के पद्य खंड में संकलित कविता वर्षा सुंदरी के प्रति से ली गई हैं। इसकी रचयिता छायावाद की प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा हैं। इन पंक्तियों में कवयित्री ने वर्…


प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक के पद्य खंड में संकलित कविता वर्षा सुंदरी के प्रति से ली गई हैं। इसकी रचयिता छायावाद की प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा हैं। इन पंक्तियों में कवयित्री ने वर्षा ऋतु का मानवीकरण करते हुए उसे एक अत्यंत सुंदर और आकर्षक स्त्री के रूप में चित्रित किया है। कवयित्री वर्षा सुंदरी के सौंदर्य का वर्णन करते हुए उससे इस दुखी और प्यासे संसार को शीतलता प्रदान करने का आग्रह कर रही हैं।

वर्षा सुंदरी का मनमोहक रूप:
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
श्यामल श्यामल कोमल कोमल,
लहराता सुरभित केश-पाश!
शब्दार्थ-
रूपसि ~ हे सुंदर स्त्री
घन-केश-पाश ~ बादलों रूपी बालों का समूह
श्यामल ~ साँवले या काले
सुरभित ~ सुगंधित
व्याख्या-
कवयित्री वर्षा ऋतु को एक सुंदर स्त्री मानते हुए कहती हैं कि हे रूपवती वर्षा सुंदरी, आसमान में छाए हुए ये काले बादल तुम्हारे सुंदर और घने बाल हैं। तुम्हारे ये काले, कोमल और सुगंध से भरे हुए बाल हवा में बहुत ही सुंदरता से लहरा रहे हैं।
नभ गंगा की रजतधार में,
धो आई क्या इन्हें रात ?
कंपित हैं तेरे सजल अंग,
शब्दार्थ-
नभ गंगा ~ आकाशगंगा
रजतधार ~ चाँदी जैसी सफेद पानी की धारा
कंपित ~ काँपते हुए
सजल ~ जल से भरे हुए या भीगे हुए
व्याख्या-
तुम्हारे इन स्वच्छ और सुंदर बालों को देखकर ऐसा लगता है जैसे तुम रात के समय इन्हें आकाशगंगा की चाँदी जैसी सफेद और पवित्र जलधारा में धोकर आई हो। स्नान करने के कारण तुम्हारे जल से भीगे हुए अंग हल्की ठंड से काँप रहे हैं।
सिहरा सा तन हे सद्यस्नात!
भीगी अलकों के छोरों से
शब्दार्थ-
सिहरा सा ~ ठंड से काँपता हुआ
सद्यस्नात ~ जिसने अभी-अभी स्नान किया हो
अलकों ~ बालों की लटों
व्याख्या-
हे अभी-अभी स्नान करके आई हुई वर्षा सुंदरी, पानी से भीगने के कारण तुम्हारा शरीर ठंड से काँप रहा है। तुम्हारे भीगे हुए बालों के किनारों से पानी की बूँदें लगातार नीचे टपक रही हैं।
चूती बूँदे कर विविध लास!
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
शब्दार्थ-
चूती ~ टपकती
विविध लास ~ तरह-तरह के नृत्य या हाव-भाव
व्याख्या-
तुम्हारे बालों से टपकती हुई ये पानी की बूँदें ऐसा दृश्य बना रही हैं मानो वे खुशी से तरह-तरह के सुंदर नृत्य कर रही हों। हे सुंदर वर्षा रानी, तुम्हारे बादलों रूपी घने बाल बहुत ही मनमोहक लग रहे हैं।

वर्षा सुंदरी के वस्त्र और आभूषण:
सौरभ भीना झीना गीला
लिपटा मृदु अंजन सा दुकूल;
शब्दार्थ-
सौरभ भीना ~ सुगंध से भरा हुआ
झीना ~ बहुत पतला या पारदर्शी
मृदु ~ कोमल
अंजन सा ~ काजल के समान काला
दुकूल ~ रेशमी वस्त्र
व्याख्या-
वर्षा के समय आकाश में छाए काले बादलों को देखकर ऐसा लगता है जैसे तुमने अपने शरीर पर काजल के समान काला, सुगंधित, बहुत ही पतला और भीगा हुआ कोमल रेशमी वस्त्र लपेटा हुआ है।
चल अंचल में झर-झर झरते
पथ में जुगनू के स्वर्ण फूल;
शब्दार्थ-
चल अंचल ~ उड़ता हुआ आँचल या पल्लू
स्वर्ण फूल ~ सोने के फूल
व्याख्या-
जब तुम चलती हो तो तुम्हारे उड़ते हुए आँचल से रास्ते में जुगनू इस प्रकार चमकते हुए गिरते हैं, मानो तुम्हारे आँचल से सोने के सुंदर फूल झर-झर करके नीचे झड़ रहे हों।
दीपक से देता बार-बार
तेरा उज्ज्वल चितवन-विलास!
शब्दार्थ-
उज्ज्वल ~ चमकता हुआ
चितवन-विलास ~ तिरछी नजर से देखने की सुंदर कला
व्याख्या-
बादलों के बीच बार-बार चमकने वाली बिजली को देखकर ऐसा लगता है जैसे तुम अपनी चमकीली आँखों से तिरछी नजर डालकर देख रही हो और वह नजर दीपक की तरह चारों ओर प्रकाश फैला रही है।
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
उच्छ्वसित वक्ष पर चंचल है
शब्दार्थ-
उच्छ्वसित ~ साँस लेने से ऊपर उठता हुआ
वक्ष ~ छाती या हृदय
चंचल ~ हिलने-डुलने वाला
व्याख्या-
हे रूपवती वर्षा, तुम्हारे बादलों रूपी घने बाल बहुत आकर्षक हैं। आसमान में उड़ते हुए सफेद बगुलों की पंक्ति ऐसी लग रही है मानो साँस लेने के कारण तुम्हारी छाती पर कोई चंचल हार हिल रहा हो।
बक-पाँतों का अरविंद हार,
तेरी निश्वासें छू भू को
शब्दार्थ-
बक-पाँतों ~ बगुलों की पंक्तियाँ
अरविंद हार ~ कमल के फूलों की माला
निश्वासें ~ छोड़ी गई साँसें
भू ~ धरती
व्याख्या-
सफेद बगुलों की वह उड़ती हुई पंक्ति तुम्हारे गले में पहने हुए सफेद कमल के फूलों के हार जैसी लग रही है। जब तुम्हारी ठंडी साँसें इस सूखी धरती को छूती हैं तो चारों ओर शीतलता फैल जाती है।

वर्षा के आगमन से प्रकृति में उल्लास:
बन बन जातीं मलयज बयार;
केकी-रव की नूपुर-ध्वनि सुन
शब्दार्थ-
मलयज बयार ~ चंदन की सुगंधित हवा
केकी-रव ~ मोरों की आवाज
नूपुर-ध्वनि ~ पायलों की छनछनाहट
व्याख्या-
धरती पर पड़ते ही तुम्हारी ठंडी साँसें चंदन की सुगंध वाली शीतल हवा में बदल जाती हैं। वर्षा ऋतु में मोरों की मधुर आवाज ऐसी लगती है जैसे तुम्हारे पैरों में बंधी हुई पायलों की मीठी ध्वनि गूँज रही हो।
जगती जगती की मूक प्यास!
रूपसि तेरा घन-केश-पाश!
शब्दार्थ-
जगती ~ जाग उठती है
जगती की ~ संसार की
मूक ~ चुपचाप या मौन
व्याख्या-
तुम्हारे पैरों की पायल रूपी मोरों की उस मीठी आवाज को सुनकर इस पूरी दुनिया की शांत और सोई हुई प्यास अचानक से जाग उठती है। हे सुंदर वर्षा सुंदरी, तुम्हारे काले बादलों रूपी बाल बहुत सुंदर हैं।
इन स्निग्ध लटों से छा दे तन
पुलकित अंकों में भर विशाल;
शब्दार्थ-
स्निग्ध ~ चिकनी या कोमल
पुलकित ~ खुशी से भरी हुई
अंकों ~ गोद
व्याख्या-
कवयित्री आग्रह करती हैं कि हे वर्षा रानी, तुम अपनी कोमल और चिकनी बालों की लटों से इस धरती के शरीर को ढक दो। इस विशाल संसार को तुम अपनी खुशियों से भरी हुई गोद में समेट लो।
झुक सस्मित शीतल चुंबन से
अंकित कर इसका मृदुल भाल;
दुलरा दे ना, बहला दे ना
शब्दार्थ-
सस्मित ~ मुस्कान के साथ
मृदुल भाल ~ कोमल माथा
दुलरा दे ~ प्यार कर दे
व्याख्या-
तुम थोड़ा नीचे झुककर अपनी मीठी मुस्कान और पानी की ठंडी बूँदों के चुंबन से इस धरती के कोमल माथे को चूम लो। गर्मी से परेशान इस धरती को तुम थोड़ा प्यार करो और इसके मन को बहला कर इसे शांति दो।
यह तेरा शिशु जग है उदास!
रूपसि तेरा घन-केश-पाश।
शब्दार्थ-
शिशु जग ~ बच्चे के समान यह संसार
उदास ~ दुखी
व्याख्या-
यह पूरा संसार तुम्हारे एक छोटे और नादान बच्चे के समान है, जो गर्मी की तपन से बहुत दुखी और उदास है। हे रूपवती वर्षा सुंदरी, तुम्हारे काले बादलों रूपी बाल सभी को आनंदित करने वाले हैं।
काव्य सौंदर्य और केंद्रीय संदेश:
काव्य सौंदर्य:
रस: यहाँ मुख्य रूप से श्रृंगार रस और वात्सल्य का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।
छंद: यह एक मुक्तक छंद की कविता है जिसमें लय और प्रवाह मौजूद है।
अलंकार: मानवीकरण अलंकार पूरे काव्य में है, अनुप्रास अलंकार श्यामल श्यामल में, और रूपक अलंकार घन-केश-पाश में प्रयुक्त हुआ है।
भाषा: संस्कृत निष्ठ खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग किया गया है जो बहुत ही मधुर और कोमल है।
गुण: पूरी कविता में माधुर्य गुण प्रधान है जो मन को मोह लेता है।
कविता का केंद्रीय संदेश:
इस कविता का मुख्य संदेश प्रकृति के प्रति प्रेम और लगाव की भावना को जगाना है।
कवयित्री ने यह बताया है कि गर्मी से तपती हुई धरती को केवल वर्षा ही नया जीवन दे सकती है।
प्रकृति हमारी माता के समान है जो हमेशा हमारा पालन पोषण करती है और हमें सुख देती है।
मनुष्य को भी वर्षा की तरह ही दूसरों के दुख और कष्ट को दूर करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए।
हमें प्रकृति की सुंदरता का सम्मान करना चाहिए और उसके साथ एक गहरा और प्रेमपूर्ण रिश्ता बनाना चाहिए।